हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 177 ☆ शाहरुख हैदर की चर्चित कविता ” मैं एक शादी शुदा औरत हूं ” पर सोचते हुए… ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – शाहरुख हैदर की चर्चित कविता ” मैं शादी शुदा औरत हूं ” पर सोचते हुए…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 177 ☆  

? आलेख – शाहरुख हैदर की चर्चित कविता “मैं एक शादी शुदा औरत हूं” पर सोचते हुए… ?

शाहरूख हैदर ईरान की शायरा हैं। उनकी यह नज्म ”मैं एक शादीशुदा औरत हूं”, कई देशों में समाज के आधे हिस्से के प्रति लोगों का नजरिया बताने को काफी है।

आप यह कविता हिन्दी कविता के फेसबुक वाल पर इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं 👉  “मैं एक शादी शुदा औरत हूँ”

महिलाओ को समाज का आधी आबादी कहा जाता है, पर मेरा मानना है की वे आधी से कहीं अधिक हैं, क्योंकि पुरुष का वजूद ही उनके बिना शून्य है, बच्चो का जन्म उनका  लालन पालन, परिवार संस्था का अस्तित्व सब कुछ स्त्री पर ही निर्भर है, इसलिए स्त्री आधी से ज्यादा तवज्जो की हकदार है। किंतु दुनिया के अनेक हिस्सों में हालत वास्तव में कैसे हैं, यह बात रेखांकित करती है यह कविता। सिहरन होती है, रोंगटे खड़े करती है यह बेबाक बयानी। इसे हर लड़की और औरत को ही नहीं हर इंसान को कम से कम एक बार तो जरूर पढ़ना चाहिए, ये जानने के लिए ही सही कि, दुनिया के बाकी हिस्से में औरतों का क्या हाल है!  संसार की हर औरत का हाल कमोबेश एक जैसा ही है।  ये नज्म कम बल्कि एक तहरीर है औरत की, मर्दवादी समाज के खिलाफ। जिसमें सरहदों की हदें मायने नहीं रखती। हर मुल्क की सीमाओं में औरतों की चीखें गूंजती हैं। अंधेरा ही नहीं बल्कि दिन का उजाला भी डराता है। जब शादी शुदा औरत की यह दुर्दशा है जिसका एक अदद शौहर कथित रूप से उसकी रक्षा के लिए मुकरर्र है, तो फिर स्वतंत्र स्त्री की दुर्दशा समझना मुश्किल नहीं है।

हमारा देश तो लोकतंत्र है, यहां तो वुमन लिबर्टी के पैरोकार हैं पर यहां का हाल भी देख लीजिए। हर रोज गैंगरेप की खबरें, दुष्कर्म के बाद हत्या और छेड़खानियां आम हैं। राजनीति में कोई कहता है की स्त्री को बुरके में या घूंघट में कैद कर रखो, कोई बलात्कारियों को उनकी उम्र की गलती बता कर माफ करना चाहता है, तो कोई कहता है की बलात्कार पर फांसी की सजा के चलते स्त्रियों की हत्या होती है। क्या वजह है कि आज स्त्रियों के प्रति व्यवहार सुधारने का आव्हान करना पड़ रहा है ?

क्यों एक लड़की अपने से छोटे भाई का हाथ थामे भीड़ में खुद को सुरक्षित महसूस किया करती है ?

यह सारा परिदृश्य सुधारना होगा, और साहित्य को इसमें अपनी भूमिका निभाना है। शाहरुख हैदर की यह कविता महज किसी एक देश में स्त्रियों  के हालत ही नहीं बताती इसके सॉल्यूशन भी बताने हैं। मलाला युसूफजई की तरह कुछ ग्राउंड पर करना है, जाने कितने नोबल प्राइज बांटे जाने हैं, पर कोई काम तो किए जाएं जिनसे हालात बदल जाएं और शादी शुदा औरत ही नहीं सारी स्त्री जात, इंसान के रूप में स्वीकार की जाएं।

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मार्गदर्शक चिंतन॥ -॥ लोभ ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मार्गदर्शक चिंतन

☆ ॥ लोभ ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆

मायाकृत मनोविकारों ने मनुष्य को फंसा रखा है। उसका दास बना मनुष्य उनकी इच्छानुसार नाचता रहता है। मन कभी यहां, कभी वहां आकर्षित करता रहता है, जिससे मनुष्य एकाग्रचित्त होकर ध्यान नहीं कर पाता, भटकता रहता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर उसे अपने अनुसार जाल में फंसाकर घुमाते रहते हैं। लोभ भी काम के समान ही एक प्रबल मनोविकार है, जिसने हर एक को अपने वश में कर रखा है। लोभ का अर्थ है लाभ पाने की उत्सुकता में चक्कर में घूमते रहना।

