☆ लघुकथा – राखी का दीप☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
☆
“भैया तुमकितनी देर में आओगे?”
“आता हूँ जरा बिजी हूं।”
“भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”
“ट्रिन ट्रिन——“
“——–“
“ट्रिन ट्रिन——–“
“———-“
“अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।
“दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”
“हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।
“नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।
“अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”
“तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”
यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
“जानती हूँ। पर क्या तुमने कभी यह सोचा है कि प्यार के बाद की जिंदगी कैसी होगी?”
“माँ, आप भी न! आजकल कौन इतनी बातें सोचता है? हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।”
“मैं भी तुम्हारी उम्र में यही सोचती थी, अनन्या।”
“फिर?”
“तुम्हारे पिता और मैंने भी बहुत प्यार किया था। घंटों बातें होती थीं, एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। लेकिन शादी के बाद बातें कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हो गईं।”
“तो क्या प्यार झूठा था?”
“नहीं। प्यार सच्चा था… शायद हमारी समझ अधूरी थी।”
“आप कहना क्या चाहती हैं?”
“बस इतना कि शादी से पहले यह मत देखना कि वह तुम्हें कितना चाहता है। यह भी देखना कि तुम्हारे ‘न’ कहने पर उसका व्यवहार कैसा होता है, तुम्हारी असहमति का वह कितना सम्मान करता है, तुम्हारे सपनों के लिए कितनी जगह रखता है।”
अनन्या कुछ देर चुप रही।
“माँ, अगर निखिल इन सब बातों में अच्छा निकला तो?”
माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा-
“तब क्या तुम उससे सिर्फ इसलिए शादी करोगी कि वह तुम्हें प्यार करता है… या इसलिए भी कि उसके साथ तुम अपने आपको सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करती हो?”
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “राहत…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆
लघुकथा ☆ राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
आजकल हाउसिंग सोसायटी हर जगह बनी हुई हैं। एक कालोनी या एक दो बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सोसायटी बना लेते हैं ताकि बिजली पानी सफाई जैसे काम होते रहें और लोग अपना काम निश्चिंत होकर करते रहें। चिंता अगर रहती है तो अपने निजी काम की। सहकारिता की इस भावना की लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुए प्रशासन ने भी सोसायटी को मान्यता दी है उसके लिए वियम पर नियम बनाए हैं। उसका रजिस्ट्रेशन वगैरह सब कुछ होता है। सोसायटी अपने सदस्यों और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी बन गई है।
गली में कचरा है तो सोसायटी साफ कराएगी। नल में पानी नहीं आ रहा है तो सोसायटी व्यवस्था करेगी। कोई अपने मकान या फ्लैट में कुछ निर्माण करवा रहा है तो उसे सोसायटी देखेगी। पार्किंग व्यवस्था भी यानी जो भी सार्वजनिक काम हो सोसायटी देखेगी। किसी के फ्लैट का पानी दूसरे के फ्लैट में आ रहा है तो सोसायटी देखेगी। वे लोग आपस में बात करके हल नहीं निकाल सकते।
पता नहीं कैसे एक डंफर से एक बड़ा पत्थर सोसायटी के गेट के अंदर गिर गया। पत्थर भारी था। वॉचमैन अकेला उठा नहीं पा रहा था। जो भी आता सोसायटी को कोसता कि सोसायटी कर क्या रही है। कब से पत्थर पड़ा है और सोसायटी सोई हुई है। आते जाते चेयरमैन सेक्रेटरी को बोलते, भाई पत्थर हटवाओ सबको बहुत दिक्कत हो रही है। सेक्रेटरी बोलता क्रेन नहीं मिल रही है, मिलते ही उठवा देंगे। सभी लोग पत्थर के इधर उधर से भुनभुनाते निकल जाते पर किसी ने उसे हटाने का प्रयास नहीं किया।
सोसायटी में चार पांच युवक थे । ड्यूटी से आने के बाद एक जगह बैठकर गप्पें मारा करते थे। एक ने कहा कि भाई यह पत्थर की दिन से एक ही जगह पड़ा हुआ है। चलो मिल कर उसे रास्ते के किनारे कर देते हैं। उनमें सहमति बनी और चारों पांचों उठे और मिल कर पत्थर को एक ओर खिसका दिया। अब किसी को परेशानी नहीं होगी।
दूसरे दिन लोगों ने पत्थर रास्ते में नहीं देखा तो सोसायटी के चेयरमैन सेक्रेटरी की तारीफ़ करने लगे कि ऐसे काम करना चाहिए और चेयरमैन सेक्रेटरी एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर चुप रहे। तीन चार दिन बाद म्युनिसिपेलिटी की गाड़ी आई और पत्थर को उठा ले गई। सभी ने राहत की सांस ली।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दोष किसका?)
लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से शहर की सड़कें तालाब में बदल गई थीं। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी थीं और गंदा पानी घरों में घुसने लगा था। शर्मा जी छतरी लेकर दरवाजे पर खड़े बड़बड़ा रहे थे।
“बस करो बारिश! आखिर कितना सताओगी? पूरा शहर डुबोकर ही मानोगी क्या?”
सामने से गुजर रहे वर्मा जी ठिठक गए।
“शर्मा जी, बारिश को क्यों कोस रहे हैं?”
“क्यों न कोसूँ? देख नहीं रहे, सड़क पर कमर तक पानी है। घर में रखा सामान खराब हो रहा है। बच्चे बाहर नहीं निकल पा रहे। यह बारिश नहीं, आफत है आफत!”
वर्मा जी मुस्कराए, “बारिश आफत नहीं, प्रकृति का वरदान है।”
“वाह! आपके घर में पानी नहीं घुसा, इसलिए वरदान लग रही है।”
“मेरे घर में भी पानी घुसा है, लेकिन दोष बारिश का नहीं है।”
“तो किसका है? बादलों का?”
“नहीं, हमारी व्यवस्था का और हमारी लापरवाही का।”
शर्मा जी तुनककर बोले, “अब इसमें हमारी क्या गलती?”
वर्मा जी ने सड़क की ओर इशारा किया। नाली के मुहाने पर प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और कूड़े का ढेर जमा था।
“यह देखिए। नाली किसने बंद की?”
शर्मा जी चुप रहे।
“बारिश ने?”
शर्मा जी ने मुँह फेर लिया।
वर्मा जी फिर बोले, “नालियाँ समय पर साफ नहीं होंगी, कचरा नालियों में फेंका जाएगा, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण होगा और फिर हम बारिश को दोष देंगे—यह कहाँ का न्याय है?”
शर्मा जी कुछ नरम पड़े।
“लेकिन नगर निगम की भी तो जिम्मेदारी है।”
“बिल्कुल है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करना, नालियों की नियमित सफाई करना और जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन शहर को साफ रखना नागरिकों का भी कर्तव्य है।”
अचानक नाली से निकला गंदा पानी सड़क पर फैलता हुआ शर्मा जी के दरवाजे तक आ पहुँचा।
वे घबराकर बोले, “अरे! मेरा सामान अंदर रखा है।”
वर्मा जी ने उनकी मदद करते हुए कहा, “यही पानी अगर सही रास्ते से निकल जाए तो मुसीबत नहीं, उपयोगी संसाधन है।”
शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा, “तो बारिश को दोष देना बंद कर दें?”
“बारिश को नहीं, अपनी सोच और व्यवस्था को सुधारिए।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
शर्मा जी ने सामने जमा कूड़े को देखा। फिर बोले, “कल मोहल्ले की बैठक बुलाएँगे। नालियों की सफाई के लिए नगर निगम में शिकायत करेंगे और लोगों को भी समझाएँगे कि कचरा नालियों में न डालें।”
वर्मा जी मुस्कराए, “अब बात बनी।”
आसमान से बारिश अब भी बरस रही थी। शर्मा जी ने पहली बार उसे शिकायत भरी नजरों से नहीं, बल्कि समझदारी भरी नजरों से देखा।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “नई दिशा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆
🌻लघुकथा🌻 नई दिशा 👩🍼
मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।
मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।
हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।
सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
वह घर आया और रूठ कर दादी के पास पहुच गया। उसकी बाजू पकड कर बोला- दादी , फोन पर मेरी पापा से बात करवा दे।
– क्यों ?
– दादी , कहां रहता है , मेरा पापा ?
– वो तो काम के लिए दूर रहता है ।
– बुला उसे अभी ।
– क्यों ?
– मैं अभी जाॅय के साथ खेल रहा था । उसका पापा आया और हम दोनों को कार में घुमाने ले गया ।
– फिर क्या हुआ ?
– जब मेरे पापा के पास गाड़ी है, तो मैं जाॅय के पापा की गाडी में सैर क्यों करूं ?
– बेटे , तेरे पापा नहीं आ सकते ।
– कह दे फिर मैं उनसे बात नहीं करूंगा ।
-नहीं बेटे, ऐसे नहीं कहते ।
– बस फिर, करवा दे मेरी बात। वह अपनी जिद्द पूरी करके ही माना । उसके बाद सपनों में खो गया और पापा की गाड़ी में सैर करने निकल गया ।
(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14 पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा सुश्री गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “औरत”।)
☆ कथा-कहानी – औरत – भाग – १ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆
गहरे रंग के दुपट्टे से बालों को ढंक कर अपने लोगों पर हुक्म चलानेवाली समीरा के गाल पर जब उसके सुनहरी बाल आ जाते, तब वह उन्हें एकटक देखता रहता | इस सुरमई आँखोंवाली मालकिन उसे उसके गाँव में बैठी एक प्रियजन की याद दिला देती | – अब इसकेआगे —-
सुश्री गिरिमा घारेखान
एक गुरुवार राशिद नहीं आया | सुबह से राह देख रही समीरा दोपहर तक बैचैन हो गई | उसने राशिद का फोन मिलाया |
‘आपकी राह देख रही हूँ |’
‘अरे जानेमन, कुछ काम है यहाँ |’
राशिद के इस ‘जानेमन’ संबोधन में समीरा को आज जान नहीं लगी | परंतु बहुत अधिक पूछताछ किए बगैर उसने इतना ही पूछा,
‘अगले गुरुवार को तो आ रहे हो न ?’
