☆ लघुकथा ☆ ~ जब लग गंग, जमुन जल धारा ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
संजना प्रतिदिन यमुना के तट पर जाती और माँ यमुना से अपने बीमार पति की लम्बी उम्र का वरदान मांगती। वह यमुना को स्वच्छ देखना चाहती थी। लेकिन यमुना के जल में बहते कूड़ा करकट और मलबे को देखकर उसका मन विचलित हो जाता था। आख़िरकार उसने यमुना को स्वच्छ रखने का बीड़ा उठा लिया। प्रारंभ में उसने अकेले, लेकिन बाद में एक बहुत बड़े समूह को साथ लेकर चलना शुरू किया। उसने इस कार्य को मिशन बना लिया।
बरसों पहले उसकी अपनी ही शादी के फेरे के समय गायी गई यह पंक्ति कि..”जब लग गंग, जमुन जल धारा। अमर रहे अहिवात तुम्हारा।।” आज तक उसके कान में गूँज रही थी l
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ जीत की असली कीमत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
आश्रम में एक दिन गुरुजी ने देखा, उनका प्रिय शिष्य नीरज उदास बैठा था।
“क्या बात है बेटा, आज इतने चुप क्यों हो?”
“गुरुजी, बहुत मेहनत करता हूँ, फिर भी संतुष्ट नहीं हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझसे आगे निकलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।”
गुरुजी उसे बगीचे में ले गए।
“देखो बेटा, यह आम का पेड़ कितनी धीरे बढ़ता है, फिर भी मीठे फल देता है।”
“लेकिन गुरुजी, दुनिया तो तेज़ चलने वालों की है!”
“अच्छा, बताओ… आख़िरी बार माँ के साथ बैठकर कब खाना खाया था?”
“याद नहीं।”
“दोस्तों से कब मिले?”
“समय ही नहीं मिला।”
“और खुलकर हँसे कब थे?”
नीरज निरुत्तर था।
गुरुजी ने पूछा, “जिस सफलता के लिए जी रहे हो, उसी के कारण जीना भूल रहे हो?”
“तो क्या मेहनत करना छोड़ दूँ?”
“नहीं बेटा, मेहनत ज़रूर करो, लेकिन अपनी सेहत और सुकून को उसकी कीमत मत बनाओ।”
“लेकिन पीछे रह गया तो?”
गुरुजी मुस्कुराए।
“बेटा, जीवन की दौड़ में सबसे आगे निकलकर भी क्या पाओगे, अगर अंत में तुम्हारे साथ चलने वाला कोई न हो?”
नीरज की आँखें नम हो गईं।
“गुरुजी, अब समझ आया… मैं सफलता कमाने निकला था, मगर ज़िंदगी ही खर्च करता जा रहा था।”
गुरुजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, कमाई दोबारा हो सकती है, लेकिन बीता समय, खोई सेहत और छूटे रिश्ते हमेशा वापस नहीं आते।”
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय कथा – दलील। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – जब से श्याम मेरी गली आयो / स्वर- रुखसार खान, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३४३ ☆
☆ कथा कहानी – दलील… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
विवाह के बारह वर्ष तक रागिनी ज़ुल्म सहती रही। उस परिवार को वंशज न दे पाने के कारण उसे हर पल प्रताड़ित किया जाता था, जबकि वह दो बेटियों की जन्मदात्री थी।
देर रात रागिनी का पति नशे में धुत्त घर लौटता और उस पर चिल्लाने लगता। उसकी दोनों बेटियां, जिनकी आयु आठ व पांच वर्ष थी, दुबक कर बिस्तर में पड़ी रहतीं। कई बार वे अपने पिता की कर्क़़श ध्वनि को सुन कर सहम जातीं और मम्मी-मम्मी पुकारने लगतीं।
रागिनी कमरे में आती तथा उन्हें सुला कर लौट जाती। देर रात तक वह उस पर बरसता रहता और जब वह निढाल होकर पड़ जाता, रागिनी अपनी बेटियों के पास लौट आती। सुबह जब वे अपनी मम्मी के शरीर पर पड़े नीले निशान देखती, तो उनके मन में अनेक प्रश्न उठते और उनके पूछने पर वह उन्हें बहला देती। कई बार वह गिरने पर चोट लगने की बात कहती और कभी मौन रह जाती। परंतु सब कुछ जानकर भी वे मासूम गुमसुम बनी रहती।
रागिनी ने जब अपने माता-पिता को पति की हरक़तों से अवगत कराना चाहा, तो उन्होंने यह कहकर उसे आग़ाह कर दिया कि अब उसका इस घर से कोई संबंध नहीं है, क्योंकि वे उसका विवाह कर विदा कर चुके हैं। उसे हर हाल में अपने ससुराल में ही रहना होगा, क्योंकि अब उसका मायके से कोई सरोकार नहीं।
रागिनी ने अपने पति के जाने के पश्चात् मशीन पर सिलाई का काम प्रारंभ किया और उससे मिलने वाले पैसों से वह अपनी संतान की आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगी तथा कभी-कभी कुछ पैसे उनके हाथ में थमा देती।
परंतु यह सिलसिला अधिक दिन तक नहीं चल सका। एक दिन उसके पति को खबर लग गई कि उसकी अनुपस्थिति में महिलाएं उसके घर आती हैं तथा उसकी पत्नी सिलाई का काम करती है। उसने रागिनी से उन पैसों का हिसाब मांगा, जो उसने अब तक कमाए थे।
रागिनी ने उसे बताया कि जो कुछ उसने आज तक कमाया है, वह घर में खर्च हो गया है। परंतु वह इससे संतुष्ट नहीं हुआ तथा शाम को घर लौटते ही उससे पैसे मांगने लगा।
रागिनी परेशान थी कि वह दिन भर जो भी कमाती है, वह पल भर में सब झपट कर ले जाता है। अब वह पहले से अधिक पीने लगा था और नशे की हालत में ज़ुल्म करने का सिलसिला भी बढ़ता जा रहा था। बारह वर्ष इसी जद्दोज़हद में गुज़र गये। अब उसकी बेटियां भी बड़ी हो रही थीं। वह नहीं चाहती थी कि उनके मन में अपने पिता के प्रति वितृष्णा का भाव जाग्रत हो और भविष्य में उन्हें पुरुष नाम के जीव से घृणा हो जाए। सो! एक दिन रागिनी ने पति का घर त्यागने का निर्णय कर लिया।
वह अपनी मासूम बच्चियों को लेकर अपनी सखी आशना के यहां चली गई, जिसका अपना बुटीक था। उसने रागिनी को अपने साथ काम पर रख लिया और वह ‘वर्किंग वुमन हॉस्टल’ में रहने लगी। धीरे-धीरे कुसुम व गगन के चेहरे की रंगत लौटने लगी और वे तीनों खुशी से अपना जीवन-यापन करने लगीं।
समय पंख लगा जाने कब उड़ गया, पता ही नहीं चला। रागिनी ने अपनी बड़ी बेटी कुसुम को कानून की पढ़ाई कराई और छोटी बेटी गगन को डॉक्टर बनाने का निर्णय लिया। वे दोनों शाम को आकर ट्यूशन देती थीं और इससे उनकी पढ़ाई का खर्च चल रहा था।
कुसुम ने लॉ की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात् कोर्ट में अपनी प्रैक्टिस करनी प्रारंभ कर दी। वह अधिकतर महिलाओं के मुकदमे लेती तथा उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन देती। उसकी दलीलें सुनकर जज भी अचंभित रह जाते।
कुसुम ने दो वर्ष के पश्चात् ज्यूडिशरी की परीक्षा पास कर ली और कोर्ट में जज बन गई। जब भी किसी औरत की प्रताड़ना का मुकदमा आता, वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठती। उसे लगता कि उसके पिता कटघरे में खड़े हैं और वह अपनी मां को न्याय दिलाने का प्रयास कर रही है। वह उस अपराधी को सख़्त से सख़्त सज़ा सुनाती, ताकि भविष्य में कोई भी अपनी पत्नी पर ज़ुल्म करने का दु:साहस न कर सके।
गगन ने भी अपनी मेडिकल की परीक्षा पास कर ली। उसने साइकेट्री में पी•जी• की ताकि वह पीड़ित महिलाओं को से मुक्ति दिलाने में सहयोग दे सके। वह उनकी समस्याओं से अवगत होती और पीड़ित महिलाओं को परिजनों द्वारा प्रदत्त यातनाओं से मुक्ति दिलाने का भरसक प्रयास करती। । वह हर मरीज़ को पूरा समय देती;उसकी समस्याओं से अवगत होती और उसके पति व परिवारजनों को उसका पूरा ध्यान रखने को कहती। यदि फिर भी वे उसकी उपेक्षा करते, तो वह उन्हें कानून की धाराओं से परिचित कराती कि उन अप्रत्याशित परिस्थितियों में वे दंडित भी किए जा सकते हैं।
रागिनी अपने मक़सद में क़ामयाब हो चुकी थी। वह अब अपनी बेटियों के नाम से जानी जाती थी। शहर में उन दोनों का दबदबा था; वे दोनों कर्तव्यनिष्ठ थीं, सजग थीं और निर्लिप्त भाव से अपने दायित्व का वहन कर रही थीं। उन दोनों के लिए अब अच्छे रिश्ते आने लगे थे
सो! रागिनी ने एक दिन दोनों से इस विषय में बात की, परंतु उन्होंने विवाह करने से इनकार कर दिया। मां के दबाव डालने पर उन्होंने पलट कर कहा कि ‘बहुत सुख दिया है पापा ने तुम्हें…कैसे हम सबकी ज़िंदगी को नरक बना कर रख छोड़ा था। फिर भी तुम हमसे विवाह करने की बात कह रही हो।
हां! मैं तुमसे पूरे होशो-हवास में यह सब कह रही हूं। यदि मैंने विवाह नहीं किया होता, तो तुम दोनों जैसी सुंदर व संस्कारवान बेटियां मुझे कहां से मिलतीं? मैं तुम्हारी मां हूं। मेरे लिए इससे बढ़कर अच्छी व गौरवपूर्ण बात और क्या हो सकती है?
ठीक है! मां हमारे धैर्य की परीक्षा मत लो। हमारी आज भी ना है और भविष्य में भी रहेगी। हम दोनों समाज में उन तिरस्कृत महिलाओं को न्याय दिलाने को दृढ़-प्रतिज्ञ हैं, जो आज भी दो जून की रोटी पाने के लिए ग़ुलामों-सा जीवन ढोने को विवश हैं।
उनके सामने जीने का न तो कोई लक्ष्य है, न ही कोई सरोकार। हम उन्हें वे सब अधिकार दिलाना चाहेंगी, ताकि वे सिर उठाकर दुनिया में जी सकें।
मां!पता नहीं तुम किस मिट्टी की बनी हो…ता- उम्र अकारण इतनी प्रताड़ना सहती रही और कभी उफ़् तक नहीं की। क्या तुम्हारे मन में नहीं आता कि पापा को उनके दुष्कर्मों की सज़ा मिलनी चाहिए?
