(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खून पसीना…“।)
अभी अभी # ९९८ ⇒ आलेख – खून पसीना श्री प्रदीप शर्मा
हमारे शरीर में खून भी है, और पानी भी। जो रगों में दौड़ता रहता है, वह खून कहलाता है। जरा सी चोट लगी, बहने लगता है। थोड़ी मेहनत की, पसीना बहने लगता है। जिनकी आंखें समंदर हैं, वहां समंदर जितने आंसू भी हैं। जितना पानी इस पृथ्वी पर है, उसी के अनुपात से, यानी हमारे इस शरीर में सत्तर प्रतिशत पानी है। हमारी इस पृथ्वी पर भी सत्तर प्रतिशत जल ही तो है।
स्वस्थ और तंदुरुस्त इंसान का खून बढ़ता है। जो हमेशा क्रोध करता है, जलता रहता है, क्या उसका खून नहीं जलता। खून पसीना बहाकर ही इंसान अपनी गृहस्थी चलाता है। खून की कमी और पानी की कमी से इंसान कमजोर हो जाता है। उधर होमोग्लोबिन घटा, इधर खून की बॉटल चढ़ी। शरीर के पानी की मात्रा घटने पर भी तो, सलाइन ही चढ़ाई जाती है।।
इन आंखों में कभी गुस्से में खून उतर आता है तो कभी जब दिल पसीजता है, तो पानी उतर आता है। समंदर ही खारा नहीं होता, हमारा पसीना भी खारा होता है।
कभी जब आपकी उंगली कटती है, तो हम उसे मुंह में ले लेते हैं, हमें हमारे खून का स्वाद भी पता चलता है, आंसू भी गर्म और नमकीन और हमारी रगों में दौड़ता खून भी गर्म और नमकीन। खून की गर्मी ही तो जोश है, जिंदगी है।
उधर जवान सरहद पर खून बहाता है और इधर किसान खेत में पसीना बहाता है। खून और पसीने का कर्ज उतारना हम देशवासियोंके लिए इतना आसान भी नहीं होता।।
जैसा मौसम, वैसी हमारी तासीर। बारिश के मौसम में इधर चाय पी, उधर तुरंत लघु शंका। पानी पीते ही टॉयलेट। ठंड में पसीना नहीं आता, शरीर को गर्मी और धूप चाहिए। भूख भी
गजब की लगती है। ठंड में हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।।
अभी तो गर्मी का मौसम अपने शबाब पर है। जून की शायरी मई में ही गुल खिला रही है ;
आजा मेरी जान,
ये है जून का महीना।
गर्मी ही गर्मी,
पसीना ही पसीना।।
जितना पसीना हम बहाते हैं, उतनी ही अधिक हमें प्यास लगती है। जो मेहनत अधिक करते हैं, उन्हें भूख भी अच्छी ही लगती है। भोजन से ही हमारा शरीर पुष्ट होता है, खून बढ़ता है, हमारी कार्य शक्ति प्रबल होती है।
खून पसीने से बना हमारा यह शरीर ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। जिस तरह कुदरत खाद, पानी और हवा से पेड़, पौधों को सींचती, पल्लवित करती, चंदन वन में परिवर्तित करती है, उसी तरह केवल खून पसीने से हमारा यह शरीर कुंदन सा महकता है। आरोग्य के मंत्र से बड़ा कोई महामृत्युंजय मंत्र नहीं, सोना चांदी च्यवनप्राश नहीं। सच्चा सुख, निरोगी काया। हमने व्यर्थ ही नहीं, खून पसीना बहाया।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख वर्तमान : सुंदरतम उपहार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – सन्नाटा जब मन में पसरने लगे / स्वर- डॉ. निशा आग्रवाल, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२२ ☆
☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘अतीत लैसन है, वर्तमान गिफ़्ट और भविष्य मोटिवेशन’…इस वाक्य में ज़िंदगी का यथार्थ अथवा प्रयोजन निहित है। अतीत हमें शिक्षा देता है; पाठ पढ़ाता है; अच्छे-बुरे की पहचान कराता है। सो! अतीत से लगाव मत रखिए … उसकी स्मृतियों को अपने ज़हन से निकाल बाहर फेंकिए, क्योंकि वे आपके विकास में बाधक-अवरोधक होती हैं… आपको पथ-विचलित करती हैं। हां! अतीत में झांकिए, परंतु उसमें लिप्त मत रहिए… जो अच्छा है, उसे ग्रहण कीजिए; संजोकर रखिए और जो बुरा है, उसे सदैव के लिए त्याग दीजिए। अतीत अर्थात् जो गुज़र गया, कभी लौटकर नहीं आता…फिर उसके लिए शोक क्यों?