‘इंशाअल्लाह’ कह कर राशिद ने फोन रख दिया |
उसके बाद प्रत्येक गुरुवार को सुबह समीरा खिड़की के पास खड़ी हो जाती और राशिद का इंतजार करती रहती और नजर हमेशा बाहर के खालीपन से टकरा कर वापिस लौट आती | एक दिन उसने माली को बाहर एक बड़े वृक्ष को उखाड़ते हुए देखा | उसने कारण पूछा तो जवाब मिला, ‘मालकिन, यहाँ तो ऐसे तैयार बड़े पेड़ लगाए जाते हैं | कुछ लग जाते हैं और कुछ नहीं लगते हैं | यह सूख गया है, इसलिए उखाड़ रहा हूँ |’
उसके बाद समीरा जब भी दर्पण में देखती, तब उसे एक सूखने वाला वृक्ष दिखाई देता | उसकी बेचैनी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी | राशिद की रुकी हुई मुलाकातें, आवाज में बेरुखी और रख दिए जाते टेलीफोन उसे क्या संकेत दे रहे थे ? अब उसे मखमली कारपेट, फव्वारे का पानी और बगीचे के फूल आनंद नहीं देते थे | अब अन्धकार से खुश्बू और दिन से उजाला उड़ गया था |
महीने से भी अधिक समय हो गया था | समीरा को राशिद के व्यवहार में आए इस अचानक बदलाव का कारण समझ में नहीं आया था | राशिद को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी? उसे मात्र काम करने के लिए यहाँ लाया गया था ? ‘हिंदुस्तानी होशियार लड़की’ थी, इस लिए ? अकेलापन उसे खाए जा रहा था | पीली खजूर भी पक कर अब सुर्ख लाल हो गई थी | कुछ दिनों में यह काम भी बंद हो जाएगा | फिर तो बात करने के लिए सईद का साथ भी नहीं मिलेगा |
समीरा का मन बारबार उड़ कर उसके गाँव पहुँच जाता | वहाँ उस छोटे से घर में कितना सुकून था ! घर व बाहर पूरे दिन किसी चिड़िया की तरह चाँव-चाँव कर उड़ती रहनेवाली वह यहाँ क्या बन गई थी- एक मसाला भरी मोरनी जो कमरे की शोभा बढ़ाती थी ? वह सोचती कि उसकी अम्मी ने उसे इस सुख के कुँए में क्यों धकेल दिया ? अम्मी ने उसकी चमकती दीवारों को देखा. लेकिन उसे यह मालूम नहीं हुआ कि उन दीवारों पर भावनाओं की आर्द्रता बिल्कुल नहीं है | इन चिकनी दीवारोंवाले कुएँ में सिर ऊँचा रख कर बैठी समीरा प्रत्येक गुरुवार की सुबह राशिद के आने की राह देखती और दोपहर के बाद अगले गुरुवार की राह देखती |
अंत में उसके दुःख के बादलों को चीरता हुआ एक गुरुवार आया | राशिद जल्दी सवेरे ही आ गया | उसके चेहरे पर समुद्र की लहरों की तरह आनंद उछल रहा था | उसके ड्रायवर ने गाड़ी में से मिठाई के पैकेट निकाले और बगीचे में काम करनेवाले लोगों को बाँटना शुरू किया | सभी लोग मालिक को ‘मबरुक, मबरुक’ कह रहे थे | राशीद तो मानो दौड़ता हुआ समीरा के पास आया और उसे उठा लिया | समीरा के मन के रेगिस्तान में बरसात हुई | बहुत दिन के बाद मिले इस खाविंद से लिपटकर वह बोली, ‘इतनी ख़ुशी ! क्या धंधे में बहुत तरक्की हुई ?’ राशिद ने समीरा के मुँह को अपने दोनों हाथों के बीच लिया. ‘अरे, जिंदगी में तरक्की मिल गई | मैं अब्बा बन गया | बेटा हुआ है, बेटा |’
समीरा के कान से मानो बहता हुआ तेज़ाब उसके पूरे शरीर में फ़ैल गया | उसने राशिद को धक्का दे कर अपने से दूर किया | अब भी उसे अपने कानो पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था, ‘आ…प आप अब्बा ? अर्थात् क्या आपकी दूसरी पत्नी…?’
अब राशिद कुछ बेशर्मी के साथ हँसा, ‘अभी ऐसे सवाल से मेरा मूड खराब मत करो | बगैर बीबी के मैं मस्कत में रहूँगा कैसे ? मैं मर्द हूँ मर्द, अरब मर्द, समझीं ? मर्द को तो औरत चाहिए ही चाहिए, हर जगह|’
समीरा का कलेजा फट गया | बोलने को कुछ रहा नहीं | अरब देश में शादी कर रोबभरी साहबी के साथ बख्शीश की तरह मिलनेवाली इस कटु वास्तविकता को वह अच्छी तरह समझ गई थी | परंतु अब क्या हो सकता है ? धागा ही टाँके को तोड़ दे, तो फिर सिलाई कैसे हो?
राशिद ने दोपहर में खजूर का सब हिसाब-किताब देखा और शाम को ही लौट गया | खिड़की के पास खड़ी होकर समीरा इस उत्फुल्ल अरब मर्द को जाते हुए देखती रही | सूरज के ढलने से अब बाहर अँधेरा छा गया था | समीरा ने खिड़की से इस अन्धकार पर थूका, कमरे में आई और सात बल्बवाले झूमर की लाईट चालू की | कमरा जगमगाने लगा |
समीरा ने मोबाईल हाथ में लिया और सईद को फोन किया | कुछ ही देर में आसमान से निकलनेवाले आफताब की तरह सईद आ गया | उसे देखकर समीरा को लगा, मानो उसे कोई आत्मीय मिल गया हो और तब केरल की बरसात की तरह उसकी आँखे बहने लगी | उसने रोते-रोते कहा. ‘सईद, तुमने भी मुझे नहीं बताया, तुमने भी ?’
सईद सब स्थिति समझ गया और नजरे झुका कर बोला, ‘आप बहुत मासूम हैं | यह अरब देश है, यहाँ तो मर्द जहाँ भी रहे, वहाँ उसे एक बीबी तो चाहिए ही |’
समीरा चुपचाप सुनती रही | सईद की बातों से उसकी मासूमियत क्षीण होती रही – ‘अब मालिक की पहली ओमानी बीबी तो बच्चे में व्यस्त हो जाएगी | सुना है, अब मालिक पाकिस्तान जाएँगे | शादी कर आएँगे और उस लड़की को मस्कत में रखेंगे…|’
पत्थर बनी समीरा कण-कण में बिखर गई | उन कणों को एकत्रित करने में उसे कुछ वक्त लगा | फिर सईद की आँखों में अपनी सजल आँखें डालकर वह बोली, ‘तुम्हारे मालिक ने पैसों के जोर पर मेरी जिंदगी बर्बाद की है | सईद, क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ ? मुझे यहाँ के कायदे-क़ानून समझाओगे ?’
सईद को समीरा की आँखों में दिखीं चौवीस घंटे उसका पीछा करती केरल के उसके घर में बैठी बहन की दो आँखें | उसने स्वीकृति में सिर हिला दिया | उसे लगा कि खुदा ने उस पर मेहरबान होकर किसी का कर्ज चुकाने का मौका दिया है |
लगभग डेढ़ महीने के बाद राशिद आया | नए कपड़े और अलंकारों से सजी किसी दुल्हन की तरह समीरा उससे लिपट गई- कोई शिकायत नहीं और कोई गुस्सा नहीं | राशिद मन ही मन हँसा, ‘औरत को कपड़े-गहने मिल जाए, उसे फिर कोई फर्क नहीं पड़ता है |’
शब्दों में अपने समग्र स्त्रीत्व को पिघालकर समीरा ने राशिद से कहा: ‘दिलबर, आप बहुत लंबे समय से नहीं आते हैं, इसलिए बहुत परेशानी रहती है |”
‘क्या बेगम ? आप बोलिए, आपकी सभी समस्याएँ दूर कर देंगे |’
राशिद को लगा कि वह किसी नए गहने की माँग करेगी |
‘आपके न आने से हमारे घर व खजूर के धंधे के लोगों की तनख्वाह समय पर नहीं होती है अतः वे काम ठीक से नहीं करते हैं | देखिए, खजूर उतारने के पहले ही कितनी पक गई ?’
‘बात तो सही है |’
‘अगर आप मंजूरी दें तो मुझे इस कामकाज को कुछ बढ़ाना है | पकी हुई खजूर में से गुठली निकालकर उसमें बादाम भर कर हम उसे परदेश भेज सकते हैं |’
राशिद को इस हिंदुस्तानी लड़की के दिमाग पर गर्व हुआ |
‘मेरे सरताज, आप मुझे यहाँ की पावर ऑफ अटार्नी दे दें, फिर आप कितने भी लंबे वक्त तक यदि न भी आएँ, तो कुछ दिक्कत नहीं |’ राशिद के होंठों पर अपनी उंगलियाँ घुमाते हुए समीरा बोली, ‘इस जानु के बगैर मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है. लेकिन उसकी औरत हूँ| मुझे मेरे खाविंद की खुशी भी देखना है न ?’
