(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा – “पासवर्ड” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९५ ☆
लघुकथा – पासवर्ड श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
स्क्रीन पर तीसरी बार फिर वह संदेश फिर उभर आया “गलत पासवर्ड.”
शरद बाबू ने चश्मा ठीक किया, उँगलियाँ धीमे धीमे कुंजियों पर चलीं, पर मन डगमगा गया।
पासवर्ड कभी लिख कर नहीं रखना चाहिए, जानते हुए भी इसी समस्या से बचने के लिए वे अपनी डायरी में पासवर्ड लिख लिया करते हैं। सावधानी के लिए बस किस अकाउंट का पासवर्ड है यह याददाश्त पर छोड़ रखा है, लेकिन फिर भी गड़बड़ हो ही जाती है।
नोटबुक के वे पन्ने पलटे हर जगह दर्ज अंक, प्रतीक और अंग्रेजी के छोटे बड़े अक्षर । मेल , बैंकों के अकाउंट , वाई फाई , नेटलिक्स , पेंशन ऐप वगैरह वगैरह के ढेर सारे विस्मृत, गड्डम गड्ड होते पासवर्ड अब प्रायः उन्हें चिढ़ाते लगे हैं।
वे कमरे की छत देखते सोच रहे थे, अपने पुराने दिन जब उनकी याददाश्त का ऑफिस में सब लोहा मानते थे, उन्हें दस अंकों के मोबाइल नंबर तक जबानी याद रहते थे, जिन्हें वे जेब में मोबाइल होते हुए भी ऑफिस के लैंडलाइन से डायल कर लिया करते थे, शायद पैसे बचाने ।
उन्हें खीजता देख ,बेटा हँसकर बोला, “पापा, इतनी दिक्कत है तो पासवर्ड मैनेजर एप रख लीजिए।”
शरद बाबू मुस्करा कर रह गए ।
*
रिटायरमेंट को पांच महीने भर तो हुए हैं।
पहले समय पीछे भागता था, अब वे उसके पीछे दौड़ रहे हैं।
पत्नी ने रसोई से पुकारा “ओटीपी आया क्या?”
स्क्रीन पर छह अंकों का नंबर चमका… फिर एस एम एस ही गुम हो गया, सेशन टाइम आउट हो चुका था।
शरद बाबू ने लंबी साँस ली, लैपटॉप बंद किया।
खिड़की से छनती धूप में धूल के कण चमक रहे थे, जैसे यादें कमरे में घुसी आ रही हों, रोशनी की एक बीम की तरह।
(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)
विघ्नहर्ता हाऊसिंग सोसाइटी ने अपने वार्षिक चुनाव के लिए सर्व सम्मति से सेवकराम जी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया था. साथ ही उन्हें अपनी समिति के गठन के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी गई थी. मुख्य रूप से अध्यक्ष, सचिव् और कोषाध्यक्ष का चुनाव होना था.
पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चुनाव प्रक्रिया चलती रही. अंतिम तिथि पर प्रत्याशियों ने अपने फॉर्म जमा कर दिए. जब लिस्ट जारी करने का समय आया तो पता चला कि दो पैनल आमने सामने आ गए हैं. एक देसाई पेनल और दूसरा पटेल पेनल.
सभी ने जोर शोर से अपने अपने पेनल के लिये प्रचार शुरू कर दिया. माहौल में चुनावी गरमी आ गई. सेवकराम जी की चुनाव समिति को समझ में नहीं आ रहा था कि उस क्षेत्र की सबसे बड़ी हाऊसिंग सोसायटी के चुनाव में लोग इतना पैसा कहाँ से और क्यों खर्च करने को उतारू हैं? बाद में पता चला कि दोनों पेनल के पीछे उस क्षेत्र की राष्ट्रीय स्तर की बड़ी राजनीतिक पार्टियों का हाथ है जिनकी नजर विघ्नहर्ता हाऊसिंग सोसाइटी के पांच हजार से अधिक मतदाताओं पर है.
अंतिम तिथि के आते आते चुनाव का माहौल बदलने लगा. उनकी चुनाव समिति के कानों में तरह तरह की बातें सुनाई देने लगी. फिर वही हुआ जिसका सब को डर था,
विगत चार वर्षों से सत्ता में रहे पटेल पेनल ने धन और राजनीतिक बल पर देसाई पेनल को अपने फॉर्म वापिस लेने पर मजबूर कर दिया.
अब सबकी नजर चुनाव समिति के निर्णय पर टिकी थी. पटेल पेनल अपने आप को “निर्विरोध निर्वाचित” करने पर दबाव बना रहा था.
चुनाव समिति ने काफी मंथन के पश्चात् निर्णय स्वरुप अपनी सूचना जारी किया कि – “प्रत्येक मतदार के मत का अपना महत्व है जो उसका अधिकार है. प्रत्याशियों ने अपना निर्णय लिया है किन्तु मतदार ने अपना निर्णय कहाँ दिया? उसने अपने मताधिकार का प्रयोग कहाँ किया? अतः निर्धारित तिथि को मतदान होगा. बैलट पेपर पर प्रत्येक मतदार को अपना मत देने के लिए “NOTA” (None of the above) अर्थात- “इनमे से कोई भी नहीं”का विकल्प भी रहेगा.”
इसका काफी विरोध हुआ किन्तु, सेवकराम जी की समिति टस से मस नहीं हुई. समय पर मतदान हुआ. पटेल पेनल के सभी प्रत्याशियों के विरोध में NOTA को अधिक मत मिले.
