डाॅ. निशिकांत श्रोत्री
इंद्रधनुष्य
☆ ॥ त्रिपुरसुंदरी अष्टकम् ॥ – रचना : जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆
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कदम्बवनचारिणीं मुनिकदम्बकादम्बिनीं
नितम्बजित भूधरां सुरनितम्बिनीसेविताम् ।
नवाम्बुरुहलोचनामभिनवाम्बुदश्यामलां
त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ १॥
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कदम्बवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं
महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणीम् ।
दयाविभवकारिणीं विशदलोचनीं चारिणीं
त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ २॥
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कदम्बवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया
कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया ।
मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया
कयाऽपि घननीलया कवचिता वयं लीलया ॥ ३॥
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कदम्बवनमध्यगां कनकमण्डलोपस्थितां
षडम्बुरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम् ।
विडम्बितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं
त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ ४॥
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कुचाञ्चितविपञ्चिकां कुटिलकुन्तलालंकृतां
कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम् ।
मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं
मतङ्गमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये ॥ ५॥
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स्मरप्रथमपुष्पिणीं रुधिरबिन्दुनीलाम्बरां
गृहीतमधुपात्रिकां मदविघूर्णनेत्राञ्चलां ।
घनस्तनभरोन्नतां गलितचूलिकां श्यामलां
त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ ६॥
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सकुङ्कुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां
समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।
अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्य भूषाम्बरां
जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम् ॥ ७॥
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पुरंदरपुरंध्रिकां चिकुरबन्धसैरंध्रिकां
पितामहपतिव्रतां पटपटीरचर्चारताम् ।
मुकुन्दरमणीमणीलसदलंक्रियाकारिणीं
भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम् ॥ ८॥
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॥ इति श्रीमद् शंकराचार्यविरचितं त्रिपुरसुन्दरीअष्टकं ॥
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भावानुवाद …
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कदम्बविहरी ऋषीमुनि जिच्या पदा सेविता
जगा जिंकिले जिने असुन विश्व नीयंत्रिता
त्रिनेत्रि त्रयदेवि पद्मनयना जगा धारिणी
शिवास अति लाडकी शरण पातलो पद्मिनी ॥१॥
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कदम्ब रहिवासिनी कनकवल्कले धारिणी
महामणि धरी सुरेख मुख ब्रह्म देहांगिणी
करूण धनदायिनी अमल नेत्र तेजस्विनी
शिवास अति लाडकी शरण पातलो पद्मिनी ॥२॥
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निवासिनि वनी कदम्ब धनभार वक्षांवरी
नगासम विशाल वक्ष गुरुची कृपा सागरी
मधूर लहरी जिभेवर अरूण भालावरी
सुरक्षि सकला जणू कवच दाट कायेवरी ॥३॥
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कदम्ब वनि जाशि हेमवलयांकिता होउनी
षडम्बु कमलवासिनी सततसिद्ध सौदामिनी
सुशोभित सरोज तेज तुज चंद्रचूडामणी
शिवास अति लाडकी शरण पातलो पद्मिनी ॥४॥
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उरोज वरती विणा कुरळ कुंतला शोभुनी
विसाव कुश लेटुनी कुटिल बुद्धिची द्वेषिणी
मधाळ नयना अरूण मनजास संहारिणी
नमीत गजसाधु आश्रय मधूर संभाषिणी ॥५॥
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प्रिया सुमन आद्य बिंदु रुधिरा सुनीलांगणी
मधूर मधुपात्र हाति फडके जिची पापणी
विशाल घन उन्नत स्तन बटा वरी लोंबती
त्रिलोचन कलत्र आश्रयि पदा तुझ्या लागती ॥६॥
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गळा सजविती रुधीर कुसुमाम्ल गुंफीयले
करात शरचाप अंकुश धरी नयन तोषले
समस्त जन मोहुनी तिज फुले वसन अर्पिती
विधी जप करोनिया स्मरण पार्वती जागृती ॥७॥
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पुरंदर पुरंध्रिका प्रिति चिकूर आभूषण
पितामह-पतिव्रता फडफडे पटा भूषण
गळावर उमेचिया बहुत मौक्तिके शोभुन
शिरी मणि मुकूट रूपवतिसी भजू पूजन ॥८॥
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॥ इति श्रीमद् शंकराचार्यविरचित निशिकान्त भावानुवादित त्रिपुरसुन्दरीअष्टक संपन्न ॥
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मराठी भावानुवाद © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री
एम.डी., डी.जी.ओ.
मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈














