आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९७ ☆

☆ दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

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शक्ति पर्व पर मिल रहा, हमको कृपा प्रसाद।

शारद की पाकर कृपा, सृजन-शहर आबाद।।

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गूँगा गाए रात दिन, झूम-झूमकर गीत।

अंधा रीझै देखकर, माँ सुनती फरियाद।।

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पंगु चढ़े पर्वत पुलक, दैवी कृपा अनूप।

रूप-अरूप करें कृपा, भिक्षुक भी हो भूप।।

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कर्मकांड को भूलिए, आँख मूँद कर ध्यान।

बहरा भी सुन कर करे, माँ का महिमा गान।।

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बौना नभ को जीत ले, मृग बन सके मृगेंद्र।

करे निरंतर कोशिशें, कामी बने जितेंद्र।।

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वंदे पराजय भी विजय, तम हो सके प्रकाश।

निराकार साकार हो, ले आशा-आकाश।।

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कंकर को शंकर करे, भक्ति भाव विश्वास।

प्रलयंकर कल्याण कर, हरते हर विधि त्रास।।

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जो गौरी वह कालिका, एक शक्ति दो रूप।

जैसे राजा प्रजा भी, और प्रजा है भूप।।

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मिलें नीलिमा-लालिमा, भोर-साँझ की बेर।

सलिल चढ़ा संजीव हो, जीव किए बिना देर।।

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©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२९.१०.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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