अंत में सेवकराम जी की चुनाव समिति ने अपना अंतिम निर्णय दिया – “पटेल पेनल के सभी सदस्य “निर्विरोध अनिर्वाचित”अगले चुनाव की तिथि समिति शीघ्र घोषित करेगी।”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “तिल गुड़ की मिठास”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ ☆
🌻लघुकथा🌻 तिल गुड़ की मिठास🌻
माँ रेवा के घाट पर उतरने चढ़ने वाले सीढ़ियों पर दान की आस लगाए जो बैठे रहते हैं। उनमें से एक महिला बहुत ही साफ सुथरी परंतु गंभीर सोचनीय अवस्था में माला जाप करती दिखी।
मकर संक्रांति का पर्व सभी खिचड़ी कोई तिल चाँवल, कोई चाँवल दाल, कोई गुड़ तिल, कोई एक-एक लड्डू देते चला जा रहा था। मानो सारा पुण्य कमा रहे हो।
पंडितों की पंक्तियां बड़े-बड़े लकड़ी के तख्तों पर आसन जमाए बैठे थे। थोड़ी देर बाद वहीं महिला सुंदर से एक प्लेट पर दान से मिले कुछ लड्डुओं को कपकपाते हाथ से पंडित जी के पास आकर कुछ रुपए रख संकल्प करने के लिए कहने लगी।
उसकी शालीनता को देख पंडित जी भी मुस्कुरा दिए। उसी समय सामने के लकड़ी के तख्त पर नजर पर पड़ी। बड़ी श्रद्धा के साथ जो गाँव की महिला अपने बच्चों के साथ हाथ लगाकर संकल्प कर रही थी और कोई नहीं उसके अपने बेटा बहू थी।
पंडित ने नगद नारायण अपने कब्जे में लेते हुए बाकी कच्ची रसोई पुरी सब्जी उसी अम्मा को देते हुए कहा— ले जा रख तेरा आज का दिन अच्छा है। तुझे मकर संक्रांति मिल रही है तिल के लड्डू मिल रहे हैं। लेजा दान का सीधा आज अच्छे से भोजन करना।
उनके जाने के बाद आँचल फैला, वह दुआ देती कहने लगी जहाँ मैं हूँ, वहाँ कभी मेरे अपने बैठने ना आए।
बस यही दान की दुआ मै मांगती हूँ। बेटा बहू तिल महादान करके बड़े खुश नजर आ रहे थे। वही सर से मुँह छुपाई वह सोच रही थी– यह तिल गुड़ मिठास, या मिलने वाला त्रास।।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– चरित्र – मंथन…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९० — चरित्र – मंथन —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
बिल्ली अपने सामने खड़े चूहे को मजे – मजे देख रही थी। चूहा अपनी ओर से सतर्क ही था। सहसा भूकंप आने पर चूहा और बिल्ली दोनों एक खंडहर में फँस गए। बिल्ली की साँसें उखड़ने पर आईं। जब कि चूहा तो मज़े – मज़े जी सकता था। बिल्ली तो मर ही जाती कि चूहे ने मिट्टी खोद कर बाहर निकलने का रास्ता बना दिया। खंडहर से मुक्त होने पर चूहे के प्रति कृतज्ञ होते भी बिल्ली ने उसका शिकार कर लिया। बिल्ली चूहों का शिकार करने की अपनी प्रकृति से मजबूर थी। उधर ऐसी बात नहीं कि चूहा न जानता हो कि बिल्ली उसे खा जाएगी। पर मिट्टी खोदने की अपनी प्रकृति से चूहा भी मजबूर था।
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बाइज़्ज़त…!
☆ लघुकथा बाइज़्ज़त…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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पागल पाशा दिन-दहाड़े दोपहरी के समय सर पर पाँव रखकर सड़क पर बेतहाशा भागा जा रहा था और साथ में अपनी बुलंद आवाज़ में ज़ोर-शोर से चिल्ला रहा था… ‘चल गई… चल गई…! चल गई…!’
जिसको सुनकर बाजार की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर ब्रेक लग गए। आबादी के विस्फोट से लावे की तरह फैलते शहर में अचानक सन्नाटा छा गया।
देश के किसी जागरूक नागरिक ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए पुलिस स्टेशन को मोबाइल लगा दिया। सुना है, शहर में चल गई है… आधी-अधूरी सूचना पर पुलिस की गाड़ियाँ सड़कों पर दौड़ने लगी, सायरन बजने लगे, पर किसी भी व्यक्ति ने यह जानने की जरा भी ज़हमत उठाई, न कोशिश की, कि कहाँ और क्या चल गई है…!
पुलिस की बड़ी देर तक चली खोज-बीन और भाग-दौड़ के बाद आखिरकार पाशा पकड़ा गया। उसे पूछताछ के लिए कोतवाली लाया गया। थानेदार के पूछने पर उसने बताया कि कल उसे चलन से बाहर हो चुके चंद अठन्नी के सिक्कों से भरी थैली नाली में पड़ी मिल गई थी जिसे लेकर उसने बॉर से एक पव्वा खरीदा। बगल वाली होटल में बैठकर पीया और साथ में भर पेट बिरयानी खाई। उसके बाद उसे ऐसा नशा चढ़ा कि उसके मुँह से इतना भर निकला… चल गई… चल गई…, लेकिन शहर के दहशतज़दा लोगों ने समझ लिया… गोली चल गई…!
दूसरे दिन शहर की शाँति भंग करने के जुर्म में पुलिस ने पागल पाशा को न्यायाधीश के समक्ष पेश किया। न्यायाधीश ने भूखे पाशा की मनोदशा को ध्यान में रखते हुए सरकार को आदेश दिया कि देश में जितने भी भूखे, नंगे, बेघर हैं उनके लिए खाने, पहनने और रहने का बंदोबस्त किया जाए और पाशा को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। अदालत से बाहर निकलते हुए, पाशा रहमान का शेर-
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत. भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “कलमुँही“.)
☆ कथा कहानी ☆ कलमुँही —☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
कभी उसकी सास उसे इसी नाम से पुकारती थी , और इस नाम से वह इतनी अधिक परिचित हो गई थी, कि वह अपना सही नाम ” सपना ” भूल चुकी थी . इस कलमुँही नाम पड़ने की भी एक कहानी है. उसे याद आता है कि जिस दिन वह कैलाश के साथ ब्याह कर , अपने गाँव बछवारा से यहाँ आयी थी तो सास लक्ष्मी देवी ने घर के दरवाजे पर पचासों औरतों के साथ उसकी अगवानी बड़े धूम- धाम से परम्परागत धार्मिक विधि से किया था. परिवार में पति कैलाश के अलावा, उसका छोटा भाई लखन और छोटी बहन तारा थी. ससुर छोटेलाल की किराने की एक दूकान थी और उनके पास कुछ खेती भी था. कैलाश स्वयं एक सरकारी आफिस में लिपिक के पद पर काम करते थे. घर में कुछ कमी तो नहीं थी, लेकिन सम्पन्नता भी नहीं थी. परिवार में सब कुछ ठीक था.
