हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ कोरिया के पहाड़ — जीवन का उत्सव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ कोरिया के पहाड़ — जीवन का उत्सव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

 प्रिय…

कभी-कभी जीवन में कुछ अनुभव ऐसे आते हैं, जो हमारी आत्मा में स्थायी रूप से बस जाते हैं। दक्षिण कोरिया में बिताए मेरे वे दिन आज भी मेरे भीतर किसी शांत संगीत की तरह गूँजते हैं — खासकर वे रविवार, जब पूरा देश मानो पहाड़ों की गोद में समा जाता था।

दक्षिण कोरिया में पहाड़ों पर सैर के लिए जाना एक अत्यंत सामान्य, बल्कि कहें तो जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। यहाँ हर व्यक्ति — चाहे वह बुज़ुर्ग हो या बालक — अपने पीठ पर सैक टाँगे छुट्टी के दिन पहाड़ों की ओर निकल पड़ता है। जब मैं वहाँ अध्यापन करती थी, तो अक्सर अपने विद्यार्थियों को गृहकार्य देती “रविवार के दिन आपने क्या किया, इस पर दस पंक्तियाँ लिखिए।”

अगले दिन जब उनकी कॉपियाँ देखती, तो कम से कम पाँच विद्यार्थी “मैं अपनी माँ के साथ पहाड़ पर गया या गयी थी।” यह बात अवश्य लिखते। मुझे यह बहुत अजीब लगता, आखिर यह “पहाड़ पर जाना” क्या होता है? यही जिज्ञासा एक दिन मुझे भी पहाड़ की ओर ले गई।

कोरिया के इन पर्वतों की चढ़ाई केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव भी है। अधिकतर पहाड़ों की चोटी पर एक छोटा-सा बुद्ध विहार होता है, जहाँ पहुँचकर लोग प्रार्थना करते हैं, ध्यान लगाते हैं और फिर हँसते-खेलते नीचे लौट आते हैं। रास्ते भर प्रकृति का अनुपम सौंदर्य साथ चलता है — शीतल हवा, पथरीली ढलानों के बीच झरनों की नीरव सरगम, और हरियाली की अनगिनत छायाएँ। कोरियाई लोग इन झरनों के स्वच्छ जल को बोतलों में भरकर घर ले जाते हैं, मानो किसी पवित्र आशीर्वाद को साथ ले जा रहे हों। यहाँ के लोग प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। वैसे, कोरियाई भाषा में ‘पहाड़’ को ‘सान’ कहा जाता है — और सच में, वहाँ का हर ‘सान’ मनुष्य और प्रकृति के मधुर संबंध का सजीव प्रतीक है।  कुछ नाम याद हैं, जैसे सोरोक्सान, तैबैक्सान, नामसान, दोबांग्सान।

नवंबर का महीना था — कोरिया में यह माह अपने पूरे रंग में था। पेड़ों पर हल्की-सी नर्मी, हवा में फूलों की गंध, और आसमान में नीली शांति पसरी थी। नए देश में, नई संस्कृति के बीच, मैं हर दिन कुछ न कुछ नया देख रही थी। इस समय कोरिया रंगबिरंगी पत्तों से भर जाता है। मानो पूरी धरती रंगों की प्रदर्शनी में बदल गई हो। इस समय बाकायदा सूचित किया जाता है कि किन पर्वों और उद्यानों में जाने से आप रंग बदलते पत्तों का दृश्य देख सकते हैं। कोरिया के सभी लोग इन दृश्यों का आनंद लेने के लिए पहुँच जाते हैं। इस समय पेड़ों के पत्ते अपने जीवन का अंतिम, सबसे सुंदर रूप धारण करते हैं। हर पत्ता जैसे जाने से पहले एक आख़िरी गीत गाना चाहता हो। क्यों कि इसके बाद पतझड शुरु होता है।

मेपल (Maple) के पत्ते गाढ़े लाल, सुर्ख़, और कहीं-कहीं बैंगनी रंग में रंग जाते हैं। वे हवा में झूमते हुए अंगारों जैसे लगते हैं — हल्की हवा चले तो लगता है कि लाल चिंगारियाँ उड़ी जा रही हों। गिन्को (Ginkgo) के पत्ते पीले से सुनहरे होते हैं। जब वे झरते हैं तो धरती पर पीले रेशम-सा कालीन बिछ जाता है। धूप पड़ने पर ये पत्ते झिलमिलाते हैं और रास्ते सोने की परत से ढके प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है मानो प्रकृति खुद अपनी विदाई के लिए एक उत्सव मना रही हो, और हर पेड़, हर पत्ता, उस अंतिम क्षण तक अपना सम्पूर्ण सौंदर्य बिखेर देना चाहता हो। कोरिया में प्रकृति के इस दृश्य का सभी आनंद उठाते हैं। इसलिए तो प्रो. किम ने मुझे इसी दौरान सान के लिए निमंत्रण दिया था।

एक रविवार को प्रोफेसर किम, मुस्कुराते हुए बोलीं, “आप भी हमारे साथ चलिए — सान पर।” “सान?” मैंने पूछा। वह हँसीं — “सान मतलब पर्वत। कोरियाई लोग उसे ऐसे ही पुकारते हैं।” और इस तरह मेरे जीवन का पहला कोरियाई सान मेरे सामने था। पर जिस दिन मैंने पहाड़ की ओर कदम बढ़ाए, उस दिन मैंने कोरिया की इस संस्कृति को शिद्दत से महसूस किया।

सुबह-सुबह हम निकले। मेट्रो से थोड़ी दूरी तक, फिर पैदल। शहर धीरे-धीरे पीछे छूटता गया और हवा में हरियाली घुलने लगी। रास्ते के दोनों ओर छोटे-छोटे जंगली फूल थे, और लोगों के चेहरों पर सहज उल्लास। कोई परिवार संग आया था, कोई अकेला — पर सभी में एक अद्भुत ऊर्जा थी, मानो हर कोई किसी पवित्र तीर्थ की ओर बढ़ रहा हो।

पहाड़ ऊँचा था। चढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ — यह यात्रा केवल पैरों की तो है ही है, पर मन की भी परीक्षा है। प्रोफेसर किम सहज गति से ऊपर जा रही थीं, और मैं धीरे-धीरे पीछे रह जाती। आधे रास्ते तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूलने लगी। वहाँ एक जगह बैठकर मैंने नीचे झाँका — शहर अब किसी चित्र की तरह दिखाई दे रहा था। दूर-दूर तक फैलती पहाड़ियों की श्रृंखलाएँ, उनके बीच से बहती धूप, और कहीं-कहीं झरनों की रजत रेखाएँ — मानो प्रकृति अपनी शांत लिपि में प्रार्थना लिख रही हो। मैंने वहीं रुकने का निश्चय किया। किम आगे बढ़ गईं, और मैं वहीं बैठी रही — पेड़ों के बीच, हवा के संगीत में, अपने भीतर कुछ सुनती हुई। शायद यही पहाड़ का जादू था  वह हमें भीतर की शांति से मिला देता है। फिर साहस बटोरकर एक एक सीढ़ि चढती आखरी मुकाम पर पहँच ही गयी… वहाँ हर पहाड़ की चोटी पर एक बुद्ध विहार होता है। इन बुद्ध मंदिर को कोरियाई भाषा में ‘सा’ कहा जाता है। जैसे ‘मोगोक्सा’, ‘जोग्योक्सा’, ‘बुलुग्सा’। कोरियाई लोककथाओं और शमन धर्म (Shamanism) में पर्वतों को देवता का निवास माना जाता है। कई पर्वतों पर “सानशिन” नामक पर्वत देवता की पूजा होती है।