मनुष्य जीवन की आवश्यकतायें तो थोड़ी होती हैं परन्तु वे अनन्त भी हैं। आवश्यकतायें सुविधा के प्रलोभन देकर आदमी को चक्कर में घुमाती रहती हैं। कुछ नया प्राप्ति के मोह ने हर एक को लोभ में फंसाया है। अपने सरल और सादे जीवन को मनुष्य ने आडम्बरमय बना रखा है। उसकी जरूरत बेहद बढ़ गई है। मन में जो इच्छायें लोभवश उत्पन्न होती हैं उन सबको जीवन में जुटा पाना किसी के वश की बात नहीं रही। आज के वैभवशाली युग में विलास की अनेकों वस्तुयें हम दूसरों को उपयोग करते देखकर अपना मन उन्हें पाने का बनाते जाते हैं। आज के युग में विज्ञापनों ने भी इस बीमारी को बढ़ाया है। हर नई वस्तु कुछ दिन बाद बदल जाती है। उससे अधिक उपयोगी उपकरण बाजार में आ जाते हैं। उनमें अधिक आकर्षण होता है और ये सभी सुख के साधन समय और आवश्यकता के अनुसार बदलते और बढ़ते जाते हैं। समय के परिवर्तन, नये अविष्कारों तथा बढ़ती जरूरतों ने हमारे लोभ या लालच को खूब बढ़ा दिया है और हमारे मन को अतृप्ति की आग में झोंक दिया है। हर आवश्यकता की पूर्ति के लिये हर व्यक्ति कोल्हू के बैल की भांति घूमता रहता है पर अपने लक्ष्य को न देख पाता न छू पाता है।

आवश्यकता है कि कुछ धन की वृद्धि के साथ कुछ वैभव प्रदर्शन के लिये कुछ समय परिवर्तन के साथ बदलती रहती है। इसी अंधी दौड़ ने मनुष्य के मन में धन प्राप्ति का लोभ बेहद बढ़ा दिया है और आज जीवन की आपाधापी को नित नया स्वरूप देता जा रहा है। धन प्राप्त करने की कामना ने मनुष्य को अनैतिक कृत्य करने को उत्प्रेरित किया है और समाज में उसी के कारण दुराचार, बुराईयां फैलती जाती हैं। प्रत्येक में लोभ की मात्रा कम या अधिक होती है। नीतिशास्त्र और धर्मों ने इसीलिये लोभ को त्यागने का उपदेश दिया है। कहा है लोभ पाप का मूल है। लोभ को संयमित करना आवश्यक है। संतोष से लोभ को संयम में रखा जा सकता है। संतोष से व्यक्ति संग्रह करने की वृत्ति से बच सकता है और सुखी हो सकता है।

वास्तव में जीवन के लिये बहुत सीमित आवश्यकता है। सनातन धर्म में जीवन काल को चार भागों में बांट कर जनहितकारी, परोपकारी, जीवन व्यतीत करने की शिक्षा दी है। ये चार आश्रम के रूप में वर्णित हैं, ब्रम्हचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। प्रत्येक की धर्म और कर्तव्य हैं, जो सभी जानते हैं। मनुष्य तृतीय आश्रम में वानप्रस्थ अर्थात् वन में रहकर लोभ को त्याग कर बहुत थोड़ी आवश्यकताओं भोजन, वस्त्र और जनसेवा मात्र से जीवन यापन कर सकता है और सन्यास में तो और भी सीमित एक कोपीन, दण्ड व कमण्डल से जीवन यापन कर सकता है। भारत में सभी धर्मों में लोभ-लालच को छोडक़र परमार्थ, तप और त्याग को महत्व दे जीने के आदेश दिये हैं। जैन धर्म ने तो वस्त्र तक त्याग कर दिगम्बर रहने की साधना को जीवन दर्शन बताया है। सत्य, अहिंसा, दया, सेवा, साधनापूर्ण जीवन बिताने पर लोभ समाप्त किया जा सकता है। इसीलिये सनातन धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म और इस्लाम तथा क्रिश्चियन धर्मों में दान की महिमा बताई गई है और सात्विक जीवन से ईश्वरोपासना कर सच्चे अर्थ में मनुष्य बन मुक्ति प्राप्ति का उपदेश है। लोभ से मुक्त होना ही वास्तव में मुक्ति है।

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

 ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, म.प्र. भारत पिन ४६२०२३ मो ७०००३७५७९८ apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मार्गदर्शक चिंतन॥ -॥ सेवा का प्रतिफल ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मार्गदर्शक चिंतन

☆ ॥ सेवा का प्रतिफल ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆

जिस मार्ग से पैदल तीर्थयात्री प्रयागराज को जाते थे वहीं पर एक छोटा सा गांव था। गांव में एक किसान का घर था। किसान धार्मिक वृत्ति वाला था। यात्रियों की सुविधा के लिये उसने अपने घर के पास मार्ग में एक कुटिया बनवा दी थी और वहीं एक कुआं खुदवा दिया था। अभिप्राय था कि थके हारे तीर्थयात्री मार्ग में आवश्यकतानुसार थोड़ा विश्राम कर लें। प्रतिदिन किसी एक यात्री को वह अपने घर में नियमित रूप से भोजन भी कराता था। विचार था कि कोई भूखा यात्री प्रसाद पा ले। इसे ही वह बड़ा पुण्य मानता था। यही उसकी सेवा थी। यही उसकी तीर्थयात्रा थी।

किसान का बड़ा लडक़ा इस व्यय से अप्रसन्न था। वह इस सेवा को परिवार पर अनावश्यक बोझ समझता था। चूंकि किसान परिवार गरीब था, आमदनी का जरिया कृषि के सिवा कुछ था नहीं। कभी कभी खेती से अन्न कम उपजता था, इसलिये लडक़ा प्रतिदिन एक अतिथि के अतिरिक्त भोजन को परिवार पर बड़ा बोझ मानता था। उसकी दृष्टि में उनकी ऐसी सामथ्र्य नहीं थी कि ऐसी सेवा करता रहे। इसलिये लडक़ा अपने पिता को ऐसा परोपकार करने से रोकता था। वह पिता से मतभिन्नता के कारण अप्रसन्न था। परन्तु वृद्ध पिता अपनी आन्तरिक भावना के कारण तीर्थयात्रियों की सेवा करने का संकल्प ले चुका था, इसीलिये पुत्र के विरोध के बाद भी यह सेवा का कार्य बराबर करता था।

एक दिन पिता को किसी रिश्तेदार के यहां शादी में दूर ग्राम को जाना पड़ा। उसने जाते समय बेटे से कहा कि वह उसकी नियमित सेवा को जारी रखे तथा किसी एक तीर्थयात्री को प्रतिदिन भोजन कराता रहे। उसका विश्वास था कि परोपकार और यथासंभव सेवा ही जीवन में सुखदायी होती है। सेवा के लाभ को और जीवन में सेवा के महत्व को पुत्र समझे। उसने लडक़े को एक घड़ा दिया और कहा कि प्रतिदिन एक व्यक्ति को भोजन कराके उसका आशीर्वाद ले और उसके आगे तीर्थयात्रा हेतु निकल जाने के बाद उस घड़े में एक कंकड़ डाल दे। प्रतिदिन वह ऐसा करता रहे और कंकड़ डाल देने के बाद घड़े को ढांक दे। खोलकर कभी न देखे।

ऐसा करने से शादी से वापस आने पर वह कंकड़ों की गिनती कर जान सकेगा कि पुत्र ने उसके सूने में कितने यात्रियों को भोजन कराया। पिता की इस बात को मानकर अपनी इच्छा के विपरीत भी पिता की आज्ञा का पूरा पालन किया। एक व्यक्ति को भोजन कराने के व उसके चले जाने के बाद पुत्र घड़े में प्रतिदिन एक कंकड़ डालता रहा। कुछ दिनों बाद पिता वापस आया। उसने पुत्र से पूछा कि क्या वह बतलाये गये नियम का पालन करता रहा? पुत्र के ‘हां’ कहने पर वह खुश हुआ और उसने घर के सब लोगों को इकट्ठा कर उनके सामने घड़े को लाकर उलटने को कहा। कंकड़ों को गिनने का जब क्रम सबके सामने जारी था तब उनमें एक सोनेू की मोहर भी निकली। सब चकित थे कि डाले तो कंकड़ थे- यह मोहर कहां से आई? पिता ने पुत्र और परिवार को समझाया कि वह मोहर किसी भगवतभक्त पुण्य-आत्मा द्वारा दिये गये आशीष का परिणाम है, जो उस भूखे और प्यासे भक्त ने जल-भोजन और आवास की सुविधा से तृप्त होकर उस परिवार को दी होगी।

यह देख और सुनकर पुत्र को परिवार के सभी जनों को विश्वास हुआ कि दान और सेवा का अनजाने में ही शुभ फल प्राप्त होता है। सबकी सहमति से यह सेवाकार्य किसान के यहां आगे भी सतत रूप से चलता रहा। मनोभावना से दान और सेवा का शुभ परिणाम अवश्य मिलता है।

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 176 ☆ पुस्तक का महत्व स्थाई है…  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – पुस्तक का महत्व स्थाई है…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 176 ☆  

? आलेख – पुस्तक का महत्व स्थाई है… ?

