श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाह और राह…“।)
अभी अभी # ८५६ ⇒ आलेख – चाह और राह
श्री प्रदीप शर्मा
यह विल और वे का मामला है! क्या चाह को हम इच्छा-शक्ति कह सकते हैं। आखिर कुछ तो अंतर होगा डिजायर और विल में! प्रबल इच्छा-शक्ति हमारा मार्ग प्रशस्त कर सकती है,लेकिन सांसारिक चाह तो हमें किसी भी रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर सकती है।
क्या वासना और चाहत में कोई अंतर है ? क्या कोई भी गलत राह सही रास्ते पर पहुँचा सकती है, ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो हमेशा अनुत्तरित रहते चले आए हैं।।
नीति और राजनीति में बहुत अंतर होता है। राजनीति विज्ञान के किताबी दायरे से, जब राजनीति खुले मैदान में आती है,तो खुला खेल फरूखाबादी शुरू हो जाता है। हमने राजनीति के शयनकक्ष में अंतरात्मा और अवसरवाद को हमबिस्तर होते देखा है। सिद्धांत पर आस्था को हावी होते भी देखा है और धर्म और अधर्म को हाथ में हाथ डालकर खुले बाजार में टहलते देखा है।
चाह को हम चाहत अथवा विश भी कह सकते हैं। निरंतर प्रयास, पुरुषार्थ और उचित अवसर मिलने पर कदम मंज़िल की ओर बढ़ ही जाते हैं, और जो चाहा है, वह हासिल हो ही जाता है।।
बर्नार्ड शॉ का तो कहना है कि जो चाहते हो, वह पा लो! वर्ना जो पाया है, उसे ही चाहने लगोगे। एक चाह जीवन का एक नया अध्याय खोल भी सकती है तो एक गलत राह जीवन को बर्बाद भी कर सकती है। शायद इसीलिए किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति लिए रास्ते का चुनाव भी सही होना चाहिए।
कर्म की कुशलता न केवल वांछित फल देती है, एक सात्विक संतुष्टि का भाव भी पैदा करती है,जिसके मूल में आस्था और विश्वास होता है। चाह और राह का सामन्जस्य जीवन के सोपान को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सक्षम होता है। आदर्श और शुचिता ही वह मूल-मंत्र है,जो जहाँ चाह , वहाँ राह के सिद्धांत को व्यवहार रूप में परिणत करता है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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