हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००७ ⇒ उबासी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उबासी।)

?अभी अभी # १००७ ⇒ आलेख – उबासी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो सुबह बासी मुंह उठते ही आ आए, उसे उबासी कहते हैं। सुबह जब, रात भर की थकान के कारण आँखें खुलने से इंकार कर देती हैं, तब मजबूरन मुंह को अपना मुंह खोलना पड़ता है। उबासी बिना किसी ऑक्सीजन के सिलेंडर के, शरीर को निःशुल्क प्राणवायु सप्लाय करती है, बिना किसी शुक्रिया, करम, मेहरबानी के।

उबासी को अंग्रेजी में yawn याॅन कहते हैं। भले ही उबासी आए न आए, यॉन शब्द का उच्चारण करने के लिए पूरा मुंह तो खोलना ही पड़ता है। उबासी आलस्य और सुस्ती का प्रतीक है। जब सामने वाला आपके मन की नहीं, उबाऊ, अनावश्यक और बेतुकी बातें करने लगता है, तो आपके दिमाग़ का दही हो जाता है, और आप कितना भी कंट्रोल करें, अपनी जबान को लगाम दें, मुंह खुल ही जाता है, और उबासी अपनी असहमति प्रकट कर ही देती है।।

जिनकी सुराही सी गर्दन होती है, और छोटा, मासूम सा मुंह, उन्हें उबासी लेते वक्त बड़ी तकलीफ होती है। उबासी के वक्त मुंह अपनी मनमानी करता है, किसी की नहीं सुनता, और अपनी हैसियत से भी ज्यादा खुल जाता है। जिस कारण चेहरे की नसें भी तन जाती हैं और कभी कभी मुंह भी दुखने लगता है। बेचारे नवजात शिशु भी इस उबासी से नहीं बच पाते और जब उबासी के कारण उनका मुंह उनकी चेहरे की रचना से अधिक खुल जाता है, तो तनाव के दर्द के कारण, वे बेचारे अनायास ही रो पड़ते हैं। उस समय अगर आसपास कोई ना हो, तो बच्चे के रोने का कारण भी पता नहीं चल पाता।

हिचकी, डकार और उबासी वायु के अवरोध के शारीरिक विकार हैं। अधिक खाने से डकार, दिमागी थकान के कारण उबासी और हिचकी की तो पूछिए ही मत।

न जाने क्यों, हिचकी को किसी की याद से जोड़ दिया गया है। डकार और उबासी को गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन कभी कभी जब हिचकियां बंद ही नहीं होती तो इसे हलके में नहीं लिया जाता। एक तरह का सांस का अवरोध ही तो है हिचकी। छींक और खांसी भी नाक और गले के ही सामान्य अवरोध हैं जिनकी सतत उपेक्षा नजला, सर्दी जुकाम और दमा – खाँसी को जन्म दे सकती है।।

एक वायु विकार और है जिसका असर वातावरण पर ही नहीं, ओज़ोन की परत तक पड़ता है, शालीन भाषा में इसे गैस की ट्रबल कहते हैं। उबासी अगर ठंडी बासी है, तो यह तो भयंकर बदबू है। लोग भी अजीब हैं, मूली के परांठे खा खाकर दुश्मनी निकालते हैं। उबासी अगर यॉन है तो यह अंग्रेजी का fart फार्ट है। आपने किशोर कुमार का वह गीत तो सुना ही होगा ; फार्ट मेरी जान, फटाफट फट। बात मेरी मान फटाफट फट।

यकीन मानिए, उबासी हो या डकार, हिचकी हो या फार्ट, सभी शरीर के नैसर्गिक साफ सफाई की युक्तियां हैं। ये ऐसे संकेत हैं, जिनकी अनदेखी करने से ही शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। एक तरह का अलार्म सिस्टम है यह। रात को सोने का वक्त हो गया, उबासी संकेत देती है, आप ध्यान नहीं देते। जब तक डकार नहीं आती, खाते ही रहते हैं। शरीर हिलेगा डुलेगा नहीं तो वायुमंडल तो डोलेगा ही। अगर आपका ड्राइवर वाहन चलाते वक्त उबासी ले रहा हो, तो तत्काल पैदल हो लें, या उसे पैदल कर दें। अभी हमें खुदा के पास नहीं जाना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विश्व तम्बाकू निषेध दिवस – तम्बाकू का जाल और युवाओं का भविष्य… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ तम्बाकू का जाल और युवाओं का भविष्य…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई) पर विशेष)

“बस एक बार ट्राय कर रहा हूँ…

आदत थोड़ी लगेगी।”

कॉलेज के बाहर खड़े उस किशोर ने हँसते हुए अपने दोस्त से कहा।

कुछ दोस्तों ने भी मुस्कुराकर उसका साथ दिया।

लेकिन शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि कई बार “सिर्फ एक बार” से शुरू हुई चीज़ पूरी जिंदगी पर भारी पड़ जाती है।

 

आज का दौर आधुनिकता, तकनीक और तेज़ जीवनशैली का दौर है।

लेकिन इसी चमकदार दुनिया के पीछे एक ऐसा खतरा भी तेजी से फैल रहा है, जो चुपचाप लाखों लोगों की जिंदगी निगल रहा है – तम्बाकू।

तम्बाकू केवल एक नशा नहीं है।

यह धीरे-धीरे शरीर, मन, परिवार और समाज को कमजोर करने वाला एक ऐसा जहर है, जो अक्सर शुरुआत में दिखाई नहीं देता।

हर वर्ष 31 मई को “विश्व तम्बाकू निषेध दिवस” मनाया जाता है।

यह दिन केवल जागरूकता का अभियान नहीं, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि तम्बाकू उद्योग किस प्रकार लोगों की कमजोरियों, जिज्ञासाओं और भावनाओं का उपयोग करके उन्हें अपने जाल में फँसाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष दुनिया भर में लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु तम्बाकू सेवन के कारण होती है। भारत में भी लाखों लोग कैंसर, हृदय रोग और श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि तम्बाकू उद्योग का सबसे बड़ा निशाना युवा पीढ़ी बन चुकी है। पहले सिगरेट और बीड़ी तक सीमित यह बाजार अब ई-सिगरेट, वेपिंग और फ्लेवर्ड निकोटीन उत्पादों के माध्यम से किशोरों तक पहुँच रहा है।

इन उत्पादों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा हों। रंगीन पैकेजिंग, मीठे फ्लेवर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और फिल्मों में धूम्रपान का ग्लैमर –

यह सब किसी संयोग का हिस्सा नहीं है।

यह एक सुनियोजित रणनीति है।

तम्बाकू उद्योग अच्छी तरह जानता है कि यदि किशोर अवस्था में किसी को निकोटीन की आदत लग जाए, तो वह लंबे समय तक ग्राहक बना रह सकता है।

“तम्बाकू उद्योग उत्पाद नहीं बेचता,

वह धीरे-धीरे निर्भरता बेचता है।”

आज सोशल मीडिया पर वेपिंग को “कूल”, “स्टाइलिश” और “स्ट्रेस रिलीफ” के रूप में दिखाया जाता है।

कई युवा यह मान बैठते हैं कि ई-सिगरेट सामान्य सिगरेट की तुलना में सुरक्षित है।

लेकिन वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वेपिंग भी शरीर के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है।

इन उत्पादों में निकोटिन, भारी धातुएँ और ऐसे रसायन पाए जाते हैं, जो फेफड़ों, मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि निकोटिन केवल शरीर को नहीं, सोचने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन को भी प्रभावित करता है। किशोर अवस्था में मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है। ऐसे समय में निकोटिन की लत ध्यान क्षमता, स्मृति और निर्णय लेने की शक्ति को कमजोर कर सकती है।

कई युवा तनाव और चिंता से बचने के लिए धूम्रपान या वेपिंग शुरू करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे मानसिक राहत मिलेगी।

लेकिन सच इसके बिल्कुल विपरीत है।

निकोटिन कुछ समय के लिए दिमाग को उत्तेजना देता है, लेकिन धीरे-धीरे वही बेचैनी, चिड़चिड़ापन और मानसिक निर्भरता का कारण बन जाता है। यही कारण है कि जो व्यक्ति शुरुआत में “तनाव कम करने” के लिए तम्बाकू लेता है, वही कुछ समय बाद उसके बिना असहज महसूस करने लगता है।

तम्बाकू का प्रभाव केवल सेवन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

परोक्ष धूम्रपान यानी सेकेंडहैंड स्मोक भी उतना ही खतरनाक है। घर में धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के कारण बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएँ भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करती हैं।

बच्चों में अस्थमा, फेफड़ों की कमजोरी और बार-बार संक्रमण जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।

तम्बाकू का एक बड़ा प्रभाव आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। कई परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा नशे पर खर्च कर देते हैं। बीमारियों के इलाज में आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है।

धीरे-धीरे यह लत व्यक्ति के आत्मविश्वास, रिश्तों और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करने लगती है।

हालाँकि सकारात्मक बात यह है कि तम्बाकू छोड़ने का लाभ बहुत जल्दी दिखाई देने लगता है।

धूम्रपान छोड़ने के कुछ ही घंटों बाद शरीर में ऑक्सीजन का स्तर सुधरने लगता है। कुछ महीनों में फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है और कुछ वर्षों बाद कैंसर तथा हृदय रोग का खतरा काफी कम हो जाता है।

लेकिन तम्बाकू छोड़ना केवल इच्छाशक्ति का विषय नहीं होता। यह शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की लड़ाई होती है। इसलिए परिवार, मित्रों और समाज का सहयोग बहुत जरूरी है।

विद्यालयों और घरों में बच्चों के साथ खुलकर संवाद होना चाहिए। उन्हें केवल डराकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर जागरूक करना होगा।

माता-पिता को यह भी समझना होगा कि बच्चे केवल शब्दों से नहीं सीखते, वे व्यवहार से सीखते हैं।

यदि घर का वातावरण तम्बाकू मुक्त होगा तो बच्चों पर उसका सकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

सरकार द्वारा बनाए गए कानून, चेतावनी चित्र और प्रतिबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक इस समस्या पर पूरी तरह नियंत्रण पाना कठिन रहेगा।

आज आवश्यकता केवल तम्बाकू विरोधी अभियानों की नहीं है, बल्कि ऐसी जीवनशैली विकसित करने की है जहाँ युवा तनाव से बचने के लिए नशे नहीं, बल्कि खेल, संवाद, योग, संगीत और सकारात्मक गतिविधियों का सहारा लें।

क्योंकि अंततः तम्बाकू केवल शरीर को ही नहीं जलाता, वह धीरे-धीरे जीवन की संभावनाओं को भी धुएँ में बदल देता है।

शायद इसलिए विश्व तम्बाकू निषेध दिवस हमें केवल यह नहीं सिखाता कि तम्बाकू कितना हानिकारक है।

यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जागरूकता, आत्मसंयम और सही निर्णय ही स्वस्थ समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

“तम्बाकू छोड़ना केवल एक आदत छोड़ना नहीं,

“बल्कि अपने जीवन, अपने परिवार और अपने भविष्य को बचाने का निर्णय है।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००६ ⇒ पंचनामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचनामा।)

?अभी अभी # १००६ ⇒ आलेख – पंचनामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

न जाने क्यों, पंच से मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर याद आ जाती है। परमेश्वर तो एक होता है,लेकिन जब पाँच सयाने एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर ही तो कहलाते हैं। पंच विक्रमादित्य की तरह पंचायत में न्याय तो करते ही हैं,दोषी को दंड भी सुनाते हैं। न्याय का हथौड़ा जब प्रहार करता है, तब वह भी एक तरह का punch ही तो होता है।

पुलिस बरामद सामग्री का पंचनामा बनाती है। कुछ गवाहों के सामने वस्तुओं को सील कर दिया जाता है और एक दस्तावेज तैयार किया जाता है, जिस पर सभी के हस्ताक्षर होते हैं। बैंकों में लॉकर भी सील किए जाते हैं और अदालत बजावरी भी चस्पा करती है। एक महान मुक्केबाज मोहम्मद अली भी हुए थे, जिनका पंच, विरोधी मुक्केबाज को दिन में तारे दिखला देता था।।

कार्टून और व्यंग्य सृजन की ऐसी विधा है, जिसमें punch का प्रयोग किया जाता है। Punch तत्कालीन व्यवस्था एवं विसंगति पर एक ऐसा करारा तमाचा है कि जिसका न तो बचाव संभव है और न ही प्रतिकार। तानाशाहों को इस प्रहार की आदत नहीं होती इसलिए अक्सर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इन पंचों पर उनकी सदा वक्र दृष्टि ही रहती चली आई है। कई बार इन पंचों का ही पंचनामा बना दिया जाता है और उन्हें सेंसर यानी प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

कलम तलवार से अधिक खतरनाक होती है। इसका जितनी बार सर कलम करो, यह उतनी ही पैनी होती चली जाती है। कार्टून और व्यंग्य में अगर पंच ना हो वह किसी बिना तड़के वाली फीकी दाल से कम नहीं।

इंग्लैंड से प्रकाशित कार्टून मैग्जीन punch अपने १५१ वर्ष पूर्ण कर सन् १९९२ में आख़िरी सांसें लेने को मजबूर हो गई। वे लोग भाग्यशाली रहे जिन्होंने अंग्रेजी में प्रकाशित पत्रिका Shankar’s Weekly का आनंद लिया। हिंदी में भी शंकर्स वीकली का कुछ समय के लिए प्रकाशन हुआ, लेकिन इसका भी बेड लक खराब ही निकला।

टाइम्स ऑफ इंडिया में आर.के.लक्ष्मण लगातार कई वर्षों तक व्यवस्था की परवाह किए बगैर अपने तीखे, करारे और तिलमिलाते कार्टून परोसते रहे। व्यवस्था को जनता से उतना खतरा नहीं होता जितना प्रिंट मीडिया से होता है। एक आपातकाल ने ऐसा सबक सिखाया, सब लाइन पर आ गए। आज न आर.के.लक्ष्मण का कॉमन मैन है और न ही धर्मयुग के कार्टून कोने में ढब्बू जी। बस व्यंग्य और कार्टून के नाम पर लालू,पप्पू और ममता से ही काम चला लो। साफ सुथरे,शालीन व्यंग्य और कार्टून जो आप घर में बच्चों के साथ भी देख सकें।।

एक चेन्नई के पत्रकार,कार्टूनिस्ट चो रामास्वामी हुए थे और एक मुंबई के शिवाजी बाल ठाकरे,जो राजनीति के घिघौने चरित्र पर प्रहार ही नहीं करते थे, उसका डटकर सामना भी करते थे और आज हालत देखिए।

व्यंग्य और कार्टून की खेती के लिए भूमि का उर्वरा होना भी जरूरी है। श्रीलाल शुक्ल कांग्रेस के जमाने में शिवपालगंज ढूंढ पाए, तो राग दरबारी का सृजन संभव हुआ,  आर.के.लक्ष्मण के समय में नेहरू और इंदिरा जैसे चरित्र थे, जिनके चेहरे को देख, कम से कम कूची तो चलाई ही जा सकती थी। आज सभी साफ सुथरे, कोमल, निष्पाप, निष्कलंक चेहरों पर क्या कार्टून बनाए जाएं और क्या वर्तमान राज पर व्यंग्य लिखा जाए। बड़ा धर्मसंकट है। डर है, कहीं कार्टून और व्यंग्य जैसी विधा का पंचनामा ही ना बनाना पड़ जाए …!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३७ – क्रोध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३७ क्रोध… ?