हाथों में पहनी चूड़ियों को खनकाते-खनकाते समीरा ने एक बादाम भरी खजूर राशिद के मुँह में रखी और उस नर्म खजूर के साथ उसकी बात भी राशिद के गले उतर गई | इतनी अवधि तक इस औरत ने इस कारोबार को बहुत सुंदर ढंग से संभाला था, इसलिये उसकी कुशलता या नियत पर भरोसा न करें, उसका कोई कारण ही नहीं था | यदि वह इसको पावर ऑफ अटार्नी दे दे, तो वह पाकिस्तान कि जिस खिली हुई कली को लानेवाला है, उसके साथ वह मस्कत में आराम से रह सकता है |
हमेशा की तरह राशिद शनिवार को चला गया और मंगलवार शाम को उसका ड्रायवर आया और सरियात की अदालत के दस्तावेज दे गया | अब राशिद की सोहार की सभी संपत्ति की पावर ऑफ अटार्नी समीरा के पास थी | दस्तावेज को हाथ में ले कर मुस्कराती हुई समीरा मन में बोली : ‘इस मर्द को पहली बार कोई औरत मिली है |’
सूर्यास्त हुआ और आकाश में चन्द्रमा उभरा | समीरा ने मोबाईल हाथ में लिया और सईद को फोन किया, ‘काम हो गया है | सेवइयाँ बना रही हूँ, आनंद से यह ख़ुशी मनाएँगे न ?’
दूर किसी मस्जिद में मगरीब की नमाज की अजान हुई | समीरा ने दुपट्टा सिर पर ओढ़ा और खुदा का शुक्रिया कहने के लिए उसने नमाज पढ़ना शुरू किया |
(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14 पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “औरत”।)
☆ कथा-कहानी – औरत – भाग – १ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆
कुछ घरघराहट. मंद हो रही रोशनी… और विमान उड़ने लगा | समीरा धीमे-धीमे छोटे होते जा रहे घरों को वह खिड़की से देखती रही | इनमें मेरा भी घर दिखाई देता होगा ? एक दूसरे से सटे अनगिनत घरों में उसका भी था एक घर | कहाँ से दिखाई देगा ? उसे याद आ गया… उसका बचपन… जब उड़ते विमान की हल्की-सी आवाज सुनते ही मोहल्ले के सभी बालक दौड़ कर बाहर आ जाते और वे तब तक देखते रहते, जब तक कि कि वह विमान छोटा होते-होते अदृश्य नहीं हो जाता | आज ठीक उल्टा है | वह विमान में बैठी है और घरों को छोटे होते हुए देख रही है |
सुश्री गिरिमा घारेखान
कुछ देर में विमान बादलों में आ गया और समीरा पानी में पड़ने वाले प्रतिबिंब की तरह कुछ दिन पहले के उस नज़ारे को तादृश्य होते हुए देखती रही |
‘नहीं मम्मी, मुझे शादी कर इतनी दूर नहीं जाना है |’
‘अरे पगली, मस्कत कहाँ इतनी दूर है ? विमान से तो सिर्फ दो-तीन घंटे में वहाँ पहुँच जाते हैं | इससे अधिक वक्त तो ट्रेन से कोचीन पहुँचने में लगता है |’
परवीन ने बेटी को समजाते हुए कहा l
समीरा को तो परदेश के नाम से ही पेट में चकरी जैसी घूमने लगती थी |
‘लेकिन अम्मी, बिल्कुल अनजान देश और अनजान लोग | मैं वहाँ कैसे रहूँगी ?’
