(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नैना बरसे…“।)
अभी अभी # ९१७ ⇒ आलेख – नैना बरसे श्री प्रदीप शर्मा
कभी रंग बरसे, तो कभी रैना बरसे ! बरसों से यही होता चला आ रहा है। जब हम और प्रकृति एक रूप हो जाते हैं तो बारिश और बसंत एक साथ प्रकट हो जाते हैं। यह बसंत भी कुछ ऐसा ही निकला। सूरज भी निकला, और हाय गज़ब, कहीं तारा, इस बार तो आसमान ही टूटा।
हम होश कब संभालते हैं, पता नहीं, लेकिन पैदा होते ही हमारी स्वर लहरियां रोने और किलकारियों के रूप में वातावरण में गूंजने लगती है। लड़का अथवा लड़की ! मुलगा किंवा मुलगी। लता, या रफी ?
जो भी हो, मर्फी रेडियो का प्यारे से बच्चे का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। रेडियो के सामने आज भी मैं एक बच्चा ही हूं।
उसी की सुनता हूं। उसके साथ ही गाता मुस्कुराता, जीता जागता, कभी खुशी, तो कभी गम के तराने गुनगुनाता हूं।।
ईश्वर ने मुझे दो कान दिए, दो आंखें दीं, और एक मुंह दिया। अपने मुंह से अपनी क्या तारीफ करूं, लेकिन मैं तानसेन भले ही ना सही, कानसेन जरूर हूं। मेरे दोनों कान पिछले ६०-६५ वर्षों से रफी और लता के नगमे सुन सुनकर ही परिपक्व हुए हैं। दोनों कानों के मार्ग एकांगी हैं। एक कान से लता जी के गीत प्रवेश करते हैं तो दूसरे कान से रफी साहब के। वैसे तो यह ट्रैफिक आम है। लेकिन रफी लता के लिए खास है। अंदर संगीत का फ्यूजन होता है और जब मैं अकेला होता हूं, मुंह से बस लता रफी के नगमे ही निकलते हैं। बस फर्क इतना होता है, कभी लता के साथ मकेश और कुशोरकुमार भी होते हैं तो रफी साहब के साथ आशा, सुमन, सुरैया, शमशाद के साथ अन्य गायक गायिकाएं भी।
मेरे नैना सावन भादो आज से नहीं, सन् १९८० से ही हो चले थे, जब हमने रफी साहब को खोया था। उनकी आवाज तो हमारे साथ थी ही, लेकिन जीवन लता अभी नहीं मुरझाई थी। लता का सहारा हम सभी संगीत प्रेमियों के लिए एक वटवृक्ष की छाया थी, जिसमें शांति थी, सुकून था, संगीत था, अध्यात्म था, द्वैत और अद्वैत एक साथ था।।
मेरे लिए लता रफी को सुनना मनोरंजन नहीं, इबादत रही है। क्योंकि इनको सुनते वक्त या तो मेरी आंखें बंद रहती हैं, या फिर मेरे कान इनके नगमों के लिए खुले रहते हैं। और होंठों तक आकर, वे तराने कब तैरने लग जाते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता।
गीत और संगीत की इस महफिल में पूरा गंधर्व लोक इस धरती पर उतर आया था। कितने गायक, गीतकार और संगीतकारों का यह कमाल, यह करिश्मा होगा जो आज हमारे फिल्मी और सुगम संगीत की धरोहर है। सहगल और नूरजहां से शुरू हुए इस सफर की दास्तान बहुत लंबी है। यकीन नहीं होता, हमारी लता की गहराइयों और ऊंचाइयों का। हमने बड़े प्रेम से और मनोयोग से इस लता को हमारे मन में सींचा है। अब लता का साम्राज्य हमारे दिलों पर है। अब तो बेलि फैल गई, आणंद फल होई।।
कभी मदन मोहन, कभी नौशाद तो कभी सलिल चौधरी और सी.रामचंद्र।
शंकर जयकिशन की बरसात से लक्ष्मी प्यारे के आन मिलो सजना तक भी रफी लता का यह सफर थमा नहीं। इस लता के सुर ने कितनों को थामा है, कितनों को राह बताई है, है कोई ऐसा पत्थर दिल, जिसकी आंख लता के नगमों ने नहीं भिगोई है।
आज दो चार नहीं, जितने आंसू बहें, बहने दो। याद करें तलत लता को, मुकेश लता को, हेमंत लता को, मन्ना दा और लता को, पंडित भीमसेन जोशी और लता को, जगजीत और लता को। बस इतना ही कह सकते हैं।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मैं, मैं और सिर्फ़ मैं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०९ ☆
☆ मैं, मैं और सिर्फ़ मैं… ☆
‘कोई भी इंसान खुश रह सकता है, बशर्ते वह ‘मैं, मैं और सिर्फ़ मैं’ कहना छोड़ दे और स्वार्थी न बने’ मैथ्यू आर्नल्ड का यह कथन इस ओर इंगित करता है कि मानव को कभी फ़ुरसत में अपनी कमियों पर अवश्य ग़ौर करना चाहिए; दूसरों को आईना भी दिखाने की आदत स्वत: छूट जाएगी।
मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझ आजीवन दूसरों के दोष-अवगुण खोजने में व्यस्त रहता है। उसे अपने अंतर्मन में झांकने का समय ही कहां मिलता है? वह स्वयं को ही नहीं, अपने परिवारजनों को भी सबसे अधिक विद्वान, बुद्धिमान अर्थात् ख़ुदा से कम नहीं आंकता। सो! उसके परिवार-जन सदैव दोषारोपण करना ही अपने जीवन का लक्ष्य स्वीकारते हैं। इसलिए न परिवार में सामंजस्यता की स्थिति आ सकती है; न ही समाज में समरसता। चारों ओर विश्रृंखलता व विषमता का दबदबा रहता है, क्योंकि मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में लिप्त रहता है और अपनी अहंनिष्ठता के कारण वह सबकी नज़रों से गिर जाता है। आपाधापी भरे युग में मानव एक-दूसरे को पीछे धकेल आगे बढ़ जाना चाहता है; भले ही उसे दूसरों की भावनाओं को रौंद कर आगे ही क्यों न आगे बढ़ना पड़े? सो! उसे दूसरों के अधिकारों के हनन से कोई सरोकार नहीं होता। वह निपट स्वार्थांध मानव केवल अपने हित के बारे में सोचता है और अपने अधिकारों के प्रति सजग व अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ दूसरों को उपेक्षा भाव से देखता है, जबकि अन्य के अधिकार तभी आरक्षित व सुरक्षित रह सकते हैं; जब वह अपने कर्त्तव्य व दायित्वों का सहर्ष निर्वहन करे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं की भावना से आप्लावित मानव आत्मकेंद्रित होता है। वह केवल अपनी अहंतुष्टि करना चाहता है तथा उसके लिए वह अपने संबंधों व पारिवारिक दायित्वों को तिलांजलि देकर निरंतर आगे बढ़ता चला जाता है; जहां उसकी काम- वासनाओं का अंत नहीं होता… और संबंध व सामाजिक सरोकारों से निस्पृह मानव एक दिन स्वयं को नितांत अकेला अनुभव करता है और ‘मैं’ ‘मैं’ के दायरे व चक्रव्यूह से बाहर आना चाहता है; स्वयं में स्थित होना चाहता है और प्रायश्चित करना चाहता है…परंतु अब किसी को उसकी व उसकी करुणा-कृपा की ज़रूरत नहीं होती।
इस दौर में वह अपनी कमियों पर ग़ौर करके अपने अंतर्मन मेंं झांकना व आत्मावलोकन करना चाहता है। परंतु उसे अपने भीतर अवगुण, दोष व बुराइयों का पिटारा दिखाई पड़ता है और वह स्वयं को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में लिप्त पाता है। इन विषम परिस्थितियों में वह उस स्वनिर्मित जाल से बाहर निकल, संबंध व सरोकारों का महत्व समझ कर लौट जाना चाहता है; उन अपनों में; अपने आत्मजों में, परिजनों में… जो अब उसकी अहमियत नहीं स्वीकारते, क्योंकि उन्हें उससे कोई अपेक्षा नहीं रहती। वैसे भी ज़िंदगी मांग व पूर्ति के सिद्धांत पर निर्भर है। हमें भूख लगने पर भोजन तथा प्यास लगने पर पानी की दरक़ार होती है और यथासमय स्नेह, प्रेम, सहयोग व सौहार्द की। सो! बचपन में उसे माता के स्नेह व पिता के सुरक्षा-दायरे की ज़रूरत व उनके सानिध्य की अपेक्षा रहती है। युवावस्था में उसे अपने जीवन- साथी, दोस्तों व केवल अपने परिवारजनों की अपेक्षा रहती है; माता-पिता के संरक्षण की नहीं। सो! अपेक्षा व उपेक्षा भाव दोनों सुख-दु:ख की मानिंद एक स्थान पर नहीं रह सकते, क्योंकि प्रथम भाव है, तो द्वितीय अभाव और इनमें सामंजस्य ही जीवन की मांग है।
जीवन जहां संघर्ष का पर्याय है; वहीं समझौता भी है, क्योंकि संघर्ष से हम वह सब नहीं प्राप्त कर पाते; जो प्रेम द्वारा पल-भर में प्राप्त कर सकते हैं। आपका मधुर व्यवहार ही आपकी सफलता की कसौटी है, जिसके बल पर आप लाखों लोगों के प्रिय बन कर उनके हृदय पर आधिपत्य स्थापित कर सकते हैं। विनम्रता हमें नमन सिखाती है; शालीनता का पाठ पढ़ाती है, और विनम्र व्यक्ति विपदा-आपदा के समय पर अपना मानसिक संतुलन नहीं खोता… सदैव धैर्य बनाए रखता है। अहं उसके निकट जाकर भी उसे छूने का साहस नहीं जुटा पाता अर्थात् वह ‘मैं, मैं और सिर्फ़ मैं’ के शिकंजे से सदैव मुक्त रहता है और आत्मावलोकन कर ख़ुद में सुधार लाने की डगर पर चल पड़ता है। वह अपनी कमियों को दूर करने का भरसक प्रयास करता है और कबीरदास जी की भांति ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसों बुरा न कोय’ अर्थात् पूरे संसार में उसे ख़ुद से बुरा व कुटिल कोई अन्य दिखाई नहीं पड़ता। इसी प्रकार सूर, तुलसी आदि को भी स्वयं से बड़ा पातकी ढूंढने पर भी दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि ऐसे लोग स्वयं को बदलते हैं; संसार को बदलने की अपेक्षा नहीं रखते।
कंटकों से आच्छादित मार्ग से सभी कांटो को चुनना अत्यंत दुष्कर कार्य है। हां! आत्मरक्षा के लिए पांवों में चप्पल पहन कर चलना अधिक सुविधाजनक व कारग़र है। सो! समस्या का समाधान खोजिए; ख़ुद मेंं बदलाव लाइए और दूसरों को बदलने में अपनी ऊर्जा नष्ट मत कीजिए। जब आपकी सोच व दुनिया को देखने का नज़रिया बदल जाएगा; आपको किसी में कोई भी दोष नज़र नहीं आयेगा और आप उस स्थिति में पहुंच जाएंगे… जहां आपको अनुभव होगा कि जब परमात्मा की कृपा के बिना एक पत्ता तक भी नहीं हिल सकता, तो व्यक्ति किसी का बुरा करने की बात सोच भी कैसे सकता है? सृष्टि-नियंता ही मानव से सब कुछ कराता है… इसलिए वह दोषी कैसे हुआ? इस स्थिति में उसे दूसरों को आईना दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
मानव ग़लतियों का पुतला है। यदि आप अपने जैसा दूसरा ढूंढने को निकलेंगे, तो अकेले रह जाएंगे। इसलिए दूसरों को उनकी कमियों के साथ स्वीकारना सीखिये … यही जीवन जीने का सही अंदाज़ है। वैसे भी आपको जीवन में जो भी अच्छा लगे, उसे सहेज व संजोकर रखिए और शेष को छोड़ दीजिए। इस संदर्भ में आपकी ज़रूरत ही महत्वपूर्ण है और ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ तथा ‘जहां चाह, वहां राह… यह है जीने का सही राह।’ यदि मानव दृढ़-प्रतिज्ञ व आत्मविश्वासी है, तो वह नवीन राह ढूंढ ही लेता है और उस स्थिति में उसका मंज़िल पर पहुंचना अवश्यंभावी हो जाता है। सो! साहस व धैर्य का दामन थामे रखिए; मंज़िल अवश्य प्राप्त हो जाएगी।
हां! अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपको सत्य की राह पर चलना होगा, क्योंकि सत्य ही शिव है, कल्याणकारी है…और जो मंगलकारी है, वह सुंदर तो अवश्य ही होगा। इसलिए सत्य की राह सर्वोत्तम है। सुख-दु:ख तो मेहमान की भांति आते-जाते रहते हैं। एक की अनुपस्थिति में ही दूसरा दस्तक देता है। सो! इनसे घबराना व डरना कैसा? इसलिए ‘जो हम चाहते हैं, वह होता नहीं और जो ज़िंदगी में होता है, हमें भाता नहीं’… वही हमारे दु:खों का मूल कारण है।’ जिस दिन हम दूसरों को बदलने की भावना को त्याग कर ख़ुद में सुधार लाने का मन बना लेंगे, दु:ख, पीड़ा, अवमानना, आलोचना, तिरस्कार आदि अवगुण-दोष सदैव के लिए जीवन से नदारद हो जाएंगे। इसलिए ‘परखिए नहीं, समझिए’ … यही जीने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। इसका दूसरा पक्ष यह है कि ‘जब चुभने लगें, ज़माने की नज़रों मेंं/ तो समझ लेना तुम्हारी चमक बढ़ रही है’ अर्थात् महान् व बुद्धिमान मनुष्य की सदैव आलोचना व निंदा होती है और वे सामान्य लोगों की नज़रों में काँटा बन कर खटकने लगते हैं। इस स्थिति में मानव को कभी भी निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रसन्नता से स्वयं को ग़ौरवान्वित अनुभव करना चाहिए कि ‘आपकी बढ़ती चमक व प्रसिद्धि देख लोग आपसे ईर्ष्या करने लगेंगे, परंतु आपको निरंतर उसी राह पर अग्रसर होते रहना चाहिए।’
ज़िंदगी जहां हर पल नया इम्तहान लेती है, वहीं एक सुहाना सफ़र है। कौन जानता है, अगले पल क्या होने वाला है? इसलिए चिंता, तनाव व अवसाद में स्वयं को झोंक कर अपना जीवन नष्ट नहीं करने का संदेश प्रेषित है। स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों में–’उठो! आगे बढ़ो और तब तक न रुको; जब तक आप मंज़िल को नहीं प्राप्त कर लेते। उस स्थिति में मन में केवल वही विचार रखें, जो तुम जो पाना चाहते हैं और केवल उसे ही हर दिन दोहराओ…आपको उस लक्ष्य के प्राप्ति अवश्य हो जाएगी।’
अंत में मैं कहना चाहूंगी कि ‘सिर्फ़ मैं’ के भाव का दंभ मत भरें; आत्मावलोकन कर अपने अंतर्मन में झांकें व दोष-दर्शन कर अपनी कमियों को सुधारने में प्रयासरत रहें… आप स्वयं को अवगुणों की खान अनुभव करेंगे। दूसरों से अपेक्षा मत करें और जब आपके हृदय में दैवीय गुण विकसित हो जाएं और आप लोगों की नज़रों में खटकने लगें, तो सोचें कि आपका जीवन, आपका स्वभाव व आपके कर्म उत्तम हैं, श्रेष्ठ हैं, अनुकरणीय हैं। सो! आप जीवन में अपेक्षा-उपेक्षा के जंजाल से मुक्त रहें…कोई बाधा आपकी राह नहीं रोक पाएगी। यही खुश रहने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। परंतु यह तभी संभव होगा, जब आप स्व-पर से ऊपर उठ कर, नि:स्वार्थ भाव से पर-हित के कार्यों में स्वयं को लिप्त कर, उन्हें दु:खों से मुक्ति दिलाकर सुक़ून अनुभव करने लगेंगे। सो! दूसरों से उम्मीद रखने की अपेक्षा ख़ुद से उम्मीद रखना श्रेयस्कर है, क्योंकि इससे निराशा नहीं, आनंदोपलब्धि होगी और मानव-मात्र के सब मनोरथ पूरे होंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ढक्कन वाला कुआं…“।)
अभी अभी # ९१६ ⇒ आलेख – ढक्कन वाला कुआं श्री प्रदीप शर्मा
कुआं कोई शीशी अथवा रसोईघर का पात्र नहीं, जो ढक्कन का मोहताज हो, आप पानी को भी ढंक सकते हैं, पूरे कुएं को ढकने का क्या औचित्य, लेकिन बाल की खाल नहीं निकालते, अगर कहीं ढक्कन वाला कुआं है भी तो आपका क्या जाता है। अच्छा है, लोग कुएं में कचरा नहीं डालेंगे, रात्रि में कोई भटका हुआ जानवर उसमें नहीं गिरेगा अथवा कोई दुखी प्रेमी कुएं में कूदकर अपनी जान तो नहीं दे पाएगा।
अब यह मत पूछिए, यह ढक्कन वाला कुआं कहां है। अगर मैं आपसे पूछूं कि खारी बावली कहां है तो आप मुझे दिल्ली तो भेज देंगे लेकिन वहां ऐसी कोई बावड़ी नहीं, जो खारी हो। सड़क और किराना मार्केट को ही आजकल खारी बावली कहते हैं। होगी कभी मुगलों के ज़माने में कोई खारी बावड़ी, जिससे नमक वाली चाय बनाई जाती हो। हमें इससे क्या।।
मुझे जब भी बस से प्रवास करना पड़ता है, मुझे ढक्कन वाले कुएं जाना ही पड़ता है, जहां से मुझे गंतव्य के लिए अपनी बस मिलती है। अजीब अजीब नाम होते हैं इन गाड़ी अथवा बस अड्डों के ! सराय काले खां भी कोई नाम हुआ। अहमदाबाद में अपनी बस पकड़ना है तो पहले पालड़ी जाओ। जब रोड़वेज की बसें चलती थीं, आंख मूंदकर सरवटे बस स्टैण्ड चले जाओ, ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे।
बहुत बार कोशिश की, ढक्कन वाले कुएं के दर्शन कर लूं, लेकिन वहां न तो कोई कुआं नजर आया और न ही कोई ढक्कन। बड़ा पॉश एरिया है ढक्कन वाला कुआं। साउथ तुकोगंज और कंचनबाग के बीच की खाली जमीन जिसकी कीमत वहां स्थित होटलों और अस्पतालों से ही आसानी से आंकी जा सकती है।।
स्मशान हो या कब्रस्तान, जहां भी हो खाली स्थान, आदमी बना लेता अपना मकान ! दूर क्यों जाएं, इंदौर के एम जी रोड पर, व्यस्त खजूरी बाज़ार के पास गोराकुंड है, जहां आज न कोई कुंड है न कोई बावड़ी। पहले यहां एक बावड़ी थी उसे ही गोराकुंड कहते होंगे। आज वहां केनरा बैंक है। बस शहर में एक राम प्याऊ है, जहां आज भी हर प्यासे के लिए शीतल जल उपलब्ध है।
हमारा शरीर नश्वर है। एक दिन इसे मिट्टी में मिलकर पंच तत्वों में समा जाना है। पारसी समुदाय में इस नश्वर काया को मुक्ति हेतु एक कुएं में ले जाया जाता है, जो ऊपर से एक लोहे की जाली से ढंका होता है। यह देह मरने के बाद ही सही, किसी जीव का भोजन बने तो क्या बुरा है। अपनी अपनी आस्था है, अपना अपना दर्शन है।।
वैसे देखा जाए तो हमारी काया भी एक ढक्कन वाला कुआं ही है। शरीर रूपी इस कुएं में जब तक जान है, पानी ही पानी है, जल ही जीवन है। इस शरीर का उपयोग एक कुएं के समान परिवार, देश और समाज के लिए हो। दो शब्द प्रेम के ही दो बूंद पानी है, जो किसी प्यासे को तृप्त कर सकते हैं। प्राण ही इसका ढक्कन है। हंस ट्रैवल का वास्तविक ढक्कन वाला कुआं हमारा शरीर ही है। थोड़ा ढक्कन हटा, और उड़ जाएगा, हंस अकेला। जग दर्शन का मेला ..!!!