ऐसी बातें मत करो। वे तुम्हारे पिता हैं।
हां! तुम उन्हें आज भी अपना पति मान सकती हो, परंतु हमारे लिए तो वे बरसों पहले मर चुके थे… जिस रात वे दूसरी आंटी को घर लाए थे और उस दिन उन्होंने हमें कमरे में बंद कर दिया था। उस रात जो शब्द हमने सुने थे, आज भी मस्तिष्क पर हथौड़े की भांति प्रहार करते हैं। तुम तो उसी कमरे में थीं और तुम्हारे सामने…तुम्हारा पत्नी होने का हक़ छीना गया था।
रागिनी कुसुम व गगन के संवाद सुनकर सन्न रह गई। उसे आभास हुआ कि जिन्हें वह मासूम समझती थी, वे कितनी समझदार हैं। आज तक वे अपने पिता के बारे में सब कुछ जानते हुए भी मौन रहीं। परंतु बरसों से जो लावा उनके अंतर्मन में सुलग रहा था, ज्वालामुखी के रूप में सहसा फूट निकला था। सो!रागिनी के पास उन्हें शांत करने के लिए अब कोई दलील नहीं थी।
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘अम्माँ को पागल बनाया किसने?‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६९ ☆
☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
‘भाई! आज बहुत दिन बाद फोन पर बात कर रही हूँ तुमसे। क्या करती बात करके? तुम्हारे पास बातचीत का सिर्फ एक ही विषय है कि ‘अम्माँ पागल हो गई हैं’। उस दिन तो मैं दंग रह गई जब तुमने कहा –‘अम्माँ बनी-बनाई पागल हैं। भूलने की कोई बीमारी नहीं है उन्हें।’
‘मतलब’? मैंने पूछा
‘जब चाहती हैं सब भूल जाती हैं, वैसे फ्रिज की चाभी ढ़ूंढ़कर सारी मिठाई खा जाती हैं। तब कैसे याद आ जाता है सब कुछ? अरे! वो बुढ़ापे में नहीं पगलाईं, पहले से ही पागल हैं।’
‘भाई! तुम सही कह रहे हो – वह पागल थी, पागल हैं और जब तक जिंदा रहेंगी पागल ही रहेंगी।‘
‘अरे! आँखें फाड़े मेरा चेहरा क्या देख रहे हो? तुम्हारी बात का ही समर्थन कर रही हूँ।’ ये कहते हुए अम्माँ के पागलपन के अनेक पन्ने मेरी खुली आँखों के सामने फड़फड़ाने लगे।
‘भाई! अम्माँ का पागलपन तुम्हें तब समझ में आया, जब वह बेचारी बोझ बन गईं तुम पर। पागल ना होतीं तो तुम पति-पत्नी को घर से बाहर का रास्ता ना दिखा दिया होता? तुम्हारी मुफ्त की नौकर बनकर ना रहतीं अपने ही घर में। सबके समझाने पर भी अम्माँ ने बड़ी मेहनत से बनाया घर तुम्हारे नाम कर दिया।‘ मेरा राजा बेटा’ कहते उनकी जबान नहीं थकती थी, पागल ही थीं ना बेटे-बहू के मोह में? बात- बात में एक दिन मुझसे कह गईं – ‘बेटी ! बच्चों के मोह में कभी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी ना मार बैठना, मेरी तरह।‘
भाई! फोन रखती हूँ। कभी समय मिले तो सोच लेना अम्माँ को पागल बनाया किसने??
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – अनिर्णय… श्री संजय भारद्वाज
यहाँ से रास्ता दायें, बायें और सामने, तीन दिशाओं में बँटता था। राह से अनभिज्ञ दोनों पथिकों के लिए कठिन था कि कौनसी डगर चुनें। कुछ समय किंकर्तव्यविमूढ़-से ठिठके रहे दोनों।
फिर एक मुड़ गया बायें और चल पड़ा। बहुत दूर तक चलने के बाद उसे समझ में आया कि यह भूलभुलैया है। रास्ता कहीं नहीं जाता। घूम फिरकर एक ही बिंदु पर लौट आता है। बायें आने का, गलतछ दिशा चुनने का दुख हुआ उसे। वह फिर चल पड़ा तिराहे की ओर, जहाँ से यात्रा आरंभ की थी।
इस बार तिराहे से उसने दाहिने हाथ जानेवाला रास्ता चुना। आगे उसका क्या हुआ, यह तो पता नहीं पर दूसरा पथिक अब तक तिराहे पर खड़ा है वैसा ही किंकर्तव्यविमूढ़, राह कौनसी जाऊँ का संभ्रम लिए।
लेखक ने लिखा, ‘गलत निर्णय, मनुष्य की ऊर्जा और समय का बड़े पैमाने पर नाश करता है। तब भी गलत निर्णय को सुधारा जा सकता है पर अनिर्णय मनुष्य के जीवन का ही नाश कर डालता है। मन का संभ्रम, तन को जकड़ लेता है। तन-मन का साझा पक्षाघात असाध्य होता है।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