परवीन ने समीरा को अपनी खाला की लड़की की बात बताकर समजाने की कोशिश की l | वह कई वर्षों से दुबई में थी | महल जैसे घर में रहती थी | अधिक आना तो उसका संभव नहीं होता था. परंतु ईद-त्यौहार पर सबके लिए ढेरों कपड़े, इत्र, खजूर, सूखा मेवा और चाकलेट भेजती रहती थी | लेकिन फिर भी समीरा का मन नहीं मान रहा था | बरसात के दिनों में उसके घर की छत से गिरते पानी की तरह अम्मी की आँखों से भी पानी का बहना शुरू हो गया था |
समीरा उसके घर की हालत जानती थी | उसे मालूम था कि उसके अब्बा पूरे दिन साँस फुलाते हैं, तब कहीं घर के छह व्यक्तियों के शरीर को उनकी ऑक्सीजन मिलती थी | पगार के बाद के दस दिन ईद की तरह लगते थे और फिर धीरे- धीरे रोजों की शुरुआत हो जाती थी | दूर के एक रिश्तेदार की मार्फ़त, बीस वर्ष की समीरा के लिए, मस्कत में रह रहे एक अरब के लिए माँग आई | इस रिश्तेदार ने पहले भी कई लड़कियों की शादी खाड़ी के देशों में कराई थी, इसलिए अविश्वास की तो कोई बात नहीं थी | अतः यदि बगैर दहेज़ दिए लड़की को उसका ठिकाना मिल रहा हो, तो समीरा की अम्मी को अविश्वास करने का विचार भी नहीं आ रहा था |
इसलिए उस दिन जब तक समीरा मान नहीं गई, तब तक परवीन उसे समझाती रही | माँ-बेटी की आँसुओं की धार एक जैसी ही थी, सिर्फ कारण अलग थे | समीरा सोच रही थी कि एक बिल्कुल अनजाने देश में, एक अजनबी के साथ उसकी जिंदगी कैसे गुजरेगी ? फिर अरब देशों के लिए तो उसने कैसी-कैसी बातें सुनी थीं- वहाँ बुर्के में रहो, घर के बाहर बहुत अधिक नहीं निकलो और ऐसी ही बहुत-सी बातें | यहाँ चाहे पैसों की कमी हो, लेकिन वह आजादी से घूम सकती थी ! सरकार द्वारा लड़कियों को दी जानेवाली सहुलियत के कारण उसने बारहवीं तक पढ़ाई की थी | लड़कों के साथ एक ही कक्षा में बैठ कर व मॉनिटर बन कर रोब जमाया था| स्कूल में हेड-गर्ल बन कर भाषण दिए थे और सहेलियों की एक्टिवा पर बैठ कर बाजारों में घूमी थी | उसके अब्बा-अम्मी ने यह सब करने के लिए कभी इंकार नहीं किया था | मस्कत में बुर्के के अलावा और कितनी बंधन होते होंगे ? क्या वह साँस ले सकेगी ?
फिर भी समीरा अम्मी के मजबूरी के शब्दों और लाचारी के आँसुओं के सामने झुक गई | उसने जब अम्मी की ओर देखतें हुए स्वीकार में सिर हिलाया, तब अम्मी इतनी खुश हो गई, मानो झुकी हुई गर्दन में उसे ईद का चाँद दिखाई दिया हो | समीरा का कपाल चूमते हुए उसने कहा था, ‘मेरी सयानी बेटी, चल, अपनी चाँद जैसी सूरत को सँवार ले | करीम चाचा उस अरब को ले कर आनेवाले हैं | राशिद – राशिद नाम है उनका |’
और आज वह राशिद की बीबी बन कर उसके साथ मस्कत जा रही थी | पहली मुलाकात में तो समीरा की पलकों पर पहाड़ छा गया था, लेकिन दूसरी मुलाक़ात में उसे लगा कि राशिद में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं था | ऊँचा, गेहूँवर्ण और चुस्त शरीर | दूसरी मुलाक़ात में उसने समीरा को कहा था, ‘उस दिन तो आपकी पलकें उठ ही नहीं रही थीं और मेरी आँखें थीं कि आपकी सूरत से हट ही नहीं रही थीं | मैं तो हिंदुस्तान आया था, लड़की से निकाह करने और मुझे तो नूरजहाँ मिल गईं | मेरी तो बिना रोजे के ही इफ्तारी हो गई | हमदुल्ला |’
तब समीरा के हृदय में एक कोपल फूट गई थी | निकाह के बाद राशिद, किसी नवाब का हो वैसा साटिन का, दूध जैसा सफ़ेद, जिसे वे ‘कंदोरा’ कहते थे, उस कुर्ते पर दिल को महकानेवाला परफ्यूम जब छांटता, तब समीरा उसकी उम्र के अंतर को भूल जाती | उसकी कमर के ऊपर लटकनेवाले चाँदी के खंजर और उसके साथ बंधे चाँदी के पट्टे ने तो मानो समीरा के मन को पूर्ण रूप से बाँध लिया था | हिंदुस्तान के सँस्कारों वाला और अब तक कुँवारा रहा समीरा का मन कब उस परदेशी के साथ ओतप्रोत हो गया, उसे महसूस ही न हुआ | वह अजनबी शख्स “शौहर” का इल्काब प्राप्त करने के साथ ही उसका सर्वस्व बन गया था |
एयर होस्टेस ठंडा पेय लेकर आई और राशिद ने समीरा को बादलों में से बाहर खींचा|
‘कैसा लगता है, यूँ बादलों में पहली बार उड़ना ?’
‘आपके साथ बैठ कर लगता है, मानो विमान सातवें आसमान में उड़ रहा है |’ समीरा ने राशिद की ओर कुछ नजदीक खिसकते हुए कहा |
निकाह के बाद तुरंत उसे साथ ले जाने की कार्यवाही में व्यस्त हुए राशिद से समीरा का बहुत कुछ पूछना बाक़ी रह गया था | उसने वह पूछना अब शुरू किया |
‘मस्कत कैसा शहर है? आपका घर कैसा है ? घर में कौन- कौन हैं ?’
