हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९८ – प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९८ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

शायद आप कहें-

‘क्या मास्टरों ने तुझे

वकील किया है ?’

जी माई बाप

न तो मैं वकालत पढ़ा हूँ और

न किसी ने मुझे वकील किया है

मैं मास्टर हूँ, मैंने खुद ‘फील‘

किया है

 

लेकिन क्या कहें अपने राज को ?

क्या कुछ भी नहीं सूझता

इस बीसवीं सदी के सभ्य समाज को?

 

यह ठीक है कि हम दोषी ठहरा सकते हैं

ब्रिटिश राज को।

अब तो अपना ही राज है

जनता ही राजा है

तो ये वक्त का तकाजा है

कि समय रहते चेतना चाहिये

अपने शासन को,

कि ‘राष्ट्र का निर्माता‘ तरसता न रहे

दवा वस्त्र या राशन को।

कि अपनी सरकार करेगी कुछ विचार

मगर इसी संदर्भ में

एक कड़ी बात याद आती है-

कि भरोसे की भैंस 

वैसे तो मुझे है भरोसा

अक्सर

पड़ा ही ब्याती है। इसलिये

समाज से भी कुछ कहना।

मेरा फर्ज है।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९५ – “उनकी छत पर कडी धूप…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “उनकी छत पर कडी धूप...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “उनकी छत पर कडी धूप...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

उनकी छत पर खड़ी धूप

जो उड़ती रहती है ।

जो उड उड कर अपने उजले

पंख बदलती है ॥

 

उड़ना तो वह रही चाहती

अमवा के ऊपर ।

उतर नदी की गहराई में

आ जाती भू पर ।

 

उनकी छत पर बड़ी धूप

कुछ गोलाई लेकर –

अपनी छाती पर उभारती

हुई मचलती है ॥

 

तनिक देर में खड़ी पहाड़ी

चढ़ जाया करती ।

और मुस्कराते वन प्रांतर को

भाया करती ।

 

उनकी छत पर कडी धूप

जो तपती रहती है –

पसरी हुई मौन लगती है

माला जपती है ॥

 

पास पहाडी झील लाल

होती होती लगती ।

माथे की ठहरी कुमकुम

जैसे बहती लगती ।

 

उनकी छत पर कड़ी धूप

कुछ ठंडी लगती है –

जो धीमे धीमें प्राणों में

ढलती लगती है ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

02 -08 -2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पता नहीं…  ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पता नहीं… ? ?

दृश्य बदल रहा है या

दृष्टिकोण बदल रहा है

पता नहीं…,

आशंका में संभावना गढ़ने वाला

संभावना में आशंका पढ़ रहा है,

यह अवसाद की वृद्धि है

या अनुभव की समृद्धि है,

पता नहीं…!

?

© संजय भारद्वाज   

22.8.18, प्रातः 9:35 बजे।

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७७ ☆ # “झूमके आया सावन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “झूमके आया सावन…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७७ ☆

☆ # “झूमके आया सावन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

प्यासी प्यासी धरती

मेघों की है दीवानी

 

कारे बादर घूम रहे हैं

धरती को चूम रहे हैं

मदहोशी में झूम रहे हैं

धरती मेघों के मिलन से

बरस रहा है पानी

झूम के आया  सावन

बरसे बरखा रानी

 

फूलों के लगे हैं मेले

झूलों के लगे हैं मेले

तरुणाई आंख  मिचोली खेलें

सावन के गीत गाए

मदमस्त है जवानी

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

 

बूंदों का श्रृंगार है

आंखों में प्यार है

साजन का इंतजार है

प्रियतम की राह तकते

ओढ़ी चुनरी है धानी

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

 

मेघों  की मनमानी है

बारिश भी तूफानी है

नगरी डूब ही जानी है

अहंकार के पतन की

यही है कहानी

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

प्यासी प्यासी धरती

मेघों की है दीवानी /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२१ – भारत की आजादी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘भारत की आजादी …‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२१ ☆

☆ भारत की आजादी … ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

भारत की आजादी को, बड़ी मुश्किल से पाया है,

मत पूछो इसको पाने में, हमने क्या गंवाया है.

*

मातृभूमि पर, रणबांकुरे, हंसते हंसते बलिदान हुए,

देश बचाने, धर्म बचाने, अपना शीश गंवाया है.

*

खून शहीदों का झण्डे में, तिरंगा तब फ़हराया है,

सीमा पर फौजी की साँसों से, ये झंडा लहराया है.

*

मिलजुल कर हम एक रहेंगे, गर्व से दिवस मनाएंगे,

झंडे को सलामी देंगे, शहीदों को, भुला न पाएंगे.

*

आओ मिलकर याद करें हम,  शहीद बलिदानों को,

रक्त से जिनने सींचा है, भारत के इन  मैदानों को.

*

छोटी छोटी बातों में, अब हमको नहीं उलझना है,

एक रहेंगे, नेक रहेंगे, बस आगे ही बढ़ते रहना है.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९० – एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।। ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९० \ ☆

☆ एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।। ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

ज़िंदगी स्वतंत्रता है सत्य मत भुलाइए

.