लेकिन शायद विधाता को सपना का यह सुखी जीवन रास नहीं आ रहा था. ससुर छोटेलाल को एक दिन खूब जाड़ा देकर तेज बुखार आ गया. सपना ने इण्टर तक की पढ़ाई किया था और उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उसके ससुर को मलेरिया हो गया है. शाम को जब कैलाश आफिस से घर आये तो उसने कहा कि बाबूजी को तुरन्त डाक्टर को दिखाईये, बाबूजी को जाड़ा देकर बुखार आया है और यह मलेरिया का ही लक्षण है. कैलाश बोला ठीक है, कल कस्बे के डाक्टर से दिखाते हैं, अभी तो रात हो गया है, और गाँव में किसी के पास कोई मोटर भी नहीं है. सपना बोली बात तो आप सही कह रहे हैं, ठीक है सुबह ही दिखाने ले जाईयेगा. इतने में सास लक्ष्मी देवी किसी के यहाँ से कोई जड़ी-बूटी ले आयीं और बोलीं कि बहु इसका काढ़ा बना कर अभी पिला दो और रात में एक बार और पिला देना. सपना करती भी क्या? कोई विकल्प नहीं था, उसने काढ़ा बना कर छोटेलाल को दिया. काढ़ा पीने के बाद छोटेलाल को कुछ राहत अनुभव हुआ और बुखार भी कुछ कम हुआ. लेकिन सपना जानती थी कि मलेरिया में बुखार घटता- बढ़ता रहता है. उसने कैलाश से कहा भी कल बाबूजी को डाक्टर के पास ले जाईयेगा. कैलाश ने कहा कि हाॅं, कल ले जाऊंगा. दूसरे दिन छोटेलाल का बुखार एकदम उतर गया, तो छोटेलाल ने खुद ही कहा कि मैं किसी डाक्टर के पास नहीं जाऊँगा, मैं अन्दर से ठीक महसूस कर रहा हूँ. कैलाश कहता भी तो क्या कहता!
लेकिन रात होने के साथ फिर ठंडक के साथ छोटेलाल को तेज बुखार चढ़ गया. फिर वही काढ़ा बना कर छोटेलाल को पिलाया गया . बुखार तो उतर गया, लेकिन अन्दर से कमजोरी थी. दूसरे दिन भी छोटेलाल ने डाक्टर के यहाँ जाने से मना कर दिया और लक्ष्मी ने भी कहा कि बैद्य जी की दवा से समय लगता है, लेकिन ठीक हो जाता है. कैलाश और सपना, डाक्टर के चलने के लिए कहते रह गए, लेकिन छोटेलाल और लक्ष्मी तैयार नहीं हुए. खैर कैलाश भी कुछ ज्यादा बोल नहीं पाया और बेचारी सपना! वह तो बहु ही थी, वह क्या बोलती! दो – तीन दिनों के बाद छोटेलाल की तबियत बहुत अधिक बिगड़ गई और कैलाश उन्हें जबरन कस्बे में डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने जब पूरी तरह निरिक्षण किया तो बोला ठीक है मैं दवा करता हूँ, बाकी ईश्वर के हाथ में है, क्योंकि आप इन्हें लाने में पहले ही काफी देर कर चुके हैं.
दो दिनों के बाद छोटेलाल की हालत काफी बिगड़ गई और देर रात छोटेलाल को अचानक सांस लेने में तकलीफ होने लगी. डाक्टर ने तत्काल आक्सीजन का मास्क लगा कर और जीवन रक्षक दवाईयों को देकर बचाने का प्रयास किया, लेकिन चार घंटों के सतत् संघर्ष करने के उपरांत भी छोटेलाल के प्राण पखेरू इस संसार को छोड़ कर चल दिए. कैलाश के परिवार पर मानो व्रजपात हो गया. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मामूली सा मलेरिया का बुखार किसी के मृत्यु का कारण भी हो सकता है! लेकिन सत्य यही था. किसी प्रकार से गाँव खबर भेजा गया. लक्ष्मी और सपना और दोनों भाई- बहन लखन और तारा रोते हुए अस्पताल पहुंचे. खैर लोगों ने समझाया कि जो होना था, वह तो हो गया! होनी को कौन टाल सकता है! गाँव के अन्य बड़े- बुर्जुगों ने परिवार को धीरज दिलाया और छोटेलाल के अन्तिम संस्कार की व्यवस्था किया गया. छोटेलाल का अन्तिम संस्कार करने के बाद सब लोग घर वापस आये. किसी के पास कुछ कहने के लिए तो था नहीं.
खैर समय तो रुकता नहीं! धार्मिक विधि से सारे कर्म करने के कुछ दिनों बाद कैलाश अपने आफिस जाने लगे. घर का सारा काम सपना ही करती थी. लक्ष्मी सामान्यतः हमेशा गुमसम ही रहती थी. इसी बीच में गाँव की कुछ बूढ़ी औरतों ने लक्ष्मी को सहानुभूति दिखाने के चक्कर में एक नयी बात छेड़ दिया. वे बोलीं कि लक्ष्मी देखो, अभी कैलाश के शादी के एक वर्ष भी नहीं बीते कि घर के मुखिया का देहांत हो गया. तुम्हारी बहु सपना कलमुँही है. पहले तो लक्ष्मी ने इन बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, लेकिन बार – बार यही बात सुनने पर, उसके मन में भी यह विश्वास हो गया कि वास्तव में बहु सपना कलमुँही है और एक दिन बातों ही बातों में उसके मुँह से निकल ही गया कि तू आते ही मेरे पति को खा गयी. तुम परिवार के लिए कलमुँही हो!
सपना तो यह सुनते ही स्तब्ध हो गई. कुछ बोलते नहीं बना, क्या जबाब दे! रात में उसने यह बात कैलाश को रोते – रोते बतायी. कैलाश ने कहा जाने दो, माँ पर दुख का पहाड़ टूट गया है, इसिलिए उलूल- जूलूल बातें किया करती हैं, ध्यान मत तो उनकी बातों पर. ननद तारा ने भी समझाया कि माँ का बाबूजी के देहांत के कारण मानसिक संतुलन बिगड़ गया है.
छोटेलाल जी के देहांत के समय ही सपना पांच महीने के गर्भ से थी. छोटेलाल जी के देहांत के उपरांत सपना तो दुखी थी ही, पूरा परिवार भी दुखी था, जिसके कारण सपना ने अपनी अवस्था का ध्यान नहीं रखा कि वह गर्भवती है और उसे अपने गर्भ में पलने वाले शिशु का ध्यान रखना चाहिए. इस बीच उसने एक- दो महीने डाक्टर को भी नहीं दिखाई और दवाईयां खाने में भी उससे काफी लापरवाही हो गयी. एक दिन रात में अचानक सपना को पेट में काफी तेज दर्द हुआ. सपना कैलाश से बोली कि मुझसे दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा है, मुझे डाक्टर के पास ले चलो. संयोग से उसी दिन पड़ोस में एक शादी थी और बारात में कईं गाड़ियां आयी थी. पड़ोसी को जब सपना के बारे में पता चला तो उसने कैलाश से कहा कि मैं तुम्हें गाड़ी दे रहा हूँ, मेरे बेटे को गाड़ी चलाने आता है, वह तुम्हें ले जायेगा. कैलाश सपना को लेकर कस्बे के लेडी डॉक्टर ( जिससे वह सपना को हमेशा दिखाता था) के पास ले गया. संयोग से लेडी डॉक्टर अभी क्लिनिक में थी, उसने देखा. देखने के बाद उसने कहा कि काफी सावधानी की जरूरत है, कोई भारी सामान आदि मत उठाईयेगा, किसी चीज की चिंता बिल्कुल मत करिये, किसी प्रकार की भी चिंता आप के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है. कुछ और आवश्यक निर्देश और दवाईयां डाक्टर ने दिया.