पर्वतारोहण यहाँ केवल व्यायाम नहीं, बल्कि ध्यान, संवाद और आत्मानुभूति का माध्यम है।  वहाँ पहुँचकर लोग कुछ क्षण मौन रहते हैं, घंटियाँ बजती हैं, और हवा में शांति की तरंगें फैल जाती हैं। रास्ते में लकड़ी के छोटे विश्रामगृह हैं, जहाँ बैठकर चाय पीते हुए कोई भी पर्वत की गहरी साँसों को महसूस कर सकता है। फिर धीरे-धीरे वे नीचे उतरते हैं — हँसते, बातें करते, जीवन से भरे हुए। मानो उन्होंने ऊपर से कुछ पाया हो — कोई अदृश्य संतुलन, कोई नई ऊर्जा। ऊपर जाने के बाद देखा एक बहुत बड़ी पहाडी चट्टान में बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा खोदी गयी थी… लोग बाग उसके सामने श्रद्धा से, विनित होकर झुक रहे थे। वहाँ सिवा उस प्रतिमा के और कुछ था नहीं…. पर प्रकृति के मध्य वह प्रतिमा अपनी सादगी में भी खूबसुरत लग रही थी। काफी सारे फोटों खींचने के बाद हम धीरे धीरे उतर कर आए… उसका प्रभाव आज तक है।

उसके बाद मैं मोशा के साथ नाम्सान पहाड पर गयी थीं। यह पहाड सियोल के मध्य स्थित है.. और सबके दिल के करीब है। इसे “सियोल का रक्षक पर्वत” माना जाता था। इस पर्वत में टॉवर के पास की रेलिंगों पर हज़ारों रंग-बिरंगे “लव लॉक्स” लटके हैं — प्रेमी युगल यहाँ अपने नाम के ताले लगाकर प्रेम की अनंतता की कामना करते हैं।

मुझे लगा — यही तो जीवन का सार है। पहाड़ हमें सिखाते हैं कि ऊँचाई पर पहुँचने से अधिक महत्त्वपूर्ण है चढ़ाई का अनुभव — हर साँस, हर पसीने की बूँद में विकास की कहानी छिपी होती है। 

कोरियाई समाज में पहाड़ केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि आत्मिक जीवन का अंग हैं। वे हर पर्वत को एक जीवित अस्तित्व की तरह देखते हैं — जिसके पास देने के लिए कुछ है। यह भावना मुझे गहराई से छू गई। हम भारतीय भी तो अपने पर्वतों को देवता के रूप में पूजते हैं — हिमालय, गिरनार, अरावली — हर एक में एक कथा, एक आत्मा है। शायद इसी से मैं उन कोरियाई लोगों से एक अदृश्य सांस्कृतिक डोर से जुड़ गई थी।

उस दिन जब मैं नीचे लौटी, मेरे कदम थके थे, पर मन हल्का था। मैंने महसूस किया कि कोरिया के पहाड़ केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी नया आकार देते हैं। वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, न कोई दिखावा — बस शांति, सहजता और प्रकृति से संवाद। मैंने अपने छात्रों की बात तब समझी — वो “पहाड़ पर जाना” दरअसल एक साधना थी, एक सैर नहीं। एक ऐसा अवसर जिसमें मनुष्य खुद से मिलने निकल पड़ता है। 

कोरिया में जीवन अनुशासित है, पर उसमें प्रकृति की सादगी भी बसी है। लोग अपने हर रविवार को पहाड़ों की गोद में बिताते हैं, जैसे कोई वादा निभा रहे हों — धरती से, हवा से, और अपने भीतर से। उनके लिए यह सैर नहीं, एक प्रार्थना है।

जब मैं भारत लौटी, तो अक्सर रविवार की सुबह कोरिया के उन पहाड़ों की याद आती — सीढ़ियों वाले रास्ते, झरनों का जल, और उस हवा का स्पर्श जो मन के भीतर तक उतर जाती थी। मुझे अब समझ में आता है — हर संस्कृति का अपना पर्वत होता है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य अपने छोटेपन को महसूस करता है और उसी में उसकी महानता जन्म लेती है।

आज इतने वर्षों बाद भी, जब कभी जीवन की चढ़ाई कठिन लगती है, मैं मन ही मन उस कोरियाई पहाड़ को याद कर लेती हूँ। उसके सीढ़ीदार पथ, उसकी शीतल हवा, और वह मौन क्षण — जब मैंने स्वयं से कहा था —“आधी चढ़ाई भी पूरी यात्रा है, यदि दिल ने उसे जी लिया हो।”

तुम्हारी….

*********                          

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Memoir ☆ दस्तावेज़ # 48 – Musings on My Birthday under the Harvest Moon  ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆ 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

The ‘दस्तावेज’ series is an effort to preserve old, invaluable, and historical memories.

While the present is being recorded on the internet in various forms, stories from earlier times — about our parents, grandparents, and great-grandparents, and events from their lifetimes — are gradually fading and being forgotten.

It is our responsibility to document these memories in time. Our generation still has the opportunity to do this. Otherwise, no one will know anything, and everything will be lost to oblivion.

We seek your support in including such historical narratives in this दस्तावेज.

In the next part of this series, we present a memoir by Shri Jagat Singh Bisht Ji “Musings on My Birthday under the Harvest Moon.

☆ दस्तावेज़ # 48 – ✍ Musings on My Birthday under the Harvest Moon💐☆ Shri Jagat Singh Bisht 

Today, ladies and gentlemen, is no ordinary full moon. Oh no—this one is called the Harvest Moon. But lest you think it’s the only lunar celebrity in the firmament, allow me to remind you of her numerous cousins: the Blue Moon, the Blood Moon, the Super Moon, the Wolf Moon, the Snow Moon, the Worm Moon (a personal favourite, as it sounds like something out of a horror novel), the Pink Moon, the Flower Moon, the Strawberry Moon, the Buck Moon, the Sturgeon Moon, the Corn Moon, the Hunter’s Moon, the Beaver Moon, and the Cold Moon. Frankly, the Moon has more aliases than a con artist evading Scotland Yard.

In India, we know this particular one as Sharad Purnima, a luminous occasion drenched in auspiciousness. It was on such a night, the story goes, that I decided to make my dramatic descent upon this planet. If the world seemed a little brighter that night, it wasn’t the moon—it was me.

Now, tradition demands that my wife makes kheer, the Indian porridge that is both humble and heavenly. She lovingly sets it under the full moon, where it is believed to be sprinkled with celestial nectar. By morning, we eat it, half-convinced we are dining on divine ambrosia. On Buddha Purnima she repeats the ritual, as a devout lady once offered kheer to the Buddha under a tree. My wife, however, considers me a “pseudo-Buddha”—a flattering title, though one which obliges me to sit cross-legged with an air of serene detachment when, in truth, I am only calculating how many helpings of kheer I can safely consume without alarming my doctor.

But let me clarify: this is only one of my birthdays. Great men, as you know, are not constrained by such trifles as a single date of birth. We emerge in instalments.

My English calendar birthday falls on the 11th of October. It is the very day when Amitabh Bachchan—the Shahenshah of Bollywood—was born. We share the date, though, alas, I do not share his height, his bank balance, or his acquaintance with Rekha.

My third and most bureaucratic birthday is the 11th of August, courtesy of my dear uncle. When he escorted me for school admission, he got the year right but the month wrong—proof, if ever one needed, that in India even your birthday can be subject to clerical error. Thus, I am blessed with three opportunities to celebrate life, though none have yet resulted in a Swiss bank account.

Birthdays, as you know, acquire different flavours with the years. My daughter-in-law insists I should celebrate in some exotic land—preferably one where they serve cocktails with umbrellas in them. My son, with his customary wit, once remarked: “Arrey yaar, papa, what was the need for your birthday at all? I would have been better off if I was born in the Adani or Ambani family!” A sentiment, I confess, I share when the bills arrive.

Last year, we celebrated in Auckland, at a restaurant charmingly called 1947, right next to the Sky Tower. The restaurant is named after India’s independence, though I noticed the paneer still remained under British rule—charcoal-grilled and helpless. We ate jalebas (a flamboyant cousin of the jalebi), while my young friend Appu and I discussed whether life had improved since 1947. The jury is still out.

But my fondest memory takes me back to my tenth birthday, when I celebrated with just two friends, Mukundan and Jude. The menu was modest—samosas and laddoos—but the joy was unqualified. Mukundan gave me chocolates, Jude presented a shirt piece, and then sang “Happy Birthday to You” with such gusto that the tabla-like pounding on the desk nearly caused structural damage. We were kings for a day, with oil-stained fingers and laughter echoing down the school corridors.

In my childhood, my father always took me to the temple on my birthday. My mother prepared a royal spread—puri, aloo ki sabji, kheerey ka raita, and suji ka halwa. With a tilak on my forehead, I felt not just blessed but positively presidential.

Now, as I sit reflecting in the twilight of my life, with the Harvest Moon glowing outside and a bowl of celestial kheer waiting patiently in the fridge, I cannot predict how my family and friends will remember me when the final curtain falls. Perhaps as a man who could have been great but remained happily ordinary. Perhaps as a pseudo-Buddha with a sweet tooth. Or perhaps just as that fellow who had the rare privilege of three birthdays and the good fortune of always having kheer on at least one of them.

And between you and me, that is greatness enough.

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५८ – “शिक्षा जगत के एक प्रेरक व्यक्तित्व –  स्व. रामचन्द्र जी तिवारी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “शिक्षा जगत के एक प्रेरक व्यक्तित्व –  स्व. रामचन्द्र जी तिवारीके संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)

स्व. रामचन्द्र जी तिवारी

☆ कहाँ गए वे लोग # ५७  ☆

☆ “शिक्षा जगत के एक प्रेरक व्यक्तित्व –  स्व. रामचन्द्र जी तिवारी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक

आगे बढ़ते चलो, सफलता पीछे आयेगी,

कर्म करो वह आकर तुम्हें स्वयं रिझायेगी।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि श्री श्रीकृष्ण सरल की उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करने वाले संस्कारधानी के  प्रतिष्ठित शिक्षाविद श्रद्धेय स्व. श्री रामचन्द्र जी तिवारी के प्रेरक व्यक्तित्व के विषय में आज जब मैं अपने शब्दों के माध्यम से श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा हूं तो मेरे मानस पटल पर तिवारी जी की शिक्षकीय कार्यकाल की वे सारी स्मृतियां जीवंत हो उठी हैं जो मेरे स्मृति कोष में एक अमूल्य धरोहर बन गई हैं। और बात शिक्षकीय जीवन की हो या फिर हमारे पारिवारिक जीवन की, आदरणीय तिवारी जी इस सुदीर्घ यात्रा में वे हमेशा मेरा संबल बने रहे।

केसरवानी कालेज जबलपुर में बी.एड. के अध्ययन काल में वे मेरे गुरु थे और पारिवारिक संबंधों के अंतर्गत मैं उन्हें चाचा जी कहकर संबोधित करता और अपने को गौरवान्वित महसूस करता। इस प्रकार दोनों ही स्थितियों में मुझे हमेशा संरक्षक, दिशा दर्शक और मार्गदर्शक के रुप में अपने सिर पर उनका वरदहस्त होने का अहसास होता रहा। कालेज के छात्रों के साथ भी उनके संबंध अत्यंत आत्मीय हुआ करते। कक्षा में अगर वे छात्रों के लिए गुरु की भूमिका में होते तो कक्षा के बाहर अभिभावक के रुप में अपने दायित्वों का निर्वाह भी करते। वे अपने छात्रों के बीच एक लोकप्रिय शिक्षक के रुप में प्रतिष्ठित थे। वे अपने छात्रों को सदा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते। उन्होंने न तो  कभी अपने छात्रों को रुकने दिया और नहीं  थकने दिया।

मेरा नज़रिया है कि वे व्यक्ति अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें विरासत में उन्हीं शैक्षणिक संस्थानों में अध्ययन करने का अवसर मिलता है जहां पर कि उनके अभिभावकों ने शिक्षा अर्जित की होती है। श्री रामचन्द्र जी तिवारी के यशस्वी सुपुत्रों को ये सौभाग्य मिला था कि उन्होंने जबलपुर की  उस गौरवशाली शैक्षणिक संस्था माडल हाई स्कूल जबलपुर में अध्ययन किया जहां पर कि उनके पूज्य पिता ने भी अपनी शालेय शिक्षा पूर्ण की थी। माडल हाई स्कूल में उस समय प्रवेश पाना और पढ़ाई करना अत्यंत सम्मान की बात होती थी।

श्री रामचन्द्र जी तिवारी ने अपनी शालेय शिक्षा माडल हाई स्कूल से प्राप्त करने के बाद महाविद्यालयीन शिक्षा अपने समय के प्रतिष्ठित काले रार्बटसन से पूर्ण की। उन्होंने आर्थिक उपार्जन का माध्यम भी शिक्षकीय क्षेत्र को ही चुना और जबलपुर की एक.पी.नर्मदा हायर सेकेण्डरी स्कूल में सफलता पूर्वक एक अध्यापक के दायित्वों का निर्वाह किया। इसी दौरान तिवारी जी ने जबलपुर के कृषि महाविद्यालय में भी  सक्रियता पूर्वक अपनी सेवाएं दीं और बाद में केसरवानी महाविद्यालय में  प्रतिष्ठा पूर्वक शिक्षण कार्य किया और केसरवानी महाविद्यालय से ही सेवा निवृत्त भी हुए। यह उल्लेखनीय है कि तिवारी जी शैक्षणिक क्षेत्र के लिए इतने समर्पित थे कि उन्होंने आमगांव में एक हाई स्कूल की भी स्थापना की थी और बाद में यह स्कूल राज्य शासन को समर्पित कर दिया गया।

एक शिक्षक के रुप में श्री तिवारी जी का यह भी सोचना था कि छात्रों के मानसिक, बौद्धिक और शैक्षणिक विकास के साथ ही उनका शारीरिक विकास होना भी आवश्यक है  और इसी सोच के अनुसार खेलकूद की गतिविधियों के अंतर्गत उनके मार्गदर्शन  में  JELCO की प्रतियोगिता की शुरुआत की गई। ये प्रतियोगिता JEAA जैसी थी। स्मरणीय है कि अपने अध्यापन काल के दौरान श्री रामचन्द्र जी तिवारी ने हिन्दी व्याकरण और इतिहास की भी पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन किया जो कि पाठ्य पुस्तक के रुप में शैक्षणिक जगत में छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक सिद्ध हुई। श्री तिवारी जी की साहित्यिक गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी थी। एक साहित्य साधक के रूप में विभिन्न शैक्षणिक और साहित्यिक संस्थाओं के साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भी उनका मार्गदर्शन और योगदान महत्वपूर्ण माना जाता था। शिक्षा जगत के लिए समर्पित और सक्रिय श्री रामचन्द्र जी तिवारी का जन्म दिनांक 25 जून 1923 को और स्वर्गवास दिनांक 18अक्टूबर 1923 को हुआ। समाज में ऐसे कम लोग ही होते हैं जो उद्देश्य पूर्ण जीवन का निर्वाह करते हुए सार्थक और सफल जीवन का एक ऐसा उदाहरण बन जाते हैं जिनसे हम आजीवन प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं और श्रद्धेय श्री रामचन्द्र जी तिवारी ऐसे ही कीर्ति पुरुष थे जिनके लिए किसी कवि की ये पंक्तियां पूरी तरह चरितार्थ होती हैं -+

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आदमी के, प्यार के, संघर्ष के जो गीत गाए,

जियेंगी सदियां उन्हें दिन रात छाती से ‌लगाए।

© श्री यशोवर्धन पाठक

संकलन – श्री प्रतुल श्रीवास्तव

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १ ☆ कहाँ गए वे लोग – “पंडित भवानी प्रसाद तिवारी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆   

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १३ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय नेता – नाट्य शिल्पी सेठ गोविन्द दास ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १४ ☆ “गुंजन” के संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव “संत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १५ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर – पंडित गोविंद प्रसाद तिवारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १६ – “औघड़ स्वाभाव वाले प्यारे भगवती प्रसाद पाठक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ 

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १७ – “डॉ. श्री राम ठाकुर दादा- समाज सुधारक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १८ – “राजकुमार सुमित्र : मित्रता का सगुण स्वरुप” – लेखक : श्री राजेंद्र चन्द्रकान्त राय ☆ साभार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १९ – “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २० – “सच्चे मानव थे हरिशंकर परसाई जी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २१ – “ज्ञान और साधना की आभा से चमकता चेहरा – स्व. डॉ कृष्णकांत चतुर्वेदी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २२ – “साहित्य, कला, संस्कृति के विनम्र पुजारी  स्व. राजेन्द्र “रतन”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २३ – “मेरी यादों में, मेरी मुंह बोली नानी – सुभद्रा कुमारी चौहान” – डॉ. गीता पुष्प शॉ ☆ प्रस्तुती – श्री जय प्रकाश पांडे ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २४ – “संस्कारधानी के सिद्धहस्त साहित्यकार -पं. हरिकृष्ण त्रिपाठी” – लेखक : श्री अजय कुमार मिश्रा ☆ संकलन – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २५ – “कलम के सिपाही – मुंशी प्रेमचंद” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २६ – “यादों में रहते हैं सुपरिचित कवि स्व चंद्रकांत देवताले” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २७– “स्व. फ़िराक़ गोरखपुरी” ☆ श्री अनूप कुमार शुक्ल ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २८ – “पद्मश्री शरद जोशी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २९ – “सहकारिता के पक्षधर विद्वान, चिंतक – डॉ. नंद किशोर पाण्डेय” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३० – “रंगकर्मी स्व. वसंत काशीकर” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३१ – “हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी के विद्वान — कवि- शायर पन्नालाल श्रीवास्तव “नूर”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३२ – “साइकिल पर चलने वाले महापौर – शिक्षाविद्, कवि पं. रामेश्वर प्रसाद गुरु” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३३ – “भारतीय स्वातंत्र्य समर में क्रांति की देवी : वीरांगना दुर्गा भाभी” ☆ डॉ. आनंद सिंह राणा ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३४ –  “जिनके बिना कोर्ट रूम भी सूना है : महाधिवक्ता स्व. श्री राजेंद्र तिवारी” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३५ – “सच्चे मानव – महेश भाई” – डॉ महेश दत्त मिश्रा” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३६ – “महिलाओं और बच्चों के लिए समर्पित रहीं – विदुषी समाज सेविका श्रीमती चंद्रप्रभा पटेरिया” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३७ – “प्यारी स्नेहमयी झाँसी वाली मामी – स्व. कुमुद रामकृष्ण देसाई” ☆ श्री सुधीरओखदे   ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३८ – “जिम्मेदार शिक्षक – स्व. कवि पं. दीनानाथ शुक्ल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३९ – “सहृदय भावुक कवि स्व. अंशलाल पंद्रे” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४० – “मानवीय मूल्यों को समर्पित- पूर्व महाधिवक्ता स्व.यशवंत शंकर धर्माधिकारी” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४१ – “प्रखर पत्रकार, प्रसिद्ध कवि स्व. हीरालाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४२ – “जिनकी रगों में देशभक्ति का लहू दौड़ता था – स्व. सवाईमल जैन” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४३ – “संवेदनशील कवि – स्व. राजेंद्र तिवारी “ऋषि”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४४ – “कर्णदेव की दान परम्परा वाले, कटनी के पान विक्रेता स्व. खुइया मामा” ☆ श्री राजेंद्र सिंह ठाकुर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४५ –  “सिद्धांतवादी पत्रकार – स्व. महेश महदेल” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४६ – “मधुर गीतकार-  स्व. कृष्णकुमार श्रीवास्तव ‘श्याम’” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४७ – “साहित्य के प्रति समर्पित : आदरणीय राजकुमार सुमित्र जी” ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४८ – “गीतों के राजकुमार मणि “मुकुल”- स्व. मणिराम सिंह ठाकुर “मणि मुकुल”  ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४९ – “शिक्षाविद और सहकारिता मनीषी – स्व. डा. सोहनलाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५० – “मंडला, जबलपुर के गौरव रत्न – श्रद्धेय स्व. श्री रामकृष्ण पांडेय” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५१ – “चर्चित कथाकार एवं मेरे श्रद्धेय अग्रज –  स्व. श्री हर्षवर्धन जी पाठक” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ – “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५३ – “प्रखर पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी – स्व. पं. कुंजबिहारी जी पाठक” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५४ – “माडल हाई स्कूल के पूज्य शिक्षक स्मृति शेष रमेश कुमार पांडेय जी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५४ – “माडल हाई स्कूल के पूज्य शिक्षक स्मृति शेष रमेश कुमार पांडेय जी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५५ – “बहुमुखी प्रतिभा के धनी – स्व. प्रोफेसर एन. बी.गोस्वामी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ कहाँ गए वे लोग # ५६ – सरस्वती पुत्र स्व प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५७ – “बुंदेली के विद्वान स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २७ – संस्मरण ☆ पश्चिम उत्तर प्रदेश का आध्यात्मिक वैभवस्थल शुकतीर्थ (शुक्र ताल) ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २७ ☆