राशिद ने हँसते हुए कहा, ‘मस्कत तो बहुत ही सुंदर शहर है | लेकिन हमें तो सोहार में रहना है |’
‘सोहार !’`
‘हाँ, वह मस्कत से कुछ छोटा शहर है और वहाँ मेरा घर है, फार्म हाउस- गार्डनवाला घर है | फार्म में घर में, बहुत नौकर- नौकरानी हैं | वहाँ तुम्हें बिल्कुल अकेला नहीं लगेगा |’
‘फ़ार्म !’ समीरा को लगा कि खुदा ने सच में उस पर मेहरबानी की है |
‘’बहुत बड़ा फ़ार्म है; खजूर के पेड़ हैं | उन्हें अब तुम्हें ही तो सँभालना है | हिंदुस्तान की लड़कियाँ बहुत होशियार होती हैं |’ समीरा के गाल पर हल्की-सी चपत लगाते हुए राशिद ने कहा|
समीरा आश्चर्य से सब कुछ सुनती रही | उसके चौकन्ने दिमाग में तुरंत एक प्रश्न उठा, ‘राशिद ऐसा क्यों कह रहा था कि तुम्हें अकेला नहीं लगेगा ? अकेले उसे क्या संभालना था और क्यों ?’ उसके दिमाग में यह सब एक साथ समा नहीं रहा था | बहुत कम समाया में उसकी जिंदगी विमान की तरह उड़ती-उड़ती उसकी विचार-शक्ति से भी आगे बढ़ गई थी | इस समय तो मानो एक विकसित पौधे को उसकी जड़ों के साथ उखाड़कर किसी अन्य जगह पर रोपने के लिए ले जाया जा रहा था |
फिल्मों में देखे किसी हवाई-अड्डे से अधिक भव्य मस्कत हवाई-अड्डे को देख कर न केवल समीरा की आँखें, बल्कि मस्तिष्क भी चौंधिया गया | एयरपोर्ट के बाहर राशिद का ड्रायवर एक बड़ी गाड़ी के साथ खड़ा था | कोमल, चमकीले गाड़ी के पहिए किसी अफ्रीकन सुंदरी के गाल जैसे रास्ते को चूमकर आगे दौड़ रहे थे | लगभग एक सौ पच्चीस किलोमीटर के रास्ते पर समीरा मार्ग के दोनों ओर लटक रही खजूरी और किसी रंगोली की तरह बिखरे फूलों को अपनी नजर से निहारती रही | सोहांर में उसने जब अपने विशाल बँगले में प्रवेश किया, तब उसे लगा कि उससे पहले जन्नत यहाँ रहने के लिए आ चुकी है |
राशिद के प्रेम में डूबी समीरा अपने कुटुंब, देश, समय व दिनों की गणना भूल गई | वह बँगला उनके हनीमून की रोमांचक घड़ी को देखता हुआ रंगबिरंगा प्रकाश फैलाता रहा | बाहर खड़े खजूर के वृक्ष उनकी पीली खजूर में अधिक मिठास भरते रहे | एक दिन सवेरे राशिद की परफ्यूम की तीव्र गंध से समीरा की नींद खुल गई |
‘इतनी सुबह किस ओर ?’
‘मस्कत जा रहा हूँ | अब काम तो करना पड़ेगा न ?’
‘मतलब ?’ आघात से समीरा के मुँह से शब्द फूटे | वह चौड़ी आँखों से राशिद को ताकती रही | उसकी नींद अब पूरी तरह काफूर हो चुकी थी |
अपने कंदोरे पर चाँदी के पट्टे को पहनते-पहनते राशिद बोला. ‘जानेमन, मेरा मुख्य बिजनेस तो मस्कत में है | सप्ताह में पाँच दिन वहाँ रहूँगा | जुम्मे से पहले अपनी मलिका के पास उसका शहनशाह हाजिर |’
‘लेकिन…’
‘अरे पाँच दिन तो ऐसे ही बीत जाएँगे |’ हाथ से चुटकी बजाते हुए राशिद बोला. ‘तुम यह महल ठीक से देखोगी और तब तक बंदा वापिस |
आलिंगनबद्ध समीरा को नजाकत से दूर कर, वह उस आघात से बाहर आए, उसके पहले राशिद चला गया | यह बात राशिद ने उसे पहले क्यों नहीं बताई, इस प्रश्न का जवाब जानने की उसने बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं जान सकी | परंतु जैसे जंगल में निकल पड़ी किसी बालिका का समय पहले डालियों पर झूलने में, नीचे गिरे फलों को उठाने में, पक्षियों के पीछे दौड़ने में और फूलों के साथ बात करने में बीतता है, वैसा ही कुछ समीरा के साथ हुआ | वह घर में बिछे मखमली गलीचों पर तितली की तरह बैठती, बाथरूम में सुगंधित पानी से भरे टब में झाग के साथ एकरस हो जाती, बगीचे में नाच रहे फव्वारे के जल के छिड़काव से वह इन्द्रधनुष हो जाती… कई बार नक्काशीदार बड़े दर्पण के सामने बैठ कर आभूषणों को बदलती और सोचती रहती कि राशिद जब आएगा, तब वह क्या पहनेगी | वह किसी चातक की तरह गुरुवार की प्रतीक्षा करती | राशिद गुरुवार की सुबह हाजिर हो जाता और समीरा अपने इस फ़रिश्ते के साथ जन्नत के अंदर की जन्नत का आनंद लेती रहती |