इस घटना के एक सप्ताह के बाद सपना को एक दिन फिर दर्द शुरू हुआ. कैलाश सपना को लेकर तुरंत कस्बे के लेडी डॉक्टर के पास गया. तमाम प्रयासों के बावजूद भी डाक्टर शिशु की रक्षा नहीं कर पायी. सपना और कैलाश के उपर दो महीने के भीतर दूसरा व्रजपात हुआ. अभी एक आघात के कष्ट से निकले नहीं थे, कि परिवार पर दूसरा आघात हो गया. खैर होनी को कौन टाल सकता! यही सोचकर परिवार को संतोष करना पड़ा.
लेकिन लक्ष्मी के दिमाग में यही बात रह – रह कर कौंधती थी कि सब सपना का ही दोष है.सपना के मुंह पर तो खुल कर नहीं कहती थी, लेकिन पीठ पीछे गाँव के महिलाओं को वह यह कहने से नहीं चूकती कि सपना ही कलमुँही है और उसी के कारण उसके परिवार में यह सब घटित हो रहा है. कैलाश तो बेचारा नौकरी करने में सुबह से शाम तक व्यस्त रहता था, लेकिन सपना के कानों तक यह बात पहुँच ही जाती थी. लेकिन वह करती क्या!
एक दिन कैलाश को आफिस से आने में कुछ देर हो गया. जब वह घर पहुँचा तो घर में अंधेरा था. सपना का कमरा बन्द था, लेकिन अन्दर से खुला था. कैलाश ने बिजली जला दिया, देखा कि सपना लेटी है आवाज देने पर सपना उठी. कैलाश ने देखा कि सपना की ऑंखें ऑंसूओं से भरी है और चेहरा एकदम दुखी है. कैलाश स्तब्ध हो गया. पूछा क्या हो गया! पहले तो सपना बोली कोई बात नहीं है, लेकिन कैलाश के कहने पर कि जब कोई बात नहीं है, तो रो क्यों रही हो? सपना ने सास द्वारा उसके कलमुँही नाम का बार- बार प्रचारित करने के विषय में बताया. बेचारा कैलाश भी क्या कहता! उसने सपना से ही पूछा कि तुम ही कोई रास्ता बताओ, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है. अब सपना भी क्या कहती! माँ से झगड़ा करने का कोई मतलब नहीं था. कैलाश ने कहा कि मैं ही कुछ करता हूँ.
रविवार के दिन, नास्ते के समय कैलाश ने अपने दोनों भाई- बहन को बुलाया और उन्हें माँ द्वारा सपना को बार- बार कलमुँही कह कर बदनाम व प्रताड़ित करने की बात बतायी. दोनों ने कहा कि भईया आप ही कोई रास्ता निकालो, इसमें हम क्या कह सकते हैं? कैलाश ने कहा ठीक है, फिर उसने माँ को बुलाया और लक्ष्मी से कहा कि माँ मैं बहुत दिनों से यह सुन रहा हूँ कि पिता जी के मृत्यु और सपना के गर्भपात के सम्बन्ध में आप सपना को ही दोषी मानती हो और उसे कलमुँही कहती हुई गाँव भर में घूमती हो. देखो किसी की भी मृत्यु परमात्मा के अधीन है और कौन अपनी संतान का विनाश चाहेगा! सात महिने गर्भ में रख कर, उसे वह खुद ही नष्ट करना चाहेगा! इस प्रकार का लांछन किसी पर लगाना बहुत ही गलत बात ही नहीं बल्कि निंदनीय है. सपना तो तुम्हारी धर्मपुत्रि है. तुम उसे कभी गृहलक्ष्मी कहती थी. मैं समझ सकता हूँ कि बाबूजी के देहांत का तुम्हें काफी सदमा लगा है, लेकिन इसका यह मतलब यह तो नहीं कि इस प्रकार की निंदनीय काम करो! बाबूजी के देहांत का दुख हम सबको है, एक छोटी सी बीमारी उनके लिए काल बन गयी . हमारी पहली संतान नहीं रही, इसका हमें भी दुख है!
पहले तो लक्ष्मी ने साफ इनकार कर दिया कि वह ऐसा कुछ कहती फिरती है, लेकिन सपना द्वारा कई महिलाओं के नाम लेकर कि उन्होंने ही उसे कहा है, लक्ष्मी के पास कोई रास्ता नहीं था. अन्त में कैलाश ने कहा कि माँ यह सब बकवास तुरंत बन्द करो और एक बात ध्यान से सुन लो. अगर मैंने दुबारा ऐसा कुछ सुना तो मैं अपने भाई- बहन को लेकर किराये के मकान में रह लूंगा, लेकिन तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा. तुम रहना अकेले और फिर जो मन में आये गाँव भर में कहते फिरना. दोनों भाई- बहन ने भी कहा अम्मा तुम यह ठीक नहीं कर रही हो.
रात को सपना ने कैलाश से अकेले में कहा कि आपको अम्मा से इतनी कठोर बातें नहीं करनी चाहिए थी. कैलाश भड़क गया, बोला, अब बेकार की ममता मत दिखाओ. तुमने अगर माॅं को पहले ही बेकार की बातें करने का विरोध करती , तो समस्या इतनी आगे नहीं बढ़ती. मैं मानता हूँ कि मेरी भी उतनी ही गलती है. मुझे भी पहले ही माॅं को इस ढंग के व्यवहार करने से रोकना चाहिए था. अब मुझे इस समस्या का स्थायी समाधान करने दो.
दूसरे दिन से कैलाश , अपनी माँ लक्ष्मी से बातें करना लगभग बन्द कर दिया. लक्ष्मी कुछ कहती भी तो हूँ- हाॅं में जबाब देता. जब माँ- बेटे का यह सिलसिला कई दिनों तक चला तो लक्ष्मी समझ गयी कि कैलाश बहुत ही नाराज है. एक दिन उसने अपने छोटे बेटे लखन और बेटी तारा से पूछा कि क्या बात है आजकल कैलाश मुझसे बात ही नहीं करता. दोनों ने कहा अम्मा, भईया तुमसे बहुत नाराज हैं . तुमने भाभी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया है और सोचो तुम्हारे इस तरह बोलने से परिवार की कितनी बदनामी होती है. लक्ष्मी क्या कहती!
