हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्रकृति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्रकृति… ? ?

प्रकृति ने चितेरे थे चित्र चहुँ ओर

मनुष्य ने कुछ चित्र मिटाए,

अपने बसेरे बसाए।

 

प्रकृति बनाती रही चित्र निरंतर,

मनुष्य ने गेरू-चूने से

वही चित्र दीवारों पर लगाए।

 

प्रकृति ने येन केन प्रकारेण

जारी रखा चित्र बनाना

मनुष्य ने पशुचर्म, नख, दंत सजाए।

 

निर्वासन भोगती रही

सिमटती रही, मिटती रही,

विसंगतियों में यथासंभव

चित्र बनाती रही प्रकृति।

 

प्रकृति को उकेरनेवाला,

प्रकृति के ख़ात्मे पर तुला,

मनुष्य की कृति में

अब नहीं बची प्रकृति।

 

मनुष्य अब खींचने लगा है

मनुष्य के चित्र..,

मैं आशंकित हूँ,

बेहद आशंकित हूँ..!

?

© संजय भारद्वाज   

(प्रातः 10:21 बजे, 21.7.2019)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३५ ☆ भावना के मुक्तक – सावन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – सावन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – सावन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

घटा घिरी तो दिल ने तो तेरा नाम लिया है।

बरसी जो बूंदें तो अधरों ने पैगाम लिया है।

सावन की फुहार में तुझे महसूस करता हूँ।

तेरी ही याद ने मुझे फिर से ही थम लिया है।

—– 

तू जब पास होती है सावन भी त्यौहार हो जाए।

तेरी हँसी से हर मौसम भी गुलजार हो जाए।

बस एक बार तेरा मैं हाथ ही थाम लूँ जानम।

सावन की हर बूँदे प्यार का इजहार कर जाए।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१६ ☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१६ ☆

☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

कब सें चिल्ला रई महतारी ।

ठठरी बंधे की दें खें गारी ।।

आग लगे जा मोबाइल में ।

सब के हाथ जा नै बीमारी।।

डुकरो कहे उठा ले हम खों ।

खत्म भई अब हमरी पारी ।।

अज़ब समैया आन पड़ो है।

जायदात में मारा मारी ।।

रिसबत खों कोनउ ने छूटो

सबरे खा ऱये, का पटवारी

घर आंगन की नन्ही चिरैया

फ़ांस ऱये जे तन के शिकारी

जे कल मुंहे नाम डुबा ऱये ।

कर कर खें करतूतें कारी ।।

इनखों सूली पै चढ़वा दो ।

तबै जुड़े है छाती हमारी ।।

नेता झूठई शान में डूबो  ।

डाल खें जेब में दुनिया सारी ।।

“संतोष”अब सम्हल खें चलियो

तुम्हें ने आबे दुनिया दारी

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २२ ☆ सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है ‘सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु’।)

☆ मंजिरी साहित्य # २२ ☆

? सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

धरती ओढ़े हरी चुनरिया, प्रकृति करे  श्रृंगार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

*

भीगी धरा निकलती ऊष्मा, बुझा रही है प्यास l

चातक हुआ तृप्त जल पीकर, हलधर बांधे आस ll

झूमे डाली नाच मयूरा, खुश होता संसार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

*

किट -किट करते कीट पतंगा, झरना गाते गीत l

हरी भरी हरियाली सुंदर, सबको लगते मीत ll

कलकल करती नदियाँ लहरें, गान लगे मल्हार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

*

बादल गरजे बिजली छिटके, रिमझिम पडती बूंद l

बूढ़े बच्चे मन हर्षाये, मिलता गात मुकुंद ll

गर्म हवा से व्याकुल मन को, मिलती शीतल धार l

पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll

☆

© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३६ – कविता – मेरे भीतर… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरे भीतर…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३६ ☆

? कविता – मेरे भीतर…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

किसने रखे हैं कदम इस चमन में,

पत्थर भी खिल के फूल हो गए हैं…

कुछ आहट है पहचानी सी,

वीरानियां भी खोकर, मधुमास हो गई है…

 

क्या हुआ जो आसमान से गिरने वाली यह बूंदें,

आजकल क्यों मोतियों की लड़ी होने लगी हैं…

बहुत लंबी, धनी काली रात, का साया…

अंधियारी को चीर कर किरणें नाचने लगी हैं…

 

यह कमजोर लरजते भीगे पंख,

हिम्मत करके ये छोटी चिरैया, पंख फड़फड़ाने लगी है…

यह कदमों की आहट, यह मधुमास का होना…

यह मोतियों की लड़ी, ये नाचती हुई किरणें…

यह छोटी सी चिड़िया की, बड़ी सी हिम्मत…

ये सब तो मेरे भीतर है, आंखें बाहर क्या खोजने लगी हैं??

 

अरसे से राह देख रही थी, उम्मीदों की…

अब तो जिंदगी, बेकार से कर्जों को उतारने लगी है…

शुक्र है तेरा, और रहमत है तेरी…

बुझने वाली चिंगारी, अब ज्वालामुखी होने लगी है…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०७ – गीत – चक्रव्यूह… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – चक्रव्यूह…।

? रचना संसार # १०७ ?

