हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “जिजीविषा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆

✍ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वैज्ञानिकों का मत है कि करीब बीस अरब वर्ष पहले एक बड़े धमाके के साथ सृष्टि का वर्तमान क्रम चालू हुआ।  तारों में सौर मंडल, उसमें पृथ्वी का जन्म, फिर उसका ठंडा होना, जल ऊपर आना और प्रारंभिक जीव वनस्पतियों का उद्गम। अनुमान यह है कि मछली से मानव तक कुल विकास गत 60 करोड़ वर्षों का है। इस विकास क्रम का भी अपना इतिहास है। कहते हैं कि प्रत्येक जीव जंतु का शरीर कोशिकाओं का गोदाम है और सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन तथा खाद्य अणु पहुंचाना और फालतू कचरा बाहर निकालना शरीर द्वारा होता है। व्यवस्था और प्रणाली भिन्न भिन्न हैं परंतु मैलिक कार्य में कोई अंतर नहीं है। धरती पर प्रजनन सर्व प्रथम पानी में ही हुआ और उसके बाद गीली और फिर सूखी भूमि पर। ऑक्सीजन प्राप्त की जाती रही पर बाद में श्वसन प्रणाली भी विकसित हुई। अनुभूति इंद्रियां, हृदय, स्मृति सबका विकास हुआ परंतु इच्छा कैसे पैदा हुई और उसका विकास क्रम का पता नहीं।

बिना इच्छा के तो कुछ होता ही नहीं परंतु जीने की इच्छा का क्या मतलब। जन्म हुआ है तो जीना ही पड़ेगा। फिर जीने की इच्छा हो या न हो, जीना ही होगा। परंतु फिर भी जीने की इच्छा है और वह सदा जीने की, अमर होने की। आध्यात्मिक मत है कि यह सृष्टि ब्रह्म से पैदा हुई, उसकी एक से अनेक होने की इच्छा हुई और वह अनेक हो गया। क्यों हुआ यह कोई नहीं जानता। लाभ हानि के हिसाब से अच्छी बुरी इच्छा का वर्गीकरण भी हुआ। आज संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह मानव इच्छा का ही परिणाम है। इच्छा प्रकट करने के लिए भाषा बनी, लिखना शुरू हुआ। विभिन्न ग्रंथ लिखे गए। सभ्यता बनीं, सिद्धांत बने। रहने के लिए महल बने। चलने के लिए सड़क बनीं और उन चलने के लिए अनेक वाहन। भूमि कम पड़ी तो जल और आसमान में भी वाहन चलने लगे। फिर भी इच्छा पूरी नहीं हुई।एक पैदा होती है और उसके पूरी होने पर दूसरी सामने आकर खड़ी हो जाती है।

आध्यात्मिक गुरु कहते हैं कि इच्छा त्यागो, जबकि यह कहना भी एक अच्छा है।  मृत्यु होने पर संसार से छुटकारा मिल जाता है परंतु फिर भी मुक्ति की इच्छा है। किससे मुक्ति की इच्छा? यह भी तो एक इच्छा है। औरों की सुधारने की इच्छा भी बड़ी प्रबल होती है। अमर होने की इस इच्छा ने कितने जीव जंतुओं मानवों का विनाश किया है, इसका कोई हिसाब नहीं।  उत्पत्ति सृष्टि है अपने आप होती है और विनाश किया जाता है जो इच्छा से होता है।  अब जीने की इच्छा को अदम्य साहस के रूप में भी देखा जाने लगा है। फिर भी इच्छा का उत्स नहीं पता।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४१ ⇒ छोटे-बड़े सपने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छोटे-बड़े सपने।)

?अभी अभी # ८४१ ⇒ आलेख – छोटे-बड़े सपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग स्वप्नदृष्टा होते हैं !। वे देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखते रहते हैं। सपने देखने के लिए चैन की नींद जरूरी है। कोई आपका स्वप्न भंग न कर दे। इसलिए वे सख्त हिदायत देकर सोते हैं। देश के लिए बड़ा सपना देख रहा हूँ। do not disturb.

फिल्मों की तरह ही होते हैं ये सपने ! कभी बहुत बड़े, कभी बहुत छोटे। सपने देखने के पहले, रुपहले पर्दे पर यह लिखा हुआ नहीं आता, फ़िल्म कितने रील की है। अच्छी है या बुरी, इसकी कोई समीक्षा पहले नहीं होती। एकदम लाइव टेलीकास्ट शुरू हो जाता है।।

कोई फ़िल्म सपनों का सौदागर जैसी वाहियात निकल जाती है तो कोई मेरा नाम जोकर जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म। देशभक्त लोग, देशहित में यादगार और यलगार जैसी फिल्में सपनों में देखना पसन्द करते हैं। एक बार तो सपने में चेतक पर सवार, महाराणा प्रताप बन नाला पार कर रहे थे। चेतक का पाँव फिसल गया और उनकी नींद टूट गई, वे पलंग के नीचे गिरे हुए थे।

बड़े सपने देखना इतना आसान भी नहीं होता। एक मच्छर भी आपके सपनों को चूर-चूर कर सकता है। सपनों के लिए मच्छरदानी एक मुफ़ीद जगह है अगर सपना ज़्यादा डरावना न हुआ तो। जो डरते हैं, उन्हें सपने कम देखना चाहिए। जिन्हें कुर्सी छिन जाने का डर है, उन्हें कुर्सी पर बैठकर सपने नहीं दिखाना चाहिए। जनता जागरूक है।।

रात लंबी ज़रूर होती है लेकिन और लंबी हो जाती है, जब चैन की नींद नहीं आती। जो सत्ता में हैं, उन्हें विपक्ष के सपने आते हैं। विपक्ष को तो सपने में भी कुर्सी ही नज़र आती है। चैन की नींद में या तो सपने आते ही नहीं, और अगर आते भी हैं तो अक्सर सुहाने ही होते हैं, बहारों के सपने होते हैं। चुनावी जीत के ढोल में खलल पड़ता है, जब मोबाइल की घंटी अचानक बज उठती है।

समय की माँग है कि बड़े बड़े सपने ना तो देखे जाएँ, और न ही दिखाए जाएँ ! छोटे छोटे सपने ज़्यादा रात भी ख़राब नहीं करते। आखिर सपनों को पूरा करने के लिए जागना भी तो ज़रूरी है। सपना देखना बुरा नहीं, लेकिन झूठे सपने दिखाना अपराध ज़रूर है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८७ ☆ ~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ “रफी की आवाज में धर्मेंद्र के फिल्मी अंदाज” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८७ ☆

?  आलेख ?~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

फेसबुक एक ऐसे विचार से शुरू हुआ था  जिसमें कुछ युवा अपने विश्वविद्यालय परिसर में आपस में जुड़ने का सरल तरीका खोज रहे थे। समय के साथ वही विचार इतना विशाल रूप ले चुका है कि दुनिया के लगभग हर कोने में लोग दिन की शुरुआत और बिस्तर पर दिन का अंत इसी मंच की खिड़की पर झांककर करते हैं। इसकी शुरुआत दो हजार चार में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई थी और धीरे धीरे इंटरनेट से आज फेसबुक सीमित दायरे वाले कॉलेज नेटवर्क से निकलकर वैश्विक मंच बन गया है। इस यात्रा में इसके संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे और आज भी कंपनी का नियंत्रण मुख्य रूप से उनके हाथ में ही है। बाद में कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा प्लेटफार्म्स कर लिया, जबकि फेसबुक उसी नाम से अपनी सेवाएं देता रहा।

फेसबुक की सबसे बड़ी सफलता उसका फैलाव है। यह केवल परिचितों से संपर्क बनाए रखने का साधन नहीं रहा, बल्कि विचार, अनुभव, समाचार, कला, व्यापार, जनमत और मनोरंजन का ऐसा सम्मिलित मंच बन चुका है जिसकी तुलना किसी अन्य माध्यम से करना कठिन है। इसके उपयोगकर्ता दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में हैं और हर दिन अरबों पोस्ट, फोटो, वीडियो और संदेश यहां पर साझा होते हैं। लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं, समूह बनाते हैं, समुदायों से जुड़ते हैं, खरीद फरोख्त करते हैं, विज्ञापन चलाते हैं और अपनी पहचान को मजबूत करते हैं। यही व्यापकता इसे आज के दौर में सबसे प्रभावी डिजिटल मंचों में शामिल करती है।

फेसबुक के आर्थिक ढांचे की रीढ़ विज्ञापन है। इसका लगभग पूरा राजस्व इसी पर आधारित है। फेसबुक उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और रुचियों को समझकर विज्ञापनदाताओं को ऐसा मंच देता है जहां वे लक्षित दर्शकों तक सीधे पहुंच सकते हैं। इस सटीकता ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया  है। धीरे धीरे कंपनी ने कंटेंट निर्माताओं के लिए भी अवसर खोले हैं। पेशेवर मोड, वीडियो मोनेटाइजेशन, पेड सदस्यता जैसे कई साधन उपयोगकर्ताओं को सीधे कमाई का अवसर दे रहे  हैं। इस तरह फेसबुक एक साधारण सोशल नेटवर्क से विकसित होकर एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है।

फेसबुक का उपयोग समझदारी और सावधानी से किया जाए तो यह उपयोगकर्ता को अत्यंत लाभ पहुंचा सकता है। गोपनीयता सेटिंग्स की समय समय पर जांच, निजी जानकारी साझा करने में संयम, उपयोगी समूहों और पृष्ठों से जुड़ाव, संतुलित समय प्रबंधन और स्वस्थ संवाद की आदत इसे सकारात्मक अनुभव बना सकती है। जो लोग रचनात्मक हैं और नियमित रूप से लेख, फोटो या वीडियो साझा करते हैं, उनके लिए यह अपनी पहचान बनाने और  लोगों तक पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी मोबाइल एप है। इसे कंप्यूटर पर भी उसी सरलता से चलाया जा सकता है, किसी तरह के व्यक्तिगत डेटा स्टोरेज की अलग से आवश्यकता नहीं होती। निजी व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए तो अब फेसबुक आधुनिक ऑनलाइन बाजार का अनिवार्य उपकरण बन चुका है।

भविष्य की दिशा में फेसबुक और उसकी मूल कंपनी मेटा नई संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है। आभासी और संवर्धित वास्तविकता के माध्यम से वे एक ऐसे डिजिटल जगत की कल्पना कर रहे हैं जिसमें लोग एक दूसरे से केवल संवाद ही नहीं करेंगे बल्कि एक साझा आभासी संसार में चल फिर सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए प्रयोग भी इस अनुभव को और उन्नत बनाने की ओर अग्रसर हैं। यह सब सफल हुआ तो सोशल कनेक्शन, मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के बिल्कुल नए स्वरूप सामने आ सकते हैं।