चैनल पर समाचार देख रहा हूँ। दुकानदार द्वारा दस रुपये मांगने पर क्रोधित युवक ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। समाचार सुनकर हतप्रभ हूँ, अवाक हूँ। कुछ लोग विचार कर सकते हैं कि केवल दस रुपए के लिए कोई इतनी हिंसा कैसे कर सकता है? मेरे सामने प्रश्न दस रुपये या दस लाख या दस करोड़ का नहीं, मनुष्य के क्रोध के पारावार का है। जो मारा गया वह मनुष्य था, जिसने मारा, वह मनुष्य है। सत्यस्थिति तो पुलिस की विवेचना से सामने आएगी तथापि प्रथम दृष्टया यह षड्यंत्रपूर्वक की गई हत्या नहीं लगती। इसके मूल में क्रोध के चलते अपना आपा खो देना दिखता है।

क्रोध मनुष्य की प्राकृतिक भावना है। मनुष्य के भावनात्मक विरेचन के लिए भी क्रोध अनिवार्य है। तथापि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्र अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए। क्रोध का अतिरेक सामान्य विवाद को हिंसक दुर्घटना में बदल सकता है।

प्रश्न है कि क्रोध क्यों उपजता है? मनोविज्ञान कहता है कि सामान्यत: अपेक्षा-भंग, असंतोष, असहिष्णुता, असफलता, असुरक्षा, असहायता के चलते क्रोध उपजता है।

योगेश्वर, श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय के बासठवें श्लोक में क्रोध के संबंध में कहते हैं,

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

योगेश्वर उवाच अगले श्लोक में इसी विषय को विस्तार देता है-

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहत्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और ज्ञानशक्ति का नाश हो जाने से मनुष्य अपनी स्थिति से, अपनी मनुष्यता से गिर जाता है।

क्रोध के चलते मनुष्यता से गिरा मनुष्य, कैसे अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है, इसका उल्लेख अपनी एक लघुकथा ‘क्रोध में किया था। लघुकथा इस प्रकार है-

“…दोनों में बहस होने लगी थी। विवाद की तीक्ष्णता बढ़ती गई। आक्रोश में दोनों थे पर पहला मनुष्य था, दूसरा क्रोधी था। क्रोध, तर्क का पथ तज देता है, मर्म को चोट पहुँचाने की राह चलता है। इस राह के एक विनाशकारी मोड़ पर तिलमिलाहट टकराती है।

तिलमिलाहट में क्रोधी ने एक बड़ा पत्थर मनुष्य के सिर पर दे मारा। मनुष्य की मौत हो गई। क्रोधी को फाँसी चढ़ना पड़ा।

यश, संपदा, नेह, संबंध, अंततः समूचे अस्तित्व की बलि ले लेता है क्रोध।”

आज के मनुष्य का अनुभव बताता है कि बदलती जीवन शैली में अब अहंकार से भी क्रोध उपजने लगा है। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स या श्रेष्ठता बोध, अहंकार के मूल में होते हैं।

इस लघुकथा को लेख के आरंभ में उल्लेखित घटना से जोड़ें। जिसकी हत्या हुई, उसका जीवन असमय नष्ट हो गया। जिसने हत्या की, उसका जीवन भी नष्ट होने की स्थिति में आ गया है।

लोकोक्ति है कि क्रोध वह अग्निकुंड है जो आपके हाथों स्वयं आपकी आहुति करवा देता है।

अपनी आहुति या अपने क्रोध पर नियंत्रण? निर्णय हरेक को अपने स्तर पर लेना है।

© संजय भारद्वाज 

(16:55 बजे, 30 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ स्क्रीन की चमक में धुंधले होते रिश्ते… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ स्क्रीन की चमक में धुंधले होते रिश्ते…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“एक मिनट… बस ये मैसेज भेज दूँ…”

पिता ने मोबाइल स्क्रीन से नज़र हटाए बिना कहा।

बेटी कुछ देर चुप खड़ी रही।

फिर धीमे स्वर में बोली –

“पापा, आप हमेशा फोन से बात करते रहते हो…

हमसे कब बात करोगे?”

कमरे में अचानक एक अजीब-सी खामोशी उतर आई।

शायद किसी ने पहली बार महसूस किया कि घर में सब साथ होते हुए भी कहीं न कहीं एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।

 

तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है।

आज मोबाइल फोन हमारी दिनचर्या का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना कुछ घंटों की कल्पना भी कठिन लगती है। काम, पढ़ाई, खरीदारी, बैंकिंग, मनोरंजन और संवाद – सब कुछ अब स्क्रीन पर सिमट आया है।

लेकिन सुविधा की इस चमक के पीछे एक सच्चाई धीरे-धीरे और स्पष्ट होती जा रही है –

स्क्रीन जितनी चमक रही है, रिश्ते उतने ही धुंधले होते जा रहे हैं।

आज सुबह उठते ही सबसे पहले लोग अपने प्रियजनों का चेहरा नहीं, मोबाइल स्क्रीन देखते हैं। रात को सोने से पहले भी आखिरी नजर फोन पर ही जाती है। दिनभर नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और लगातार आती सूचनाएँ हमारे मन को हर समय व्यस्त रखती हैं।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर के लोगों से जुड़े हुए हैं, लेकिन अपने ही घर के लोगों से बातचीत कम होती जा रही है।

पहले परिवारों में साथ बैठकर चाय पीना, दिनभर की बातें साझा करना और बिना किसी कारण घंटों बातचीत करना सामान्य बात थी। आज वही समय मोबाइल स्क्रॉल करने में बीत जाता है।

एक ही कमरे में बैठे लोग अलग-अलग डिजिटल दुनिया में खोए रहते हैं।

बातचीत छोटी हो गई है।

धैर्य कम हो गया है।

और रिश्तों में वह सहजता भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जो कभी परिवारों की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी।

सबसे अधिक प्रभाव बच्चों और युवाओं पर दिखाई दे रहा है।

आज बच्चे मैदानों से ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताते हैं। परिवारों के भीतर संवाद की जगह वीडियो और रील्स ने ले ली है। कई बच्चे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के बजाय मोबाइल में सुकून ढूँढने लगे हैं।

दूसरी ओर, बड़े भी इससे अछूते नहीं हैं।

कई बार माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं। धीरे-धीरे स्क्रीन “परिवार” की जगह लेने लगती है।

