स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…५।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०१ ☆
☆ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
आज
आम आदमी
संत्रस्त है, परेशान है
और है बेहद दुखी,
धैर्य के धिक्कार से
सहिष्णु मन भी
आतुर है
बन जाने को ज्वालामुखी।
याद आ रहा है
एक पुराना गीत-
‘मन के हारे हार है
मन के जीते जीत! ‘
गीत, आखिर गीत होता है
खण्डहर में गूँजते गीत से
आदमी भयभीत होता है।
हम,
खण्डहर में खड़े खड़े
भयभीत होते जा रहे हैं-
हमारी नियति-
होठों से गिरकर
पत्थर पर लिखे गीत होते जा रहे हैं।
हमारे नाकनक्श भूख
तराशे हैं,
हकीकत ये है –
हम कई दिनों से उपासे हैं, प्यासे हैं,
और
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈















