हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रश्नविहीन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆

✍ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ। भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।

सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं।

एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।

प्रतीक की बोलती बंद। जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०५ – सुकून… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुकून।)

☆ लघुकथा # १०५ – सुकून श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

इस भाग दौड़ की जिंदगी में समझ में नहीं आता क्या करूँ क्या न करूँ?

आज पैदल चल रही हूँ तो यह रास्ता भी मुझे बहुत लंबा लग रहा है कमल जी अपने आप से बातें करते हुऐ आराम से धीरे-धीरे चल रही थी।

दीवार पर लिखे हुए सभी पोस्ट को ध्यान से पढ़ रही थी और आसपास की दुकानों के बोर्ड भी पढ़ रही थी। चलो अच्छा है आज गाड़ी खराब हो जाने से कुछ तो फायदा हुआ पता चल जाएगा कि कहाँ क्या मिलता है?

तभी अचानक  एक पोस्ट दिखाई दिया उसमें लिखा था कि चाय कॉफी के साथ यहाँ बातों का आनंद लें।

यह कैसी दुकान है कमल जी ने सोचा कुछ देर रुकने के बाद उनके मन में विचार आया चलो अंदर चल कर देखती हूँ घर जल्दी जाकर क्या करूंगी अकेली ही तो रहती हूँ बच्चों ने तो मुझे अकेला छोड़कर विदेश चले गए समय काटने के लिए पास के स्कूल में पढ़ाती हूँ।

उन्होंने देखा काफी सारे लोग बैठे हैं एक लाइब्रेरी है उसमें कुछ लोग ऑनलाइन पढ़ रहे हैं कुछ पेपर और किताबें पढ़ रहे है, चाय कॉफी और नाश्ता भी मिल रहा है।

तभी एक मुस्कुराती हुई महिला ने कहा -” मैडम आप क्या लेंगे लिए यहाँ बैठ जाइए।”

कमल जी ने कहा बहन जी कैसी जगह है इसके बारे में आप मुझे कुछ बताइए?

उसे महिला ने कहा मेरा नाम कविता है, हम पति-पत्नी यहां रहते हैं हमारा बहुत बड़ा घर था सड़क के किनारे हम अकेले रहते थे इसलिए हम लोगों ने सारी किताब कॉपी को एक जगह रख दिया और कुछ कंप्यूटर भी खरीद लिए हैं बच्चे पढ़ते हैं और जो हमारी तरह बुजुर्ग हैं वह भी यहां आते हैं हम सभी एक दूसरे के साथ अपना अनुभव बताते हैं और इतनी देर हम सब कैसे बैठ पाएंगे इसलिए यहाॅं पर चाय कॉफी नमकीन बिस्कुट सैंडविच और पकौड़ी मिलती है।

बाबाजी आप लोग तो बहुत अच्छे कार्य कर रहे हो मुझे तो यह पता ही नहीं था।

कविता ने कहा बहन क्या करें हमारी मजबूरी है और वक्त की मांग है आज के जमाने में किसी के पास समय नहीं है और हमारे पास समय ही समय है तो क्यों ना हम सभी को सुकून बाँटे।

कविता ने कहा ठीक कह रही हो बहन मुझे भी एक कप चाय पिला दो। कविता और रागिनी दोनों मुस्कुराने लगती हैं उनकी आंखों में एक चमक आ जाती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९७ – रोग ग्रसित राजा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रोग ग्रसित राजा…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९७ — रोग ग्रसित राजा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

राजा के तीन रोग थे। उसने अपने रोग स्वयं में छिपाये रखा क्योंकि रोग प्रकट होने से उसका मस्तक झुकता। आश्चर्य, उसके देश के कवि ने उसके तीन रोगों से मिलती जुलती कविता लिख दी। राजा क्रोधित हुआ। उसने कवि की हत्या करवा दी। जहाँ लाश फेंकी गई वहाँ सुन्दर फूल खिले। राजा को ये फूल बहुत पसंद आए। पर उसे जब पता चला ये फूल उसके शत्रु के वक्ष पर उगे हुए हैं बिलखने पर चौथे रोग ने उसे ग्रस लिया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

07 – 03 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “अंतिम पड़ाव में…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  लघुकथा – अंतिम पड़ाव में… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

गांव से विधुर पिता जी बेटे के पास रहने शहर आ गये थे। उनके आते ही बहू बेगम के चेहरे की भाव भंगिमा बिगड़ी हुई थी। अनुभवी पिता तुरंत ताड़ गये। बहू बेटे को बुला कर बोले- देखो बेटा, तुम दोनों नौकरी पेशा हो और बहुत बिज़ी रहते हो इसलिये