आज गिफ़्ट है, उपहार है…उसकी महत्ता समझिए, उसका सम्मान कीजिए और उसे प्राप्त कर खुशी का इज़हार कीजिए…जो भी आपको वर्तमान में मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ अभिवादन-अभिनंदन कीजिए… उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए और मासूम बच्चे की भांति निरीह-निश्छल भाव से प्रसन्नता प्रकट कीजिए। वास्तव में वर्तमान ही सत्य है, क्योंकि अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अर्थात् कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस! यही एक पल है। आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने न तू’ इस भाव को सार्थक करती हैं यह पंक्तियां… आज की अथवा वर्तमान की उपादेयता पर प्रकाश डालती हैं। बुद्धिमान लोग आज में अर्थात् वर्तमान में जीते हैं; समय की महत्ता को स्वीकारते हैं और एक भी पल व्यर्थ नहीं जाने देते। चारवॉक दर्शन भी ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ सिद्धांत का पक्षधर है, संदेश-वाहक है और प्रयोगवाद व नयी कविता का क्षणवादिता का दृष्टिकोण भी हर पल को खुशी से जीने व भोग लेने की सीख देता है, क्योंकि वे नहीं जानते कि अगला पल आएगा या नहीं…यह शाश्वत सत्य है; अनास्था की पराकाष्ठा है। हमारे ऋषि- मुनियों ने वर्तमान की सार्थकता दर्शाते हुए, हर पल को अंतिम स्वीकार, कर्मनिष्ठता का संदेश दिया है। संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो! वर्तमान में जीना सीखिए, यही ज़िंदगी का सार है।
भविष्य प्रेरणा है; अनिश्चित है, परंतु वह हमारा प्रेरक है…जिससे तात्पर्य है कि मानव को जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘वह कौन है और उसका संसार में आने का क्या प्रयोजन है? उसका लक्ष्य क्या है? लक्ष्य निर्धारण के पश्चात् ही आप उस लीक पर चल सकते हैं अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति में स्वयं को जी-जान से जुटा सकते हैं। इसके लिए हमारे पूजनीय माता-पिता, गुरु-जन व धार्मिक ग्रंथ ही हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। सो! इनके प्रति श्रद्धा भाव रखना अपेक्षित है। परंतु आजकल तो यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ वाली बातें मात्र जुमले बन कर रह गयी हैं। पहले वे हमारे आदर्श होते थे और हम उनके व्यक्तित्व को देख स्वयं को उसी रूप में ढालने में प्रयासरत रहते थे।
परंतु आजकल तो जीवन-मूल्य दरक़ रहे हैं…उनका निरंतर पतन हो रहा है। सो! ‘यथा राजा तथा प्रजा’ अर्थात् चारों ओर अराजकता का वातावरण छाया हुआ है। सो! किसी से आस्था व विश्वास की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है, निष्प्रयोजन है। हिंसा, लूटपाट व अनाचार, अनास्था व भ्रष्टाचार के वातावरण में, जहां इंसान किसी भी कीमत पर अधिकाधिक धन कमाना चाहता है; वहीं उसके हृदय से स्नेह, प्रेम व सौहार्द के भाव नदारद होते जा रहे हैं। वह रिश्तों की अहमियत को नकार, परिवार की खुशियों को अपने हाथों बेदर्दी से रौंद डालता है और दूर… बहुत दूर निकल जाता है, जहां उसे अपने सभी बेग़ाने नज़र आते हैं। इस मन:स्थिति में वह केवल धन की महत्ता को सर्वोपरि मानता है और अपने परिवारजनों और परिजनों की अहमियत व अपेक्षा-आवश्यकता नहीं महसूसता।
धन-संपदा हमेशा साथ नहीं देती। लक्ष्मी स्वभाव से चंचल है… ‘आज यहां, कल वहां।’ सो! एक लंबे अंतराल के पश्चात् उसे अपने आत्मजों की याद आती है, जिन्हें समय की आंधी बहा कर बहुत दूर ले जा चुकी होती है। अब वे उसे लेशमात्र अहमियत भी नहीं देते और वह एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाता है। समय नदी की भांति सदैव बहता रहता है, कभी रुकता नहीं। इसलिए मानव को समय के महत्व व अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त करता व सचेत रहता है तथा उस ग़लती को नहीं दोहराता… ग़लत राह का अनुसरण भी नहीं करता। भविष्य हमें प्रेरणा देता है। सो! लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होना श्रेयस्कर है… जिसके लिए दरक़ार है… आत्मविश्वास व दृढ़ निश्चय की। हां! रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पांव रख कर आगे बढ़ना ही … हमारे धैर्य की परीक्षा है।
अब्दुल कलाम जी इसलिए ‘खुली आंखों से सपने देखने की बात कहते हैं, बंद आंखों से नहीं।’ आप स्वयं को परिश्रम की भट्ठी में झोंक डालिए…अच्छे- बुरे का ध्यान रखते हुए, स्व-पर, राग-द्वेष व लाभ- हानि से ऊपर उठ जाइए…यही सफलता की कसौटी है। दूसरे शब्दों में संसार में आप व्यक्ति नहीं,व्यक्तित्व बन कर जिएं, क्योंकि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, व्यक्तित्व की नहीं…वह अपने आदर्शों के रूप में सदैव ज़िंदा रहता है। परंतु यह तभी संभव है, जब हमारा लक्ष्य सामान्य मानव की तरह जीने का न हो अर्थात् संसार के समस्त प्राणी-जगत् में खाना-पीना सोना व सृष्टि-संवर्द्धन में सहयोग देना–तो सामान्य क्रियाएं हैं; परंतु मानव को प्रदत्त सोचने-समझने की शक्ति उसे श्रेष्ठता प्रदान करती है। मानव का मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि उसे शेष प्राणी-जगत् से अलग स्वरूप प्रदान करती है, जिसके बल पर वह सृष्टि पर आधिपत्य स्थापित कर, सबको अंगुलियों पर नचा सकता है। परंतु उसकी सकारात्मक सोच उसे ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ बनाने का सामर्थ्य रखती है। व्यक्तित्व अर्थात् जिस पर दुनिया नाज़ करती है… उसके गुणों की चर्चा समस्त विश्व में होती है… सब उसके गुणों का अनुसरण करते हैं और वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं… उसका सानिध्य पाकर वे स्वयं को धन्य अथवा सौभाग्यशाली समझते हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही दुनिया से रुख्सत हो जाए, परंतु वह मानव-मात्र के हृदय में समाया रहता है, सबके दिलों पर राज्य करता है। इसलिए मानव को व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बनकर जीने का संदेश दिया गया है।