संस्मरण ☆ ~ पश्चिम उत्तर प्रदेश का आध्यात्मिक वैभवस्थल शुकतीर्थ (शुक्र ताल) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

समृद्ध पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जनपद मुजफ्फरनगर, गन्ने की चीनी मिले एवं दूर दूर तक फैले गन्ने की फसलों के बीच मेरा वाहन  आगे बढ़ रहा था। एक भ्रमण कार्यक्रम के सिलसिले में मेरा इस जनपद में आना हुआ। आर्थिक रूप से समृद्ध इस जनपद की साहित्यिक समृद्धि के विषय में जानने की उत्कंठा को मुजफ्फरनगर के प्रख्यात साहित्यकार एवं चिकित्सक डॉ. बी.के. पाण्डेय जी ने एवं डॉ. राकेश कौशिक ने पूर्ण किया।

जब से मैं यहां आया मेरी खोजी नजर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि को ढूंढ रही थी। मुझसे मेरे बड़े भाई श्री उमेश दत्त शर्मा जी से इस विषय बात हुई और होती भी क्यों नहीं, जब मैं उनके गृह जनपद के भ्रमण पर था।

भोपा, अथाई, सब कुछ मेरे जेहन में था। यात्रा का अंतिम पड़ाव पार करने के उपरांत समय की सुई सांय के पाँच से ऊपर के समय को पार कर चुकी थी। मेरी नजर एक मार्ग निर्देशिका की तरफ गयी। जिसपर   शुकतीर्थ – तीन किलोमीटर लिखा हुआ दिखाई दिया। शुकतीर्थ शब्द मेरे मन मस्तिष्क में ज्योहीं आए एक विशेष स्पंदन की स्थिति उत्पन्न हुई।

आध्यात्मिक अभिरुचि एवं  उस तपोभूमि से जुड़ी हुई  कथाएं मेरे मन में मचल रही थी। अब मेरे पास मुजफ्फरनगर की आध्यात्मिक समृद्धि के दर्शन करने का अवसर आ गया था।

श्री सलित जी, जिन्हे स्थानीय रूप से हमारे सहयोग के लिए नामित किया गया था, शायद उन्होंने मेरे मन की बात को समझ लिया था।

सर..मैं समझ रहा हूं  आप पावन तीर्थ ‘ शुकतीर्थ ‘की ओर चलना चाहते हैं।

डॉ.रजनीश ने एक पंक्ति में भागवत भगवान के प्राकट्य स्थल की बात और शुकदेव जी की एक लघुकथा कार में बैठे बैठे सामने धर दी। मैं और मेरे दो सहयोगी मित्र हम चारों शुकतीर्थ की पावन भूमि पर पहुंच चुके थे। थोड़ी ऊंचाई पर पैदल चलते-चलते हम उस पावन तीर्थ के प्रवेश द्वार की सीढ़िया पर पहुंचे तो मेरी नजरों के आगे वह अक्षय वटवृक्ष दृष्टिगत हो उठा जिसके नीचे बैठकर सुखदेव जी ने परीक्षित महाराज  को  भागवत भगवान की  प्रथम महिमा कथा सुनाई थी।

यह क्या…!! मंदिर की सीढ़ियों से आगे कुछ ही कदम  पड़े थे कि हमें एक पावन दिव्य युवा संत के दर्शन हुये। हम स्वयं ऐसे संत के दर्शन कर रहे थे और वे अगवानी के भाव में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।

दिव्य युवा विभूति कोई और नहीं थी बल्कि इस मंदिर को अपनी साधना एवं अध्ययन भूमि बनाने वाले पूज्य श्री अचल कृष्ण शास्त्री जी थे। दोनों हाथों को जोड़कर हम दोनों ने एक दूसरे के अभिवादन को स्वीकार किया। लेकिन हम स्वतः ही बाएं की तरफ मुड़ गए और हम पहुंच गए, उस अद्भुत, दिव्य, आध्यात्मिक स्थल पर जिस स्थान पर बैठकर शुकदेव जी ने महाराजा परीक्षित को श्री भागवत् भगवान की कथा सुनाई थी। आज भी यह पवित्र अक्षयबट वृक्ष जो कि लगभग साढे पांच सौ वर्षों से यहां पर इस रूप में है, मानो आज भी शुकदेव जी यहां पर विराजमान है।

लोग पीत सूत्रों से लिपटे हुए इस वृक्ष के समीप  आकर पूजा अर्चन करते हैं।

भजन कीर्तन चल रहा था मंदिर में शुकदेवजी महाराज और महाराजा परीक्षित एवं  उनकी कथा सुनती हुई मूर्तियां विराजमान थी।

वार्ता के केंद्र में परीक्षित महाराज की चर्चा हुई तो मुझे अतीत के वे दिन याद आ गए जब, मैं बचपन में मेरठ जनपद के नगर मवाना मैं रहता था, जहां से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर महाभारत काल का, हस्तिनापुर और परीक्षितगढ़ किला सब कुछ मुझे याद आ रहा था। दो ढाई सौ किमी वृतीय  दायरे में फैला यह वही भूभाग है जहां महाभारत काल में नाना प्रकार की घटनाएं घटी। पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर हो या उनका दूसरा नगर इंद्रप्रस्थ ( दिल्ली ) हो या अभिमन्यु जी के पुत्र महाराज परीक्षित जी का परीक्षितगढ़ किला हो  या कुरुक्षेत्र का मैदान जहां आध्यात्मिक इतिहास की सबसे बड़ी घटना घटी जब भगवान श्री कृष्ण यानी परम ब्रह्म के स्वमुख से  श्रीमद्भागवत गीता जी का प्राकट्य हुआ या वह स्थान जिसे आज शुकतीर्थ कहते हैं जहां महाराज परीक्षित ने सुखदेव जी से भागवत भगवान की पावन कथा सुनी थी।

इन सभी स्थानों की बात मै इसलिए कह गया कि जब मैं मंदिरके किनारे ऊंचे स्थान से श्री हनुमान जी का विशाल विग्रह और गंगा मैया के कछार का क्षेत्र देख रहा था, तो मुझे वह पूरा भूभाग समझ में आ रहा था। मेरे मन में महाभारत काल की बातें और ये सारे महत्वपूर्ण स्थान के दर्शन हो रहे थे। मैं एक अलग ही अनुभूति कर रहा था कि यह वही क्षेत्र है जहां ये सारी घटनाएं घटी थीं।