मैं अपने लिये कुछ व्यवस्थाएं प्लान करके आया हूँ। वो ये कि – मेरे नाश्ते, और दोनों टाईम खाने के लिये टिफ़िन सर्विस और कपड़े धुलवाने लांड्री वाला तय कर देना। एक इंडक्शन कुकर ले आया था और चाय बनाने की सामग्री, तो सुबह जल्दी उठता हूं इसलिये चाय अपनी मैं बना लिया करूँगा। अपनी दवाईयां भी होम डिलीवरी से आनलाईन मंगवा लिया करूँगा। अपने सभी खर्च भी अपनी पेंशन से वहन कर लूंगा। जब भी समय मिले मेरे साथ कुछ देर बैठ लिया करना।

बहू बेगम फिर भी चहक पड़ीं -” तो हमारे यहाँ वृद्धाश्रम जैसे रहने का मतलब क्या हुआ,पिता जी ? पिता जी शांत स्वर में बोले- मैं तो बस इस अंतिम समय में तुम लोगों और पोते पोती का साथ और लाड़ दुलार को जीने यहाँ चला आया हूँ। अन्यथा न लेना। तुम लोगों की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता हूं। सेवक तो गाँव में भी बहुत थे पर तुम सबका साथ कहाँ था वहां। इतना हक मुझे दे देना ,बस और कुछ नहीं चाहिए मुझे। अब न केवल बहू बेगम बल्कि बेटा भी पूर्णतः निरुत्तर थे। 

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ – होलिका दहन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “होलिका दहन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ ☆

🌻लघु कथा🌻 🔥 होलिका दहन🔥

मोहल्ले में होलिका रखी गई थी। साज सजावट, डीजे की धुन, आनंद उल्लास, उमंग को बढ़ा रही थी। मस्ती में झूमते सभी नजर आ रहे थे।

फूल बताशामाला, धूप, कच्चा धागा, हल्दी गाँठ लाईलावा, सुखे श्रीफल, मावा की थाली, सजा सभी महिला पुरुष होली पूजन के लिए जाने लगे।

देखते- देखते पूरा प्रांगण भर उठा सृष्टि अभी दो महिने ही हुए थे पति का स्वर्गवास हो गया था। छोड़ गए थे अपने पीछे यौवन से भरपूर सृष्टि और दो मासूम बच्चे।

बच्चों को लेकर वह भी थाल सजा होलिका पूजन में पहुंच गई। अरे यह क्या?? सभी की निगाहें सृष्टि की तरफ – – बातें बनने लगी इशारे इशारों में सभी तानों की फाग छेड़ने लगे।

गाना बज रहा था। माइक पर पंडित जी बैठे शुभ मुहूर्त का समय और होली की पौराणिक कथा बता रहे थे। सृष्टि ने हाथ जोड़ माईक हाथ में ले लिया। बड़े विनम्र भाव से सभी को प्रणाम कर कहने लगी— आप सभी मेरे आत्मिय और मार्गदर्शक है। मुझे बता दे क्या मैं अपने बच्चों के लिए जी नहीं सकती।

यदि आप में से कोई इनका भरण-पोषण भविष्य बनाने के लिए तैयार हैं, तो मैं यहीं पर आज इसी होलिका में अपने आप को दहन कर लूंगी।

परंपरा और रीत जीवंत तो उठेगी। यदि नहीं तो मुझे भी रंगों के साथ  जीने दीजिए और बच्चों के लिए दोहरी भूमिका निभाने दीजिए।

पंडित जी ने माइक हाथ में ले, दूसरे हाथ से गुलाल उड़ा होली की शुभ बधाई देने लगे। देखते-देखते सृष्टि की श्वेत साड़ी गुलाबी, लाल हो चली।

बच्चे खूब ताली बजा- बजा कर नाच रहे थे। रूढ़िता, द्वेष, ईर्ष्या, होलिका में दहन हो गई। सृष्टि को जीने का रंग मिल गया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९६ – वंदन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वंदन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९६ — वंदन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैंने देखा मेरी टूटी हुई वीणा ने स्वयं अपनी मरम्मत कर ली है। पर मैं तो वीणा के मामले में छलिया हूँ। मेरे पास वीणा हो सकती है, लेकिन मैं उसके तारों को झंकृत नहीं कर सकता। पर मेरी वीणा की बात कुछ और है। विशेष कर आज मेरी वीणा आकंठ जागृत थी। मैं चुप था। मेरी वीणा ने स्वयं गाया, “मॉरिशस पहुँचे उन प्रथम भारतीय मजदूरों को वंदन जिनकी कुदाल से इस देश की धरती पहली बार स्पंदित हुई थी।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

24 – 02 – 26

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – समाधान… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समाधान

? लघु कथा – समाधान ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

पांचवी कक्षा में पढ़ने वाला आशीष शाम को चार बजे घर लौटता तो स्कूल बैग, यूनिफॉर्म और जूते उतारने  के बाद अलमारी में से अपना मोबाइल निकालता और डाइनिंग टेबल पर पहुंच जाता.