☆ गीत – चक्रव्यूह… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

थोथे सारे वादे निकले,

सच्चाई के लाले।

आँखों बँधी लोभ की पट्टी,

होते नित घोटाले।।

*

उबड़-खाबड़ सड़क कोसती,

व्यस्त सभी चौराहे।

डामरीकरण का नाटक बस,

होता जब जी चाहे।।

*

मन में क्षोभ हज़ारों लेकिन,

ख़ुद ही दुश्मन पाले।

**

टौल-टैक्स भारी ले-लेकर

भरते रोज़ ख़ज़ाने।

सड़क सुधरती कागज़ पर ही,

काम सभी मनमाने।।

*

सच्चाई पर मौन भीष्म बन,

काम करें सब काले।

**

दुर्घटनाएँ होतीं प्रतिदिन,

रोतीं हैं माताएँ।

थोड़े दिन आन्दोलन होते,

चक्रव्यूह रचनाएँ।।

*

अंधी नगरी चौपट राजा,

 बुनता रहता जाले।

**

औरँगज़ेबी आदेशों से,

दिल पर चले कुल्हाड़ी।

गहरी चोट कुशासन देता,

उलट-पुलट हर गाड़ी।।

*

बस नीलामी आदर्शों की

करते टोपी वाले।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नंग-धड़ंग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – नंग-धड़ंग ? ?

तुम झूठ बोलने की

कोशिश करते हो

किसी सच की तरह,

तुम्हारा सच

पकड़ा जाता है

किसी झूठ की तरह..,

मेरी सलाह है,

जैसा महसूसते हो

वैसे ही जिया करो,

काँच की तरह

पारदर्शी रहा करो,

मन का प्राकृत रूप

आकर्षित करता है

प्रकृति के

सौंदर्य की तरह,

किसी नंग-धड़ंग

शिशु की तरह..!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३४ ☆ कविता – सावन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – कविता – सावन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ कविता – सावन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

काले बादल घिर-घिर आए,

नभ ने ली अंगड़ाई,

बरखा बरसी रिमझिम-रिमझिम ,

धरती खूब नहाई।

*

सौंधी-सौंधी खुशबू माटी की ,

मन को खूब रिझाया,

सूना-सूना मन का आँगन,

सावन गीत सुनाया।

*

झूले पड़े डाली-डाली,

हँसती हर अमराई,

कूक-कूक कर कोयल ने ,

प्रेम-पाती पहुँचाई।

*

मोती-सी बूँदें पत्तों पर,

फूलों पर मुस्कान,

छेड़ दिये सावन ने फिर ,

मन का मधुर गान।

*

भीगी पलकों में छिपी है,

अनकही कितनी कहानी,

सावन केवल ऋतु नहीं है,

सावन है मन की रानी।

*

आओ मिलकर गीत सुनाएँ,

इस मौसम की रीत,

बूँद-बूँद में प्रेम घुला है,

मन भावन  संगीत।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१५ ☆ बुंदेली पूर्णिका – जा दुनिया ने सगी कोऊ की… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  बुंदेली पूर्णिका – जा  दुनिया  ने  सगी  कोऊ  की… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१५ ☆

☆ बुंदेली पूर्णिका – जा दुनिया ने सगी कोऊ की… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

 

=========

सबको  बोझा   मूडे   धरत  हो

भैया  काहे खों  सिर  धुनत  हो

*

बखत  पड़े कोऊ काम न  आबे

सुध  ओरन  की  खूब  धरत हो

*

इनकी   उनकी   छोड़ो   भईया

दंद – फंद   में   काय  परत   हो

*

कैसे  रख  हो  प्रसन्न  सभै  खोँ

चिंता  सब  की  काय  करत हो

*

अपनी  सोचो  अपनी  देख  लो

जबरन  सच्चाई   सें   डरत   हो

*

भईया  कब  लौ सुन हो  सबकी

सब  के  लाने   काय   मरत   हो

*

जा  दुनिया  ने  सगी  कोऊ  की

“संतोष”  पीछू  काय  भगत  हो

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २१ ☆ कविता – सावन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता  ‘सावन ‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २१ ☆

? कविता – सावन – ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(मदिरा सवैया)

?

दृश्य मनोरम निर्झर वाहत सुंदर  शैलज सावन है l

मोहित वृक्ष धरा अति शोभित गंध उड़े अति पावन है ll

खेल निमग्न दिखे सब बालक दंगल शोर लुभावन है l

रंग हरा बिखरे वसुधा पर बारिश का अभिनंदन है ll

*

सावन घोर घटा धन देखत बज्र गिरे चमके बिजुरी l

साँझ ढली तब गुंजन मोहक, कोयल मोर कपोल डरी ll

भीग रही अवनी सुख पाकर पापन आज बिसार खरी l

झूम रहे सब वृक्ष यहां पर मोहक रूप निखार भरी ll

*

सावन मास चलो सखियां वन शीतल मंद बयार चले l

कूक रही अब कोयल श्यामल डार हरेक पसार चले ll

घोर घटा घनघोर घिरे तब, बारिश बूंद सँवार चले l

वो वन फूल सुगंध लिये अब, मोहक रूप निखार चले ll

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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