सोना अग्नि में तप कर ही कुंदन बनता है तथा उसकी चमक कीचड़ में गिरने के पश्चात् भी कम नहीं होती। इसलिए मानव का चरित्र भी कुंदन की भांति होना चाहिए, जिस पर आलोचनाएं प्रभावी न हो पाएं। सो! उसे स्थितप्रज्ञ होना चाहिए, जिस पर सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान व निंदा-स्तुति का लेशमात्र भी प्रभाव न हो। शायद! इसीलिए आलोचनाओं को साबुन स्वीकार कर, उनसे अपने अंतर्मन में निहित अहं को धोने अर्थात् त्यागने का संदेश दिया गया है, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए उससे अपने भीतर छुपी दुष्प्रवृत्तियों …काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से मुक्ति पाने का आग्रह किया गया है। इसलिए हमें आलोचकों अर्थात् निंदकों को जीवन में श्रेष्ठ स्थान देना चाहिए तथा सबसे बड़ा हितैषी स्वीकारना चाहिए, क्योंकि वे ही तो अपना सारा समय आपको, आपके दोष-दर्शन कराने में नष्ट करते हैं। वे अपने समय को आपके हित व समुन्नत करने में उपयोग करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छ्वाय’ अर्थात् निंदक को सदैव अपने निकट रखना चाहिए। इस तरह वे आप के विकास के निमित्त सदैव चिंतित रहते हैं और आपको व्यक्ति से व्यक्तित्व बनाने में इनका योगदान श्लाघनीय है, अविस्मरणीय है।
मानव को इन हितैषियों द्वारा सुझाए गए रास्तों का अनुसरण कर, अपने अंतर्मन को निर्मल करना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बिना साबुन पानी के आप को, दोषों व अवगुणों से अवगत करा कर प्रसन्न होते हैं। वे आपके प्रति ईर्ष्या-भाव नहीं रखते, क्योंकि वे आपके हित-चिंतक होते हैं। वास्तव में मानव को ऐसे लोगों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोत्कृष्ट बनाने में अपने जीवन का अनमोल समय रूपी धन निवेश करते हैं, जिसका लाभ आपको मिल सकता है। यदि आप सजग व सचेत होकर स्वयं में परिवर्तन व सुधार लाएंगे, तो आपकी गणना उत्तम श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।
इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं, वे पंक्तियां ‘जो बाहर की सुनता है, उसका बिखरना निश्चित है और जो भीतर की सुनता है, उसका निखरना अर्थात् संवरना निश्चित है, अवश्यंभावी है’…उपरोक्त विचारों की पोषक हैं। सो! आप व्यर्थ की आलोचनाओं से हताश-निराश न हों, बल्कि इनसे प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाएं। हां! लोग तो आपको बातों में उलझा कर आपको पथ-भ्रष्ट करना चाहते हैं। परंतु वही मनुष्य वास्तव में महान् है, जो उनके कटाक्षों व निंदा से विचलित नहीं होकर बिखरता नहीं… बल्कि अपने अंतर्मन की पुकार सुन कर संवर जाता है, निखर जाता है। सो! माया रूपी सांसारिक आंकर्षणों के पीछे न भागें और न ही दूसरों की आलोचना, व्यंग्य- बाण व कटाक्षों से हैरान-परेशान हों, बल्कि उनकी उपेक्षा कर निरंतर आगे बढ़ते जाएं … यही मानव का लक्ष्य है। हमें अपने अतीत से सीख लेकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि वर्तमान ही सत्य है…उसे सुंदर बनाना अत्यंत कारग़र है, क्योंकि जो सुंदर होगा, कल्याणकारी अवश्य होगा। वर्तमान वह उपहार है, जो प्रभु-प्रदत्त है और आप उसे अपनी इच्छानुसार रूप व आकार प्रदान करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अभिशप्त स्वामिभक्त…“।)
अभी अभी # ९९७ ⇒ आलेख – अभिशप्त स्वामिभक्त श्री प्रदीप शर्मा
महाभारत समाप्त हो चुका है, लीलाधर श्रीकृष्ण अपनी लीला समेट चुके हैं, पाँचों पांडव स्वर्गारोहण के लिए बद्रिकाश्रम के वन में प्रवेश कर चुके हैं। बर्फ़ के पहाड़ में धर्मराज के चारों भाइयों के शरीर गल चुके हैं, और उन्होंने बर्फ में ही समाधि ले ली है। अकेले धर्मराज अपने स्वामिभक्त कुत्ते के साथ स्वर्ग के द्वार में प्रवेश कर चुके हैं। द्वारपाल उनका तो स्वागत करता है, लेकिन कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं देता। युधिष्ठिर भी कह देते हैं कि अगर मेरे साथ मेरे कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता, तो मुझे भी स्वर्ग नहीं जाना। धर्मराज की जीत होती है। स्वामिभक्त श्वान धर्मराज के साथ शान से स्वर्ग में प्रवेश करते हैं।
यहां कहानी ख़त्म नहीं होती। एक कुत्ते की दास्तान शुरू होती है। कई प्रश्न खड़े होते हैं। धर्म की रक्षा के लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं माना जाता, शायद इसीलिए अश्वत्थामा हाथी के मरने पर नरो वा कुंजरो वा कहने पर भी धर्मराज के धर्म का सिंहासन नहीं डोलता। लेकिन द्यूत क्रीड़ा में उनकी हार यह दर्शाती है कि अधर्म के काम में कभी धर्म की विजय हो ही नहीं सकती। अगर द्यूत क्रीड़ा में धर्मराज जीत भी जाते तो मानवता को एक गलत संदेश जाता। जुए में हमेशा धर्म की हार ही होती है।।
कुत्ते की योनि भी भोग योनि ही है, लेकिन एक पशु योनि! केवल नर ही नहीं, सत्संग का असर तो पेड़ पौधों और पशु पक्षियों पर भी पड़ता है। गिरधर की मुरलिया हो या रविशंकर का सितार। बज जाता मन का तार तार। कुछ लोग उस कुत्ते के भाग्य को सराहते हैं, जो रईसों के यहां पलते, बढ़ते हैं। उसकी समझदारी और वफादारी की तारीफ करते नहीं थकते। लेकिन जब किसी आवारा कुत्ते को सड़क पर, किसी वाहन से कुचला पड़ा हुआ देखते हैं, तो मुंह से यही निकलता है, भगवान ऐसी कुत्ते की मौत किसी को ना दे।