सोशल मीडिया ने तुलना की एक ऐसी संस्कृति भी पैदा कर दी है, जहाँ लोग दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी खुशियों को कम आँकने लगते हैं। हर समय “अपडेटेड” रहने की होड़ ने मन को बेचैन बना दिया है।

 

लोग अब जीने से ज्यादा “दिखाने” में व्यस्त हो गए हैं।

किसी यात्रा का आनंद लेने से पहले उसकी तस्वीर पोस्ट करना जरूरी लगने लगा है। खाने का स्वाद लेने से पहले उसकी फोटो खींची जाती है। धीरे-धीरे वास्तविक अनुभवों से ज्यादा उनका प्रदर्शन महत्वपूर्ण होने लगा है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम ध्यान क्षमता को कम करता है, नींद को प्रभावित करता है और चिंता तथा अकेलेपन जैसी समस्याओं को बढ़ाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोग अब “अकेले बैठना” भूलते जा रहे हैं।

हर खाली पल मोबाइल से भर दिया जाता है।

लेकिन इंसान को केवल सूचना नहीं, शांति भी चाहिए।

और शांति लगातार स्क्रीन देखने से नहीं, कभी-कभी उससे दूरी बनाने से मिलती है।

यही कारण है कि आज “डिजिटल उपवास” जैसी अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उपवास किया जाता है, उसी प्रकार मन को भी समय-समय पर डिजिटल विश्राम की आवश्यकता होती है।

डिजिटल उपवास का अर्थ तकनीक छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है – तकनीक के साथ संतुलित संबंध बनाना।

यदि दिन का कुछ समय मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर बिताया जाए, तो व्यक्ति धीरे-धीरे मानसिक रूप से अधिक शांत महसूस करने लगता है। परिवार के साथ बैठना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना, टहलना या बिना किसी स्क्रीन के कुछ पल स्वयं के साथ बिताना मन को भीतर से हल्का करता है।

विशेष रूप से परिवारों को कुछ छोटे नियम बनाने की आवश्यकता है।

जैसे –

भोजन के समय मोबाइल नहीं,

सोने से पहले स्क्रीन बंद,

और दिन में कुछ समय पूरी तरह ऑफलाइन।

ये छोटे बदलाव रिश्तों में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

आज बच्चों को केवल डिजिटल शिक्षा नहीं, डिजिटल संतुलन भी सिखाने की आवश्यकता है। उन्हें यह समझाना होगा कि तकनीक उपयोग की वस्तु है, जीवन का केंद्र नहीं।

वहीं बड़ों को भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यदि माता-पिता हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से संतुलन की अपेक्षा करना कठिन होगा।

हमें यह समझना होगा कि तकनीक ने सुविधा दी है, लेकिन संवेदनाएँ अब भी इंसानी संवाद से ही जीवित रहती हैं।

एक मुस्कान,

एक बातचीत,

एक साथ बैठा हुआ परिवार –

इनका कोई डिजिटल विकल्प नहीं हो सकता।

“जहाँ बातचीत कम होने लगती है,

वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे मौन में बदलने लगते हैं।”

अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि मोबाइल हमारे हाथ में है या नहीं।

प्रश्न यह है कि क्या हमारा समय, हमारा ध्यान और हमारे रिश्ते अब उसके नियंत्रण में जा रहे हैं?

यदि इसका उत्तर हमें असहज करे, तो शायद समय आ गया है थोड़ा ठहरने का।

क्योंकि सच यही है –

स्क्रीन की चमक कुछ पल आकर्षित कर सकती है,

लेकिन जीवन की असली रोशनी रिश्तों से ही आती है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००५ ⇒ दीवारों के कान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दीवारों के कान।)

?अभी अभी # १००५ ⇒ आलेख – दीवारों के कान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुना है, दीवारों के भी कान होते हैं, कभी देखा नहीं ! वैसे हम सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन हमने भी दीवारों को हमारी बातें सुनते, देखा है। अब आंखों देखी बात तो झूठ नहीं हो सकती न। उनकी पीठ सुनती है, हमने लोगों को कहते सुना है। जब पीठ सुन सकती है, तो दीवार क्यों नहीं।

बात कभी यूं ही शुरू नहीं होती ! हम जब आपस में बातें करते हैं, तो बेचारी दीवारें कान लगाकर हमारी बात सुनती हैं। दीवार खड़ी ही इसीलिए होती है, कि कोई बाहर वाला हमारी बातें नहीं सुने। दीवार तो एक आड़ है। अगर दीवार नहीं होती तो शायद बात, दूर तलक जरूर जाती।।

हुआ यह कि अभी कुछ दिनों के लिए हम दीवारों को ताले में बंद कर बाहर गांव चले गए। आप भले ही मुंबई जाएं, या नोएडा, बाहर जाने को बाहर गांव जाना ही कहते आए हैं हम तो। खैर, हम तो घर ताला लगाकर, दीवारों के भरोसे छोड़ गए। आजकल कोई दीवार फांदकर घर में प्रवेश नहीं करता।

हो सकता है, हमारे घर से बाहर जाने के बाद, दीवारों ने यह गाना गाया हो ;

दीवारों से, ये मत पूछो

दीवारों पे क्या, गुजरी है

गुजरी है…

Who cares! मिट्टी, ईंट, सीमेंट की दीवार, हम उसे ज्यादा मुंह नहीं लगाते। खैर, दो चार दिनों में हमें वापस घर तो आना ही था, दरो दीवार से सामना करना ही था।।

हम जैसे ही मध्य रात्रि को वापस घर आए, दीवारें ज्येष्ठ की गर्मी में भट्टी जैसी तप रही थी, और सांय सांय कर रही थी। सन्नाटे का शोर हमें दीवारों से आता प्रतीत हुआ। पहले हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। यह आवाज दीवारों से आ रही है, या फिर हमारे कान बज रहे हैं।

हमें अपने कानों पर तो भरोसा था, लेकिन हमारे कानों को दीवार से आती सांय सांय आवाज पर भरोसा नहीं हो रहा था।

हमारे आने से शायद दीवारों को भी ठंडक मिली, क्योंकि हमने आते ही कूलर में पानी डाला, पंखे चालू किए और सुबह होते ही मुरझाए हुए पौधों को पानी पिलाया।।

आप मानें या ना मानें, सुबह तक दीवारें शांत हो चुकी चुकी थी। जो भी सांय सांय अथवा सिसकी जैसी आवाज थी, वह थम चुकी थी, हमें लगा, अब दीवारें हमसे बातें करना चाहती हैं।

हमने मंदिर में मूर्तियों को बोलते, बातें करते सुना और देखा है। दीवार पर लगी कुछ तस्वीरें भी बोलती हैं, हमसे बातें करती हैं। दीवारें इस घर में हमसे पुरानी हैं। नींव के साथ साथ ही खड़ी हुई हैं। हमारी एक तरह से बुनियाद है यह दरो दीवार। आज हमें महसूस हुआ, हमसे ही घर, घर कहलाया, और दीवारों ने भी यही दोहराया।।

इसे जब हम दीवाल THE WALL कहते हैं तो यह मजबूती से खड़ी रहती है, लेकिन जब यही दीवार, नफरत की दीवार हो जाती है, तो THE WAR हो जाती है। वैसे इन दीवारों का दिल भी होता है, जो धड़कता भी रहता है, लेकिन हम सब इस सत्य से अनजान, दीवारों में सूराख किया करते हैं, एक नहीं कई, और उसमें कीलें ठोका करते हैं, मानो दीवार, दीवार नहीं, कोई सलीब हो। और उस पर प्रेम से कैलेंडर और तस्वीर टांग दिया करते हैं। फिर भी दीवार कभी उफ तक नहीं करती।

अब घर हमें काटने को नहीं दौड़ता। दीवारें हमारा दुख दर्द सुनती, समझती, जानती हैं, हमने भी उसका दुख, दर्द पहचान लिया है। हम दीवारों से अब माथा नहीं फोड़ते, अपना सर नहीं खपाते, माथा झुकाकर उसका धन्यवाद करते हैं। बहुत कुछ कहने, सुनने लग गई हैं आजकल दीवारें, क्योंकि अब उसके और हमारे बीच कोई पर्दा नहीं, कोई दीवार नहीं..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००४ ⇒ दृष्टि और दर्शन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दृष्टि और दर्शन।)

?अभी अभी # १००४ ⇒ आलेख – दृष्टि और दर्शन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 ∆ SIGHT & VISION ∆

जिस ओर निगाहें जाती हैं,उसके ही दर्शन पाती हैं । आप चाहे इसे आंख कहें,नयन कहें,नेत्र कहें अथवा लोचन,ईश्वर इतना दयालु है कि एक के साथ एक फ्री देता है । वह जानता है,हम अक्सर आंखें चार ही करते हैं ।

अगर हमारे चेहरे पर सिर्फ एक आंख होती तो हम कैसे लगते। छोड़िए दो आंखों को,आप तो बस इतना बताइए,अगर इनमें रोशनी ही नहीं होती,तो ये आँखें किस काम की होती । क्या यह दुनिया,यह महफिल,हमारे किसी काम की रहती । क्या आपने कभी सोचा है,एक जन्म से दृष्टिबाधित व्यक्ति का संसार कैसा होता है।

कैसी है हमारी दृष्टि ! आँखें होते हुए भी कुछ लोग सिर्फ सिर्फ किसी की आंखों में डूब जाना चाहते हैं। उन्हें दुनिया नजर नहीं आती,बस किसी के दो मस्त मस्त नैन ही नजर आते हैं । गोरी तेरे नैना हैं जादू भरे । हम पर जुलम करे । वैसे कुछ हद तक यह सच भी है। तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ।।

क्या दुनिया वही है,जो हमें अपनी आंखों से दिखाई देती हैं। क्या हम इन दो सीमित आंखों से इतनी बड़ी दुनिया देख सकते हैं। हमारी आंखों का क्या है, जो उसके सामने आता है,वह हमें दिख जाता है ।

हमारे पीठ पीछे क्या चल रहा है,यह तो छोड़िए,आप जिसे देख रहे हैं,उसके मन में क्या चल रहा है,बेचारी आँखें कहां पढ़ पाती हैं ।

हम आंखों से पढ़ पाते हैं,कुछ लोग आंखों से बहुत कुछ पढ़ लेते हैं । आंखों आंखों में बात भी होती है, प्यार भी होता है और नैन लड़ाए जाते हैं तो कभी मटकाए जाते हैं।

अगर सहगल के शब्दों में कहें तो ;

मैं क्या जानूं क्या जादू है

इन दो मतवाले नैनों में,जादू है

मन पूछ रहा है अब मुझसे

नैनों ने कहा है क्या मुझसे

जब नैन मिले,नैनों ने कहा

अब नैन बसेंगे नैनों में ..

क्या सब कुछ हमें आंखों से ही दिखाई देता है !

जब हम किसी को आंखें दिखाते हैं,तब हमारे मन में कुछ और ही चल रहा होता है । जो व्यक्ति हमारे सामने नहीं,हम उसे भी देख लेने की धमकी देने लगते हैं। कई बार हमारी आंखें भी धोखा खा जाती हैं । एक बार कोई इंसान हमारी नजर से गिरा,तो वह फिर हमें फूटी आँखें नहीं सुहाता ।

हम जब रात को सो जाते हैं,तो नींद में भी हम बंद आंखों से सपने देखना शुरू कर देते हैं और तब तक देखते रहते हैं,जब तक हमारी आंख नहीं खुल जाती। सपनों में आंखों का क्या काम ?

हमारी खुली आंखों में भी कभी कभी हमारे सुनहरे भविष्य के सपने तैरने लगते हैं । आप बस आराम से आंख बंद किए पड़े रहिए,आपके विचार आपको ,जहां आप चाहेंगे,वहां पहुंचा देंगे ।जिसे हम thought कहते हैं,उसका विजन बहुत बड़ा है। वह आंखों का नहीं,सिर्फ कल्पना शक्ति और संकल्प का कमाल है ।

लोग मंदिर जाते हैं,खुली आंखों से अपने इष्टदेव का दर्शन करते हैं,पूजा आरती में शामिल होते हैं,प्रसाद ग्रहण करते हैं लेकिन जब कुछ मांगने की बारी आती है तो एक बच्चे की तरह आंख बंद कर लेते हैं,मानो अभी आंख खोलते ही हाथ में टॉफी टपक पड़ेगी । हम बंद आंखों से भगवान से क्या मांग रहे हैं,यह केवल हम ही जानते हैं । क्या आंखें बंद करने से भगवान थोड़े करीब आ जाते हैं। ध्यान में शायद यही होता हो,प्रार्थना में भी शायद यही होता है ।।

एक संसार हमारे भीतर भी है जहां मन की आंखों का साम्राज्य है और यही मन बाहर की दुनिया से एकाकार हो, आस्था,लगन, निष्ठा, परिश्रम और आत्म विश्वास के धरातल पर जीवन को एक ऐसी दिशा देता है जो हमारी मंजिले मकसूद है,जहां हमारी नज़रों के सामने हमें अपने सपने सच होते नज़र आते हैं ।

अंदर बाहर की दृष्टि ही हमारा वास्तविक व्यापक जगत है। हमारी अन्तर्दृष्टि हम पर सदैव नजर रखती है। बाहर की आंखें एक बार धोखा खा जाएं,अंदर की नज़र कभी धोखा नहीं खाती । हमेशा आंखें खुली रखें । जब कभी विराट के दर्शन करना हो,आँखें मूंद लें,अंदर प्रवेश कर जाएं । उजाला ही उजाला,प्रकाश ही प्रकाश। उधर एक आकाश,इधर कई आकाश ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२३ ☆ आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ  / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२३ ☆

☆ आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘ज़िंदगी कितनी ही बड़ी क्यों न हो, समय की बर्बादी से छोटी बनायी जा सकती है’ जॉनसन की यह उक्ति आलसी लोगों के लिए रामबाण है, जो अपना समय ऊल-ज़लूल बातों में नष्ट कर देते हैं; आज का काम कल पर टाल देते हैं; जबकि कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस यही एक पल है/ कर ले पूरी आरज़ू’ फिल्म वक्त की ये पंक्तियां भी आज अथवा इसी पल की सार्थकता पर प्रकाश डालते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने अथवा जीने का संदेश देती हैं। कबीरदास जी का यह दोहा ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब/ पल में प्रलय होएगी, मूरख करेगा कब ‘ आज अर्थात् वर्तमान की महिमा को दर्शाते हुए वे सचेत करते हैं कि ‘कल कभी आने वाला नहीं और कौन जानता है, कौन-सा पल आखिरी पल बन जाए और सृष्टि में प्रलय आ जाए। चारवॉक दर्शन का संदेश ‘खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ’ आज की युवा-पीढ़ी के जीवन का लक्ष्य बन गया है। इसीलिए वे आज ही अपनी हर तमन्ना पूरी कर लेना चाहते हैं। कल अनिश्चित है और किसने देखा है? इसलिए वे भविष्य की चिंता नहीं करते; हर सुख को इसी पल भोग लेना चाहते हैं। वैसे तो कौन जानता है कि अगली सांस आए या नहीं। सो! कल के बारे में सोचना, कल की प्रतीक्षा करना और सपनों के महल बनाने का औचित्य नहीं है।

ऐसी विचारधारा के लोगों का आस्तिकता से कोसों दूर का नाता होता है। वे ईश्वर की सत्ता व अस्तित्व को नहीं स्वीकारते तथा अपनी ‘मैं’ अथवा अहं में मस्त रहते हैं। उनकी यही अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता की भावना उन्हें सबसे दूर ले जाती है तथा आत्मकेंद्रित कर देती है। वास्तव में एकांतवास अथवा आइसोलेशन–कारण भले ही कोरोना हो, हमें आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करते हैं। कोरोना वायरस ने भले ही पूरे विश्व में तहलक़ा मचा रखा है, परंतु उसने हमें अपने घर की चारदीवारी में, अपने प्रियजनों के सानिध्य में रहने और बच्चों के साथ मान-मनुहार करने का अवसर प्रदान किया है। परंतु अक्सर लोगों को वह भी पसंद नहीं आया। मौन एकांत का जनक है; जो हमें स्वयं से रू-ब-रू करने का अवसर प्रदान करता है और सृष्टि के विभिन्न रहस्यों को उजागर करता है। सो! एकांतवास की अवधि में हम आत्मचिंतन कर ख़ुद से मुलाकात कर सकते हैं; जो जीवन में असफलता व तनाव से बचने के लिए ज़रूरी है। इतना ही नहीं, यह स्वर्णिम अवसर है; अपनों के साथ रहकर समय बिताने का; ग़िले-शिक़वे मिटाने का; ख़ुद में ख़ुद को तलाशने का; मन के भटकाव को मिटा कर अंतर्मन में प्रभु के दर्शन पाने का। सो! एकांत वह सकारात्मक भाव है, जो हमारे अवचेतन मन को जाग्रत कर, सर्वश्रेष्ठ को बाहर लाने अथवा अभिव्यक्ति प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है। आपाधापी भरे आधुनिक युग में रिश्तों में खटास व अविश्वास से उपजा अजनबीपन का एहसास मानव को अलगाव की स्थिति तक पहुंचाने का एकमात्र कारण है, कारक है और व्यक्ति उस मानसिक प्रदूषण अर्थात् चिंता, तनाव व अवसाद की ऊहापोह से बाहर आने का भरसक प्रयास करता है।

जब व्यक्ति एकांतवास में होता है, जीवन की विभिन्न घटनाएं मानस-पटल पर सिनेमा की रील की भांति आती-जाती रहती हैं और वह सुख-दु:ख की मन:स्थिति में डूबता-उतराता रहता है। इस मनोदशा से उबरने का साधन है एकांत, जिसका प्रमाण हैं– लेखक, गायक और प्रेरक वक्ता विली जोली, जो 1989 में न्यूज़ रूम कैफ़े में अपना कार्यक्रम पेश किया करते थे। उनकी लाजवाब प्रस्तुति के लिए उन्हें अनगिनत पुरस्कारों व सम्मानों से नवाज़ा गया था। परंतु मालिक के छंटनी के निर्णय ने उन्हें आकाश से धरा पर ला पटका और उन्होंने कुछ दिन तक एकांत अर्थात् आइसोलेशन में रहने का निर्णय कर लिया। एक सप्ताह तक आइसोलेशन की स्थिति में रहने के पश्चात् उनकी ऊर्जा, एकाग्रता व कार्य-क्षमता में विचित्र-सी वृद्धि हुई। सो! उन्होंने अपनी शक्तियों को संचित कर स्कूलों में प्रेरक भाषण देने प्रारंभ कर दिए और वे बहुत प्रसिद्ध हो गये। एक दिन लुइस ब्राउन ने उन्हें अपने साथ कार्यक्रम आयोजित करने को आमंत्रित किया; जिसने उनकी ज़िंदगी को ही बदल कर रख दिया। इससे उन्हें एक नई पहचान मिली, जिसका श्रेय वे क्लब-मालिक के साथ-साथ आइसोलेशन को भी देते हैं। इस स्थिति में वे गंभीरता से अपने अवगुणों व कमियों को जानने के पश्चात् तनाव से मुक्ति प्राप्त कर सके। सो! एकांतवास द्वारा हम अपने हृदय की पीड़ा व दर्द को, अपनी आत्मचेतना को जाग्रत करने के पश्चात् अदम्य साहस व शक्ति से सितारों में बदल सकते हैं अर्थात् अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।

ब्रूसली के मतानुसार ‘ग़लतियां हमेशा क्षमा की जा सकती हैं; यदि आपके पास उन्हें स्वीकारने का साहस है।’ दूसरे शब्दों में यह ही प्रायश्चित है। परंतु अपनी भूल को स्वीकारना दुनिया में सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि हमारा अहं इसकी अनुमति प्रदान नहीं करता; हमारी राह में पर्वत की भांति अड़कर खड़ा हो जाता है। अब्दुल कलाम जी के मतानुसार ‘इंसान को कठिनाइयों की भी आवश्यकता होती है। सफलता का आनंद उठाने के लिए यह ज़रूरी और अकाट्य सत्य भी है कि यदि जीवन में कठिनाइयां, बाधाएं व आपदाएं न आएं, तो आप अपनी क्षमता से अवगत नहीं हो सकते।’ कहां जान पाते हो आप कि ‘मैं यह कर सकता हूं?’ सो! कृष्ण की बुआ कुंती का कृष्ण से यह वरदान मांगना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि ‘उसके जीवन में कष्ट आते रहें, ताकि प्रभु की स्मृति बनी रहे।’ मानव का स्वभाव है कि वह सुख में उसे कभी याद नहीं करता, बल्कि स्वयं को ख़ुदा अर्थात् विधाता समझ बैठता है। ‘सुख में सुमिरन सब करें, दु:ख में करे न कोई / जो सुख में सुमिरन करे, तो दु:ख काहे को होय’ अर्थात् सुख-दु:ख दोनों स्थितियों में प्रभु की सुधि बनी रहे… यही सफल जीवन का राज़ है। मुझे याद आ रहा है वह प्रसंग–जब एक राजा ने भाव-विभोर होकर संत से अनुरोध किया कि वे प्रसन्नता से उनकी मुराद पूरी करना चाहते हैं। संत ने उन्हें कृतज्ञता-पूर्वक मनचाहा देने को कहा। सो! राजा ने राज्य देने की पेशकश की, जिस पर उन्होंने कहा –राज्य तो जनता का है,  तुम केवल उसके मात्र संरक्षक हो। महल व सवारी भेंट-स्वरूप देने के अनुरोध पर संत ने उन्हें भी राज-काज चलाने की सुविधाएं मात्र बताया। तीसरे विकल्प में राजा ने देह-दान की अनुमति मांगी। परंतु संत ने उसे भी पत्नी व बच्चों की अमानत कह कर ठुकरा दिया। अंत में संत ने राजा के अनुरोध पर उसे अहं त्यागने को कहा, क्योंकि वह सबसे सख्त बंधन होता है। अंततः राजा को अहं त्याग करने के पश्चात् असीम शांति व अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई।