पिछले लंबे अरसे  (1992) से, जो किताब पढ़ता हूँ, उस पर लिखता हूँ . म प्र साहित्य अकादमी के पाठक मंच, मंडला तथा जबलपुर का संचालन करता रहा, फिर बनमाली सृजनपीठ के जबलपुर केंद्र की पाठक पीठ चलाई, बहुचर्चित पुस्तकें खरीद कर पढ़ी, या जिन रचनाकारों ने समीक्षा के आग्रह से किताबें भेजी उनके कंटेंट पर भी “पुस्तक चर्चा” लिखता रहा हूँ। पारंपरिक आलोचना के स्थान पर पुस्तक के कंटेंट की चर्चा करने की मेरी शैली की कुछ पाठकों, लेखकों, तथा चंद प्रकाशकों ने भी बहुत प्रशंसा की।

ई-अभिव्यक्ति व साहित्य संगम संस्थान स्वस्फूर्त आगे बढ़कर मेरी इस पुस्तक चर्चा को स्तंभ के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। जब तब जिन अखबारों पत्रिकाओं में भेज पाया उन्हें अनेक ने प्रकाशित भी किया । मेकलदूत अखबार ने तो इसे धारावाहिक स्तंभ ही बना लिया था।

पुस्तक चर्चा  कई लेखकों से आत्मीयता से जुड़ने का माध्यम बना।

एक उल्लेखनीय बात यह कि मैं प्रकाशक को भी उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक पर यह आलेख भेजता हूँ, किन्तु,आश्चर्यकारी है कि मात्र दस से बीस फीसदी प्रकाशक ही रिस्पांस करते हैं, शेष मात्र प्रिंटर की भूमिका में लगे, जिन्होंने शायद किताब छापी, लेखक को उसका ऑर्डर पकड़ाया, जो बेच सके वह बेचा और फुरसत पाई। पर सब कुछ निराशाजनक ही नहीं है कुछ गिने चुने प्रकाशक ऐसे भी हैं जो मुझे नियमित रूप से उनके द्वारा प्रकाशित किताबें समीक्षार्थ भेजने लगे।

पर ऐसे भी प्रकाशक जुड़े जिन्होंने स्वस्फूर्त आग्रह किया और कुछ पुस्तक चर्चाओं का संग्रह ही प्रकाशित कर दिया। मेरी किताब “बातें किताबों की” आई। अस्तु, पुस्तक अपने स्वरूप बदल रही है प्रिंट से ई बुक, आडियो बुक बन रही है, इन दिनों लाइब्रेरियां सूनी पड़ी रहती हैं, पर तय है कि पुस्तक का महत्व स्थाई है। इस उहापोह के दौर में भी पुस्तक का महत्व स्थाई है…

अतः पुस्तकें समीक्षा हेतु आमंत्रित है…

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

apniabhivyakti@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सात समंदर पार – भाग -6 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख – “सात समंदर पार” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख ☆ सात समंदर पार – भाग – 6 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

एक पुरानी कहावत है” भूखे भजन ना होई गोपाला” हम जब यात्रा कर रहे हों तो कुछ अधिक ही भूख लगती हैं। अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा में भोजन का मूल्य भी यात्रा टिकट में शामिल रहता हैं, परंतु जब भोजन परोसा जाता है, तो मुफ्त वाली फीलिंग आना स्वाभाविक ही हैं। यात्रा के पहले पड़ाव में दुबई पहुंच गए।

विमान से बाहर आने के पश्चात जब बस के द्वारा दूसरे प्लेटफार्म के लिए बाहर ले जा रहें थे, तो साथ में चल रही एक वृद्ध महिला जो पंजाब प्रांत से पहली बार विदेश जा रही थी, नाराज़ होकर बोली मैने हवाई जहाज की टिकट खरीदी है, बस में नहीं जाऊंगी। बड़ी मुश्किल से उनको बस में बैठाया। बस से उतरने के पश्चात लिफ्ट से पांच मंजिल पातललोक में जाकर मेट्रो ट्रेन से अगली विमान यात्रा के प्लेटफार्म पर विमान आने का फिर से इंतजार करने लगे। हाथ में बंधे हुए पग मापक यंत्र करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलने की सूचना दे रहा था।

दुबई विमानतल पर कार्यरत अधिकतर कर्मचारी हमारे देश के ही थे। हमें भ्रम होने लगा कि कहीं अपने देश के किसी विमानतल पर ही तो नहीं हैं, ना? घर से रोज़ी रोटी कमाने के लिए हमारे देश के नागरिक लगभग पूरी दुनिया में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। क्या करें, पापी पेट का जो सवाल हैं। इसके साथ ही साथ देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने का प्रमुख स्रोत भी ये प्रवासी ही हैं।

दुबई के विमानतल का नज़ारा हमारे दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस के बाज़ार को भी मात देता हैं। एक देश से दूसरे देश जाने के लिए इस विमानतल का उपयोग विमान बदलने के लिए भी किया जाता हैं। हमारे देश में इटारसी स्टेशन पर भी इसी प्रकार से बहुत सारी ट्रेन क्रॉस होती हैं, ऐसे ही पुराने दिनों की याद आ गई। हमने अपने जीवन की अधिकतर यात्राएं रेल से ही तो करी हैं। गंतव्य स्थान जाने वाला विमान प्लेटफार्म पर आ गया है, अगले भाग में मिलते हैं।

क्रमशः… 

© श्री राकेश कुमार

संपर्क –  B  508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मार्गदर्शक चिंतन॥ -॥ मन का संतुलित पोषण आवश्यक है ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मार्गदर्शक चिंतन