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “ रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य परंपरा के आधार प्रतिनिधि” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०० ☆
आलेख – रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य परंपरा के आधार प्रतिनिधि श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य साहित्य की उस गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि लेखक हैं, जिन्होंने व्यंग्य को केवल हास्य या चुटकुलेबाजी का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक आलोचना, आत्मपरीक्षण और सांस्कृतिक विमर्श का गम्भीर औजार बनाया। उनका व्यंग्य हँसाता कम है, चौंकाता ज्यादा है । वह पाठक को भीतर तक झकझोरता है और अपने ही समाज की विडंबनाओं के आईने में उसका चेहरा दिखाता है। त्यागी जी का व्यंग्य लेखन , विशुद्ध मनोरंजन के विरुद्ध एक विद्रोह है। वह मनोरंजन के बहाने व्यक्ति की सामाजिक और मानसिक जड़ताओं से, रूढ़ियों से, पाखंडों से और कभी-कभी स्वयं लेखक की ही आत्ममुग्धता से मुक्ति का मार्ग खोजते हैं ।
रवीन्द्रनाथ त्यागी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वे व्यंग्य को शब्दों की बाजीगरी नहीं मानते। उनके लिए व्यंग्य यथार्थ को देखने की, उसे समझने की और फिर उसे इस तरह से पाठक के सामने प्रस्तुत करने की एक दृष्टि है, कि वह मुस्कराए भी, लज्जित भी हो, और कहीं न कहीं अपने भीतर झाँकने के लिए विवश हो जाए। उनकी रचनाओं में कोई अतिरिक्त अलंकरण नहीं है, न ही बनावटी गढ़े गए हास्यप्रसंग हैं। वे घटनाओं और
पात्रों के माध्यम से सामाजिक स्थितियों की तह तक पहुँचते हैं। उनकी शैली में सहजता है, लेकिन वह सहजता एक लंबे अनुभव और गंभीर आत्मचिंतन से उपजी है।
त्यागी जी की रचनाओं में भाषा एक अलग ही जीवित पात्र की तरह व्यवहार करती है। वे शुद्ध साहित्यिक हिंदी का आग्रह नहीं रखते, न ही प्रचलित बाजारू भाषा की ओर झुकते हैं। उनकी भाषा वह लोक भाषा है जो गाँव , कस्बों और नगरों के बीच सामाजिक सरोकारों से जुड़ती है। वे आम बोलचाल के शब्दों का इस तरह से प्रयोग करते हैं कि वे विश्लेषण और व्यंग्य के माध्यम बन जाते हैं। ‘मैं और मेरा समाज’ या ‘टंच माल’ जैसी रचनाओं में हम देखते हैं कि एक ही शब्द या वाक्यांश कितनी बार कितने अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होकर पाठक को गहरे व्यंग्यबोध की स्थिति में पहुँचा देता है। यह शब्दों की नहीं, उनकी लेखकीय सोच की चतुराई है।
त्यागी जी के व्यंग्य की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता उनका आत्म-रूपांतरण है। वे अपने पात्रों में स्वयं को शामिल करते हैं। यानी वह ‘मैं’ जो लेखक का है, अक्सर उतना ही दोषी, उलझा हुआ और मजेदार होता है , जितना कि कोई दूसरा पात्र। यह ईमानदारी, यह आत्मव्यंग्य की क्षमता उन्हें विशेष बनाती है। वे अपने पाठकों पर ऊँगली नहीं उठाते, बल्कि खुद के जरिए उन्हें यह अनुभव कराते हैं कि समाज का हर हिस्सा, हर व्यक्ति किसी न किसी विडंबना का हिस्सा है, उनके हास्य की शुरुआत आत्म-स्वीकृति से ही होती है।
उनका व्यंग्य एक तरह से ‘भीतर से बाहर’ जाने वाली प्रक्रिया है। जहाँ आज के कई व्यंग्यकार समाज को बाहर से देखकर उस पर तंज कसते हैं, वहीं त्यागी जी का व्यंग्य समाज के भीतर उतर कर, उसके छोटे-छोटे अनुभवों को समेट कर उभरता है। वे डॉक्टर, प्रोफेसर, बाबू, नेता, लेखक. गृहणी, पंडित सबको अपने ही रंग में दिखाते हैं, लेकिन न तो किसी को खलनायक बनाते हैं, न ही किसी को देवता। उनका हास्य ‘करुणा’ से निकला है, उपहास से नहीं।
व्यंग्य में विचारशीलता का होना, और वह भी बिना बोझिल हुए, रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की रचनाशीलता की विशेष उपलब्धि है। उनके लेखों में विचार पाठक के ऊपर लादा नहीं जाता, बल्कि वह कहानी और संवाद के बीच से धीरे-धीरे रिसता है। पाठक को पता भी नहीं चलता और वह किसी गूढ़ सामाजिक सच्चाई से साक्षात्कार कर बैठता है। जैसे ‘संपादक जी’ या ‘ठलुआ क्लब’ जैसी रचनाएँ पढ़ते समय हम हँसते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर यह भी समझते हैं कि यह समाज कैसे धीरे-धीरे आत्म-मुग्धता और सुविधा-प्रियता के जाल में फंसता जा रहा है।
रवीन्द्रनाथ त्यागी का व्यंग्य एक तरह से समय का सामाजिक दस्तावेज है। उन्होंने अपने समय की नौकरशाही, साहित्यिक दुनिया, शिक्षा व्यवस्था, मध्यमवर्गीय नैतिकता और राजनीतिक पाखंड को बड़े ही प्रभावी तरीके से उजागर किया है। वे किसी वाद या प्रचार की भाषा नहीं बोलते, बल्कि उनकी लेखनी पाठक को इस स्थिति में खड़ा करती है, जहाँ वह हँसते-हँसते अपनी ही भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाने लगता है। यह शक्ति सामान्य व्यंग्यकारों में नहीं पाई जाती।
त्यागी जी की शैली में कथा और निबंध का ऐसा अद्भुत मेल मिलता है, जहाँ एक ओर अनुभवजन्य घटनाएँ पाठक को बांधती हैं. वहीं दूसरी ओर लेखक की टिप्पणी, कटाक्ष और मूल्यांकन उसे वैचारिक स्तर पर भी झकझोरते हैं। वे एक साथ कथाकार, निबंधकार और टीकाकार की भूमिका निभाते हैं, लेकिन इस तरह से कि कोई भूमिका दूसरी पर भारी नहीं पड़ती। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि हम किसी साहित्यिक कथा का आनंद ले रहे हैं, लेकिन अगले ही पल एक गहरा व्यंग्य वाक्य हमें उस कल्पना से बाहर खींच कर सामाजिक यथार्थ के कठोर धरातल पर ले आता है।