पुनः में शुकतीर्थ की ही बात करता हूं। पश्चिम उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में बोली जाने वाली कौरवी बोली, जो हिन्दी के शाब्दिक अर्थ को बदलकर रखने का सामर्थ्य रखती है, इस स्थान को शुकर ताल बोला जाता रहा। यद्यपि न यहाँ शुक्राचार्य जी महाराज का स्थान है न ही कोई ताल है, बल्कि यहाँ गंगा कछार है। खैर पूज्य माननीय आदरणीय मुख्यमंत्री जी की दृष्टि इस पावन तीर्थ पर पड़ी और यह स्थान अब अपने पुरातन नाम शुकतीर्थ के रूप अपने आध्यात्मिक वैभव को प्राप्त कर रहा है।

मेरे सहयोगी श्री सनित कुमार में मुझे  हजारों वर्ष प्राचीन इस अक्षय बट की एक शाखा के दर्शन हुए जिसमें श्री गणेश भगवान का स्वयं प्राकट्य रूप और शुकदेव जी ( शुकरूप ) की  आकृति स्पष्टरूप  से दिखाई दे रही थी। इस बीच जब मेरी नज़रें ऊपर की तरफ गई तो अनेकानेक शुक यानी तोते पंक्षियों के जोड़े  दिखाई दे रहे थे। ये इस बात को बयां कर रहे थे कि आज से करीब साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व इसी स्थान पर श्री शुकदेव जी महाराज ने महाराजा परीक्षित को इस पावन कथा का श्रवण कराया था।

अब हम सभी पूज्य अचल कृष्ण शास्त्री जी के विराजित स्थल पर पहुंच चुके थे। महाराज श्री अचल शास्त्री जी ने श्री भागवत भगवान के प्राकट्य की संक्षिप्त कथा सुनाइ, यह तो हमारा अमृत पान सा था। साथ ही साथ आपने प्रसाद और छाछ भी प्रदान किये जिसने हमें आत्मिक रूप से महाराज से जोड़ दिया।

पूज्य अचल शास्त्री जी महाराज अभी युवा है लेकिन बौद्धिक रूप से आपने प्रचुर आध्यात्मिक ज्ञानअर्जन कर लिया है, ऐसा मुझे उनसे बात करने के उपरांत आभासित हो रहा है। भागवत भगवान की कथा के वाचक आचार्य अचल कृष्ण शास्त्री जी ने बताया कि प्रतिवर्ष इस स्थान पर हजारों लोग आते हैं और यहां अस्थाई रूप से कुछ दिनों के लिए रुकते हैं। भागवत कथा को सुनते हैं। उन सभी मानना है कि जिस स्थान पर राजा परीक्षित जी ने प्रथम भागवत कथा सुनी थी। हमको भी उस स्थान पर इस पावन कथा का श्रवण कर  स्वयं को धन्य करना है।

अब मैं चर्चा करुंगा एक ऐसे संत की जिन्होंने इस तीर्थ के पुनरोत्थान/ जीर्णोद्धार में अपना  पूरा जीवन समर्पित कर दिया यह संत भगवान थे स्वामी कल्याण देव जी महाराज। भारत में सैकड़ों ट्रस्टॉ, आध्यात्मिक पीठों की स्थापना करने वाले स्वामी कल्याण देव जी को पद्म भूषण, पद्म विभूषण जैसी उपाधियों से भारत की सरकार ने न सिर्फ सम्मानित किया बल्कि भारत के पहले  प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी एवं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर माननीय पपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी ने इस स्थान पर आकर या अन्य स्थानों पर सम्मान सम्मान करने हेतु महाराज जी को बुलाकर उनके दर्शन प्राप्त किये। ये सारे चित्र हमें इस स्थान पर निर्मित संग्रहालय में देखने को मिलते हैं। हमें स्वामी कल्याण देव जी की से जुड़े उन सारी सामग्रियों के भी पावन दर्शन हुए जो हमें उनके साक्षात दर्शन की पावन अनुभूति करा रहे थे।

हमारे प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री जी जो स्वयं में योगी है, उनका संतों के प्रति और आध्यात्मिक तीर्थं स्थानों के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। ऐसा इस स्थान के साथ भी है और हमें उनके कुछ चित्र को इस स्थान पर देखकर लग भी रहा था।

इस स्थान पर स्थाई रूप से बना हुआ हेलीपैड इस बात को बयां कर रहा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी अक्सर इस स्थान पर आते हैं।

इस पावन यात्रा के समाप्ति पर पूज्य अचल शास्त्री जी ने हमें भेंट स्वरूप एक पुस्तिका ” ऐतिहासिक शुकतीर्थ संक्षिप्त परिचय ” दी, जिसके लेखक हैं स्वामी ओमानंद जी एवं प्रकाशक है श्री सुखदेव आश्रम स्वामी कल्याण देव सेवा ट्रस्ट सुख तीर्थ ( शुक्र ताल ), मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश।

इस आध्यात्मिक यात्रा ने मुझे  न सिर्फ पश्चिम उत्तर प्रदेश के आध्यात्मिक वैभव की यात्रा कराया बल्कि  इस यात्रा की समाप्ति पर मैं अपने साथ साहित्यिक आध्यात्मिक और भौतिक अनुभूतियों को लेकर वापस जा रहा हूं।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ स्कॉटलैंड की वह रात ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ स्कॉटलैंड की वह रात ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

प्रिय,

कभी-कभी कोई एक रात हमारे भीतर उतर जाती है… इतनी गहराई तक कि वह हमें बदल देती है, हमारे भीतर का स्वरूप नया हो जाता है। ऐसी ही एक रात थी …स्कॉटलैंड की वह रात!

स्कॉटलैंड का मौसम वैसे भी अपने अप्रत्याशित स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है। कहते हैं, वहाँ एक ही दिन में चारों ऋतुएँ उतर आती हैं.. सुबह धूप, दोपहर में बादल, शाम को बारिश और रात में धुंध। हवा में एक नमी रहती है, जो कभी सिहरन देती है तो कभी कविता। एडिनबर्ग, जहाँ हम ठहरे थे, वही शहर है जिसने हैरी पॉटर को जन्म दिया। यहीं की पुरानी गलियाँ, पत्थरों की सीढ़ियाँ, और कैफ़े की खिड़कियों से बाहर झरती बारिश ने जे.के. रॉलिंग को प्रेरणा दी थी, जब वे “The Elephant House” नामक कैफ़े में बैठकर हैरी, हॉगवर्ट्स और उस जादुई दुनिया को रच रही थीं। उस रात जब मैं खिड़की से बाहर देख रही थी, तो लगा मानो वही जादुई दुनिया अब भी हवा में तैर रही है ..बस इस बार जादू किसी जादूगर की छड़ी से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से बन रहा था।

घमासान बारिश कुछ ज़्यादा ही भयावह लग रही थी..मानो आसमान अपनी सारी अधूरी बातें ज़मीन से कह रहा हो। शहर की सड़कों पर जलकुंड बने थे, रोशनी हर मोड़ पर पानी में बिखरकर झिलमिला रही थी। रात की शांत सड़कों पर बारिश की निरंतर झड़ी भले ही अपना सौंदर्य लिए थी, पर उस सौंदर्य के बीच हमारे भीतर की बेचैनी हर बूँद के साथ और गहरी होती जा रही थी।

हम छह लोग थे। थके हुए, पर भीतर कहीं घर लौटने की राहत लिए हुए। हमारी ट्रिप का वह आख़िरी दिन था। लंदन के सैर और संगोष्ठी के बाद हमारा अंतिम पड़ाव था स्कॉटलैंड। सुबह पाँच की फ़्लाइट थी, और तय था कि दो बजे तक एयरपोर्ट पहुँचना है। हम वापसी के लिए उत्सुक थे और अपने…….अपने कमरों में सामान पैक कर बस जाने के लिए तैयार थे।

डिनर के बाद, जब वह मेसेज आया, “आपकी फ्लाइट केन्सिल हो गयी है”… तो जैसे वक़्त ने एकाएक रुककर हमें देखा और मुस्कुरा दिया, थोड़ी सी विडंबना के साथ। हम सबके चेहरे पर पता नहीं कितने सवाल आए और गए… विदेशों में फ्लाइट का कैंसिल होना अब आम बात है, पर जब तक दूसरी फ्लाइट कन्फर्म नहीं होती, जान हलक में अटकी रहती है।

लॉज की बुकिंग खत्म हो चुकी थी, हमने चेक…….आउट कर लिया था और मैनेजर की कृपा से एक कमरे में यूँ ही बैठे थे। अब कोई ठिकाना नहीं था। बाहर घनघोर बरसात थी, ऐसी कि टैक्सी की हेडलाइट भी धुंध में खो जाए। हम सब चुप थे.. एक…….दूसरे की आँखों में सवाल थे और उत्तर कहीं नहीं।

“चलो एयरपोर्ट चलते हैं,” किसी ने कहा “वहाँ जाकर कुछ न कुछ कर लेंगे।” यह ‘कुछ न कुछ’ शब्द उस रात सबसे बड़ा सहारा बन गया। एक बांग्लादेशी ड्राइवर आया… लंबा, चौड़ा, भरा हुआ आदमी, जिसकी आँखों में नींद और दया दोनों थीं। वह हमारे लिए टैक्सी लेकर खड़ा था, मानो हमारी बेचैनी को वह भी समझ गया हो।

बरसाती अँधेरी रात में हम निकल पड़े। वाइपर लगातार शीशे पर बारिश से जूझ रहा था, पर हर बार हार जा रहा था। कभी…….कभी सड़क की लाइटें बारिश की धारों में टूटकर गिरतीं और फिर लुप्त हो जातीं… बिल्कुल हमारी उम्मीदों की तरह।

एयरपोर्ट पहुँचे तो राहत की साँस ली… कम से कम मंज़िल दिखी। पर भीतर के काउंटर पर कंप्यूटर की स्क्रीन ने वही कहा जो बारिश ने बाहर कहा था..सब धुँधला है, स्पष्ट कुछ नहीं। एयरपोर्ट पर इतनी रात गए कोई नहीं था। कारण कोई फ्लाइट न आनेवाली थी न जानेवाली। धीरे…….धीरे चार बजे के आसपास एक काउंटर खुला, लोग आने लगे।

हमारा ग्रुप लीडर, गायत्री, वाणी और मैं.. लगातार फ़ोन पर थे। किसी न किसी रूप में हमें कोई फ्लाइट मिल जाए… और अचानक एक मेसेज आया.. दो टिकट कन्फर्म हुईं हैं, दिल्ली तक। हम कुल छह लोग थे। बाकी चार वहीं ठहर गए.. जैसे चार आत्माएँ किसी प्रतीक्षालय में अटकी हों।

उस रात हमें समझ नहीं आया कि हँसे, रोएँ या बस इंतज़ार करें। किसी ने मित्र को जगाया, किसी ने रिश्तेदार को, कोई कस्टमर केयर पर चिल्लाया, तो कोई चुपचाप खिड़की से बाहर झाँकता रहा… जहाँ बारिश अब भी वही थी, बस हमारी स्थिति बदल गई थी। हमारे साथी अपने बैग उठाकर चले गए। हमने कहा, “आप जाइए… हम कोई न कोई इंतज़ाम तो कर ही लेंगे।”

समस्या पर समस्या। कोई कहता ..“यूएस होकर जाइए।” कोई कहता.. “दुबई होकर।” पर वीज़ा? हर समाधान एक नई उलझन बन जाता। आख़िर थककर हमने एक कोना ढूँढ़ा और बैठ गए.. बिना किसी से कोई सवाल किए। गायत्री लगातार अपने पति के संपर्क में थी..उम्मीद थी, कुछ तो हो।

हाँ, बाहर बारिश लगातार हो रही थी। हम जहाँ बैठे थे वहाँ बारिश की आवाज़ और भी गहरी थी, जो भीतर के अवसाद को और गाढ़ा करती जा रही थी। पता नहीं कितनी फ्लाइटें आयीं…….गईं, कितने लोग आए…….गए, और हम वहीं थे… बस एक ही मन में “टिकट कन्फर्म हो जाए…”..फ्लाईट मिल जाए

घंटों बाद, मेसेज आया — गायत्री का एक टिकट बुक हुआ, वाया यूएस। पर उसके साथ उसका बेटा था — वह अकेली कैसे जा सकती थी! फिर से सब रद्द। सुबह के दस बज चुके थे, पर बाहर लग नहीं रहा था कि सुबह है। हम लगातार कोशिश कर रहे थे कि किसी भी तरह कोई बुकिंग मिल जाए, भले ही डायरेक्ट न हो।

पाँच घंटे बीत गए.. कुछ नहीं हुआ। एयरपोर्ट अथॉरिटी ने अब हमें वहाँ ज़्यादा रुकने की अनुमति नहीं दी। कोई सुविधा भी नहीं। उन्होंने कहा, “लंदन वापस जाइए, वहीं से फ्लाइट लीजिए।” हमने सोचा.. चलो, यहाँ से निकलते हैं, वहीं कोई ठिकाना ढूँढ़ते हैं कि तभी तीनों को मेसेज मिला , “फ्लाइट कन्फर्म्ड फॉर टुमॉरो!” सुबह की एक फ्लाइट मिली ..बैंगलोर तक। एक साँस में जैसे हम सबने जीवन को पकड़ लिया। अब प्रश्न था.. रात कहाँ काटें?