☆ ॥ मन का संतुलित पोषण आवश्यक है ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆

वर्तमान युग को ज्ञान विज्ञान या अंतरिक्ष का युग कहा जाता है। मनुष्य ने विज्ञान में बहुत सी उपलब्धियां की है। जो सुख-सुविधाओं का अंबार लगाती जा रही है। परन्तु यह भी सच है कि यह कलयुग है, जहां कलपुर्जों ने मनुष्य को विकल कर रखा है और कलह क्लेश भी बढ़ाये हैं। अनाचार, पाखण्ड और अधार्मिकता की भी प्रबलता के कारण धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस युग को कलयुग कहा जाता है। सुख-सुविधा के अपार उपकरणों की उपलब्धि और आपसी द्वेष कलह से मानव त्रस्त हो रहा है। धन प्राप्ति के लिये अनावश्यक स्पर्धायें बढ़ गई हैं। अत: जीवन में भारी आपाधापी है। समय की कमी है तथा अनाचार पाखंड और लूट खसोट व ठगी की घटनाओं की बाढ़ से मन का भय और समाज में आतंक बढ़ गये हैं। लोगों का मन अशांत एवं चिंतित रहता है। विकास और अविश्वास दोनों ही दिशाओं में नई-नई कठिनाईयां बढ़ती जा रही हैं।

ऐसा क्यों हो रहा है। जब इस पर चिंतन मनन करते हैं तो ध्यान में आता है कि मनुष्य में एक ओर संग्रह या परिग्रह की भावना बढ़ रही है और इसी से दूसरी ओर अनावश्यक हिंसा भी बढ़ी है। पुरानी कहावत है सादा जीवन उच्च विचार। आज के समाज में यह अमान्य सा हो गया है। आज देखने में तो इसके विपरीत यह आता है कि दिखावे के साथ जियो खूब खाओ पिओ सही सोच विचार अब बेकार हो गये हैं। ऐसे मनोभावों का बढ़ावा दिनोंदिन अधिक हो रहा है। आदमी का मस्तिष्क तो बढ़ा है पर मन असंवेदनशील हो गया है। सब अपने अपने में मस्त और व्यस्त हैं। दूसरों के दुख दर्द के प्रति न तो कोई सोच है और न ही चिंता। पहले व्यक्ति थोड़े में सुखी था खुद खाता-पीता था तो पड़ोसी की भी उतनी ही चिंता करता था, सबका हित करना मानव धर्म माना जाता था। इसीलिये चीटियों को व मछलियों तक को भोजन दिया जाता था। चिडिय़ों को दाना पानी दिया जाना अनिवार्य माना जाता था। आज आदमी अपने दरवाजे बंद रख सुबह से शाम तक सपरिवार धन की चाह में भाग दौड़ में लगा है। उसे किसी और की ओर निहारने की फुर्सत नहीं है। धन की लालसा में उसे असंवेदनशील और क्रूर बना दिया है। धन प्राप्ति के लिये वह हिंसा पर उतारू है। हिंसा में मानसिक शारीरिक और आत्मिक हिंसायें भी शामिल हैं। किसी को अकारण ही जान से मार डालना बहुत आसान लगता है विज्ञान में सुख सुविधायें बढ़ाई हैं पर हिंसा के सहज उपकरण भी तैयार किये हैं जिनके उपयोग से अपराधी वृत्ति के लोग  दूसरों को मारकर शायद अपना मनोरंजन होता पाते हैं। स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थी भी अकारण ही आवेश में अपने साथियों पर प्रहार कर बैठते हैं। उन्हें समाप्त करने में अपना महत्व समझने लगे हैं। समाज में आतंकवादी पैदा हो गये हैं। जो बिना किसी सोच के बाजारों में, चौराहों में, निर्दोष लोगों की जान लेकर अपने अस्तित्व का प्रभुत्व शासन पर जमाने का प्रयास कर रहे हैं। क्या किसी को अकारण मारकर या धन लुटाकर किसी का कभी कुछ भला हो सकता है। किन्तु इस युग में यह साधारण सी समझ भी मनुष्य खो चुका है और इसके दुष्परिणाम सारा समाज बुरी तरह भोग रहा है।

      इन बुराइयों को दूर करने के लिये कानून कायदे भी कमजोर दिखाई देते हैं। मनुष्य का मन ही ऐसा प्रमुख साधन है जिससे वह जैसा सोचता विचारता है वैसा ही बनता है। अर्थात् मनुष्य खुद अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। मन से ही अनुशासन में रह सकता है या उच्छृंखल हो सकता है। मन पर संतुलन बनाये रखने के लिये स्वाभाविक रूप से ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिये जिससे सबका हित हो। पर आज इस ओर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा। यह शिक्षा विभिन्न कारणों से न तो परिवार से बच्चों को मिल पा रही है और न ही शासन के द्वारा विद्यालयों में उपलब्ध हो पाती है। इसीलिये सारी अव्यवस्था, अनुशासनहीनता और क्लेश का वातावरण है। मन यदि संयमित हो तो न परिग्रह की भावना बलवती हो और न ही हिंसा का भाव जागे। अत: सबसे बड़ी जरूरत मन के संतुलित संपोषण की है। तभी संसार में शांति और सुख संभव होगा। मानव जीवन सुखी हो सकेगा एवं देश की प्रगति हो सकेगी।