दो- चार दिनों के बाद एक दिन रात के नौ बजे के आसपास जब कैलाश अपने कमरे में था, लक्ष्मी कमरे में आयी और बोली कि मैं मानती हूँ कि मुझसे गलती हुई, लेकिन मैं भी क्या करती! मेरे उपर ऐसा व्रजपात हुआ कि मेरा दिमाग खराब हो गया था. अब यह गुस्सा थूको, अब मरते दम तक मुझसे ऐसी गलती नहीं होगी. इतने में सपना कमरे में आ गयी. माँ- बेटे के बीच की बातें उसने भी सुन ली थी. बोली अम्मा , जो हो गया सो गया, ईश्वर हम सबके बीच प्रेम बनाये रखे, परिवार के लिए यही अच्छा है.
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बाल कहानी – “बर्फ की आत्मकथा” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३५ ☆
☆ बाल कहानी – बर्फ की आत्मकथा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मैं पानी का ठोस रूप हूं. द्रव्य रूप में पानी बन कर रहता हूं. जब वातावरण का ताप शून्य तक पहुंच जाता है तो मैं जम जाता हूं. मेरे इसी रूप को बर्फ कहते हैं. मेरा रासायनिक सूत्र एचटूओ है. यही पानी का सूत्र भी है. यानी मेरे अंदर हाइरड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु मिले होते हैं.
जब पेड़पौधे वातावरण से कार्बन गैस से कार्बन लेते हैं तब मेरे पानी से हाइड्रोजन ले कर शर्करा बनाते हैं. इसे ही पौधों की भोजन बनाने की प्रक्रिया कहते हैं. इसे हिंदी में प्रकाश संश्लेषण कहते हैं. इस क्रिया में मेरे अंदर की आक्सीजन वातावरण में मुक्त हो जाती है.
बर्फ अपनी आत्मकथा सुना रहा था. सामने बैठा हुआ बेक्टो ध्यान से सुन रहा था.
बर्फ ने कहना जारी रखा. ध्रुवों पर तापमान शून्य के करीब रहता है. इस कारण वहां का पानी जम रहता है. इस जमे हुए पानी के पहाड़ को हिमनद कहते हैं. ये बर्फ के रूप में जमा होता है. यह सुन कर बेक्टो की आंखें फैल गई.
तुम सोच रहे हो कि सूर्य के प्रकाश से मेरा पानी पिघलता नहीं होगा ? बिलकुल नहीं. सूर्य का प्रकाश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. इस कारण जानते हो ? नहीं ना. तो सुनो. सूर्य का जितना प्रकाश मेरे ऊपर पड़ता है उतना ही मैं वापस वातावरण में लौट देता है. मैं सूर्य के प्रकाश को अपने पास नहीं रखता हूं. इसे वैसा ही वातावरण में लौटा देता हूं जैस यह मेरे पास आता है.
यही वजह है कि बर्फिली जगह लोगों को काला चश्मा लगाना पड़ता है. यहां पर प्रकाश बहुत तीव्र होता है. इस की चमक से आंखे खराब हो सकती है. इसलिए वे आंखों पर चश्मा लगाते हैं.
ओह ! बेक्टो की आंखे चमक गई. उस ने पूछा कि सूर्य का प्रकाश उसे पिघलाता नहीं है.
तब बर्फ ने कहा कि सूर्य का प्रकाश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. इस का कारण यह है कि मैं बर्फ की कोई ऊष्मा अपने अंदर ग्रहण नहीं करता हूं. मेरी मोटीमोटी पर्त भी पारदर्शी होती है. वे प्रकाश को आरपार पहूंचा देती है. या वातावरण में लौटा देती है. इसलिए मैं पिघलता नहीं है.
यदि मैं पिघल जाऊ तो जानते हो क्या होगा ? बर्फ के पूछने पर बेक्टो ने नहीं में गरदन हिला दी. तब बर्फ बोला कि यदि मेरी सभी बर्फ पिघल जाए तो इस से समुद्र के सतह पर 60 मीटर ऊंची दीवार बन जाएगी. इस पानी की दीवार में धरती की आधी आबादी डूब कर मर जाए.
यह सुन कर बेक्टो चकित रह गया.
बर्फ ने बोलना जारी रखा. मैं पिघलता नहीं हूं इसलिए हिमनद के रूप में जमा रहता हूं. यदि कभी मैं पिघलता हूं तो इस का कारण आसपास के वातावरण के तापमान बढ़ने से पिघलता हूं. वैसे जैसा रहता हूं वैसा जमा रहता हूं. यही मेरी कहानी है.
बेक्टो को बर्फ की कहानी अच्छी लगी. उस ने कहा कि आप तो सूर्य से भी नहीं डरते हैं.
इस पर बर्फ बोला कि सूर्य मेरा कुछ नहीं बिगाड़ता है. कारण यह है कि मैं ताप को ग्रहण नहीं करता हूं. इसलिए वातावरण से प्राप्त सूर्य के ताप को उसी के पास रहने देता हूँ. यदि तुम भी किसी की बुराई ग्रहण न करें तो तुम्हारी अंदर बुराई नहीं आ सकती है. तुम मेरी तरह अच्छाई ग्रहण करते रहो तो तुम भी मेरी तरह सरल और स्वच्छ बन सकते हो. यह कहते ही बर्फ चुप हो गया.
बेक्टो सोया हुआ था. उस की आंखे खुल गई. उस ने एक अच्छा सपना देखा था. इस सपने में वह बर्फ से आत्मकथा सुन रहा था. यह आत्मकथा बड़ी मज़ेदार थी इसलिए वह मुस्करा दिया.
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – ऊहापोह
हिरण मोहित था पानी में अपनी छवि निहारने में। ‘मैं’ का मोह इतना बढ़ा कि आसपास का भान ही नहीं रहा। सुधबुध खो बैठा हिरण।
अकस्मात दबे पाँव एक लम्बी छलांग और हिरण की गरदन, शेर के जबड़ों में थी। पानी से परछाई अदृश्य हो गई।
जाने क्या हुआ है मुझे कि हिरण की जगह मनुष्य और शेर की जगह काल के जबड़े दिखते हैं।
ऊहापोह में हूँ, मुझे दृष्टिभ्रम हुआ है या सत्य दिखने लगा है?