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। गलत सूचना, गोपनीयता का जोखिम, अत्यधिक स्क्रीन समय से आँखें खराब होना ,सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल निर्भरता जैसे पहलू चिंता का विषय बने रहते हैं। इस कारण फेसबुक की उपयोगिता तभी अर्थपूर्ण है जब इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। एक ओर यह अवसरों की दुनिया खोलता है, दूसरी ओर यह अपने साथ अपेक्षित सतर्कता भी मांगता है।

समग्र रूप से फेसबुक आधुनिक समाज का ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें पूरी दुनिया एक साथ दिखाई देती है। यह लोगों को जोड़ता है, विचारों को दिशा देता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों के नए मार्ग खोलता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि हर तकनीक उतनी ही उपयोगी है जितनी समझदारी से हम उसका उपयोग करें।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

इन दिनों न्यूयार्क से

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५४ – देश-परदेश – शहर बसा नहीं और चोर पहले आ गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५४ ☆ देश-परदेश – शहर बसा नहीं और चोर पहले आ गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆ 

आज के समाचार पत्र में उपरोक्त ख़बर पढ़ी, तो मन में ऊपर लिखी पुरानी किंवदंती याद आ गई हैं। विगत माह सरकार ने दरियादिली दिखाते हुए स्वास्थ बीमा से जी एस टी शुल्क जो कि 18% है, हटाने का ऐलान कर दिया। सब तरफ खुशी की लहर फैल गई, आमजन ने खुशियों मनाते हुए खूब मिठाइयां भी खाई। उनमें से इस कारण से कुछ का तो पेट भी खराब हो गया था।

बीमा कमानियों को अपने ग्राहकों की ये खुशी देखी नहीं गई। इसलिए प्रदूषण को बैसाखी बना कर उन्होंने पॉलिसी की मूल्य वृद्धि करने का निर्णय भी समय रहते ले डाला हैं। अंग्रेज़ी में इसी को “प्रो एक्टिव” भी कहते हैं।

इस पूरे गणित में उपभोक्ता को कोई हानि नहीं हुई, सरकार को जी एस टी से मिलने वाली राशि शून्य हो गई, बीमा कंपनियों की आय में पंद्रह प्रतिशत वृद्धि हो जाएगी। ग्राहक और कंपनियां दोनो खुश।

सबसे अधिक नुकसान तो ग्रुप पॉलिसी वालों का होगा। जी एस टी शुल्क पूर्व के सामान लागू रहेगा, ऊपर से 15% की बढ़ी हुई प्रीमियम दरों से ही बीमा पॉलिसी मिलेगी।

बड़े व्यापारिक घराने, कॉरपोरेट्स से लेकर छोटे व्यापारी तक मौके पर चौका लगा ही लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४० ⇒ प्रपंच और पसारा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रपंच और पसारा।)

?अभी अभी # ८४० ⇒ आलेख – प्रपंच और पसारा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संसार को माया कहने वाले पंचों की कमी नहीं! मानव शरीर नश्वर है, यह मानने वाले ज्ञानी-ध्यानी जीवन की सीमित आवश्यकताओं पर जोर देते हैं। प्रपंच और पसारा आसक्ति का मूल है, अतः सादा जीवन, उच्च विचार जैसे आदर्श वाक्य यदा-कदा पाठ्य-पुस्तकों में नज़र आ जाया करते थे।

जीवन की एक अवस्था होती है, जिसे आदर्श अवस्था कहते हैं। उस अवस्था में शिक्षा भी आदर्श बाल मंदिर और आदर्श शिशु विहार और आदर्श कन्या महाविद्यालय में ग्रहण की जाती थी। विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, गीता-रामायण, मीरा-कबीर-तुलसी और संत विनोबा आसपास मंडराया करते थे। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे शब्दों का बोलबाला था। सरकारी स्कूल सादगी, संतोष और सदाचार की शिक्षा दिया करते थे। ट्यूशन जैसा शब्द अस्तित्व में नहीं आया था।।

आदर्श जब बड़ा हो जाता है, तो समझदार और व्यवहारिक हो जाता है। कच्ची उम्र के भोलेपन पर समय की सयानी रेखा लकीर बन चेहरे पर हल्की मूँछ के रूप में उभरने लगती है। फ़िल्म जंगली, प्रोफेसर और राजकुमार के गीत लबों पर अनायास उतरने लगते हैं। बाल मन हुस्न, ज़ुल्फ़ और इश्क़ जैसे शब्दों में उलझकर रह जाता है।

बस यहीं से उसकी ज़िन्दगी में चकाचौंध शुरू हो जाती है।

कॉलेज की हवा, सायकल से स्कूटर, कच्ची उम्र का प्रेम और फिर चार पहिये का सफर, प्रशांत होटल से साया जी होटल तक वह बहुत कुछ ज़िन्दगी का स्वाद चख चुका होता है। अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी के बाद वह एक अच्छे आलीशान भवन का स्वामी भी बन जाता है।।

पैसा, प्रसिद्धि और पॉवर ही अब उसके पर्याय हो जाते हैं। बच्चे पढ़-लिखकर विदेशों में सेटल हो चुके होते हैं। ऐसे समय में प्रपंच और पसारा जैसे शब्द जब उसके अवचेतन में प्रवेश कर जाते हैं, तो वह चौंक उठता है।

शायद मुझमें वैराग्य पसर रहा है। प्रपंच मुझे सुहा नहीं रहा है। क्या मेरे वानप्रस्थ के दिन नज़दीक आ गए।

बड़े भारी भरकम हैं ये चार आश्रम, जो कभी सौ बरस की ज़िंदगी को चार आश्रमों में बाँटते थे। किसे मालूम था कि ज़िन्दगी का शॉर्ट कट उसे अनजाने में एक नए ही आश्रम में ला खड़ा करेगा, जिसे आजकल वृद्धाश्रम कहते हैं। यहाँ आकर उसके प्रपंच और पसारे की इतिश्री हो जाती है। उसके ज्ञान-चक्षु खुल जाते हैं, बहुत दुनिया देख ली।।

आलस्य और प्रमाद की तरह ही प्रपंच और पसारा भी हमारे चित्त को बंचक बनाये हुए है। कर्म की विवशता ही हमें सदा प्रवृत्त, प्रबुद्ध और प्रयासरत बनाए हुए है जिसमें लोकेषणा, जिजीविषा, पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा और आसक्ति का भी उतना ही योगदान है। मानसिक संतुलन, विवेक और आंतरिक वैराग्य ही हमारे सांसारिक प्रपंच और पसारे को एक लगाम की तरह कस सकते हैं। अन्तरावलोकन और अनुशासन ही शायद उसकी कुंजी हो।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३९ ⇒ गंजे को नाखून ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गंजे को नाखून।)

?अभी अभी # ८३९ ⇒ आलेख – गंजे को नाखून ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुना है भगवान गंजे को नाखून नहीं देते। मैं निश्चिंत हूं, जब तक मेरे नाखून हैं, मैं गंजा नहीं हो सकता। क्या आपने कभी किसी गंजे के नाखूनों को गौर से देखा है? कैसे देखेंगे, भगवान उसे नाखून देता ही नहीं है। हमने बिना खून वाला (बहुत ही कम हीमोग्लोबिन ) इंसान तो देखा है लेकिन बिना नाखून वाला इंसान आज तक नहीं देखा। आप कैसे कह सकते हैं कि भगवान के यहां देर है अंधेर नहीं?

यह तो सरासर अंधेरगर्दी है।

बालक शब्द ही बाल से बना है। छोटे बाल, बालक, बड़े बाल, बालिका। एक जमाना था जब चोटी की सिने तारिकाओं की लंबी लंबी चोटी हुआ करती थी। अगर उनके बाल नहीं होते तो न तो जुल्फ लहराती और न वे जुल्फ से पानी झटकाती। जितने बड़े बाल, उतनी ही अधिक देखभाल, रखरखाव।।

तब कहां आज की तरह शैंपू और मॉश्चराइजर का बाजार था। बड़े बड़े बाल वाले बच्चों का परिवार होता था। लोमा हेयर ऑइल से बाल कमर से नीचे तक लहराते थे।

सुबह से ही नाखूनों की सहायता से बड़ी दीदी छोटी बहन के सिर से जुंओं की धरपकड़ शुरू कर देती थी। इन्हें मारना भी जरूरी हो जाता था।

समय बदलता चला गया। लोग लीक से हटते चले गए और रुसी पर आकर अटक गए। वैसे जूं और लीक में अंतर बताना विशेषज्ञों का काम है। सुना है शैम्पू से डर से आजकल जूं ने बाल उद्यान छोड़ दिया है और वह कानों में रेंगने लगी है।।

पहले लोगों के बाल बढ़ते थे, आजकल झड़ते हैं। पौष्टिक आहार की कमी, और पानी में भारीपन के अलावा ट्यूबवेल के पानी में कैल्शियम की मात्रा अधिक होने के कारण बालों का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा है। लेकिन ईश्वर बड़ा दयालु है वह पुरुषों को भले ही गंजा कर दे, नारियों पर वह इतना मेहरबान जरूर है कि किसी का मैदान साफ नहीं करता क्योंकि वे बालों के साथ साथ नाखूनों की भी उचित देखभाल करती है। जहां सुंदर नाखून हैं, वहां सुंदर बाल हैं। पुरुष भले ही एक बार जूता पॉलिश करना भूल जाए, नारी नाखूनों में नेल पॉलिश लगाना नहीं भूलती।

मैं कोई सौंदर्य विशेषज्ञ नहीं, लेकिन नारी सौंदर्य में जितना महत्व बालों और नाखूनों का है उतना शायद किसी अन्य तत्व का नहीं। लेकिन आजकल उल्टी गंगा बह रही है। महिलाएं बाल छोटे रख रही हैं और पुरुष बाल बढ़ा रहा है। अगर स्त्री नहीं बन सकते, तो बाल बढ़ाकर बाबा ही बन जाओ। बाबा के प्रवचन में भी अधिकतर महिलाएं ही महिलाएं। एक दो गंजे पुरुष दिख जाएं तो बहुत।।

सुना है नाखून रगड़ने से बाल बढ़ते हैं। गंजा भी पुरुष ही होता है तो नाखून भी वही रगड़ेगा। अब इस भगवान की गंजों से क्या दुश्मनी है, कुछ समझ नहीं आता। पहले भगवान के आगे नाक रगड़ो। अगर मुझे गंजा कर ही दिया है तो नाखून तो सलामत रहने देते। बाबा रामदेव ने देखो, नाखून रगड़ रगड़ कर कैसे बाल लंबे कर लिए। काश हमारे भी नाखून होते तो हम उन्हें घिस घिसकर बाबा रामदेव बन जाते।

कुछ भी कहें बाल हों या नाखून, हमारे ही खून से ये पुष्ट होते हैं, फलते फूलते हैं। इनका रखरखाव ठीक से करें। सुना है ज्यादा चिंता से बाल उड़ते हैं, तो क्या पुरुष ही अधिक चिंता करता है और महिलाएं पूरी तरह निश्चिंत रहती हैं। वैसे पुरुष का भाग्य कौन पढ़ पाया है। लोग तो गंजा देखते ही कहने लग जाते हैं, जरूर भाग्यशाली और पैसे वाला होगा। देखो, उसकी पत्नी कितनी सुंदर है, हां वही, लम्बे, बड़े बालों वाली, और लंबे नाखूनों वाली।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१२ – साक्षात्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१२ ☆ साक्षात्कार… ?

शाम का धुँधलका घिर रहा है। बालकनी में खड़ा सड़क की दूसरी ओर का दृश्य निहार रहा हूँ। यह क्षेत्र पेड़ों से भरा हुआ है। घर लौटते पंछियों की चहचहाट से वातावरण गुंजायमान है।

देखता हूँ कि सुदूर आकाश में दो पंछी काफी ऊँचाई पर पंख फैलाये, धीमी गति से उड़ रहे हैं। उनमें से एक धीरे-धीरे नीचे की ओर आ रहा है। नीचे आने की प्रक्रिया में पेड़ के पीछे की ओर जाकर विलुप्त हो गया। संभवत: कोई घोंसला उसकी प्रतीक्षा में है। दूसरा दूर और दूर जा रहा है, निरंतर आकाश की ओर। थोड़े समय बाद आँखों को केवल आकाश दिख रहा है।

जीवन भी कुछ ऐसा ही है। घोंसला मिलना, जगत मिलना। जगत मिलना, जन्म पाना। आकाश में ओझल होना, प्रयाण पर निकलना। प्रयाण पर निकलना, काल के गाल में समाना।

प्रकृति को निहारो, हर क्षण जन्म है। प्रकृति को निहारो, हर क्षण मरण है। प्रकृति है सो पंचमहाभूत हैं। पंचमहाभूत हैं सो जन्म है।

प्रकृति है सो पंचतत्वों में विलीन होना है, पंचतत्वों में विलीन होना है सो मरण है। प्रकृति है सो पंचेंद्रियों के माध्यम से जीवनरस का पान है। जीवनरस का पान है सो जीवन का वरदान है। जन्म का पथ है प्रकृति, जीवन का रथ है प्रकृति, मृत्यु का सत्य है प्रकृति।

प्रकृति जन्म, परण, मरण है। जन्म, परण, मरण, जीव की गति के अलग-अलग भेष हैं। जन्म, परण, मरण ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश,त्रिदेव हैं। प्रकृति त्रिदेव है। सहजता से त्रिदेव के साक्षात दर्शन कर सकते हो।

साधो! कब करोगे दर्शन?

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३७ ⇒ सर्वहारा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सर्वहारा।)

?अभी अभी # ८३७ ⇒ आलेख – सर्वहारा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर सर्व- शक्तिमान है,उसी से यह धरती-आसमान है और जो सर्वत्र विराजमान है ! सर्वहारा भी उसी की एक सन्तान है,और उसकी बनाई इसी धरती पर विद्यमान है। सर्वहारा शब्द उन लोगों पर लागू नहीं होता, जो ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकल जाना चाहते हैं। इन्हें आगे लाने वाले,इनसे कई कदम आगे निकल जाते हैं। वह तो बेचारा समझ ही नहीं पाता, कौन जीता कौन हारा।

सर्वहारा कोई आम शब्द नहीं ! यह खास लोगों के लिए, कुछ ख़ास लोगों द्वारा रचा गया है। सरल शब्दों में खेतिहर मजदूर और किसान ही इस श्रेणी में आते हैं। जिस तरह देश के कर्णधार देश के विकास के लिए बार बार विदेश जाते रहते हैं, उसी तरह सर्वहारा के संरक्षक उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए कभी मास्को तो कभी चीन की यात्रा किया करते हैं। ।

सर्वहारा के दो दुश्मन हैं,एक तो समाजवाद और दूसरा बुर्जुआ ! जो खा-पीकर बुजुर्ग हुआ,उसे आप बुर्जुआ भी कह कहते हैं। पेंशनर कहीं से कहीं तक सर्वहारा में नहीं आता। भले ही वह इधर से उधर फिरता रहे मारा-मारा,परेशानियों का मारा।

आचार्य से भगवान ,और भगवान से एक कदम अधिक ओशो, कहते कहते थक गए कि,समाजवाद से सावधान। चिल्लाते-चिल्लाते वे अमेरिका चले गए,फिर भी उनकी किसी ने न सुनी और सर्वहारा की चिंता ने लालू को बे-चारा कर दिया और समाजवादी मुलायम के बेटों को सरकारी बंगले की टाइल्स तक उखाड़नी पड़ी। अगर गधे-घोड़े एक हो गए,अमीर गरीब एक हो गए, तो नेताओं के वादों का क्या होगा, सर्वहारा की क्रांति का क्या होगा। ।

सृष्टि के सुचारू रूप से चलने के लिए जितना जरूरी लक्ष्मी-नारायण का वरदान है,उतना ही सर्वहारा का सह-अस्तित्व भी ! दरिद्रों में नारायण का वास है ,इसलिए उनका भी रहना जरूरी है। लक्ष्मी भले ही तिजोरी में बंद हो,नारायण का वास हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब में समान रूप से है।

प्रेमचंद,रेणु की परती परी कथा और निराला की वह तोड़ती पत्थर को अगर आज आप सर्वहारा नहीं तो गरीब,वंचित,उपेक्षित ,पिछड़े अथवा मज़दूर ,किसान ,जो भी नाम दें, हमारे इस सभ्य,सुसंस्कृत,डिजिटल इंडिया का ही अंग है। जिन तक सूर्य की रोशनी बिना भेद-भाव तक पहुँचती रहती है,जिनकी झोपड़ियों में स्वच्छ हवा निर्बाध गति से बहती रहती है, भूख,प्यास और नींद जिन पर सदा मेहरबान रहती है,उन पर हमारे आकाओं की भी दृष्टि हो। उन्हें भी इंसान समझा जाए, उन्हें किसी राजनैतिक विचारधारा का मोहरा न बनाया जाए,विकास रूपी अमृत की कुछ बूँदें उनके हलक तक पहुंच जाए,तो आप चाहें तो इसे जुमला कहें,लेकिन स्वर्ग धरती पर उतर आए। ।

शहर से गाँव चलने के दिन अब लद गए ! अब तो सभी गाँव रोजगार के लिए शहर चले आ रहे हैं। वनवासी-आदिवासी तक जो पहुँचता है,या तो वह कोई प्रोजेक्टधारी एनजीओ होता है या फिर किसी राजनैतिक पार्टी का प्रचारक ! एक शहरी तो यहाँ अर्बन नक्सल से ही डरा हुआ है,वह क्या बस्तर के आदिवासियों के बीच जा पाएगा। जहाँ कभी प्रकृति की छाँव थी,आज वहाँ हिंसा और आतंक का साया है।

सर्वहारा हमारी पहुँच से बहुत बाहर है। जिसकी जगह हमारे दिल में होनी थी,उसकी जगह लाचारी,ग़रीबी, मज़बूरी में है। हमें आगे बढ़ना है,विजयी होना है। फ़िल्म अपना देश का यह गाना गाना है,सुन चंपा,सुन तारा ! कोई जीता कोई हारा। जो हारा, वही सर्वहारा। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०० ☆ अनदेखे फलित सपने… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनदेखे फलित सपने। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०० ☆

☆ अनदेखे फलित सपने… ☆

‘कुछ लोग उन चीज़ों को देखते हैं; जिनका अस्तित्व है और पूछते हैं कि वे ऐसी क्यों हैं? मैं उन चीज़ों के स्वप्न देखता हूं; जो कभी नहीं थीं और कहता हूं–वे क्यों नहीं हो सकतीं?’ जार्ज बर्नार्ड शॉ का यह कथन उनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचायक है कि संसार में जिन वस्तुओं का अस्तित्व है; उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करना सामान्य सी बात है। वास्तव में जिनका अस्तित्व नहीं है,जो कल्पना व स्वप्न हैं; जिनका अस्तित्व कभी नहीं था; उनके बारे में भी अपनी धारणा बनानी चाहिए कि वे क्यों नहीं हो सकतीं? ऐसी कल्पना विलक्षण प्रतिभा का धनी व्यक्ति ही कर सकता है। इस कथन को सार्थक करती हैं दुष्यंत की पंक्तियां– ‘कौन कहता है/ आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ संसार में असंभव कुछ भी नहीं है। जो नहीं है,उसके बारे में चिंतन व शोध करना और उसे सबके के समक्ष प्रकट कर देना ही चमत्कार है। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण व एडिसन का बल्ब की खोज व अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उन वस्तुओं के अस्तित्व व रूपाकार को स्पष्ट करना किसी अजूबे से कम नहीं है। ऐसे कार्य प्रभु-प्रदत्त प्रतिभा,दृढ़ निश्चय व अथक परिश्रम द्वारा संभव हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक योगदान रहता है आत्मविश्वास का; जो हमें निरंतर कर्म करने की प्रेरणा देता है तथा बीच राह से लौटने नहीं देता; न ही थककर निराशा का दामन थामने देता है।

सपने में होते हैं, शजो हम खुली आंखों से देखते हैं,क्योंकि वे हमें सोने नहीं देते और बंद आंखों से देखे गए सपनों का कोई अस्तित्व नहीं होता। अब्दुल कलाम की यह सोच मानव मन को ऊर्जस्वित करती है और वह इंसान तब तक चैन से नहीं बैठता; जब तक उसके सपने साकार नहीं हो जाते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि ‘मनुष्य युद्ध में सहस्त्रों पर विजय प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब वह  स्वयं पर विजय पा लेता है; सबसे बड़ा विजयी होता है,क्योंकि उसे आत्मावलोकन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जीवन में कठिनाईयाँ तो हमसाये की भांति हमारे अंग-संग रहती हैं। यदि हम उन्हें कष्टकारी मानते रहेंगे,तो वे हमें असीम पीड़ा व दु:ख पहुंचाएंगी। यदि हम उन्हें परछाई के रूप में स्वीकार लेंगे तो वे हमारा पथ- प्रशस्त करेंगी और हम आत्मविश्वास के बल पर दाना मांझी की भांति पर्वत काटकर बीस किलोमीटर लंबी सड़क अकेले ही बना पाने का साहस जुटा पाएंगे। वास्तव में चुनौतियां हमें प्रेरणा देती हैं और जब हम उन्हें जीवन का हिस्सा स्वीकार लेते हैं; वे हमारी पथ-प्रदर्शक बन निरंतर कार्य-रत रहने को प्रेरित करती हैं। सो! उनसे मुक्ति पाने का उपाय,उनकी  सहज-स्वीकार्यता ही है।

बाबा आमटे बचपन में मन के अनुकूल न होने पर नाराज़ हो जाते थे,जो उनकी माता को बहुत अखरता था। एक बार वे पतझड़ के मौसम में उन्हें बगीचे में ले गयीं और दिखाया कि वृक्ष अपने पत्तों का त्याग कर रहे हैं और उनके स्थान पर नए पत्ते आकार ग्रहण कर रहे हैं। सो! मानव को भी सुखद जीवन जीने के लिए मन के दुराग्रह व धारणाओं का त्याग करके संबंधों को नवीन ढंग से सींचना चाहिए और अपने अप्रिय अनुभवों को पुराने पत्तों की भांति त्याग देना चाहिए। आमटे पर उक्त सीख का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे तुरंत अपने नाराज़ मित्र से मिलने पहुंच गए। वास्तव में यही जीवन है; सृष्टि का क्रम है। जीवन-मृत्यु का सिलसिला तो निरंतर चलता रहता है। संतोषानंद जी की यह पंक्तियां ‘जीवन का मतलब तो आना और जाना है/ परछाइयाँ रह जाती रह जातीं, रह जाती निशानी है।’ आज तक कोई भी इस रहस्य को नहीं जान पाया है कि इंसान कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है? धन-दौलत, महल-चौबारे व सगे-संबंधी सब यहीं धरे रह जाते हैं; केवल उसके कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है। इसलिए मानव को सत्कर्म व सबसे प्रेम-पूर्वक व्यवहार करने की सीख दी गई है।

मालवीय जी के मतानुसार ‘जो मनुष्य अपनी निंदा सुन लेता है; वह सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह सामर्थ्य केवल उसी व्यक्ति में होता है; जिसमें अहं भाव नहीं होता। टैगोर का ‘एकला चलो रे’ संदेश भी अनुकरणीय है कि ‘जो लोग बने-बनाए रास्ते पर न चलकर अपनी राह का निर्माण ख़ुद करते हैं; वे ही मील के पत्थर स्थापित करते हैं।’ टैगोर की भांति वे अपने सृजन अर्थात् कृत-कर्मों से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। जीवन के अंतकाल में जब टैगोर बीमार पड़ गए थे तो विनोबा भावे उन्हें देखने गए और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने पचपन हज़ार गीतों की रचना कर इतिहास रच दिया है तथा टेनिसन, शैले आदि गीतकारों को भी पीछे छोड़ दिया है। परंतु उन्होंने यह उत्तर दिया कि ‘वे संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि अभी वे उन गीतों का सृजन नहीं कर पाए हैं; जो वे करना चाहते थे। वास्तव में वे गीत, जो गाये नहीं गए; आज भी उनके ज़हन में हैं,अधूरे हैं।’

सृजन एक साधना है और उत्तम साहित्यकार निरंतर साधना-रत रहता है और उसके हृदय में उत्कृष्ट सृजन का भाव सदैव विद्यमान रहता है। प्रत्येक साहित्यकार एक नयी कृति के सृजन को पाठकों तक पहुंचाने के मध्य प्रसव-पीड़ा से गुज़रता है। उस स्थिति में समाज के हर व्यक्ति की पीड़ा उसकी पीड़ा बन जाती है और वह उसे आत्मसात् कर जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर लेता; चैन से नहीं बैठ सकता। उसे उन पात्रों के दर्द को जीना पड़ता है और जब तक वह अनुभूत पीड़ा उसी रूप में पाठकों के हृदय को आंदोलित नहीं करती; उसका सृजन सार्थक नहीं होता। काव्य-शास्त्र में यह विधा साधारणीकरण कहलाती है और नाटक में त्रासदी को देखते हुए जब दर्शकों के नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है और वे उस क़िरदार की मनोदशा में पहुंच जाते हैं,तो वह सृजन सफल माना जाता है; जिसे पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में विरेचन की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। सोहनलाल द्विवेदी जी की ये पंक्तियां ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती/ लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ अर्थात् जो लहरों से डरकर किनारे पर बैठे रहते हैं; उनकी नौका कभी भी पार नहीं उतर सकती। सो! मानव को निरंतर प्रयासरत चाहिए।

किंग ब्रूसली ने एक मकड़ी को अपने जाले से बार-बार गिरते व चढ़ते देख उससे प्रेरणा प्राप्त की और पुन; युद्ध करने पर उन्हें विजय प्राप्त हुई। सो! जीवन में निरंतर संघर्ष-रत रहना चाहिए; कभी पराजय को स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ वैसे भी जो हम सोचते हैं और जैसा हमारा नज़रिया होता है; वही घटित हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि नज़रें बदलने से नज़ारे बदल जाएंगे और नज़रिया बदलने से ज़िंदगी बदल जाएगी; जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा। अंत में स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से मैं यह कहना चाहूंगी कि ‘मौसम भी बदलते हैं/ दिन रात बदलते हैं/ यह समां बदलता है/ जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं/ दिल को सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं,परंतु सृष्टि का क्रम अनवरत चलता रहता है। इसलिए ‘दु:खों से मत घबरा मानव/ यह समां भी गुज़र जाएगा।’ रात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर नयी आशा व नवीन स्वप्न लेकर दस्तक देती है और हमें ऊर्जस्वित करती है। इसलिए आशा का दामन थाम रखिए; जीवन में अप्रत्याशित करिश्में हो जाएंगे; जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ लाफ्टर योगा – हास्ययोग ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

😂 लाफ्टर योगा – हास्ययोग 🤣☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

हर कोई जानता है कि हँसी सबसे अच्छी दवा है, लेकिन हममें से कितने लोग रोज खुलकर हँसते हैं?