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मार्गदर्शक चिंतन॥ -॥ अनुशासन ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मार्गदर्शक चिंतन

☆ ॥ अनुशासन ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆

अनुशासन का शब्दिक अर्थ है शासन का अनुगमन अर्थात् शासन के नियमों का पालन। यदि निर्धारित नियमों का पालन सभी के द्वारा किया जाय तो कहीं न तो कोई अव्यवस्था हो और न समाज के सही संचालन में कोई कठिनाई। परन्तु जब नियमों का पालन कुछ के द्वारा नहीं किया जाता तो अनेकों को कठिनाइयां होती हैं और यदि बहुत से लोग नियमों का पालन नहीं करते तो अराजकता शुरु हो जाती है। धर्म या राज्य के नियम समाज के सुख-शांति और प्रगति के लिये ही रचे गये हैं। उन पर सबके द्वारा पालन किया जाना जरूरी है। परन्तु प्राय: व्यक्ति अपने मन के अनुसार काम करना चाहता है, बन्धन नहीं चाहता, इसीलिये संघर्ष और नई-नई विपदायें शुरु होती हैं। अनुशासन मानना ही स्वच्छंदता है। स्वच्छंदता और स्वतंत्रता में भारी अन्तर है। स्वतंत्रता का अर्थ है समाज के समस्तजनों के हित को ध्यान में रख, नियमों का पालन करते हुये अपने व्यक्तित्व के विकास हित समझदारी से कार्य संपादन जबकि स्वच्छन्दता में स्वैराचार की और नियमों के पालन करने की भाववृत्ति प्रधान है। स्वतंत्रता तो एक उच्च आदर्श है, किन्तु स्वच्छंदता अनैतिक अत्याचार है जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिये अहितकारी भर नहीं हानिप्रद भी है। इसी से पतन होता है।

आज हमारे देश में यही देखने में आ रहा है। हर व्यक्ति में अनुशासनप्रियता के स्थान पर क्रमश: उदण्डता की प्रवृत्ति बढ़ती दिखती है। कहीं भी देखिये- घर, परिवेश, स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, राजतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों में जहां नजर जाती है, वहीं नियमों का उल्लंघन कर आंदोलन दिखाई देता है। जिस का आशय स्वार्थ को पूरा करना है, जनहित का नहीं। यह स्थिति देश के लिये बहुत ही दुखद है। समाज और शासन की गाड़ी पटरी पर नहीं चल सकती। इससे जो उन्नति की गई है वह स्थिर नहीं रह सकती और देश में जनतंत्र की भावना को कलंकित किया जा रहा है। संयम और सदाचार वे सद्गुण हैं, जिनसे असंभव को भी संभव किया जा सकता है और अनुशासनहीनता, स्वच्छंदता कलह, क्लेश तथा अवनति के निश्चितकारक हैं, जो पूर्वजों की कीर्ति को भी नष्ट करते हैं। आज की स्थिति सभी के लिये विचारणीय है जो सुधार की अपेक्षा हर एक से अनिवार्य रूप से रखती है। हमारा भविष्य अनुशासन प्रियता पर ही निर्भर है।

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

 ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, म.प्र. भारत पिन ४६२०२३ मो ७०००३७५७९८ apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 152 ☆ सादी पोशाक के सैनिक – 2 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

आज की साधना – माधव साधना (11 दिवसीय यह साधना कल गुरुवार दि. 18 अगस्त से रविवार 28 अगस्त तक)

इस साधना के लिए मंत्र है – 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

(आप जितनी माला जप अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं यह आप पर निर्भर करता है)

आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

☆  संजय उवाच # 152 ☆ सादी पोशाक के सैनिक 🇮🇳 – 2  ?

इस शृंखला में आज हम एक और अनन्य सैनिक की चर्चा करेंगे। स्वाभाविक है कि यह सैनिक भी सेना की वर्दी वाला नहीं होगा। लेकिन सादी पोशाक में आने से पहले यह पुलिस की वर्दी में अवश्य रहे। विशेष बात यह कि वर्दी में रहे या सादी पोशाक में, इनके भीतर का सैनिक सदैव सक्रिय रहा।

चर्चा करेंगे सेवानिवृत्त सहायक पुलिस उपनिरीक्षक राजेंद्र धोंडू भोसले की। भोसले मुंबई के डी एन. नगर थाना में 2008 से 2015 तक नियुक्त थे। वहीं से वे रिटायर भी हुए। डी.एन. नगर थाना में उनके सेवाकाल में 166 लड़कियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ हुई थी‌। कर्त्तव्यपरायणता का चरम देखिए कि उन्होंने अपनी टीम के साथ इसमें से 165 लड़कियों को ढूँढ़ निकाला।