त्यागी जी की रचनाओं में विसंगति पकड़ने की अद्भुत दृष्टि है। वे समाज की उस दरार को भी देख लेते हैं जो सामान्य दृष्टि से छिपी रहती है। फिर वह दरार चाहे भाषायी हो, नैतिक हो, या मानसिक। ‘कहानी का संकट’ जैसे लेखों में हम देख सकते हैं कि वे कैसे भाषा, शैली और कथ्य के कृत्रिमता की ओर संकेत करते हैं। उनका व्यंग्य साहित्यिक आत्ममुग्धता पर भी उतना ही प्रहार करता है जितना वह सामाजिक पाखंड पर करता है। यह संतुलन उन्हें एक संपूर्ण व्यंग्यकार बनाता है।
त्यागी जी की रचनाएँ समकालीन हैं, लेकिन उनकी दृष्टि कालातीत है। वे किसी विशेष घटना या व्यक्ति से बँधे नहीं है, बल्कि प्रवृत्तियों को पकड़ते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं जितनी अपने समय में थीं। वे न तो केवल ‘क्लासिक’ बन गए हैं, न ही ‘समाचार’। वे उस मध्यधारा में हैं जहाँ साहित्य जीवन से संवाद करता है, जीवन पर टिप्पणी करता है और कभी-कभी उसकी दिशा भी बदलता है।
त्यागी जी के व्यंग्य में ‘संवेदना’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्त्व है। वे केवल हँसी नहीं पैदा करते, बल्कि उस हँसी के पीछे छिपे दर्द, असहायता, विडंबना और थकावट को भी महसूस कराते हैं। पाठक उनके लेखों को पढ़कर केवल ‘हँसता’ नहीं, बल्कि सोचने लगता है, कभी खुद के बारे में, कभी समाज के बारे में, और कभी-कभी लेखक के बारे में भी। उनका व्यंग्य कोई निर्णय नहीं सुनाता, बल्कि प्रश्न छोड़ता है। शायद यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि वे व्यंग्य को समाधान नहीं, संवाद बनाते हैं।
आज के व्यंग्य साहित्य में जहाँ तीखापन और आक्रोश अधिक है, वहाँ रवीन्द्रनाथ त्यागी एक सधे हुए संतुलन की मिसाल हैं। उनका व्यंग्य न गाली है, न ताली । वह आइना है, साफ, खरा और कभी-कभी चुभता हुआ। वह हमें यह नहीं बताता कि हम गलत हैं, वह केवल इतना करता है कि हमें हमारी तस्वीर दिखा देता है और फिर छोड़ देता है कि हम खुद ही तय करें कि हमें बदलना है या नहीं। यह व्यंग्य की पराकाष्ठा है और रवीन्द्रनाथ त्यागी इस शिखर पर स्थिर और प्रतिष्ठित दिखाई देते हैं।
इस दृष्टि से देखें तो रवीन्द्रनाथ त्यागी केवल व्यंग्यकार नहीं हैं, वे हिंदी समाज के भीतर बैठे उस ‘स्व’ की आलोचना हैं जो कभी स्वयं पर हँसना नहीं जानता था। उन्होंने व्यंग्य को आत्म साक्षात्कार का माध्यम बनाया। वे हमारे समय के दर्पणकार हैं जिन्होंने हमें हमसे मिलवाया, और यह सबसे बड़ा साहित्यिक योगदान है।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७७ ☆ महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
☆ ॐ नमः शिवाय ☆
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भोले भंडारी भरें, भक्तों के भंडार ।
भस्म लगा धूनी रमा, कैलाशी सरकार ।।
*
शिव सह गौरा सोहतीं, कार्तिकेय, गणराज ।
बाघम्बर धारण किए, बाजे डमरू साज ।।
*
बम- बम भोले बोलिए, शिव शम्भू कैलाश।
सच्चे मन से प्रार्थना, रोके सभी विनाश।।
*
शीष विराजे चंद्रमा, केशों गंगा धार ।
भस्म रमा धूनी सहित, गले सर्प का हार।।
*
शिव शंकर जग मोहते, माॅं गौरा के साथ।
अपने भक्तों पर कृपा, करते दीना नाथ।।
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आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में युवा मन अक्सर बाहर की दुनिया में उलझा रहता है—कैरियर, स्क्रीन, प्रतिस्पर्धा और लगातार बदलती अपेक्षाएँ। ऐसे समय में महाशिवरात्रि हमें एक सरल लेकिन गहरा संदेश देती है: बाहर नहीं, भीतर लौटो। शिव किसी दूर बैठे देवता नहीं, बल्कि हमारे भीतर की स्थिरता, संतुलन और सजगता का नाम हैं।
अध्यात्म का अर्थ दुनिया से भागना नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए भी अपने मन को स्पष्ट और शांत रखना है। यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए और भी ज़रूरी है। महाशिवरात्रि की रात हमें याद दिलाती है कि थोड़ी देर रुककर, मोबाइल की स्क्रीन से नज़र हटाकर, अपने भीतर झाँकना भी उतना ही ज़रूरी है जितना आगे बढ़ना।
शिव की पूजा में प्रयुक्त वस्तुएँ—बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल,फल, दूध, दही,घी, शहद, भस्म, धूप,दीप—सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़े रहने का सुंदर प्रतीक हैं। ये चीज़ें सरल हैं, सहज हैं और हमें “ग्रीन मोटिवेशन” देती हैं कि जीवन की मूल ज़रूरतें दिखावे में नहीं, सादगी में पूरी होती हैं। प्रकृति के साथ यह तालमेल ही असल में शिव का संदेश है—संतुलन, संयम और स्वीकार।
आज का युवा अगर शिव को इस रूप में समझे—एक आंतरिक शक्ति, एक स्थिर चेतना और प्रकृति से जुड़ा जीवन-दर्शन—तो महाशिवरात्रि सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर दिशा देने का अवसर बन सकती है। क्योंकि जब भीतर स्थिरता आती है, तभी बाहर की दुनिया भी सही मायनों में सँवरती है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बेजोड़ जोड़ी…“।)
अभी अभी # ९१५ ⇒ आलेख – बेजोड़ जोड़ी श्री प्रदीप शर्मा
क्या जोड़ से ही जोड़ी बनती है ? एक समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी था ! वह बैलगाड़ी का ज़माना था। दो बैलों की जोड़ी ही हल भी जोतती थी। अकेला बैल किस काम का ?