‘कलयुग केवल नाम आधारा,’ अंतर्मन की शुद्धता के लिए कलयुग में नाम-स्मरण ही पाप-कर्मों से मुक्ति पाने का साधन है। जब अंतस शुद्ध होगा, तो केवल पुण्य कर्म होंगे और पापों से मुक्ति मिल जाएगी। विकृत मन से अधर्म व पाप होंगे। हृदय की शुद्धता, प्रेम, करुणा व ध्यान से प्राप्त होती है… उसे पूजा-पाठ, तीर्थ-यात्रा व धर्म-शास्त्र के अध्ययन से पाना संभव नहीं है। सो! जहां अहं नहीं; वहां स्नेह, प्रेम, सौहार्द, करुणा व एकाग्रता का निवास होता है। आशा, विश्वास व निष्ठा जीवन का संबल हैं। तुलसीदास जी का ‘एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास/ एक राम, घनश्याम हित चातक तुलसीदास।’ जीवन में डूबते को तिनके का सहारा अर्थात् घोर अंधकार व संकट में आशा की किरण भले ही जुगनू के रूप में हो; उसका पथ-प्रदर्शन करती है; धैर्य बंधाती है; हृदय में आस जगाती है। ‘नर हो ना निराश करो मन को/ कुछ काम करो, कुछ काम करो’ मानव को निरंतर कर्मशीलता के साथ आशा का दामन थामे रखने का संदेश देती है…यदि एक द्वार बंद हो जाता है, तो किस्मत उसके सम्मुख दस द्वार खोल देती है। सो! उम्मीद जिजीविषा की सबसे बड़ी ताकत है। राबर्ट ब्रॉउनिंग का यह कथन ‘आई ऑलवेज रिमेन ए फॉइटर/ सो वन, फॉइट नन/ बैस्ट एंड द लॉस्ट।’ सो! उम्मीद का दीपक सदैव जलाए रखें। विनाश ही सृजन का मूल है। भूख, प्यास, निद्रा –आशा व विश्वास के सम्मुख नहीं टिक सकतीं; वे मूल्यहीन हैं।

आइसोलेशन मन की वह सकारात्मक सोच है, जिसमें मानव समस्याओं को नकार कर स्वस्थ मन से चिंतन-मनन करता है। चिंता मन को आकुल-व्याकुल व हैरान-परेशान करती है और चिंतन सकारात्मकता प्रदान करता है। चिंतन से मानव सर्वश्रेष्ठ को पा लेता है। राबर्ट हिल्येर के शब्दों में ‘यदि आप अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं, तो आपके पास असफलता की चिंता करने का समय ही नहीं रहेगा।’ असफलता हमें चिंतन के अथाह सागर में अवगाहन करने को विवश कर देती है, तो सफलता चिंतन करने को, ताकि वह सफलता की अंतिम सीढ़ी पर पहुंच सके। सो! एकांतवास वरदान है, अभिशाप नहीं; इसे भरपूर जिएं, क्योंकि यह विद्वत्तजनों की बपौती है; जो केवल भाग्यशाली लोगों के हिस्से में ही आती है। इसलिए आइसोलेशन के अनमोल समय को अपना भाग्य कोसने व दूसरों की निंदा करने में नष्ट मत करें। जीवन में जब जो, जैसा मिले, उसमें संतोष पाना सीख लें; आप दुनिया के सबसे महान् सम्राट् बन जाएंगे। जीवन में चिंता नहीं, चिंतन करें…यही सर्वोत्तम मार्ग है; उस सृष्टि-नियंता को पाने का; आत्मावलोकन कर विषम परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना कर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का। सो! हर पल का आनंद लें, क्योंकि गुज़रा समय कभी लौट कर नहीं आता तथा उसके लिए अपेक्षित है; अहम् का त्याग;  अथवा अपनी ‘मैं’  को मारना। जब ‘मैं’… ‘हम’ में परिवर्तित हो जाता है, तो ‘तुम’ का भाव अदृश्य हो जाता है। यही है अलौकिक आनंद की स्थिति; राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठने की मनोदशा, जहां केवल ‘तू ही तू’ अर्थात् सृष्टि के कण-कण में प्रभु ही नज़र आता है। सो! आइसोलेशन अथवा एकांत एक बहुमूल्य तोहफ़ा है… इसे अनमोल धरोहर-सम स्वीकारिए व सहेजिए तथा जीवन को उत्सव समझ, आत्मोन्नति हेतु हर लम्हे का भरपूर सदुपयोग कर अलौकिक आनंद प्राप्त कीजिए।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१४ ☆ अदब के आफताब का अस्त: डॉ. बशीर बद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१४ ☆

?  आलेख – अदब के आफताब का अस्त: डॉ. बशीर बद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

उर्दू अदब के इतिहास में, शायरी की दुनिया को अपनी सादगी से रोशन करने वाले अज़ीम शायर, पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र ने 91 वर्ष की आयु में भोपाल में अपनी अंतिम सांस ली।

शब्दों का प्रणाम।

बशीर साहब का जाना एक जिस्म का रुखसत होना नहीं , बल्कि उर्दू गज़ल के उस सुनहरे दौर का अवसान है जिसने शायरी को महलों और दरबारों से निकालकर आम आदमी की दहलीज पर ला खड़ा किया था।

अयोध्या की सरज़मीं पर जन्मे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल कर प्रोफेसर बने बशीर बद्र ने ताउम्र शब्दों की साधना की। उन्होंने भारी-भरकम और जटिल उर्दू अल्फ़ाज़ के बजाय आम बोलचाल की जुबान को अपनी गज़लों का जेवर बनाया। यही वजह है कि उनकी शायरी सीधे रूह में उतर जाती है।

बशीर बद्र साहब की विदाई के इस गमगीन मौके पर उनकी ही लिखी पंक्तियां आज हमारी भावनाओं को ज़बान दे रही हैं। ज़िंदगी के फलसफे और इसके आखिरी पड़ाव को उन्होंने बरसों पहले जिस खूबसूरती से पिरोया था, वह आज पूरी तरह मौजूं बैठता है।

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

आज वाकई बशीर साहब की जिंदगी की शाम हो गई है, लेकिन वे जाते-जाते हमारे पास अपनी यादों और गजलों के ऐसे चिराग छोड़ गए हैं, जिनकी रोशनी कभी मद्धम नहीं पड़ेगी।

उनके सफर का थमना हमें उनकी उस बेहद मशहूर गज़ल की याद दिलाता है ,जिसे फिल्म मसान में भी बेहद शिद्दत के साथ इस्तेमाल किया गया था ।

“मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,

किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।”

 बशीर बद्र जी मानवीय संवेदनाओं और मोहब्बत के अमर हस्ताक्षर थे ।

उन की शायरी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे हर दिल के जज्बात को बखूबी शब्द देना जानते थे।

समाज का दर्द हो, मोहब्बत की कशिश हो या फिर इंसानी रिश्तों की मजबूरियां, उन्होंने हर रंग को अपनी कलम से मुकम्मल किया।

आइए, अदब के इस उस्ताद के कुछ और चुनिंदा और बेहद मकबूल शेरों के जरिए उनके फन को याद करें।

रिश्तों की नाजुकता और जुदाई पर..