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।
इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम:
ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– साल और भी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८९ — साल और भी… —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
गरीब ने ऊँचे पर्वत के शिखर से कूद कर आत्म हत्या कर ली। हज़ार साल पहले यहाँ प्रकृति के वक्ष पर लिखा हुआ था विश्व सम्राट ने यहाँ से आत्म हत्या की थी। तब से यह विश्व सम्राट की मौत की जागीर हुई। अब जा कर एक गरीब से उसकी यह जागीर टूटी। अब प्रश्न शेष रहता विश्व सम्राट हज़ार साल पहले अपने राजशाही परिवार में अधिनियंता की जो जागीर छोड़ गया था उसके टूटने में और कितने साल लगते?
☆ समाधान… मूळ गुजराती लेखिका : डॉ. रुश्वी टेलर ☆ हिन्दी अनुवाद : श्री राजेंद्र निगम ☆
गीत बजने की आवाज सुनकर वे चौंककर जाग गए। नींद से हल्के से जागकर पलंग के पास रखे मोबाइल को ढूँढा। नहीं, अलार्म तो नहीं बजा और अभी तो एक ही बजा था। बिस्तर पर बैठने के बाद उन्हें समझ में आया कि बाहर के कमरे से टीवी की आवाज आ रहा थी। “विराज रात में इतनी देर तक क्यों टीवी चालू कर के बैठा है ?”
वे खड़े होकर बैठक के कमरे में आए। प्रियांशी उन्हें देखकर सोफे पर से एकदम खड़ी हो गई। “सॉरी पापा, मैं चैनल बदलने के लिए गई, लेकिन मेरी भूल से से आवाज बढ़ गई।”
वे लुछ देर प्रियांशी के सामने और कुछ देर टीवी के सामने देखते रहे। प्रियांशी आगे कुछ कहने जा रही थी की तब ही वे बोले,
“क्यों बेटा, अब तक जाग रही हो ? क्या हुआ ? सेहत तो ठीक है न ?”
“अरे नहीं, नहीं। पापा कुछ नहीं हुआ। बस वैसे ही नींद नहीं आ रही थी तो लगा कुछ देर टीवी देख लूँ। सॉरी पापा, मेरे कारण आपकी नींद बिगड़ गई। आप सो जाएँ, मैं भी सोने के लिए जा रही हूँ।” कहते-कहते उसने टीवी बंद किया और तुरंत अपने कमरे में चली गई। बैठक खंड के अँधेरे में वे कुछ देर असमंजस जैसी स्थिति में खड़े रहे। उन्हें कुछ असामान्य जैसा लग रहा था या फिर वह केवल उनका वहम था !
उन्होंने कमरे में आकर अंदर वैसे ही दो-चार चक्कर लगाए। पलंग पर तकिया रखा और उसके सहारे बैठे। “प्रिया किसी बेचैनी में थी या कुछ और था ? ऑफिस में कुछ हुआ होगा ? विराज के साथ कुछ अनबन हो गई होगी ? नहीं… ऑफिस से आई, तब तो बहुत अच्छे मूड में थी। थकी हुई थी, लेकिन फिर भी उसने मेरी प्रिय दाल-ढोकली बनाई। और मुझे आग्रह कर खिलाया। लेकिन हाँ, वे दोनों जब भोजन के लिए बैठे, तब वह कुछ ढीली लग रही थी। तुरंत भोजन किया और बगैर कुछ बोले और बगैर रसोई का काम निपटाए सोने के कमरे में चली गई| लेकिन विराज भी तो सामान्य था। मेरे साथ फुटबॉल मैच देखते वक्त सहज लग रहा था। उसके किसी परिचित का फोन आया, तब वह हँस-हँसकर बात भी कर रहा था। तो फिर क्या हुआ होगा ? प्रियांशी की तबियत खराब हो गई होगी या फिर काम के बोझ के कारण थक जाती होगी ? उनका दिमाग घूमने लगा। जोरजोर से बोलनेवाली और वैसे ही हँसनेवाली प्रियांशी आज शाम के बाद गुमसुम हो गई थी। “अभी टीवी देख रही थी और जैसे ही मैं चला गया. तो कैसी शर्मसार हो गई थी ! मानो कोई गुनाह करते हुए पकड़ ली गई हो ! और मुझे उसकी परेशानी बताते हुए उसे शर्म आ रही हो ? क्या करूँ…अलका को फोन करूँ ? नहीं, नहीं. इतनी गंभीर बात भी नहीं है। और यह भी कहाँ निश्चित है कि प्रिया को कुछ हुआ ही है या वह सिर्फ मेरे मन का वहम है ? अलका की गैर-मौजूदगी के कारण क्या मैं कुछ अधिक चिंतित हो गया हूँ ? कल सवेरे विराज के साथ बात कर लेंगे।”
कोई ऊँची आवाज में बोल रहा था, वे तुरंत जाग गए। ओह, यह तो विराज की आवाज है। वे उठकर लगभग दौड़ते हुए बाहर आए। विराज टाई पहनते हुए गुस्से में बोल रहा था।
“मैं मेरा काम करूँ या तुम्हारे दर्जी के यहाँ धक्के खाऊँ ? इतना ही जरूरी था तो खुद जाकर के ले आती।”
वे घबरा गए। “वीरू बेटा, क्या हुआ है ? क्यों इतने गुस्से में हो ? प्रिया कहाँ है ?”
प्रियांशी रसोई से दोनों की टिफिन बैग लेकर बाहर आई। उसकी आँखें सुर्ख लाल हो रही थीं। चेहरा बिल्कुल उतर गया था। वे स्थिति को समझने की कोशिश करते रहे। विराज उनकी मौजूदगी को नजरअंदाज कर जूते-मौजे पहनने लगा। प्रियांशी टिफिन बैग को डाइनिंग टेबल पर रखकर रसोई में चली गई। वे रसोई के दरवाजे पर खड़े रहकर दोनों के सामने देखते रहे।
“प्रिया बेटा, क्या हुआ ? क्यों झगड़े तुम दोनों ? और ओ भाई, यह सवेरे-सवेरे क्यों चीख रहे हो ? ऐसा अच्छा नहीं लगता है। कारण बताओ, तो मालूम पड़े। प्रिया तुम्हें रोना नहीं चाहिए, बेटा| यहाँ बाहर आकर बैठो। वीरू, तुम भी बैठो।”
“पापा मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है। और मेरे पास इन सब नाटकों के लिए वक्त नहीं है ! मैं निकल रहा हूँ।”
“विराज, मैं शांति से बात कर रहा हूँ, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि तुम मेरे साथ चाहे जिस भाषा में बात कर सकते हो। चुपचाप जूते निकालकर यहाँ आ कर बैठो। नहीं जाना ऑफिस। प्रिया, तुम भी काम छोड़कर बाहर आओ।”
प्रियांशी बाहर आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई। जो हुआ है, उसका संकोच उसके चेहरे पर देखा जा सकता था। “अब शांति से बोलो, वीरू, क्या हुआ ? क्यों इतना गुस्सा कर रहे हो प्रिया पर ?”
विराज लंबी साँस खींचकर गुस्से में प्रिया की ओर देखते हुए टाई को ढीला करने लगा। प्रियांशी की आँखें फिर बहने लगी।
“बेटा प्रिया, इसके सामने मत देखो। बोलो, क्या हुआ ? तुम कुछ बोलोगी तो मुझे मालूम होगा न ! मम्मी को फोन करूँ ?”
“नहीं पापा, मम्मी को परेशान मत करो। कोई बड़ी बात नहीं है, यह तो इनकी आदत है छोटी-छोटी बात को बड़ा रूप देने की।”
“वाह, मैं उसको बड़ा रूप दे देता हूँ ? मैं ? कल रात से तुम मुँह फुलाए घूम रही हो, मानो मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो, इसलिए मेरी ओर देखती भी नहीं। पापा, सच तो यह है कि मम्मी ने बहू को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है। और इसीलिए मुझ पर हुक्म चलाती है। देखो प्रिया, एक बात सुन लो, मेरे सामने फिजूल मगजमारी मत करो। तुम कमाती हो तो इसका रोब मुझ पर मत झाड़ो।” विराज का गुस्सा फिर बरसने लगा।
वे कुछ देर विराज के सामने देखते। यह घटना उनके स्वयं के घर में घट रही थी और इस परिवेश में वे स्वयं एक अनजान व्यक्ति की तरह मौजूद थे। इस घर में ऐसी भी घटनाएँ होती हैं ? पहले भी हुई होंगी ?
उन्हें घबराहट होने लगी। विराज को कुछ कहने के लिए गए, उसके पहले ही प्रियांशी बोल पड़ी, “सॉरी, विराज, तुम्हें अपना समझ कर मैंने अपना काम बताया था। तुम्हें यदि इसमें मेरा रोब दिखाई देता है, तो अब नहीं कहूँगी और कभी भी तुमसे मदद नहीं माँगूंगी।”
वह सिसकियाँ भरने लगी, “पापा, आज शाम को मेरे ऑफिस में ब्रांड सक्सेस का एक कार्यक्रम रखा है। मैं उस प्रोजेक्ट की लीडर हूँ और इसलिए आज मुझे वह अवार्ड मिलना है। फंक्शन में पहनने के लिए मैं नई साड़ी लाई थी और उसका ब्लाउज उस दरजी को सीने के लिए दिया था. जिसकी दूकान विराज की ऑफिस के पास के ही कांप्लेक्स में है। कल रात वह दर्जी शहर छोड़कर कहीं बाहर जाने वाला था, इसलिए मैंने विराज को विशेष रूप से याद करके मेरा ब्लाउज लाने के लिए कहा था और वे भूल गए। मुझे दुख हुआ, इसलिए मैंने कुछ नाराजगी बताई और उसमें ये उबल पड़े।”
“अरे यार, मैं कहाँ फुर्सत में हूँ। सत्तर प्रकार के तनाव हैं। काम में भूल गया, क्या करूँ, फाँसी पर लटक जाऊँ ?”
“हाँ, बस आपको ऐसा उल्टा बोलना आता है। मेरी वस्तु लाना भूल गए, उसका कोई अफसोस नहीं।” दोनों के एक दूसरे के आमने-सामने आक्षेप लगाते हुए देखकर उन्हें हँसी आ गई, ये दोनों कैसी तुच्छ बात पर झगड़ रहे हैं ?
वे प्रियांशी को समझाने लगे कि बेटा दूसरी साड़ी पहन लेना। तब ही विराज बोल पड़े, “कपड़ों के इतने ढेर इकट्ठे कर लिए हैं, उसमें से कुछ भी पहन लो न यार, उस नई साड़ी पर क्या कुछ छाप लगाई है ?”
“बस, देखा न, पापा ? सलाह दे दी कि अन्य कुछ पहन लो। मुझे आपकी सलाह की कोई जरूरत नहीं है, विराज। मैं निपट लूँगी।”
“मुझे मालूम है कि तुम्हें मेरी सलाह की कोई जरूरत नहीं है। मेरा दिन बिगड़ दिया, यार ! तुम्हें तो आदत हो गई है, बात-बात पर कलह करने की।” विराज गुस्से में पुनः बूट पहनकर उनकी ओर नजर डाले बगैर निकल गया।
प्रियांशी आँसू पोंछते-पोंछते उसके कमरे में चली गई। बैठक-खंड शांत हो गया। मानो कुछ हुआ ही नहीं ! ऐसी ही शांति तो रहती है इस घर में, हमेशा। “वीरू-प्रिया क्या पहली बार ऐसे झगड़े होंगे ? दोनों की बात से लगता है कि पहले भी झगड़े होंगे, तो मुझे यह क्यों मालूम नहीं है ? अलका ने भी मुझे नहीं कहा ?”
वे अभी सोच ही रहे थे कि तब ही प्रियांशी तैयार होकर बाहर आई। “पापा, भोजन तैयार है। आप भोजन करने के बाद ही ऑफिस जाने के लिए निकलना। मैं आज शाम पाँच बजे आ जाऊँगी। आपकी और विराज की रसोई बनाकर, करीब सात बजे मैं निकल जाऊँगी। मैं तो अपना भोजन वहीं ले लूँगी।”
प्रियांशी उसका पर्स लेकर बाहर निकली। सेंडल पहन कर वापिस आई और दरवाजे के पास खड़ी रही। “पापा, आप चिंता नहीं करें। छोटी बात है। मैं रात में विराज के साथ बात कर लूँगी। और प्लीज, मम्मी से कुछ नहीं कहना, वे अनावश्यक चिंता करेंगी। चिंता में उनका बीपी बढ़ जाता है।”
“प्रिया बेटा, तुम दोनों ऊँचे ओहदे पर नौकरी करते हो, इतने परिपक्व हो। फिर भी इस प्रकार छोटे बच्चों की तरह झगड़ते हो, क्या यह अच्छा लगता है ? अलका ने तो मुझे कभी कहा नहीं कि तुम दोनों ऐसी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने लगते हो। विराज इतना गुस्सा करता है, यह भी मुझे पहली बार मालूम हुआ।”
“आपको परेशानी न हो, शायद इसलिए मम्मी ने नहीं कहा होगा। लेकिन विराज का तो यह हमेशा का है। वह अपने काम को ही अहमियत देता है और दूसरे लोगों को तो वह गिनता ही नहीं। बात मात्र मेरे ब्लाउज भूलने की नहीं थी, पापा। उन्हें सौंपा गया घर का कोई भी काम वे नहीं करते हैं। भूल गया, कह कर हाथ झटक देते हैं। मम्मी की बात को भी इसी प्रकार उड़ा देते हैं। क्या घर की इस प्रकार उनकी कोई जवाबदारी नहीं है ?”