जिस प्रकार रंगी को नारंगी, मेवे को खोया, और चलती को गाड़ी कहना उलटबासी है, उसी तरह दो अलग अलग वस्तुओं के साथ को जोड़ी कहना भी उलटबासी ही हुआ। जोड़ा-जोड़ी हमारे सांकेतिक शब्द हैं। जोड़ी हमारी बनेगा कैसे जॉनी, और दो हंसों का जोड़ा, जोड़ के बेजोड़ उदाहरण हैं।।
बिना फेविकॉल के जो आपस में जुड़े रहते हैं, उन्हें आप जोड़ा अथवा जोड़ी कह सकते हैं। अंग्रेज़ी में pair शब्द सब कुछ बयां कर जाता है। वाह क्या जोड़ी है, दिलीप सायरा, धर्मेंद्र-हेमा, अमिताभ-जया और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की ! जब तक बीच में कोई दीवार नहीं खड़ी हुई, सलीम-जावेद की जोड़ी भी अनमोल थी।
मनुष्य, ईश्वर की एक बेजोड़ कलाकृति है। एक अकेले शरीर में कितनी जोड़ियां ? दो कान, दो दो आँख, दो पैर, दो हाथ, और तो और किडनी भी दो, लेकिन एक दिल और सौ अफ़साने। जब गब्बर बोलता है, ” ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर ” तो वह एक नहीं, दोनों हाथों की माँग करता है। बेटी के जब हाथ पीले होते हैं, तो दोनों एक साथ ही होते हैं। कान में जब झुमका पहना जाता है, तब दोनों कानों के लिए दो झुमकों की आवश्यकता होती है।।
एक चश्मा दोनों आँखों पर चढ़ जाता है। अंग्रेज़ी में चश्मे को pair of spects कहते हैं। एक ही आँख पर चश्मा नहीं चढ़ सकता। वैसे अगर नाक नहीं होती, तो चश्मे को सहारा कौन देता। चश्मा पहले नाक पर चढ़ता है, फिर आँख पर। यहाँ आप दोनों कानों की उपेक्षा भी नहीं कर सकते। हैं न सभी बेजोड़।
हम जूते खरीदने जाते हैं। शान से बैठकर, दुकानदार के सामने दोनों पाँव रख देते हैं। कोई अच्छा सा जूता बताओ। वह आपके पाँवों की जोड़ी के लिए एक अच्छे से जूते की जोड़ी लेकर आता है। दाहिने पाँव के लिए दाहिने पाँव का जूता और बाँये पाँव के लिए अलग जूता ! अंग्रेजी में foot, feet हो जाता है, और जूता, a pair of shoes। और आप एक जोड़ी जूते पसंद कर लेते हैं। अगर कहीं भीड़, या मेले में, मंदिर अथवा कथा-सत्संग में दो में से एक जूता- चप्पल गुम जाए, तो जोड़ी टूट जाती है। कोई भी दुकानदार एक चप्पल और जूता नहीं जुटा सकता। टूटे जूते की मरम्मत तो हो सकती है, लेकिन एक अकेले जूते की जोड़ी फिर से नहीं बन सकती।।
दो से एक होना ही द्वैत से अद्वैत होना है। जब दिल से दिल मिलता है, तो दो दिल एक जान हो जाते हैं। शायद भगवान ने इसीलिए एक दिल और एक ही जान भी दी। लोग जब दिल दे बैठते हैं, तो ज़िंदा नहीं रह सकते, इसीलिए जिसे दिल दिया है, उसे जान भी दे बैठते हैं। जब एक दिल, एक जान हो जाते हैं, और तब ज़माना कह उठता है, वाह ! क्या जोड़ी है।
पक्षी आदतन, अकेले नहीं रह सकते। चकवा-चकवी, चिड़ा-चिड़ी, तोता-मैना, मोर-मोरनी साथ जीते हैं, और साथ ही मरते हैं। वे दोनों मिलकर ही एक नीड का निर्माण करते हैं। संसार सृजन का दूजा नाम है। एक से एक का मिलना ही जोड़ी है। नाग-नागिन तो एक दूसरे का साथ पाताल तक नहीं छोड़ते, और एक शादी-शुदा जोड़ा, सात जनम तक।
हमारे आदर्श अवतार भी कहाँ अकेले हैं ? सीता-राम और राधा-कृष्ण को छोड़िए, विष्णु को लक्ष्मी और अजन्मे शंकर को भी पार्वती के साथ रहना ही पड़ा।
एक से एक मिलकर ही दो का अंक होता है। एक विषम है, और दो सम ! सम-विषम का जोड़ ही ज़िन्दगी का गणित है। लड़के-लड़की की पत्रिका में पहले गुण मिलाए जाते हैं, अवगुण नहीं। गुण मिलने पर ही जोड़ी जमती है। एक दूसरे के गुण-अवगुण
को समान रूप से स्वीकार करते हुए ज़िन्दगी की गाड़ी चलती है। गाड़ी भी तो आखिर दो ही से चलती है।।
दुनिया में कोई अकेला नहीं। जो अकेला है, वह भी किसी मक़सद, उद्देश्य और आदर्श
से जुड़ा है। सड़क का एक खंबा भी ज़मीन से जुड़ा है। एक विशालकाय वृक्ष की जड़ें भी तो ज़मीन से ही जुड़ी हैं।
हम कभी ईश्वर से बिछड़े थे। वह तो हम से आज भी जुड़ा हुआ है। योग का अर्थ भी जोड़ना ही है। हम अपने आदर्शों से जुड़े रहें, ईमान से बड़ा कोई धर्म नहीं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शहद की मधुमक्खी…“।)
अभी अभी # ९१४ ⇒ आलेख – शहद की मधुमक्खी श्री प्रदीप शर्मा
कबीर यूँ तो जुलाहे थे, लेकिन जब दुहते थे, तो दोहे निकलते थे। माखी गुड़ में गड़ी रहे, पंख रह्यो लिपटाय। हाथ मले और सर धुने, लालच बुरी बलाय।
कबीरदासजी जिस मक्खी की बात कर रहे हैं, वह पहले तो गंदगी पर बैठती है, और बाद में गुड़ की भेली पर। यह मक्खी बीमारियों की जड़ है। यह BPL मने बिलो पॉवर्टी लाइन वाली मक्खी है। हम जिस मक्खी की बात आज कर रहे हैं, वह मधु की मक्खी याने क्रीमी लेयर वाली मक्खी है।।
यह न तो गंदे में बैठती है, न ही गुड़ से इसे कोई विशेष प्रेम है। यह अपने आप में शहद की एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है। यह एक रसिक भँवरे की तरह फूलों से परागकण एकत्रित करके शहद का थोक में उत्पादन करती है। लोभी भँवरों की तरह आदमी भी शहद के लालच में इसे पालने लग गया है, और उस लालन-पालन का उसने नाम रखा है, मधुमक्खी पालन।
मक्खी में भी ढाई आखर ही होते हैं, लेकिन मक्खियों से कोई प्रेम नहीं करता। मधुमक्खी में ढाई आखर नहीं है, लेकिन शहद के लालच में इंसान इससे प्रेम करता है। मक्खी से ज़्यादा लालची तो इंसान ही हुआ न।।
जंगलों में, बड़े बड़े वृक्षों के तनों में, पुरानी विशाल इमारतों के वे अंधेरे कोने, जहाँ जीरो मेंटेनेंस होता है, मधुमक्खी पहले मोम के
छत्ते बनाती है, और फिर उसमें शहद का निर्माण करती है। फूलों के रस से शहद के निर्माण की यह प्रक्रिया बड़ी रोचक, विचित्र और प्रेरणादायक है। आश्चर्यजनक रूप से एक रानी मधुमक्खी और उसकी श्रमिक मधुमक्खी ही यह पूरा कारोबार संभालती है और नर को निखट्टू कहा जाता है।
जहाँ उत्पादन अधिक होता है, वहाँ परिवार नियोजन का कोई प्रयोजन नहीं। रानी मधुमक्खी निखट्टू नर की सहायता से एक दिन में 1500 अंडे दे देती है, जिनका पालन श्रमिक मधमक्खियों को ही करना पड़ता है। पहले मोम का छत्ता बनाना, और फिर फूलों से मधु निकाल छत्तों में एकत्रित करना। कौन जानता है, यह कर्म सकाम है या निष्काम।।