एक ही पशु योनि का कुत्ता! एक धर्मराज के साथ स्वर्ग का भागी बनता है तो एक सड़क पर अपनी मौत मरता है। लेकिन दोनों जगह धर्मराज के धर्म की तरह, कुत्ते की स्वामिभक्ति कायम है, क्योंकि वफादारी उसका जन्मजात गुण है। धर्म को कभी वफादारी से अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी स्वामिभक्त होते हुए भी यह प्रजाति अभिशप्त है।।
हम इंसान हैं, कोई जंगली जानवर नहीं, इसलिए उस पालतू कुत्ते की ही बात करेंगे, जो सदियों से गांव गांव, डगर डगर और नगर नगर आदमी का साथ निभाता आया है। रोटी के बदले रखवाली और वफादारी के साथ साथ वह प्यार का भी भूखा होता है। कुत्ता किसी का भी हो, एक बार अगर वह आपको पहचान गया, तो समझो आपका हो गया। जो कुत्तों से डरते हैं, कुत्ता उन्हें और डराता है। जो कुत्तों को अपने से दूर भगाते हैं, कुत्ता उन्हें भी पीछा करके, बड़ी दूर तक भगाता है। कुत्ते का डर काटने से जुड़ा है और काटने का डर, कुत्ते के पागल होने के साथ। इसलिए जो अपनी जान से करे प्यार, वो कुत्ते से कैसे करे प्यार।
इंसान अगर पागल हो, तो उसके लिए मनोचिकित्सक हैं, पागलखाने हैं, लेकिन अगर कोई कुत्ता अगर पागल हो जाए और किसी इंसान को काट ले, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।
कौन कुत्ता कब पागल हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। उस पागल कुत्ते का केवल एक ही इलाज है, उसे गोली मार दी जाए। सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी यही कहता है। एक पागल कुत्ते की नियति भी शायद यही है, ” सरकार मैने आपका नमक, खाया है! ” तो अब गोली खा।।
रात भर जागते रहने से इसे आप निशाचर भी कह सकते हैं। लेकिन रामभक्त हनुमान की तरह इसकी स्वामिभक्ति वरदान नहीं, एक अभिशाप है। हनुमान जी के बिना राम दरबार अधूरा है। एक कुत्ते के ऐसे नसीब कहां ? उसे तो जब मन करा, टरका दिया जाता है, लकड़ी से मार भगा दिया जाता है। कई लोग शिकायत करते हैं, मुझे कुत्ते की तरह घर से निकाल दिया। मेरी घर में इज्जत, एक कुत्ते से भी गई गुजरी हो गई है।।
कुत्ता अभिशप्त है, अकारण भौंकने को, रात रात भर जागने को, अपने स्वामी के आगे दुम हिलाने को। वह कितना भी वफादार हो, स्वामिभक्त हो, आपके घर की रखवाली करता हो, रहेगा एक कुत्ता ही। कुत्ते की पूंछ जिस तरह हमेशा टेढ़ी रहती है, उसका भौंकना कभी बंद नहीं होगा। वही उसका अस्त्र भी है और ब्रह्मास्त्र भी। आदमी कुत्ते से वफादारी भले ही नहीं सीख पाया हो, हां, भौंकना जरूर सीख गया है।
वह शायद जानता है, वह ऊपर वाला सभी की सुनता है। ईश्वर में भेद बुद्धि नहीं। वह इंसान और जानवर में भेद नहीं करता। उसका भौंकना ही उसका दर्द है, उसकी पुकार है, उसकी अजान है, अरदास है। उसे कोई नाम नहीं आता, शायद भौंकना ही उसका महामंत्र है। ईश्वर ही उसकी भाषा समझ सकता है। उसे उसकी वफादारी और स्वामिभक्ति का पुरस्कार दे सकता है। उसे इस अभिशाप से मुक्त कर सकता है।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं?…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८७ ☆
☆तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं? ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
तपन जब अपने चरम पर होती है, तब मन किसी तर्क से नहीं, केवल अनुभव से चलता है। धूप में दो कदम चलते ही भीतर एक ही पुकार उठती है — “काश कहीं कोई पेड़ मिल जाए… बस एक पल की छाँव मिल जाए।” यह चाह केवल शरीर की थकान नहीं होती, यह आत्मा की प्यास भी होती है।
कभी आपने ध्यान दिया है—कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ पेड़ों की हरियाली सिर पर छतरी-सी तनी रहती है। उन्हीं रास्तों से गुजरते हुए, चाहे आप खुले में हों या गाड़ी के भीतर, गर्मी का तीखापन जैसे कहीं खो जाता है। हवा वही होती है, सूरज वही होता है, पर एहसास बदल जाता है। वहाँ धूप जलाती नहीं, बस छूकर निकल जाती है।
और दूसरी ओर, वे रास्ते जहाँ पेड़ नहीं हैं—जहाँ केवल कंक्रीट है, तपती ज़मीन है, और बिन छाँव का विस्तार है। वहाँ आप गाड़ी के भीतर बैठकर एसी चला लें, फिर भी भीतर कहीं न कहीं गर्मी का एक अदृश्य बोझ बना रहता है। जैसे वातावरण ही तपकर भीतर उतर रहा हो।
यह अंतर केवल तापमान का नहीं, यह प्रकृति के स्पर्श का अंतर है।
पेड़ केवल छाया नहीं देते, वे वातावरण को संतुलित करते हैं। उनकी पत्तियाँ हवा को ठहराती हैं, उसे शीतल बनाती हैं, और उनकी जड़ें धरती में जल को थामे रखती हैं। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, वहाँ धरती की नमी जीवित रहती है, वहाँ जीवन की साँसें गहरी होती हैं।
हरियाली दरअसल प्रकृति का वह मौन संगीत है, जो बिना शब्दों के हमें सुकून देता है। जब हम पेड़ों के बीच से गुजरते हैं, तो केवल शरीर नहीं, मन भी ठंडा होता है। जैसे कोई अदृश्य हाथ हमारे माथे को सहला रहा हो और कह रहा हो—“ठहरो, सब ठीक है।”
शायद इसी कारण, जब जीवन की भागदौड़ और गर्मी दोनों हमें थका देती हैं, तब हम अनायास ही हरियाली की ओर खिंचते हैं। क्योंकि पेड़ों की छाँव में केवल विश्राम नहीं, एक गहरा अपनापन मिलता है—एक ऐसा अपनापन, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ देता है।
तो इस तपते समय में, जब हर कोई सुकून की तलाश में है, क्यों न हम खुद भी उस सुकून का कारण बनें?