चरम के भी परम की अनन्य गाथा यहाँ से ही आरम्भ होती है‌। 22 जनवरी 2013 को उनके थाना में सात वर्षीय एक बच्ची की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ कराई गई थी। केवल यही एक मामला रह गया था जिसे भरसक प्रयास के बाद भी वे सुलझा नहीं पाए‌। राजेंद्र भोसले 2015 में सेवानिवृत्त हुए। एक बच्ची को न तलाश पाना, उन्हें सालता रहा। उन्होंने बच्ची की एक फोटो अपने पास रख ली। सेवानिवृत्ति के बाद वर्दी के बजाय वे साथी पोशाक धारण करने लगे पर उनके भीतर का पुलिस अधिकारी, अंदर का सैनिक अपने मिशन में जुटा रहा। वे निरंतर बच्ची को तलाशते रहे।

हुआ यूँ था कि बच्ची का अपहरण एक नि:संतान दंपति ने कर लिया था‌। बाद में अपनी संतान हो जाने पर वे बच्ची से न केवल घर के सारे काम कराने लगे, अपितु अन्य घरों में भी बेबी सिटिंग जैसे कामों के लिए भेजने लगे। कुछ समय पहले अपहरणकर्ता दंपति शहर के उसी इलाके में आकर रहने लगे जहाँ से नौ वर्ष पहले बच्ची का अपहरण किया गया था‌‌।

बच्ची के साथ काम करने वाली एक समवयस्क लड़की ने उसकी कहानी जानकर इंटरनेट सर्च किया। उसे अब तक तलाश रहे स्वयंसेवकों के नम्बर तलाशे। अंतत: समाजसेवियों और पुलिस की सहायता से सेवानिवृत्त सहायक पुलिस उपनिरीक्षक राजेंद्र धोंडू भोसले की मुहिम रंग लाई‌। बच्ची से बातचीत कर उसका वीडियो उसकी माँ को दिखाया गया। पुष्टि हो जाने के बाद पुलिस ने कार्यवाही करते हुए अपराधियों को हिरासत में ले लिया‌। नौ वर्ष बाद 4 अगस्त 2022 को बच्ची अपने असली घर लौट आई‌।

राजेंद्र धोंडू भोसले की यह कर्तव्यपरायणता कल्पनातीत है, असाधारण है इस महा मानव को सैल्युट और  चरणवंदन।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी   ☆  ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मार्गदर्शक चिंतन॥ -॥ दृष्टिकोण ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मार्गदर्शक चिंतन

☆ ॥ दृष्टिकोण ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆

दिनभर की निरन्तर यात्रा पूर्ण कर सूर्यदेव का रथ अस्ताचल के शिखर से नीचे उतर गया था। पश्चिम दिशा रक्ताभ थी। पूर्व की ओर से कालिमा की अवनिका क्रमश: उतरती और पसरती जा रही थी।

किसी पुराने किले के खंडहर के विवर से एक उलूक ने बाहर झांका और अपने बच्चों से बोला- बच्चों! अंधेरा हो रहा है। अब चिंता की कोई बात नहीं, तुम्हारी क्षुधा शांति के लिये मैं अभी शिकार करके लाता हूं। कष्टों की समाप्ति निकट है। मेरे स्वेच्छ संचार और काम्य व्यापार के लिये इष्ट तथा सुखद समय आ गया। फलोद्यान के वृक्ष पर बैठे कीर ने कहा- ‘मित्रों चलो अब नीड़ पर लौटकर विश्राम का समय आ गया है। यह बाग अब अंधकार में भयावह दिखाई देने लगा है।’

नगर के घने बाजार के पास की बस्ती की अट्टालिका से रंगीन दीपों की निकलती रश्मियों के साथ घुंघरुओं की झनकार तथा सुरम्य वाद्यों की आकर्षक ध्वनियों को सुनकर किसी पथिक ने कहा- कैसी मधुर और मोहक स्वर लहरी है। कितना सुहाना समा है।

तपस्वी पुत्र ने वनान्चल में निशानिमज्जित वातावरण को निहारते हुये कहा- ‘सारा संसार नैश नीरवता में निस्पन्द है। मानसिक एकाग्रता की साधना, उपासना और ज्ञान संचेतना के लिये संध्यावन्दन का उचित समय हो गया।’

कवि चिन्तन कर रहा था- ‘सूर्य की अनुपस्थिति में अंधकार का साम्राज्य तो थोड़े ही समय का होता है। रात हो गई, अब विहान के आगमन के मार्ग में कोई व्यवधान कहां? नवप्रभात की स्वर्णरश्मियों को झलकना तो सुनिश्चित है। बस कुछ समय की ही देर है।’