प्रकृति के आँचल में खनिज है, खाद्यान्न है, सब जीव जंतुओं के लिए राशन पानी है, हवा है, धूप है, पानी है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जंगलों का अस्तित्व अवश्यम्भावी है।
प्रोजेक्ट टाइगर ! यानी प्रोटेक्ट टाइगर और प्रोटेक्ट जंगल। एनिमल किंगडम, ह्यूमन किंगडम से अधिक मूल्यवान है। हम मुँह उठाए मौज मस्ती और मनोरंजन के लिए वन में चले जाते हैं, वनचर हमारी बस्ती में भूले भटके ही आते हैं, और जब भी आते हैं, मुँह की खाते हैं।।
गुलाब में काँटे होते हैं, शहद पैदा करने वाली मधुमक्खी भी डंक मारती है। देवता अमृतपान करते हैं, शंकर गरल को धारण कर नीलकंठ कहलाते हैं। शहद के छत्तों की रक्षा के लिए ही शायद प्रकृति ने इन मधु मक्खियों को डंक हथियार के रूप में दिए हैं। हम प्रेम से शहद चाटते हैं, और मधुमक्खी काटे, तो भागते हैं।
जब भी आप नींबू-शहद का सेवन करें, इनके उपकार को न भूलें। आयुर्वेदिक उपचार में दवाओं का सेवन शहद के साथ ही किया जाता है। पृथ्वी पर अगर कहीं अमृत है, तो वह शहद ही में है। शहद ही में है। मधुमक्खी तुम धन्य हो।।
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपकी एक ज्ञानवर्धक आलेख “आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता” पर चर्चा।
☆ आलेख ☆ आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता☆ श्री मनजीत सिंह ☆
भूमिका
देश केवल भूगोल नहीं होता, बल्कि वह अपने नागरिकों की चेतना, सोच और संघर्ष से बनता है। मनुष्य और राष्ट्र एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। किसी भी देश में राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में वहाँ के सामाजिक हालात और साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता, विशेषकर उर्दू पत्रकारिता, ने जनमानस को जागृत करने, राजनीतिक चेतना को विकसित करने तथा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए जनता को मानसिक रूप से तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
1857 की क्रांति के संदर्भ में यदि उस समय की परिस्थितियों का अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि उर्दू समाचार पत्रों ने उच्च और निम्न—दोनों वर्गों के भारतीयों को एक साझा मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की।
1857 का विद्रोह और उर्दू पत्रकारिता
अतीक सिद्दीकी ‘इंडियन न्यूज़पेपर’ की समीक्षा करते हुए ‘नटराज’ के हवाले से लिखते हैं कि उन्नीसवीं सदी का छठा दशक ब्रिटिश भारत के इतिहास में अत्यंत निर्णायक था। 1757 की प्लासी की लड़ाई से आरंभ हुआ अंग्रेज़ी प्रभुत्व 1856 में अवध के विलय के साथ अपने चरम पर पहुँच गया। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 1857 का महासंग्राम फूटा, जिसे अंग्रेज़ों ने “ग़दर” कहा, जबकि भारतीयों के लिए यह स्वतंत्रता का प्रथम संगठित प्रयास था।
1857 की असफलता के पश्चात् अनेक उर्दू समाचार पत्रों की नीति में अस्थायी नरमी आई। कुछ पत्रों ने राजनीति के स्थान पर पश्चिमी कला और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित किया, किंतु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित होने के बाद भी भारतीयों का असंतोष कम नहीं हुआ।
विद्रोह की पृष्ठभूमि और अख़बारों की भूमिका
ब्रिटिश शासन की धोखेबाज़ नीतियों से भारतीय सैनिक और जनता अत्यंत क्षुब्ध थे। विद्रोह की निश्चित तिथि 31 मई तय की गई थी, परंतु मेरठ में घटनाएँ पहले ही भड़क उठीं। मंगल पांडे द्वारा बैरकपुर में अंग्रेज़ अधिकारी पर गोली चलाना विद्रोह का संकेत बन गया। इस घटना से पहले ही उर्दू अख़बार जनता को मानसिक रूप से तैयार कर चुके थे।
लॉर्ड कैनिंग ने स्वयं स्वीकार किया कि देशी अख़बारों ने जनता को विद्रोह के लिए उकसाया। उनके अनुसार,
“देशी समाचार पत्रों ने जानबूझकर ऐसी खबरें प्रकाशित कीं, जिनसे भारतीय जनता विद्रोह के लिए प्रेरित हुई।”
प्रमुख उर्दू समाचार पत्र और पत्रिकाएँ
1857 और उसके बाद अनेक उर्दू पत्र-पत्रिकाएँ पूरी तरह राजनीतिक स्वरूप में सामने आईं। इनमें प्रमुख थे—
दिल्ली उर्दू अख़बार (मौलाना मोहम्मद बाकर)
सहर सामरी (1856)
अवध अख़बार (मुंशी नवल किशोर)
तरक़ीब-ए-बगावत
शोला-ए-तूर
दबदबा-ए-सिकंदरी
अख़बार आलमताब, खैरख़्वाह-ए-ख़लक, शम्स-उल-अख़बार आदि
इन सभी का स्वर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अंग्रेज़-विरोधी था। इन पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और स्वतंत्रता के लिए जन-भावना को सशक्त बनाया।
दिल्ली उर्दू अख़बार और मौलाना मोहम्मद बाकर
‘दिल्ली उर्दू अख़बार’ उस समय का सर्वाधिक प्रभावशाली समाचार पत्र था। इसके संपादक मौलाना मोहम्मद बाकर न केवल पत्रकार थे, बल्कि सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। 1857 की असफलता के बाद अंग्रेज़ों ने अख़बार बंद कर दिया और मौलाना मोहम्मद बाकर को गोली मार दी गई।
इमदाद साबरी लिखते हैं कि मौलाना बाकर ने कलम और तलवार—दोनों से अंग्रेज़ों का मुकाबला किया। बहादुर शाह ज़फर ने इस अख़बार का नाम ‘अख़बार-ए-ज़फर’ रखने का प्रस्ताव भी दिया था।
अवध अख़बार की ऐतिहासिक भूमिका
लखनऊ से प्रकाशित अवध अख़बार उस दौर का एक अत्यंत प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्र था। इसमें राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक और आर्थिक विषयों पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे। यह अख़बार कुशासन की आलोचना करता था और देशभक्तों के बलिदान को उजागर करता था।
रतननाथ सरशार, मिर्ज़ा हैरत देहलवी, सैयद अहमद शेहरी जैसे प्रतिष्ठित लेखक इससे जुड़े थे। अवध अख़बार ने राष्ट्रप्रेम की भावना को व्यापक रूप से फैलाया।
विद्रोह के बाद दमन और पत्रकारों का संघर्ष
1857 के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन नीति अपनाई। विशेषकर मुसलमानों को निशाना बनाया गया। ‘शोला-ए-तूर’ जैसे अख़बारों ने इन अत्याचारों का हृदयविदारक विवरण प्रकाशित किया। नवाब जिया उद्दोला की त्रासदी इसका उदाहरण है, जिनकी पूरी संपत्ति जब्त कर ली गई और परिवार को नष्ट कर दिया गया।
बीसवीं सदी और उर्दू पत्रकारिता
बीसवीं सदी के प्रारंभ में राजनीतिक आंदोलन तेज़ हो गए। बंगाल विभाजन, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, होम रूल आंदोलन आदि ने उर्दू पत्रकारिता को नई दिशा दी।
‘वतन’, ‘तर्रक़ी’, ‘ज़माना’, ‘मुख़बीर-ए-आलम’, ‘उर्दू-ए-मौल्ला’, ‘हिंदुस्तानी’, ‘ज़मींदार’ और ‘आज़ाद’ जैसे पत्रों ने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक समर्थन दिया।
हसरत मोहानी की ‘उर्दू-ए-मौल्ला’ ने स्वदेशी आंदोलन का खुला समर्थन किया और कांग्रेस तथा वामपंथी विचारधारा के प्रति सहानुभूति दिखाई।
ज़मींदार और राष्ट्रवादी चेतना
‘ज़मींदार’ पत्रिका मौलाना ज़फर अली खान के संपादन में जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुई। इसने विदेशी शासन का भय दूर किया और निर्भीक राजनीतिक पत्रकारिता की मिसाल कायम की। यह पत्रिका कांग्रेस और संयुक्त राष्ट्रवाद की समर्थक रही।
निष्कर्ष
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उर्दू पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह प्रतिरोध, बलिदान और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उपकरण थी। उर्दू पत्रकारों ने कठोर दमन, फाँसी और संपत्ति की जब्ती के बावजूद अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। उनकी कलम ने भारतीय जनता को संघर्ष के लिए प्रेरित किया और स्वतंत्रता की नींव मजबूत की।
उर्दू पत्रकारिता का यह योगदान भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छुप गया कोई रे…“।)
अभी अभी # ९१३ ⇒ आलेख – छुप गया कोई रे श्री प्रदीप शर्मा
वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान..। ‘ पंत ‘
प्रेम और भक्ति दोनों में जितना महत्व संयोग का है, उससे थोड़ा अधिक ही महत्व विरह और वियोग का है। हैं सबसे मधुर वो गीत, जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं।
सुर तो खैर संगीत और साधना का विषय है, लेकिन दर्द का सुर तो ईश्वर ने हर प्राणी को दिया है। आह को चाहिए, एक उम्र असर होने तक। कब किस वक्त, किस मूड में, कौन सा गीत, अनायास ही आपके कानों में पड़े, और आप उसे गुनगुनाने लगें, उसमें इतने डूब जाएं, कि वक्त ठहर जाए।।
कई बार सुना होगा फिल्म चंपाकली(1957) के इस अमर
गीत को आपने भी। अहसास तो हम सबको होता है, लेकिन जब हमारे दर्द की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह होती है, तो शब्द हृदय के अंदर तक उतर जाते हैं ;
छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के
दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के ..
हमारी यादों की परछाइयों में भी बहुत कुछ ऐसा है, जो इन शब्दों को सुनते ही अनायास ही प्रकट हो जाता है।
आज हैं सूनी सूनी, दिल की ये गलियाँ
बन गईं काँटे मेरी, खुशियों की कलियाँ
प्यार भी खोया मैने, सब कुछ हार के
दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के …
खोना और पाना, कांटों और खुशियों के बीच ही तो हम अपना जीवन गुजारते चले आ रहे हैं। प्यार अगर जीवन का सबसे खूबसूरत उपहार है, तो प्यार में हारने का दुख भी उतना ही पीड़ादायक है।
क्या पीड़ा में भी सुख होता है। इस दर्द भरे गीत में ऐसा क्या है, जो एक सुधी श्रोता को बांधे रखता है।
शायद राजेंद्र कृष्ण की कलम है, अथवा हेमंत कुमार का मधुर संगीत। लेकिन लगता है, लता की आवाज का ही यह कमाल है। जब लता ने यह गीत गाया होगा, तो अवश्य ही डूबकर गाया होगा। अगला अंतरा देखिए ;
अँखियों से नींद गई, मनवा से चैन रे
छुप छुप रोए मेरे, खोए खोए नैन रे
हाय यही तो मेरे, दिन थे सिंगार के
दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के …
जो शब्द और सुर आपको पूरी तरह झंझोड़ दे, तो अवश्य ही वह राग झिंझोटी होगा। मैं नहीं जानता, इस गीत में ऐसा क्या है, जो मैं इसे आप तक पहुंचाने के लिए बाध्य हो गया।
अपना नहीं, इस जहां का नहीं, दो जहां का दर्द शामिल है इस गीत में। जब यह गीत मैं सुनता हूं तो कई ऐसे चेहरे मेरे सामने आ जाते हैं, जो इस दौर से गुजर चुके हैं। और उनमें कुछ चेहरे तो ऐसे हैं, जो यह दुनिया ही छोड़ चुके हैं। उन सबके लिए और आपके लिए भी समर्पित है यह गीत। बस, सुनिए, गुनगुनाइए, डूब जाइए, और मन करे तो दो आंसू भी बहाइए क्योंकि ;
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆
सोने के भाव दिन दोगुने और रात चौगुने बढ़ते आ रहे हैं। इस प्रकार की चर्चा सुनते सुनते कई दशक बीत गए। बचपन से आरंभ सफर से बुढ़ापे की दहलीज तक पहुंचते सोने के लिए ये ही सब सुनते आ रहे हैं।
विगत कुछ समय से लोग कह रहे है, सोने के तो अब पंख लग गए हैं। पंख लगे पक्षियों के लिए ऊंचाई मायने नहीं रखती हैं। असमान से भी ऊपर पहुंचने की दम रखते हैं।
तिजोरियों में बंद सुरक्षित सोना भी क्या सोचता होगा, कि वो तो सौ तालों में बंद रहता है, दुनिया झूठी है, और कहती है, कि सोने के तो अब पंख लग गए हैं।
राजस्थान के छोटे से कस्बे डेगाना जिला नागौर में एक सुनार की दुकान से एक कबूतर ने सोने की एक चेन लेकर उड़ान भर ली थी। फिर क्या था ? पूरे कस्बे के लोग कबूतरों के पीछे पीछे दौड़ने लग गए, क्या पता कौन सा कबूतर उड़ा कर ले गया हो। जब कोई व्यक्ति कीमती वस्तु को उठा कर भागता है, तो भी तो सब उसके पीछे भागने लग जाते हैं।
कस्बे के बुजुर्ग कहने लगे, किसी ने कबूतरों को ट्रेनिंग करवा कर ये काम करवाया होगा। इतिहास में भी ये जानकारी है, कि राजकुमारियों के प्रेम पत्र का आदान प्रदान कबूतर ही करते थे।
हमारे समय में तो गली मोहल्ले के आशिकों को भी कबूतर का दर्जा मिला हुआ था। वो तो पंजाबी के प्रसिद्ध गायक दलेर मेहंदी ने “कबूतरबाजी” में गैर कानूनी कमाई करी तब से कबूतर शब्द से ही लोग गुरेज करने लग गए हैं।
डेगाना कस्बे के भोले भाले कबूतर ने सोने की चेन उसके मालिक को जल्दी लौटा कर, पक्षियों की ईमानदारी प्रमाणित कर दी है।