एक ही साँस में बोलकर प्रियांशी कुछ रुकी। “इस समय जो हुआ, उसके लिए सॉरी। मम्मी की गैर-मौजूदगी में आपको यह तनाव झेलना पड़ा।” धीमे से दरवाजा अटका कर वह चली गई।
“मम्मी की गैर मौजूदगी में आपको यह तनाव झेलना पड़ा।” यह वाक्य उन्हें काँटे की तरह चुभ गया।
“इस घर से संबंधित मामलों की सभी चिंताएँ मात्र अलका ही दूर कर सकती है ? वह अकेली ही इसे मैनेज करती है ? विराज इसी प्रकार का ख़राब व्यवहार करता है, उसके संबंध में मुझे कभी कहा ही नहीं ? उसका बीपी बढ़ जाता है ? डॉक्टर को बताती होगी ? दवा लेती होगी? प्रिया ने कहा की विराज सिर्फ अपने काम को ही प्राथमिकता देता है, वह मात्र विराज के लिए ही था या मेरे लिए भी था ? वह दर्जी के वहाँ जाना भूल गया, इसलिए वह झगड़ा करे, इतनी नादान तो प्रिया नहीं है। विराज द्वारा वह मुझे कुछ बताना चाहती होगी ? या अन्य कोई बड़ी बात होगी ?”
उन्हें कहीं चैन नहीं पड़ रहा था। अलका को फोन करने की तीव्र इच्छा हुई। लेकिन फोन में कहना क्या ? “उसकी बहन की सेहत के बारे में कुछ जानकारी ले लूँ और कुछ इधर-उधर की बातें कर, प्रिया-वीरू के झगड़े के बारे में कहूँ ? नहीं, नहीं वे दोनों तो शाम तक इसका समाधान कर लेंगे और वह फिर अनावश्यक चिंता में अपना बीपी बढ़ा लेगी। वह दवाई ले गई होगी ? वह क्यों मुझे कुछ कहती नहीं है ?” भोजन करने की इच्छा ही नहीं रही। वे तुरंत कपड़े बदलकर ऑफिस जाने के लिए तैयार हुए। दरवाजा लॉक करने के पहले घर में एक नजर घुमाई। यह घर अलका के कितने समाधान और कितनी पीड़ाओं को संग्रहित किए हुए है ?
कार चलाते समय इन्हें विचारों में दिमाग घूमता रहा। वे याद करने लगे, अंत में अलका ने कब उनसे मदद माँगी थी ? या कोई जरूरी काम उन्हें सौंपा था ? अरे ऑफिस से लौटते समय घर का कोई सामान ले आने के लिए कहा हो, ऐसा भी कभी नहीं हुआ। घर या बच्चों से संबंधित कोई जवाबदारी अलका ने मुझे सौंपी ही नहीं ? या मैंने कभी ली ही नहीं ? उसे जब मेरी जरुर पड़ी होगी, तब उसने क्या किया होगा ? अन्य किसी की मदद माँगी होगी या उस काम को ही छोड़ दिया होगा ? विराज-विराली की स्कूल, कॉलेज, दोनों की शादियाँ, ओह! कितने कार्यक्रम और घटनाएँ हैं, जिनमें अलका को मेरी जरूरत पड़ी होगी ! लेकिन मैं तो कहीं था ही नहीं ! लेकिन उसने कभी कोई शिकायत भी नहीं की ?” उनकी छाती सिकुड़ रही थी| अलका वापस आए, तब यह सब कहना था, कई प्रश्न पूछने थे।
दिमाग पर जब बहुत जोर दिया कि कभी तो ऐसा हुआ होगा कि जब अलका ने उनसे मदद माँगी होगी। याद ही नहीं आ रहा था। मानस-पटल पर वर्षों पहले की एक रात उभर आई, जब अलका ने आँख में आँसुओं के साथ, पस्त आवाज में कहा था,
“सुनो, वीरू-विली की सँभाल, घर के काम, इनमें मैं बहुत थक जाती हूँ। अम्माजी बिल्कुल मदद नहीं करती हैं और मदद नहीं भी करें, तब भी मुझे कुछ आपत्ति नहीं, लेकिन काम करते समय यदि जरा भी देर हो जाए, तो वह पूरा घर सिर पर उठा लेती हैं जोर-जोर से चाहे जो बोलने लगती हैं। उनके गुस्से से तो बच्चे भी डर जाते हैं। आप अम्माजी को कुछ समझाएँगे ?”
वे गुस्से से लाल हो गए थे, “अरे यार, मैं धंधे में ध्यान दूँ या घर में बैठकर औरतों की कलह को निपटाता रहूँ ? ऐसे छोटे-छोटे मामलों में मुझे हैरान मत करो। तुम अनपढ़ तो हो नहीं कि ऐसी मामूली-सी बातों में तुम्हें मेरी जरूरत पड़े। कुछ समझदार बनो, अपनी स्वयं की समस्याओं के लिए खुद समाधान ढूँढना सीखो। मेरे पास क्या कोई कम समस्याएँ हैं, जो तुम्हारे आगे-पीछे फिरता रहूँ ?” तब उन्हें अलका ने जो जवाब दिया था, उसने इस समय हथौड़ी की तरह दिमाग पर वार किया,
“मेरी भूल हो गई, जो मैंने आपसे मदद माँगी। अब मैं कभी आपको परेशान नहीं करूँगी| मेरी परेशानियों का समाधान मैं स्वयं ही ढूँढ लूँगी।”
उन्होंने विराज को फोन लगाया, “प्रिया की पार्टी शाम सात बजे है। पाँच बजे के पहले उसके मनपसंद रंग के रेडिमेड ब्लाउज के साथ डिजाइनर साड़ी ले कर घर पहुँच जाना।”
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मूळ गुजराती कथा – समाधान
मूळ लेखिका : डॉ. रुश्वी टेलर
संपर्क – झाड़ेश्वर, भरूच (गुजरात)
मो. 9979880080
हिंदी अनुवाद : श्री राजेन्द्र निगम
संपर्क – 10-11, श्री नारायण पैलेस सोसायटी, झायडस हॉस्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद- 380059.
मो. 9374978556
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