दादी गीता उसे गर्म गर्म नाश्ता बना कर देती. वह नाश्ता खाते-खाते लगातार मोबाइल में आ रहे गेम्स खेलने लगता. गीता जी को बहुत बुरा लगता .एक दो बार उन्होंने टोक भी दिया – “बेटा खाते समय मोबाइल को कुछ देर साइड में रख दिया करो…” लेकिन वह उनकी बात को अनसुना करके अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहता.

आज फिर उसके मोबाइल देखने पर गीता ने कह दिया- ” बेटा, थोड़ी देर मोबाइल रख दो ना. मुझसे बात करो मैं भी तो यहीं बैठी हूं…” एकाएक वह गुस्से से भड़क उठा- ” मुझे  दो घंटे बाद ट्यूशन पर जाना है फिर मोबाइल कब देखूंगा..? और आपके साथ  मैं क्या बात करूं..? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो मोबाइल मत देखो..…आप अपना काम करो और मुझे मोबाइल देखने दो….”

और वह फिर से मोबाइल देखने में व्यस्त हो गया. अपने पोते के व्यवहार से गीता जी भीतर तक आहत हो  गईं. उनकी आंखें भीग गईं.

रात को बेटे बहू को उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया तो दोनों एकदम चुप हो गए और एक दूसरे का मुंह देखने लगे.

अगले दिन शाम को ऑफिस से लौटने पर बहू बेटे ने गीता जी के हाथ में एक मोबाइल फोन रख दिया और बोले – ” मां,अब आप भी अपने आप को इसमें व्यस्त कर लो… हमारे पास यही एक समाधान है…”

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४१ – लघुकथा – कारण – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी लघुकथा – कारण।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४१

☆ लघुकथा – कारण ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

” लाइए मैडम ! और क्या करना है ?” सीमा ने ऑनलाइन पढ़ाई का शिक्षा रजिस्टर पूरा करते हुए पूछा तो अनीता ने कहा, ” अब घर चलते हैं । आज का काम हो गया है।”

 इस पर सीमा मुँह बना कर बोली, ” घर !  वहाँ  चल कर क्या करेंगे? यही स्कूल में बैठते हैं दो-तीन घंटे।”

” मगर, कोरोना की वजह से स्कूल बंद  है !” अनीता ने कहा, ”  यहां बैठ कर भी क्या करेंगे ?”

” दुखसुख की बातें करेंगे । और क्या ?”  सीमा बोली, ” बच्चों को कुछ सिखाना होगा तो वह सिखाएंगे । मोबाइल पर कुछ देखेंगे ।”

” मगर मुझे तो घर पर बहुत काम है, ”  अनीता ने कहा, ”  वैसे भी ‘हमारा घर हमारा विद्यालय’ का आज का सारा काम हो चुका है।  मगर सीमा तैयार नहीं हुई, ” नहीं यार। मैं पांच बजे तक ही यही रुकुँगी।”

अनीता को गाड़ी चलाना नहीं आता था। मजबूरी में उसे गांव के स्कूल में रुकना पड़ा। तब उसने कुरेदकुरेद कर सीमा से पूछा, ” तुम्हें घर जाने की इच्छा क्यों नहीं होती?  जब कि तुम बहुत अच्छा काम करती हो ?” अनीता ने कहा।

उस की प्यार भरी बातें सुनकर सीमा की आंख से आंसू निकल गए, ” घर जा कर सास की जलीकटी बातें सुनने से अच्छा है यहां शकुन  के दोचार घंटे बिता लिए जाए,” कह कर सीमा ने प्रसन्नता की लम्बी साँस खिंची और मोबाइल देखने लगी।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

22-08-2020  

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना।)

☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

कमला  अपनी कहानी के रजिस्टर को लेकर पास के साइबर कैफे में गई ।

साइबर कैफे का मालिक उसके बेटे उज्जवल  का परम मित्र था।

उज्जवल तो विदेश में नौकरी करने चला गया। अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़कर।

कमला जी विदेश जाना भी नहीं चाहती थी?