राशिद धीरे-धीरे खजूर के कारोबार के बारे में समीरा को बताता गया और चतुर समीरा कुछ ही समय में सब काम सीख गई | पीली हो गई खजूर को पेड़ों से नीचे लाना, वजन कराने के बाद पैक कराना, लेबल लगाना और बड़े-बड़े खोखों में मस्कत भेजना | यह सब काम वह अपने लोगों से बहुत अच्छे ढंग से कराती | वहाँ इन सब का मैनेजर केरल से आया सईद था, जो अब उसका सीधा हाथ जैसा हो गया था | अपने ही मुल्क की इस मालकिन का उस पर जो विश्वास था, उससे सईद मगरूर था | गहरे रंग के दुपट्टे से बालों को ढंक कर अपने लोगों पर हुक्म चलानेवाली समीरा के गाल पर जब उसके सुनहरी बाल आ जाते, तब वह उन्हें एकटक देखता रहता | इस सुरमई आँखोंवाली मालकिन उसे उसके गाँव में बैठी एक प्रियजन की याद दिला देती |
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय बोधकथा ‘लकीर‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६३ ☆
☆ बोधकथा – लकीर☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
स्वाभिमान और अहंकार की गाड़ी ट्रैफिक में अटक गई। अहंकार ड्राइविंग सीट पर बैठा था। एफ.एम. पर गाने चल रहे थे – ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई- –‘ गाने को सुनकर बातों ने नया मोड़ ले लिया। स्वाभिमान बोला– “तरह-तरह के लोग होते हैं दुनिया में। तू अपने को ही देख, कितना बढ़-चढ़कर बोलता है।”
अहंकार बोला – “अरे! दुनिया गाल बजानेवालों की है, मुँह सिले बैठे रहो, कौन पूछेगा तुम्हें?”
“मैं तेरी तरह डींगे नहीं हाँकता। तेरी बातों से दूसरों का दिल दुखता है। मैं जो करता हूँ, अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए” — स्वाभिमान जरा तनकर बोला।
“मैं भी यही करता हूँ। किसी का दिल दुखे, बुरा लगे तो इसमें मेरा क्या दोष? मैं कुएँ के मेंढ़क की तरह नहीं रह सकता।”
पास खड़ा स्कूटर सवार अभिमान इनकी बातचीत सुन बोला- “ड्राइविंग सीट पर बैठा अहंकार तो सबको दिखता है पर पिछली सीट पर बैठा स्वाभिमान कब अहंकार में बदल जाता है, इसका भान उसे भी नहीं होता—-!!”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। शिक्षा – स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र ए हिंदी साहित्य), सम्मान – अनेक साहित्यिक सम्मान से अलंकृत। प्रकाशन – साझा संकलन एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,आकाशवाणी में काव्यपाठ। सम्प्रति – गृहणी, श्रोता एवं रचनाकार। अभिरुचि– साहित्य, संगीत, प्रकृति, देशाटन। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्री गणेश।)
☆ लघुकथा ☆ श्री गणेश श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’☆
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शाम ढलते ही गणेश पंडाल गेंदे के फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सज गया था। ढोल-मंजीरों की गूँज के साथ संध्या आरती हुई। सभी ने श्रद्धा से आरती की और प्रसाद लेकर अपने घरों की ओर मुड़े ही थे कि बाहर गाड़ियों का शोर गूँजा।
“अरे हटो, नेता जी आ रहे हैं!”
कार्यकर्ताओं के लावलश्कर के साथ स्थानीय नेता जी समर्थकों समेत पंडाल में दाखिल हुए। मुख्य कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत गणेश प्रतिमा के सामने ला खड़ा किया।
एक कार्यकर्ता ने पुजारी के हाथ से थाली लेकर नेता जी को थमा दी और जोर से बोला, “मुख्य अतिथि आ गए हैं, आरती दोबारा होगी!”
पुजारी ने असमंजस में भगवान की मूर्ति और फिर नेता जी की ओर देखा। इसके बाद भारी मन से घंटी उठाई और बोले, “ॐ जय गणेश देवा…”
नेता जी ने कैमरों की तरफ देखकर आरती शुरू की। जो लोग घर जा चुके थे, वे भी रुककर इस तमाशे को देखने लगे। बप्पा के दरबार में भक्ति पीछे छूट गई थी और प्रोटोकॉल का बोलबाला हो चुका था।