शीश कटे, लोग लुटे तब मिली स्वतंत्रता

सरफ़रोश नहीं हटे तब मिली स्वतंत्रता

याद करें फख्र से, न फर्ज भूल जाइए  

ज़िंदगी स्वतंत्रता है नित्य गुनगुनाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

गोद सूनी हो गई, न आह होंठ ने करी

चाक-चाक दिल हुआ, न माँग फिर कभी भरी

सीखिए सबक, न अश्रु आँख से बहाइए

काम आएँ देश के, न देश बेच खाइए 

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

राजनीति राज की, न काज की तनिक रही

लोक नीति लोभ नीति, शोक नीति हो रही

अपनी वंश बेल को काक्रोच मत बनाइए

अदालतों में न्याय का मजाक मत उडाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

बेचना-खरीदना न जीत सत्य की कभी

संसदों में बैठ कर न बात करें दोमुही

नीर-क्षीर कभी कहीं, हो रहा दिखाइए

दीन-हीन को गले, अभी यहीं लगाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

जात-धर्म में न बाँट, काट-छाँट मत करें

मंदिरों में भक्ति हो, बजार-हाट मत करें 

तीर्थ में न मद्य की नदी कभी बहाइए

किसान को, मजूर को, हुजूर मत रुलाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१५.८.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४२ – कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सावन का अंधा…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४२ ?

? कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

मुझको हरा ही हरा दिख रहा है

मैं सावन का अंधा हुआ जा रहा हूँ ll

प्रभारों के बोझों से इतना लदा हूँ, हम्मालों का कंधा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का…

=1=

रंगा न लहू से, वो अख़बार कैसा

हिंसा क़त्ल चोरी कपट काला पैसा

कालाबाज़ारी दलालों की मण्डी, मैं उफ़ गोरखधंधा हुआ जा रहा हूँ ll

=2=

डायनिंग सैट सोफा किचन सैट सब हैं, अपसैट माइण्ड चुप्पी साधे लब हैं

फँसते चुनिन्दा ही जालों के फन्दे, मैं बेबस परिन्दा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का…

=3=

चंदा जुटाने में मशगूल बंदा, ज़माना बख़ाने भले इसको गंदा

मुनाफ़े की अब न गुंज़ाइश तनिक़ भी, मैं बिजनिस इक मन्दा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का….

=4=

‘राजेश’ मन-ही-मन, बेशुमार प्यार भी, पर हो न पाया कभी दिल से इज़हार भी

चुपके तकिये में छुपाके पढ़ें कई, मैं यूँ गुलशन नंदा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का…

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १५ – हिन्दुस्तानी शान!! 🇮🇳 ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता हिन्दुस्तानी शान !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १५ ☆

☆ हिन्दुस्तानी शान !!🇮🇳 ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

तीन रंग से बना तिरंगा, हिंदुस्तानी शान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

०

शीर्ष रंग है केसरिया जो, कहे कहानी त्याग की।

धवल रंग धुन छेड़ा करता, देश प्रेम अनुराग की।।

रंग हरा हरियाली देता, रखना प्यारे ध्यान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

०

 

तिलियां मिल चौबीस बनाती, सुंदर चक्र अशोक है।

सीख अनोखी हर तीली दे, ज्ञान भरा यह लोक है।

अमन शांति का घर स्वदेश हो, मन में बस अरमान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

०

ताज हिमालय का पहनें हैं, अपनी माता भारती।

चरण पखारें पावन नदियांँ, शंखनाद से आरती।

भारत मांँ का आंँचल पानें, जन्म लिए भगवान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१६ ☆ मुक्तक – ।। जय कन्हैया लाल की ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१६ ☆

☆ मुक्तक ।। जय कन्हैया लाल की ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।। वर्ण 8 8 8 7।।

☆

=1=

जय कन्हैया   लाल की

हाथी घोड़ा ओ  पालकी

कारागार   में    देवकी

पाला   यशोदा   माई।।

=2=

बाल ग्वाल   रात्रि भोर

खेले  घूमें   करें  शोर

कहते  माखन    चोर

यशोदा   को   बधाई।।

=3=

बन   गए    नंद  लाल

पूतना    करा    संहार

कंस   मरा  घर   द्वार

असुरों     से   लड़ाई।।

=4=

गोपियों  मटकी  फोड़ें

दही  माखन न   छोड़ें

गायों  संग  बस  डोलें

द्रौपदी   ली   बचाई।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०८ – गीत – उजड़ा कुंज… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – उजड़ा कुंज…।

? रचना संसार # १०८ ?

☆ गीत – उजड़ा कुंज…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

कुंज मनोहर ऐसा उजड़ा,

रोती बैठी हीर।

छलक रहा नयनों का निर्झर,

कैसे रखते धीर।।

**

चुभते है भँवरों की गुन-गुन,

बौराई सी प्रीत।

विकल बहुत बागों की बुलबुल ,

रूठे पावस गीत।

*

चाल चलें कितनी मायावी,

विश्वासों को चीर।।

**

मंजरियाँ सब मुरझाईं सी,

काँपे कोमल गात।

रंग बदलती गिरगिट जैसी,

चादर ताने रात ।

*

छले चंद्रमा छलिया बनकर,

नयन-कोर नम नीर।।

**

प्रेम सार सुर ढाई आखर,

चोटिल हर पल साँस।

मन मयूर करता है क्रंदन,

टूटी जीवन आस।

*

बंजारन पागल सी घूमे,

बढ़ती अंतस पीर।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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