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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 107 ☆ लघुकथा – क्या था यह ? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा (डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा ‘क्या था यह ?’। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस लघुकथा रचने  के लिए सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 106 ☆ ☆ लघुकथा – क्या था यह ? — ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆ अरे !  क्या हो गया है तुझे ? कितने दिनों से अनमयस्क - सा  है ?  चुप्पी क्यों साध ली है तूने। जग में एक तू ही तो है जो पराई पीर समझता है। जाने – अनजाने सबके दुख टटोलता रहता है। क्या मजाल की तेरी नजरों से कोई बच निकले। तू अक्सर बिन आवाज रो पड़ता...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “तू किस मिट्टी की बनी है माँ?” ☆ डॉ कुंवर प्रेमिल ☆

डॉ कुंवर प्रेमिल (संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 350 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं।  आपने लघु कथा को लेकर कई  प्रयोग किये हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक लघुकथा ‘‘तू किस मिट्टी की बनी है माँ?’’।) ☆ लघुकथा – "तू किस मिट्टी की बनी है माँ?" ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल ☆ "मेरी जुराबें कहां हैं माँ?" "मेरी गणित की किताब नहीं मिल रही है माँ." "मेरा टिफिन लगा दिया न माँ!" "दूध वाला गेट पर खड़ा है माँ?" "पापा, कच्छा-बनियान ढूंढ़ रहे हैं माँ." "चाय-बिस्कुट कब दोगी...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – लम्बी कहानी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ मार्गशीष साधना🌻 आज का साधना मंत्र  - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – “अदरक के पंजे” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल☆

श्री घनश्याम अग्रवाल (श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  – “अदरक के पंजे”) ☆ कथा-कहानी ☆ लघुकथा – “अदरक के पंजे” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆ सड़क के किनारे बनी उस छोटी -सी गन्ने के रस की दुकान पर मैं प्रायः चला जाता हूँ। परिचित दुकानदार होने के नाते कुछ देर रुकता हूँ। ग्राहकों की ओर देखता हूँ। ग्राहक रस पीने की एक पूरी प्रक्रिया से गुजरते हैं। रसवाला जब ताजा गन्ना मशीन में डालता है तो ग्राहक का ध्यान मशीन के पास लगा होता है। पहली बार में मशीन से रस का एक फव्वारा -सा फूटता है। ( कुदरत ने कहाँ-कहाँ मीठे झरने छुपा रखे हैं। ) ढेर सारा गाढ़ा रस जब मशीन से बर्तन में गिरता है तो बिना पीए ही एक मिठास -सी महसूस होती है। पर यह मिठास गन्ने को दुबारा मशीन में डालने तक ही रहती है। जब गन्ने को तिबारा मशीन में डाला जाता है, तो मशीन से...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #169 ☆ कहानी ☆ नये क्षितिज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार (वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कहानी ‘नये क्षितिज’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 169 ☆ ☆ कथा कहानी ☆ नये क्षितिज ☆ शुभा अपना हाथ ऊपर उठाकर देखती है। त्वचा सूखी और सख़्त हो गयी है। उम्र का असर साफ दिखता है। शीशा उठाकर देखती है...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ कथा कहानी – टूक-टूक कलेजा ☆ डॉ. हंसा दीप ☆

डॉ. हंसा दीप संक्षिप्त परिचय यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। तीन उपन्यास व चार कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी व पंजाबी में पुस्तकों का अनुवाद। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020। आप इस कथा का मराठी एवं अङ्ग्रेज़ी भावानुवाद निम्न लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।  मराठी भावानुवाद 👉 ढासळत चाललय काळीज  - सौ. उज्ज्वला केळकर  अङ्ग्रेज़ी भावानुवाद 👉 Broken Heart Translated by - Mrs. Rajni Mishra ☆ कथा कहानी – टूक-टूक कलेजा ☆ डॉ. हंसा दीप ☆ सामान का आखिरी कनस्तर ट्रक में जा चुका था। बच्चों को अपने सामान से भरे ट्रक के साथ निकलने की जल्दी थी। वे अपनी गाड़ी में बैठकर, बगैर हाथ हिलाए चले गए थे और मैं वहीं कुछ पलों तक खाली सड़क को ताकती, हाथ हिलाती खड़ी रह गयी थी। जब इस बात का अहसास हुआ तो झेंपकर इधर-उधर देखने लगी कि मेरी इस हरकत को कहीं...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – कमाई ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।)  आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय लहूकथा – कमाई ।) ☆ लघुकथा – कमाई  ☆ श्री हरभगवान चावला ☆ स्कूल से लौटने के बाद से तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली बेटी तीन घंटे से पढ़ रही थी। उसे न खाने की सुध थी, न सोने की। इतनी देर तक तो बेटी कभी भी नहीं पढ़ी। शारदा ने पुकार कर पूछा, "आज स्कूल से बहुत काम मिला है क्या बेटी?" "हाँ माँ।" श्रेया ने जवाब दिया। "इतने छोटे बच्चों को इतना काम?" माँ ने भीतर आते-आते कहा। बेटी अब भी एक मोटी सी किताब पर झुकी हुई थी। माँ ने उस किताब को उठाकर उलट-पलट कर देखा, "यह तुम्हारे सिलेबस की किताब तो नहीं है।" "हाँ माँ, यह जी.के. की किताब है, स्कूल की...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – मुल्क ☆ श्री महेश कुमार केशरी ☆

श्री महेश कुमार केशरी ☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा - मुल्क ☆ श्री महेश कुमार केशरी ☆"मांँ तुम रो क्यों रही हो ? " -सादिक  ने अमीना बीबी के कंँधे पर धीरे से हाथ  रखकर पूछा। " नहीं, मैं रो कहाँ रही हूंँ ? " " नहीं, तुम रो नहीं रही हो तो तुम्हारी आंँखों  से आंँसू कैसे. निकल रहे हैं ? " सादिक, वैसे ही बोल रहा था। जैसे वो, अमीना बीबी की बात को ताड़ गया हो। "कुछ नहीं होगा... हमलोग.. कहीं.. नहीं जा रहें हैं। सादिक  ने अमीना बीबी को जैसे विश्वास दिलाते हुए कहा।" बहुत मुश्किल से अमीना बीबी का जब्त किया हुआ बांँध जैसे भरभराकर टूट गया,  और वो रुआंँसे गले से बोलीं - " इस तरह से जड़ें... बार-बार नहीं खोदी जातीं l ऐसा ही एक गुलमोहर का पेंड़ हमारे यहांँ भी हुआ करता था। तुम्हारे अब्बा ने उसे लगाया था। इस गुलमोहर के पेंड़ को देखकर तुम्हारे अब्बा की याद आती है। सोचा, इस...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #127 – पुरस्कृत बाल कथा – “चाबी वाला भूत” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है पुरस्कृत पुस्तक "चाबी वाला भूत" की शीर्ष बाल कथा – “चाबी वाला भूत”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 127 ☆ ☆ पुरस्कृत पुस्तक "चाबी वाला भूत" की शीर्ष बाल कथा – चाबी वाला भूत ☆  बेक्टो सुबह जल्दी उठा। आज फिर उसे ताले में चाबी लगी मिलीं। उसे आश्चर्य हुआ। ताले में चाबी कहां से आती है ? वह सुबह चार बजे से पढ़ रहा था। घर में कोई व्यक्ति नहीं आया था। कोई व्यक्ति बाहर नहीं गया था। वह अपना ध्यान इसी ओर लगाए हुए था। गत दिनों से उस के घर में अजीब घटना हो रही थी।  कोई आहट नहीं होती। लाईट नहीं जलती। चुपचाप चाबी चैनलगेट के ताले पर लग जाती। ‘‘ हो न...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चाय☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ मार्गशीष साधना🌻 आज का साधना मंत्र  - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना...
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