एक पेड़ लगाएँ, एक पौधे को बढ़ने दें, ताकि आने वाले समय में जब कोई राहगीर उस रास्ते से गुजरे, तो उसे भी वही शीतलता मिले, वही राहत मिले—जो हम आज तलाश रहे हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और पत्थर …“।)
अभी अभी # ९९६ ⇒ आलेख – फूल और पत्थर श्री प्रदीप शर्मा
सन् १९६६ में धर्मेंद्र और मीना कुमारी की एक फिल्म आई थी, फूल और पत्थर ! एक पत्थर दिल इंसान और कोमल ह्रदय वाली मीनाकुमारी की यह फिल्म थी । उसके बाद से बहुत कुछ बदला है । और बदले की इस आग में एक नए किस्म का पत्थर, शक्ल ले चुका है,जिसका नामकरण किया गया है नफ़रत का पत्थर ।
कितना भाग्यशाली होगा,वह पत्थर,जो रामजी के नाम लेने से तैरने लगता है और पूरी वानर सेना को पुल बनाकर समुद्र के पार पहुंचाता है ।।
पत्थर अभिशप्त है,रास्ते में पड़े रहने के लिए ! जो ठोकर खाता है पत्थर से,वह पत्थर को कोसता भी है और ठोकर खाने के बावजूद उसी पत्थर को एक ठोकर और मारता है । बेजुबान पत्थर हमें यह समझाता है,तुमने मुझे ठोकर मारी । ठीक है, अब तो संभल जाओ । देखकर चलो ! नहीं तो ज़िन्दगी भर ठोकरें ही खाते रहोगे ।
नसीब अपना अपना ! कोई फूल कहाता,कोई पत्थर । कांटों को तो गुलाब अपने गले लगाता है,पत्थर का ऐसा नसीब नहीं । पत्थर को कोई गले नहीं लगाता ।
जब कोई पहाड़ टूटता है ,तब पत्थर का जन्म होता है । अगर बहती नदी में गिरे, तो घिस घिस कर या तो शालिग्राम हो जाता है या फिर कंकर से शंकर । वही
पत्थर जब किसी मूर्तिकार द्वारा तराशा जाता है,तो किसी मंदिर में विराजमान हो जाता है, लोग उसी पत्थर को पूजने लग जाते हैं ,उस पर फूल चढ़ाए जाते हैं ।
पत्थर से इमारतें बनती हैं तो कोई पत्थर मील का पत्थर कहलाता है । सुना है पत्थर दिल इंसान भी होते हैं । वह पत्थर कितना भाग्यशाली होगा,जिस पर रोजाना फूल चढ़ते होंगे ।।
शिव शंकर तो इतने पत्थर दिल है कि एक पत्थर में ही समा गए । कोई कंकर शंकर कहलाया तो कोई पत्थर शिव लिंग । कभी भोले भंडारी तो कभी रौद्र रूप धारी । हम उसी पत्थर का अभिषेक करते हैं ।
श्रृद्धा और भक्ति को पुष्प द्वारा प्रकट किया जाता है और नफरत को ,पत्थर फेंककर । इसमें पत्थर का कोई दोष नहीं ;
इक लोहा पूजा में राख्यो
एक घर बधिक धरयो ।
पारस गुन अवगुन नहिं परखत
कंचन करत खरयो ।।
ठीक इसी प्रकार वही पत्थर जब मंदिर में रखा जाता है तो पूजा जाता है । पत्थर तो इतना बेबस है कि जब तक हम अपना सर उस पर नहीं पटकें,वह हमें हानि नहीं पहुंचा सकता । हमारी हिंसा ही उसे एक अस्त्र बनाती है ।
पत्थर बचपन में हमने भी फेंका है । गणेश चतुर्थी के चंद्रमा को देखना निषेध है । ऐसी मान्यता है कि कोई आप पर झूठी चोरी का इल्ज़ाम लगा देता है । हमारे लिए यह खेल बन गया था । चन्द्रमा को देखना, और किसी की छत पर पत्थर फेंकना । तब अधिकांश छतें पतरे की होती थी ।
बाद में यही पत्थर पहले कुत्तों पर और बाद में भीड़ में बरसने लगे । पत्थरबाजी,पतंगबाजी की तरह एक शौक हो गया । और आज वही पत्थर पूरी तरह बदनाम हो गया,जब उसे नफरत का पत्थर नाम दे दिया गया । नफ़रत हमारी,और बदनाम पत्थर । पत्थर को पत्थर ही रहने दो,उसे बदनाम ना करो । उसे अपनी नफरत का भागीदार तो मत बनाओ ।
आजकल किसी के घर शीशे के नहीं होते । शब्द बाण भी नफरत का पत्थर ही है । प्रेम और भक्ति में पुष्पों की वर्षा होती है,पुष्पगुच्छ का आदान प्रदान होता है । श्रद्धा में पुष्पांजलि भी अर्पित की जाती है । हमारे मुंह से भी शब्द पुष्प की तरह झरें ।
हमारे हाथों में पत्थर की जगह हमेशा फूल हो । जो पाषाण हृदय हैं,उनका हृदय पिघले । उसमें सदा करुणा का वास हो । आमीन ।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆कुओंकापानी: जिसेहमनेबोतलोंमेंकैदकरदिया… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना कुआँ अब बूढ़े आदमी जैसा लगता है।
चुप… थका हुआ… और भुला दिया गया।
उसके किनारों पर अब बच्चों की हँसी नहीं गूंजती। रस्सी की “चर्र-चर्र” वाली आवाज़ अब इतिहास बन चुकी है। जहाँ कभी औरतों की बातें, ठहाके और गीत गूंजते थे, बुज़ुर्ग वहीं बैठकर हुक्का पीते थे। वहाँ अब सिर्फ सूखी पत्तियाँ उड़ती हैं और कभी-कभी कोई छिपकली दीवार पर भागती दिखाई दे जाती है।
कुआँ मरता नहीं है। वह बस इंतज़ार करता है। किसी अपने के लौटने का।
लेकिन अब कौन लौटेगा?
अब तो हर घर में आरओ (RO) लगा है, हर हाथ में प्लास्टिक की बोतल है और हर इंसान खुद को “हाइजीनिक” समझकर मिट्टी की खुशबू से भाग रहा है।
दादी उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं – मुझे याद है गर्मियों की दोपहरें।
जब सूरज आग उगलता था और खेतों की मिट्टी पैर जला देती थी।
तब एक पीतल की गागर लेकर कुएँ तक जाती थीं। रस्सी फेंकती थीं… बाल्टी “छपाक” से पानी में गिरती थी… और फिर दोनों हाथों से रस्सी खींचती थीं।
वह सिर्फ पानी नहीं निकाल रही होती थीं। वह धरती का दिल बाहर खींच रही होती थीं। उस पानी में ठंडक नहीं, दुआ होती थी। पहला घूंट गले से उतरता नहीं था… आत्मा तक पहुँच जाता था।
आज की बोतल वाला पानी? वह पानी नहीं, प्लास्टिक का घमंड है। उस पर लिखा होगा – “मिनरल वॉटर”, “प्योर”, “हिमालयन”।
कुएँ का पानी इंसान को जोड़ता था। बोतल का पानी इंसान को अकेला कर गया। पहले लोग कुएँ पर मिलते थे। कोई रस्सी पकड़ लेता था, कोई बाल्टी खींच देता था, कोई हालचाल पूछ लेता था। पानी भरते-भरते रिश्ते बन जाते थे। कई प्रेम कहानियाँ वहीं शुरू हुई थीं। कई झगड़े वहीं खत्म हुए थे।
अब?