 “कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

सियासत और समाज के दर्द पर…

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”

मोहब्बत के हसीन और मुकम्मल अहसास पर..

“कोई मिल तो जाएगा मगर तुम्हारी तरह कौन चाहेगा,

चलो मय-कदे में वहीं बात होगी।”

रिश्तों के टूटने और बिखरने के सलीके पर…

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”

बशीर बद्र साहब ने अपने जीवन के आखिरी तीन दशक भोपाल की आबो-हवा में गुजारे। भोपाल की इस ऐतिहासिक और साहित्यिक सरज़मीं की यह तासीर रही है कि इसने हमेशा बड़े फनकारों को अपनी गोद में पनाह दी है और निखारा है। जब हम बशीर बद्र के अवदान को देखते हैं, तो स्वतः ही भोपाल के उन समकक्ष और समकालीन दिग्गजों की याद हो आती है जिन्होंने अपने-अपने दौर में शब्दों की हुकूमत चलाई।

एक तरफ जहाँ दुष्यंत कुमार ने इसी भोपाल की ज़मीन से हिंदी गज़ल को आम आदमी के गुस्से और व्यवस्था के खिलाफ तल्खी का हथियार बनाया और कहा कि *’सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए’, वहीं दूसरी तरफ शरद जोशी ने अपने तीखे और बेबाक व्यंग्य से सत्ता और समाज की विसंगतियों की धज्जियां उड़ा दीं।

जहाँ दुष्यंत की गज़ल में इंकलाब की तड़प थी और शरद जोशी के लेखन में समाज को आईना दिखाने वाला अचूक तंज था, वहीं बशीर बद्र ने इस त्रिवेणी में अपनी बेहद मखमली, रूमानी और सीधे दिल को छू लेने वाली गज़लियत का रंग घोला था।

 इन महान रचनाकारों की उपस्थिति ने भोपाल को अदब का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बना दिया, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती।

 आज बशीर साहब के जाने से भोपाल की साहित्यिक थाती का एक और विशाल स्तंभ ढह गया है।

बशीर बद्र जी के साथ उनके एक युग का अंत, हुआ है पर उनकी किताबें और यादें हमेशा जिंदा रहेंगी।

डॉ. बशीर बद्र केवल पन्नों पर लिखे जाने वाले शायर नहीं थे, वे मुशायरों की जान और महफिलों की धड़कन थे। उन्होंने उर्दू अदब को जो मिजाज और रूमानी शिद्दत दी, उसका कोई दूसरा सानी नहीं है। उनका काव्य हिंदी और उर्दू की भोपाल की साझी तहजीब का ऐसा अनमोल दस्तावेज है, जो पीढ़ियों तक इंसानी दिलों को आपस में जोड़ने का काम करता रहेगा।

शायर कभी मरते नहीं, वे अपने शेरों के जरिए कायनात के हर जर्रे में हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। बशीर साहब भले ही आज हमारे बीच जिस्मानी तौर पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन दुष्यंत और शरद जोशी की तरह वे भी अपने कालजयी शब्दों के जरिए भोपाल की फिजाओं में , यहां के तालाब में बनते उनके अक्स में हमेशा के लिए रचे-बसे रहेंगे।

उर्दू अदब के इस बेताज बादशाह को अश्रुपूर्ण और कोटि-कोटि श्रद्धांजलि।

खुदा उनकी रूह को सुकून बख्शे ।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००३ ⇒ घूंट घूंट चिंतन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घूंट घूंट चिंतन।)

?अभी अभी # १००३ ⇒ आलेख – घूंट घूंट चिंतन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मन की कई अवस्थाएं होती हैं। एक शांत मन होता है, जिसमें विचारों की भीड़ जमा नहीं होती, वहीं दूसरी ओर एक उत्तेजित मन ऐसा भी होता है, जहां विचारों का जमघट लगा रहता है। कहीं लहर है, तो कहीं तूफान और कहीं प्रशांत महासागर।

उनके खयाल आए, तो आते चले गए। विचारों के सैलाब को थामने के लिए, कागज़ पर कलम चलाने के लिए मूड बनाया जाता है। खिड़की खोली जाती है, पंखा चलाया जाता है, मौसम के हिसाब से ठंडा गरम हुआ जाता है। सुबह सुबह तो चाय का प्याला कमाल कर जाता है, चुस्कियों के साथ चुटकियों में कलम सरपट दौड़ने लगती है।।

बच्चों का मन बड़ा चंचल होता है, खेलते वक्त उन्हें खाने पीने की कोई फिक्र नहीं होती। मां आवाज देती है, दूध पीकर खेलने जाओ। बच्चा, बचने का बहाना बनाता है, अभी गर्म है। मां उसकी चालाकी समझती है, तुरंत ठंडा कर देती है, फीका है, एक और बहाना। मां दूध में हॉर्लिक्स मिला देती है, चलो अब जल्दी गट गट पी जाओ, फिर चॉकलेट भी दूंगी। और बच्चा एक सांस में गट गट, पूरा ग्लास खाली कर देता है।

जो लोग स्वाद के शौकीन होते हैं, वे चाय हो अथवा दूध, आराम से घूंट घूंट पीते हैं। हमने वह जमाना भी देखा है जहां कॉफी हाउस में एक कप कॉफी और सिगरेट के सहारे लोग घंटों समय काटा करते थे। एक एक चाय का घूंट और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने का अंदाज़। सार्वजनिक स्थानों पर आज भले ही धूम्रपान वर्जित हो गया हो, लेकिन आज भी केसर के दाने दाने में दम है। चोर, चोरी से जाए, हेराफेरी से ना जाए।।

जो शायर कम्युनिस्ट होते हैं, वे बदनाम होते हैं। खुले आम शराब पीते हैं, और कहते हैं ;

मैने पी शराब !

तुमने क्या पीया ?

आदमी का खून ….

पीने पिलाने की भी तहजीब होती है। शराब की चुस्कियां नहीं ली जाती, पेग पीये, पिलाये जाते हैं, कहीं घूंट घूंट, तो कहीं बच्चों की तरह गटागट। कहीं शराब गम गलत करती है, तो कहीं खुशी बढ़ाती है।

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा।

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।।

एक आम आदमी की जिंदगी भी क्या है। वहां रोज संघर्ष है, मान अपमान है, राग द्वेष है,

महत्वाकांक्षा है, हार जीत है, पेशेवर ईर्ष्या (professional jealousy) है। आए दिन कभी उसे अपमान का घूंट

पीना पड़ता है, तो कभी जहर का। कभी उसका खून जल रहा है, तो कभी वह बेबस, लाचार सिर्फ खून का घूंट पीकर ही रह जाता है।

घुट घुटकर जीने से तो अच्छा है, दो घूंट ही लगा लें। हम पीने पिलाने से इत्तेफाक नहीं रखते, क्योंकि यह आपका जाती मामला है। फिर भी

हम किसी को खून का घूंट पीने से नहीं रोक सकते। ऐसी परिस्थितियों में मुकेश का यह गीत हमारा शॉक ऑब्जर्वर का काम करता है ;

जब ग़म ए इश्क़ सताता

है तो हँस लेता हूँ।

हादसा याद ये आता

है तो हँस लेता हूँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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