अकेले घर में खाली बैठे हुए बागवानी करती थी और कहानी लिखती थी, अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की।

मन में एक विचार आया कि चलो अमन से बात करते हैं।

कमल जी तैयार होकर तुरंत अमर के कैफे में पहुंची।

कमल जी को देखकर अमन ने कहा- “नमस्ते आंटी आप थोड़ी देर बैठ जाइए मैं कुछ फोटो को एडिट कर रहा हूं। बस थोड़ी देर में ही काम खत्म हो जाएगा, फिर आपकी बात सुनता हूँ।”

 वे किनारे रखी कुर्सी में बैठ गई उनके बगल में एक 15 साल की लड़की नेट पर कुछ मैटर  सर्च करवा रही उन्होंने देखा प्रसिद्ध हिंदी के रचनाकारों की पिक्चर थी, इसलिए उनकी जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने पूछा बिटिया “हिंदी के इन कलम के सिपाहियों के बारे में  क्या जानती हो?”

“नहीं आंटी पर मैं इनके बारे में नहीं जाना चाहती स्कूल में मुझे फेमस राइटर के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को दिया है।”

कमल जी ने कहा -“बेटा यदि तुम जानना चाहो तो मेरे पास किताबें हैं तुम लेकर प्रोजेक्ट बना सकती हो।”

“हम इंटरनेट यूजर हैं, हमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं है।”

आंटी मेरा नाम खुशी है आप मुझे बिटिया न कहें, मैडम ने कहा है, प्रोजेक्ट बनाना है अंकल सभी की फोटो निकालकर बढ़िया सा एक प्रोजेक्ट मुझे बनाकर 1 घंटे में दे देंगे।

 इधर-उधर भटकने की और मेहनत करने की मुझे क्या जरूरत है?

कमल जी की ओर देखकर उस लड़की ने बोला -“जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं सलाह देने के लिए?”

कमल जी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि वे सब उनके पसंदीदा  लेखक थे वे क्या करती इसीलिए चुप हो गई।

लड़की खुशी ने कहा-  अमन अंकल मेरी फोटो तो आपने सब एडिट कर दिए अब एक लेख के साथ अच्छा सा प्रोजेक्ट बना दीजिएगा, वीडियो भी  बना दीजिएगा बिल्कुल ऐसा लगे मैं ही बोल रही हूँ। 2 घंटे बाद में आकर ले जाऊंगी एक पेन ड्राइव में सब कर दीजिएगा, पैसे आपको पूरे मिल जाएंगे।

अमन ने कहा -“चार हजार में बढ़िया बन जाएगा।”

उस लड़की ने कहा – ठीक है और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई।

कमल जी ने कहा – “अमन बेटा आजकल बच्चे पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते तुम्हारे पास आते रहते हैं इसीलिए इतनी भीड़ है।”

अमन बोल – “हां आंटी आजकल सभी बच्चों के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट भी है सारे सवालों के जवाब पूछते हैं।”

कमल जी ने कहा- ” बेटा फिर इन बच्चों का दिमाग कैसे चलेगा जब किताब पढ़ कर प्रोजेक्ट नहीं करेंगे  तो?”

अमन ने कहा – “अरे! आंटी आजकल सारे बच्चे बदल गए हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करते हैं।”

“ठीक कह रहे हो अमन” – कमल जी ने गंभीर स्वर में कहा।

कमला जी की आंखों में आंसू आ गए रोते हुए उन्होंने कहा-

“आजकल किसी के अंदर कोई भावना और इमोशन नहीं है, रिश्ते भी बदल गए हैं।”

“हाथ में एक छोटा सा जादू पकड़ लिया है मोबाइल नामक राक्षस।”

सारा कुछ इसी में देखते हैं, आजकल लोग एकाकी हो गए हैं, इसी के जरिए लोगों को उल्लू बनाकर पैसे भी मांगते हैं, कुछ दिन पहले बेटा डिजिटल क्राइम के विषय में सुना था।

क्या कोई इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इलाज नहीं करता?

अमन ने कहा -“आंटी अभी तो दुनिया इसी पर चल रही है, जाने कितने युवाओं की नौकरी भी जा रही है भविष्य में देखते हैं क्या होगा?”

कमला जी ने कहा – “बेटा अमन तुम तकनीकी के काम करते हो और हम बुजुर्गों की बात तो सुन लेते हो। भगवान इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जादू से हम सबको बचाए मैं ऐसी प्रार्थना करूंगी।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ – ख्वाहिशों की होली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆

🌻लघु कथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻

शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।

कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।

वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।

अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।

जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।

सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।

वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।

गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –

ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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