अब हर कोई अपनी-अपनी बोतल लेकर घूम रहा है जैसे दिल नहीं, “पर्सनल पैकेजिंग” लेकर पैदा हुआ हो। पहले माँ मटके में कुएँ का पानी भरती थीं। उस मटके के ऊपर रखा पीतल का गिलास पूरे घर की प्यास बुझाता था। कोई “माय बोतल”, “योर बोतल” नहीं होता था। आज हर बच्चे के बैग में अलग बोतल है और हर इंसान के दिल में अलग अकेलापन।
कुएँ का पानी सिर्फ शरीर नहीं ठंडा करता था। वह इंसान का दिमाग भी शांत करता था। कुएँ के पास बैठो तो हवा अलग लगती थी। ऐसा लगता था जैसे धरती धीरे-धीरे तुम्हारे सिर पर हाथ फेर रही हो।
अब आरओ (RO) मशीन दीवार पर टंगी रहती है जैसे कोई सरकारी क्लर्क हो। उस मशीन में कोई आत्मा नहीं है। कुएँ में आत्मा थी। कुएँ के पानी में मिट्टी की हल्की-सी खुशबू होती थी।
वही खुशबू जो पहली बारिश में आती है और आदमी को बचपन में पहुँचा देती है। आज के फिल्टर उस खुशबू को “इम्प्योरिटी” बोलकर मार देते हैं।
कितनी अजीब बात है। हमने स्वाद को बीमारी मान लिया और केमिकल को शुद्धता।
अब गाँवों में भी लोग कहते हैं – “कुएँ का पानी मत पीना, सेफ नहीं है।” लेकिन वही लोग पिघला हुआ प्लास्टिक मिला पानी पी जाते हैं।
फिर डॉक्टर के पास जाकर पूछते हैं – “पता नहीं शरीर में इतनी गर्मी क्यों बढ़ रही है?”
कुआँ गाँव का व्हाट्सऐप (Whatsapp) था। हर खबर वहीं मिलती थी। किसके घर मेहमान आए, किसकी फसल अच्छी हुई, किसकी बेटी की शादी तय हुई – सब कुछ वहीं पता चलता था।
आज मोबाइल में हजारों कॉन्टैक्ट्स (Contacts) हैं, लेकिन दरवाज़ा खटखटाने वाला एक इंसान नहीं।
हमने सुविधा के चक्कर में जीवन का स्वाद खो दिया।
फ्रिज ठंडा दे सकता है, लेकिन ताज़गी नहीं।
आरओ साफ पानी दे सकता है, लेकिन अपनापन नहीं।
बोतल स्टेटस दे सकती है, लेकिन संतोष नहीं।
और सबसे दुखद बात?
अब कुएँ सिर्फ फिल्मों में दिखते हैं। हीरोइन वहाँ गाना गाती है, लोग फोटो खींचते हैं और फिर वापस मिनरल वॉटर पीने चले जाते हैं। कुएँ को हमने विरासत नहीं रहने दिया। उसे “बैकग्राउंड एस्थेटिक” बना दिया।
जिस कुएँ ने पीढ़ियों की प्यास बुझाई, आज उसी में लोग कूड़ा फेंक देते हैं।
प्लास्टिक की बोतलें… चिप्स के पैकेट… टूटी चप्पलें…
कभी-कभी लगता है, धरती माँ भी थक गई होगी।
वह सोचती होगी – “मैंने इन्हें नदियाँ दीं, कुएँ दिए, बारिश दी… और इन्होंने बदले में मुझे प्लास्टिक लौटा दिया।”
अगली बार जब आप फ्रिज से बोतल निकालकर पानी पिएँ, तो एक पल रुकिएगा।
आँखें बंद करके उस पुराने कुएँ को याद कीजिएगा।
रस्सी की आवाज़… बाल्टी की छपाक… मटके की ठंडक…और दादी के हाथों का वह पीतल का गिलास।
फिर समझ आएगा –
प्यास सिर्फ गले की नहीं थी। प्यास रिश्तों की भी थी। और वह प्यास… बोतलों से कभी नहीं बुझ सकती।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि…“।)
अभी अभी # ९९५ ⇒ आलेख – योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि श्री प्रदीप शर्मा
हम यहां वेद और आयुर्वेद की चर्चा नहीं कर रहे, ना ही उस जठरग्नि का जिक्र कर रहे, जिसके कारण हमारे पेट मेंअक्सर चूहे दौड़ा करते हैं, और जब कड़ाके की भूख लगती है, तो जो खाने को मिले, उसे कच्चा चबा जाने का मन करता है।
हमारा शरीर हो, अथवा यह सृष्टि, पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश, इन पांच तत्वों का ही तो सब खेल है। अग्नि को साधारण बोलचाल की भाषा में हम आग बोलते हैं। सोलर सिस्टम तक हम भले ही नहीं जाएं, सोलर एनर्जी तक हम जरूर पहुंच गए हैं। गरीब का चूल्हा और एक मजदूर की बीड़ी आज भी आग से ही जलती है। इतनी दूर बैठा सूरज, देखिए कैसा आग उगल रहा है। आपके पास जो आयेगा, वो जल जायेगा।।
अग्नि का धर्म ही जलाना है, खाक करना है। कलयुग में हम कितने सुखी हैं, कोई कितना भी जले, हमें बददुआ दे, हमारा बाल भी बांका नहीं होता। अगर सतयुग होता तो कोई भी सिद्ध पुरुष क्रोध में हमें शाप देकर भस्म कर देता।
आज भी आयुर्वेदिक चिकित्सा में भस्म का बहुत महत्व है। हमने बचपन में अपनी मां को राख से बर्तन मांजते देखा है, और यज्ञ और हवन की भस्म हमने भी माथे पर लगाई है।
एक अग्नि योग की होती है, जहां यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अवस्था के पश्चात योगियों के सारे काम, क्रोध, लोभ और मोह के विकार जल कर खाक हो जाते हैं, और उसमें योगाग्नि प्रज्वलित हो जाती है। हजारों वर्षों तक ये योगी तपस्या किया करते थे, तब जाकर भोलेनाथ प्रसन्न होते थे। मांग वत्स वरदान।।
यह सब सुनी सुनाई गप नहीं, हमारा सनातन धर्म है। मत करो भरोसा, हमें क्या। लेकिन हमारी बात अभी खत्म नहीं हुई। परशुराम, महर्षि विश्वामित्र और दुर्वासा के क्रोध के चर्चे तो आपने सुने ही होंगे। शिव जी के तीसरे नेत्र से कौन नहीं डरता। जहां योगाग्नि होगी, वहीं क्रोधाग्नि भी अवश्य मौजूद होगी। अग्नि तो अग्नि है, उसका काम ही भस्म करना है।
मर्यादा पुरुषोत्तम हों अथवा वासुदेव कृष्ण, कहीं अचूक रामबाण तो कहीं सुदर्शन चक्र, अगर एक बार चल गए तो बिना अपना काम किए, कभी वापस नहीं आते। बहुत सोच समझकर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जाता था।।
हमारे पास आज योगाग्नि तो है नहीं, लेकिन क्रोधाग्नि की कोई कमी नहीं। क्रोध में खुद ही जलते भुनते रहते हैं। शक्ति का प्रयोग उन्हें ही करना चाहिए, जिनमें विवेक बुद्धि हो, तप और स्वाध्याय का बल हो।
अग्नि से ही ओज है,
अग्नि से ही संहार है।
दुधारी तलवार है, योगाग्नि क्रोधाग्नि।
क्रोध आया, किसी पर हाथ उठा दिया, गाली गलौच कर ली, अपने ही कपड़े फाड़ लिए, हद से हद, अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली, लो जी, हो गई तसल्ली। क्या करें योगाग्नि तो है नहीं। ईश्वर समझदार है, कभी बंदर के हाथ में तलवार नहीं देता।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मि.एंड मिसेस कोयल…“।)
अभी अभी # ९९४ ⇒ आलेख – मि. एंड मिसेस कोयल श्री प्रदीप शर्मा
जो कूकती है, उसे कोयल कहते हैं। बचपन से आज दिन तक मैने केवल दो आवाजें ऐसी सुनी हैं, जिन पर समय, काल और परिस्थिति कोई प्रभाव नहीं पड़ पाया, एक तो स्वयं कोयल और एक कोकिल कंठी, लता मंगेशकर। अक्सर, दिन यही गर्मियों के होते थे, जब अचानक वातावरण में, किसी पेड़ की ऊंची शाखा से, कुहू कुहू की आवाज गूंज जाती थी। हम भी प्रत्युत्तर में उसकी नकल करते हुए कुहू कुहू दोहराते। हम थक जाते, लेकिन वह कभी नहीं थकती। आज भी वही
कोयल है, और वही उसकी चिर परिचित मीठी कूक।
हमने बचपन में एक अंग्रेजी कविता पढ़ी थी, जिसमें कोयल की कूक का जिक्र तो नहीं था, लेकिन एक मुर्गे महाशय का जरूर था।
The cock is crowing
And the birds doth twitter.
समय के साथ भले ही मुर्गे की आवाज दबती चली गई और घर की मुर्गी दाल बराबर हो गई हो, न तो मुर्गे ने बांग देना बंद किया और ने ही मुर्गी ने अंडे देना। कैसे कैसे वॉरियर्स हैं, वॉलंटियर्स हैं प्रकृति में, निष्काम, निःशब्द, निरहंकार।।
कोयल की बात हो, और सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जिक्र ना हो, यह मुमकिन नहीं। जब लताजी ने स्वर्ण सुंदरी का यह खूबसूरत गीत राग यमन में गाया होगा तो कोयल ने भी मुदित मन से ना केवल अपना सिर हिलाया होगा, लता जी के साथ जरूर कुहू कुहू दोहराया होगा। गीत देखिए ;
कुहू कुहू बोले कोयलिया
कुंज कुंज में भंवरे डोले
गुन गुन बोले, अमृत घोले।
इन पक्षियों को राग रागिनी कौन सिखलाता है। जो पक्षी गा सकता है, वह मूक कैसे कहला सकता है।
हम उसकी भाषा नहीं जानते, यह कहना ही ठीक होगा। ऐसा क्या है जिस कारण इन पक्षियों का शोर कलरव कहलाता है और हमारा शोर ध्वनि प्रदूषण। ।
जंगल में मोर नाचा, किसने देखा ! मोर महाशय कभी हमारे लिए नहीं नाचते। वे तो मिसेस मोरनी को प्रभावित करने के लिए अपने मोर पंख फैलाकर गोपीकृष्ण की तरह अपनी छटा बिखेरते हैं। यह एक आम धारणा है कि कोयल भी मादा ही है। बचपन की एक कविता तो यही कहती है ;
कौआ कोयल दोनों काले
पर दोनों के नाम निराले।
कांव कांव कौआ करता है,
कोयल कू कू बहुत सुहाती
डाल डाल पर वह है गाती। ।
अब जो गाती है, वह अगर कोयल हुई, तो कहीं ना कहीं उसके मिस्टर भी तो होंगे ही। जब मामले की तह में जाने की कोशिश की तो विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ कि हम जिसकी आवाज़ पर फिदा हैं, वे तो मिस्टर कोयल निकले। ये मिस्टर कोयल काले जरूर हैं, लेकिन इनकी ही कूक में दम है। यानी यहां भी मोर मोरनी वाला ही मामला दिखता है। हमें मिसेस कोयल से पूरी सहानुभूति है। हम कोई पक्षी विशेषज्ञ नहीं, अधूरा ज्ञान बांटने से अच्छा है, क्यों न किसी जानकार की राय ले ली जाए। हम तो इस विषय में पक्षी विशेषज्ञ सलीम अली को ही अथॉरिटी मानते हैं। इस विषय में क्या कहता है आपका पक्षी ज्ञान, पूछता है भारत।
यह हमारी भी आस्था का सवाल है। क्या नारी विमर्श की तरह पक्षी संगठन में मिसेस कोयल के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठा सकता। जिसकी आवाज मधुर है, जिसकी कुहू कुहू हमें बहुत सुहाती, वह कोयल ही है।
या यहां भी कोई धर्मराज इनकी आवाज को दबा देगा। नरो वा किं मादा वा। निष्कर्ष कुछ भी हो, कोकिल कंठ तो भारत रत्न लता ही हैं और सदैव रहेंगी। ।
स्वर तो स्वर होता है, हमारी भेद बुद्धि ही उसे स्त्री पुरुष के सांचे में ढालती है। नाद ब्रह्म भेद रहित होता है। जब प्रकृति और पुरुष का भी भेद समाप्त हो जाता है, तब ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है। लेकिन हमें इससे क्या।
मूक बेजुबान पशु पक्षियों को पालतू बनाना, उनके साथ अन्याय करना है। कोयल पक्षी भी बहुत समझदार है। दूर के ढोल की तरह वह भी, मनुष्य की पहुंच से ऊपर, वृक्ष की किसी ऊंची डाल पर ही अपना डेरा जमाता है।
इनके बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती है। इनके पास जाएं, इन्हें परखें, अपनाएं, लेकिन इनकी आजादी में बाधा ना पहुंचाए। इतना बड़ा आंचल है इस वसुंधरा का। प्रेम और दया के पात्र इन शांति दूतों की रक्षा और सुरक्षा ही पर्यावरण की सुरक्षा है। कभी आप मिसेस कोयल की आवाज सुनें तो बताएं, यकीनन, मिस्टर कोयल से उन्नीस ही होगी, बीस नहीं।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७७ ☆ देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆
वैसे तो अपने हर शहर की लस्सी प्रसिद्ध होती हैं। लेकिन गुलाबी शहर का ये लस्सीवाला तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पूर्व काल (1944) का है। ये भी कह सकते हैं, अंग्रेजों के जमाने का है।
दही की लस्सी को पंजाब वाले अपना आविष्कार मानते हैं। हरियाणा वाले भी हिसार की भैंसों के दूध की दही की लस्सी को विश्व की सर्वोत्तम लस्सी का खिताब देते हैं। आप इसको चंडीगढ़ जैसा मसला मान सकते हैं, या फिर रसगुल्ला के जन्म स्थान बंगाल और उड़ीसा के बीच के विवाद जैसा समझ सकते हैं।
पुराने जयपुर (walled city) और नए शहर के मध्य में मिर्जा इस्माइल रोड पर ये दुकान स्थित है। आस पास में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी लस्सीवाला के नाम से मिलते जुलते नाम रख कर लस्सी बेचकर चांदी काटे जा रहे हैं।
लस्सी का सेवन मिट्टी के छोटे और बड़े सिकोरे (ग्लास) में उपलब्ध रहता है। सुबह सात बजे से तीन बजे दोपहर तक या स्टॉक रहने पर ही इसकी सप्लाई चालू रहती है। लस्सी अपेक्षाकृत गाढ़ी रहती है और लकड़ी की चम्मच से खाई भी जाती है। हमारे जैसे तो एक बार मुंह में ग्लास लगाने के बाद पेंदा देखकर ही रुकते हैं। बचपन से ही परिवार में इसका चलन था। दादाजी का एक कांसे का ग्लास जिसकी क्षमता तीन पाव करीब सात सौ मिलीलीटर थी। हमारा भी प्रिय बर्तन हुआ करता था।
युवावस्था में हमारे बैंक की जबलपुर सिटी शाखा से जुड़ी हुई लस्सी की प्रसिद्ध दुकान हुआ करती थी। सन ’75 के आस पास सवा रुपे का एक ग्लास मिलता था। उन दिनों में रेजगारी की किल्लत हुआ करती थी, इसलिए अकेले ही अनेकों बार चार ग्लास गटक जाया करते थे, ताकि रेजगारी की झंझट ही ना हो।
वर्तमान समय में नींबू के भाव कम करने में लस्सी सबसे अचूक हो रहीं हैं। मन में विचार आया, इसकी चर्चा कर लेते हैं, क्योंकि मीठा का सेवन तो अब प्रतिबंधित हो चुका है। कम से कम चर्चा तो कर ही सकते हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “व्यास पीठ…“।)
अभी अभी # ९९३ ⇒ आलेख – व्यास पीठ श्री प्रदीप शर्मा
सृष्टि में पहले व्यास पीठ की स्थापना हुई, तत्पश्चात ज्ञानपीठ की ! ज्ञानपीठ तो केवल पुरस्कार प्रदान करता है, भक्ति और ज्ञान की गंगा तो केवल व्यास पीठ से ही प्रवाहित होती है !
ज्ञानपीठ में तो कई विद्वान पीठासीन होते हैं, लेकिन व्यास पीठ पर जो वक्ता विराजमान होते हैं, उसी में साक्षात महर्षि वेदव्यास पीठासीन हो जाते हैं।
हरि अनंत हरि कथा अनंता ! जो कथा है वही साहित्य है, कहानी है। संस्कृत में तो कई महाकाव्य रचे गए हैं, लेकिन रानी केतकी की कहानी ही, हिंदी की पहली कहानी कहलाती है। कथा हक़ीक़त होती है, कहानी में यथार्थ और कल्पना का मिश्रण होता है।।
बुद्धि और ज्ञान का जहाँ मिलन होता है, वह ज्ञानपीठ कहलाता है। ज्ञान और भक्ति का मार्ग वैराग्य का मार्ग है। जहाँ सरस्वती का वास है, वही वास्तव में व्यास पीठ है।
भागवत कथाओं का सागर है ! व्यास पीठ की कुछ मर्यादा है। कथा सामने बैठकर सुनी जाती है, पीछे बैठकर अथवा वक्ता के स्थान से ऊपर बैठकर नहीं। शुकतार में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिनों में जो कथा सुनाई, वही भागवत का सार है। भय से मुक्ति ही मोक्ष का आधार है। तक्षक नाग के काटने से सात दिनों में मृत्यु तो निश्चित है ही, क्यों न समय रहते भागवत कथा के जरिये भगवत स्मरण कर लिया जाए।।
कलयुग में मोक्ष अथवा मुक्ति इतनी आसान नहीं। सात दिनों में अंग्रेज़ी सीखिए की तर्ज़ पर केवल व्यासपीठ से भागवत कथा सुनने से आत्मिक शांति तो मिल सकती है, वैराग्य अथवा मुक्ति नहीं।
भय से मुक्ति और मनोविकारों से छुटकारा ही वैराग्य का आधार है। मृत्यु का भय ही वह तक्षक नाग है। वैराग्य पलायन नहीं, स्थूल संन्यास नहीं, केवल उस परम तत्व की तलाश है। ज्ञानपीठ हो या कोई व्यासपीठ, सत्य की खोज ही इनका आधार है। चिंतन, मनन, ध्यान, धारणा उस अज्ञात और अज्ञेय को पाने की, अथवा जानने की एक सतत प्रक्रिया है, जो अनादिकाल से चली आ रही है। जिन खोजां तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। बुद्धि, ज्ञान और विवेक को पीठ न देना ही ज्ञानपीठ का सम्मान करना है, किसी व्यासपीठ का हृदय से आदर करना है।।