हँसी का हमारे स्वास्थ्य, खुशी, और मन की शांति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह एक तरह की अंदरूनी कसरत है। हँसी हमारे शरीर की ज़्यादातर प्रणालियों को सक्रिय कर देती है। यह शरीर की अशुद्ध हवा को बाहर निकालती है और फेफड़ों को ताज़ी ऑक्सीजन से भर देती है।

खुलकर हँसना एक बेहतरीन व्यायाम है। इससे तनाव के हार्मोन कम होते हैं और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। हँसी से रक्त वाहिनियाँ फैलती हैं, रक्त प्रवाह सुधरता है, और हृदय रोग का ख़तरा कम होता है।

आज हमें ज़्यादा हँसने की ज़रूरत है क्योंकि तनाव और अवसाद सबसे बड़ी बीमारी बन चुके हैं। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव को हँसी तत्काल दूर करती है, क्योंकि इससे फील-गुड हार्मोन का उत्पादन होता है। इसलिए यह अवसाद के लिए भी एक प्रभावशाली उपाय है।

लाफ्टर योगा – हास्ययोग – एक अनोखी पद्धति है, जिसमें कोई भी व्यक्ति बिना चुटकुलों, कॉमेडी या हास्य-व्यंग्य के हँस सकता है। बिना किसी कारण, बिना किसी शर्त! सुख में भी और दुख के पलों में भी। हम कुछ सरल एक्सरसाइज़ की मदद से हँसी शुरू करते हैं, जो थोड़ी ही देर में यह बच्चों की तरह मस्ती, नजरों के मिलने, और सामूहिक ऊर्जा से सहज और वास्तविक हँसी में बदल जाती है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि शरीर असली और नकली हँसी में फर्क नहीं करता — दोनों के लाभ एक जैसे होते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सत्र में होने वाली हँसी नकली है; बल्कि यह अक्सर रोज़मर्रा की हँसी से ज़्यादा गहरी और सुकून देने वाली होती है।

लाफ्टर योगा में हँसी के अभ्यासों के साथ सांसों के अभ्यास और योग का मेल होता है। इसकी शुरुआत मुंबई के एक चिकित्सक डॉ. मदन कटारिया ने की थी। 13 मार्च 1995 को पहले सत्र में केवल पाँच लोग सम्मिलित थे, लेकिन आज यह सौ से अधिक देशों में किया जाता है।

हम लाफ्टर योगा क्यों करें?

इसके तीन प्रमुख कारण हैं:

पहला — हँसी का स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए रोज़ कम से कम दस–पंद्रह मिनट लगातार हँसना ज़रूरी है।

दूसरा — हँसी गहरी और पेट से उठने वाली होनी चाहिए।

तीसरा — हँसी को कभी-कभार या विशेष अवसर के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए; इसका अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए, ताकि इसके स्वास्थ्य लाभ मिल सकें।

लाफ्टर योगा के फायदे अनेक एवं अद्भुत हैं। यह एक मज़बूत कार्डियो वर्कआउट है। दस मिनट की गहरी हँसी, तीस मिनट रोइंग मशीन चलाने के बराबर है। हँसी से एंडोर्फिन बनते हैं — वही हार्मोन जो आपको पूरे दिन खुश और ऊर्जावान रखते हैं। शरीर को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है, जिससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। हँसी तनाव को तत्काल दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है।

लाफ्टर सत्र साधारणतः चार चरणों में होता है।

सबसे पहले ताली बजाना, फिर गहरी सांस का अभ्यास, उसके बाद बच्चों जैसी मस्ती। तत्पश्चात, कुछ लाफ्टर एक्सरसाइज़ करते हैं।

सत्र का समापन, लाफ्टर मेडिटेशन से हो तो उत्तम। इसमें हँसी का निर्बाध प्रवाह होता है। यह एक दिव्य अनुभव है — शुद्ध और निर्मल आनंद। मन पूर्णिमा के चाँद की तरह शांत और उज्ज्वल हो जाता है।

सत्र का समापन उत्तम स्वास्थ्य, चारों दिशाओं में आनंद, और विश्व-शांति की प्रार्थना के साथ होता है।

जब हम हास्ययोग की यात्रा शुरू करते हैं, तो हमारा ध्यान अपने स्वास्थ्य और खुशियों पर होता है।

लेकिन धीरे-धीरे भीतरी बदलाव आने लगते हैं — दूसरों के प्रति गर्मजोशी, दया, करुणा, और अपने अंदर आशावाद और सकारात्मकता बढ़ने लगती है। हम ज़्यादा स्नेहमय, मददगार, और मेलजोल वाले बन जाते हैं।

निर्मल हंसी से जनित आत्मिक शक्ति हमारे जीवन को पूर्णतः बदल देती है!

😅😂🤣

 #laughteryoga #हास्ययोग

 

 © जगत सिंह बिष्ट

लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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