तभी कोई दार्शनिक लिख रहा था- ‘जिसे रात्रि कहा जाता है वह दिन से भिन्न नहीं है। दिन का ही तो दूसरा पहलू है। सूर्य तो निरन्तर प्रकाशमान है। पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण जो भाग सूर्य के सामने आता वहां प्रकाश हो जाता और जो भाग सूर्य की विपरीत दिशा में चला जाता वहां अंधेरा हो जाता है। यह तो प्रकृति का सहज नियम है। मनुष्य ने जाने क्यों इस प्रक्रिया को मनोभावों से रंगकर दो अलग नाम दे रखे हैं- ‘दिन और रात’

संसार में सब लोग जो देखते, सुनते और समझते हैं वह सच में उनके मनोभावों और दृष्टिकोणों का ही प्रतिरूप होता है।

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मार्गदर्शक चिंतन॥ -॥ अभिभावकों का दायित्व सन्तान को सदाचारी बनाने का यत्न कीजिये ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मार्गदर्शक चिंतन

☆ ॥ अभिभावकों का दायित्व सन्तान को सदाचारी बनाने का यत्न कीजिये ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆

आज का युग पहले से बहुत बदल गया है। युगान्तरकारी परिवर्तन हो चुके हैं। पहले जहां छ: वर्ष के पहले स्कूल में प्रवेश नहीं दिया जाता था, वहां अब बच्चा को तीन साल का होने के पहले ही किसी नर्सरी, मोंटेसरी या किंडर गार्टन स्कूल में प्रवेश दिला दिया जाता है। माता-पिता बच्चे का स्कूल में मोटी रकम देकर नाम लिखा कर प्रसन्न तथा निश्चिंत हो जाते हैं। स्कूल यूनीफार्म पुस्तकें आदि खरीदकर आने जाने की वाहन व्यवस्था में भारी खर्चा करते हैं और बस अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं। माँ-बाप दोनों ही चूंकी कहीं सर्विस करते हैं अत: दिनभर थककर शाम को जब घर लौटते हैं तो निरंतर व्यस्तता के बीच बच्चे के सही पूर्ण विकास की ओर ध्यान देने, पूछताछ करने और मार्गदर्शन देने का अवसर ही उनके पास नहीं होता। बच्चा अगली कक्षाओं में पढ़ता बढ़ता जाता है। माता-पिता बच्चों के भविष्य के विषय में बड़ी-बड़ी कल्पनाओं सजाकर ट्यूशन आदि की व्यवस्था भी कर देते हैं, परन्तु बच्चे के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक विकास की ओर पूरा ध्यान और समय नहीं दे पाते हैं। पढ़े-लिखे माता-पिता भी व्यक्तिगत रूप से बच्चे के शिक्षण कार्यक्रम में सहयोग नहीं दे पाते। बच्चे स्कूल और नौकरों के भरोसे पलते और बड़े होते हैं। माता-पिता के सर्विस में बाहर होने के कारण स्कूल से आकर बच्चे घर में अकेले या अन्य साथियों के साथ मनमौजी तरीके से या तो सडक़ पर खेलते होते हैं या घर में टीव्ही देखने में मस्त होते हैं। पढ़ाई में होमवर्क करते हैं तो पुस्तक की नकल कर उत्तर लिख जाते हैं। कई बार तो अधिकांश शिक्षक-शिक्षिकायें भी उत्तर लिखने को बालक की मौलिक योग्यता और भाषा को हतोत्साहित करते हैं और पुस्तक की भाषा में रटे हुये उत्तर को अधिक महत्व देते हैं, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के विरुद्ध है। पुस्तकीय ज्ञान और भाषा से अधिक महत्वपूर्ण छात्र के अपने अनुभव पर आधारित अपने शब्दों में लिखे गये उत्तर होते हैं। परन्तु उसकी मौलिकता को स्कूलों में भी आज कम सराहा जाता है। सदाचार की शिक्षा तो दूर की बात है, सदाचार के सही व्यवहार भी उन्हें स्कूल और समाज में देखने और समझने को कम मिलते हैं। अत: बच्चों का सही विकास नहीं हो पाता। शिक्षा से न तो सदाचार का पालन करना आता है न ही उनके संस्कार बनते हैं। एकल परिवार के कारण घर में बड़े-बूढ़े भी नहीं होते। अत: स्वास्थ्य, सदाचार, संस्कार की नींव मजबूत करना वास्तव में माता-पिता की ही जिम्मेदारी रह गई है, जो आज के जाने-अज्ञाने पूरी नहीं कर पा रहे हैं। सदाचारी न होने पर आदतें बुरी पड़ती हैं, दुराचार की प्रवृत्ति बढ़ती है। यही कारण है कि आज अनाचार और अपराध बढ़ते जा रहे हैं। माता-पिता को इससे यह दायित्व और भी अधिक समझने जिम्मेदारी से जरूरत है कि वे बच्चों को बचपन से ही सदाचारी बनाने के यत्न करें। दुराचारी व्यक्ति न केवल परिवार के लिए वरन पूरे समाज और राष्ट्र के लिये घातक और समस्यामूलक होते हैं।

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

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