वीणा ने अपने संपर्कों से किसी एअर बिन का इंतज़ाम किया। हमने कैब बुक की। फोन बार…….बार सिग्नल खो रहा था। आखिर किसी तरह एअर बिन.. हमारे उस दिन के गंतव्य तक पहुँचे। मकान बड़ा सुंदर था, दीवारों पर हल्की नमी, लकड़ी की खुशबू, और डिजिटल ताले का ठंडा स्वागत। फोन पर कोड आया.. दरवाज़ा खुला। लगा, यह शहर कह रहा है ..“यहाँ इंसान नहीं, सिस्टम रहते हैं।”  दिन के बारह बज चुके थे। थकान इतनी कि कुर्सियाँ भी तकिए लगने लगीं। वहाँ के प्रबंधक .. शायद वही एक वास्तविक व्यक्ति हमारी दशा देखकर मुस्कुराए, “थोड़ी चाय…….टोस्ट लीजिए।” वह चाय सिर्फ गर्म नहीं थी, वह एक सांत्वना थी। टोस्ट हमारे भीतर के डर पर मरहम की तरह था। चाय के बाद नींद आँखों में उतरने लगी। लॉबी में, सूटकेस के सहारे, हम सब अनजान शहर में सो गए ..किसी अजनबी की छत के नीचे, किसी डिजिटल ताले की सुरक्षा में। जब जागे तो एक शाम हो गई थी। बारिश थम गई थी। हमने एक…….दूसरे को देखा.. थके थे पर अब राहत थी। नहा…….धोकर बाहर निकले… भीगे शहर को देखने, अपने डर को पीछे छोड़ने। सड़कें साफ़ थीं, हवा में गीली मिट्टी की खुशबू थी। लाइटें अब झिलमिला नहीं रही थीं.. स्थिर थीं, जैसे कह रही हों… “अब सब ठीक है।” हम पैदल ही चले… हँसते, बातें करते, कभी तस्वीरें लेते, कभी पेड़ों से टपकती बूँदें देखते। शहर की नमी अब अपनी लगने लगी थी।

एक मॉल में पहुँचे। कुछ खाया नहीं, पर थोड़ी खरीदारी की.. शायद सामान्यता को फिर से महसूस करने के लिए। फिर एक छोटे…….से चायनीज़ रेस्टोरेंट में गए। नूडल्स का स्वाद उस रात की भूख से कहीं गहरा था। हर बाइट में थकान का संतुलन था, हर घूँट में राहत का स्वाद। रात लौटे तो शरीर बिस्तर पर था, पर मन अब भी उड़ान में। आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। सबसे बड़ी थी मैं — जिम्मेदारी की परछाइयाँ मन पर घूमती रहीं। क्या सब ठीक होगा? क्या अगली सुबह कुछ नयी समस्या तो नहीं आएगी? रात के दो बजे फिर वही सिलसिला शुरू हुआ — टैक्सी बुक करना, सिस्टम से कोड लेना, सामान बाँधना, बच्चे को जगाना।

पर इस बार हम डर से नहीं, अनुभव से निकल रहे थे।

एडिनबर्ग एयरपोर्ट रोशनी में नहाया हुआ था, पर उस चमक में एक ठंडी दूरी थी।

लॉबी में तरह…….तरह के लोग थे — अपने देश लौटने वाले, पहली बार विदेश जा रहे, और कुछ बस यात्राओं के बीच ठहरने वाले। ऑफिसर्स के चेहरों पर आत्मविश्वास था , कहीं-कहीं वह आत्मविश्वास एंठ में बदल जाता। वे अपनी साफ…….सुथरी अंग्रेज़ी में बात करते, और जब किसी देसी यात्री की टूटी…….फूटी अंग्रेज़ी सुनते, तो उनके चेहरे पर हल्की…….सी मुस्कान फैल जाती और कभी कभी ये मुस्कान, जो तिरस्कार की सीमा तक चली जाती थी। वहीं, कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी आँखों में करुणा थी। एक बुज़ुर्ग महिला का पासपोर्ट गिर गया था, और एक अजनबी युवक ने बिना कुछ कहे उसे उठा लिया। एक विदेशी महिला को अपने बैग का वजन कम करना था, तो बगल में बैठी भारतीय युवती ने मुस्कराते हुए कुछ चीज़ें अपने बैग में रख लीं। इन छोटे-छोटे क्षणों में लगा…मानवीयता अब भी ज़िंदा है, बस भीड़ में दब जाती है।

वहीं कुछ प्रवासी भारतीय अपने बच्चों से फोन पर बात कर रहे थे…हिंदी, मराठी, कन्नड़, तमिल, पंजाबी अलग-अलग भाषाएँ एक साथ घुलमिल रही थीं। ऑफिसर वर्ग के कुछ चेहरे हुए ऐसे लगे, मानो अपने ही देश के लोगों को किसी अलग श्रेणी में रख दिया हो। मुझे लगा शायद “विकास” और “विदेश” के बीच कहीं संवेदना छूट जाती है।

अनाउंसमेंट हुआ, “Flight to Mumbai now boarding…” हमने अपनी चीज़ें समेटीं।  पीछे मुड़कर देखा तो वह एयरपोर्ट रोशनी, आवाज़ें, चेहरों का सागर  सब एक मूक प्रतीक बन चुका था। बोर्डिंग पास हाथ में लेकर हम फ्लाइट में आ बैठे। फिर बातें..बातें और बातें.. हँसना, खाना और तस्वीरें लेना…

मुंबई पहुँचे। वहाँ फ्लाइट बदलनी थी। गायत्री अपने बेटे के साथ मुंबई में उतर गई। मैं और वाणी बैंगलोर के लिए निकल पड़े। सुबह चार बजे दोसा खाया, वह दोसा जैसे कह रहा था, “सब गुज़र गया, अब बस घर बाकी है।” बैंगलोर पहुँचे। पहली बार लगा, हवा में अपनापन है। थकान उतरी, और भीतर एक अजीब सी कृतज्ञता भर गई। उस रात ने मुझे सिखाया कि सुरक्षा कोई बाहरी वस्तु नहीं, वह भीतर से उगती है। हमारा भय तब तक बड़ा होता है, जब तक हम उसे छूने की हिम्मत नहीं करते। एक बार जब हम उससे होकर गुजरते हैं, तो वह बस एक अनुभव बन जाता है.. जो हमें और जीवित बना देता है।

कभी कभी नियति हमें परदेश की बारिश में फेंक देती है  ताकि हम जान सकें कि घर सिर्फ एक जगह नहीं होता, वह हमारी आत्मा की शांति में बसता है। उस रात मैंने यह सीखा कि हर अनिश्चितता के भीतर एक अदृश्य हाथ होता है, जो हमें संभालता रहता है, भले ही हम उसे देख न पाएं। अब जब भी कोई स्थिति मेरे नियंत्रण से बाहर जाती है, तो मुझे स्कॉटलैंड की वह रात याद आती है … बारिश की आवाज़, भीगी सड़कों की चमक, और वह अजनबी टैक्सी ड्राइवर, जो जाने…….अनजाने मेरी कहानी का हिस्सा बन गया। कभी लगता है  वह रात एक परिचय थी…अपने भीतर के साहस से, अपने भीतर के विश्वास से।

प्रिय, यदि कभी जीवन तुम्हें किसी बरसाती अंधेरे में छोड़ दे, तो याद रखना.. हर बारिश के पार एक सुबह होती है, और हर खोए हुए सफ़र के बाद घर की हवा और भी परिचित लगती है। मैं यह सब तुम्हें इसलिए लिख रही हूँ, क्योंकि कुछ बातें सिर्फ आत्मा को ही कही जा सकती हैं .. शब्दों में नहीं, अनुभवों में। तुम वह आत्मा हो, जिससे बात करना, अपने आप से बात करना है। स्कॉटलैंड की वह रात अब बीत चुकी है, पर उसकी बूंदें आज भी भीतर गीली हैं कभी याद की तरह, कभी सीख की तरह, और कभी बस एक मुस्कान की तरह।

*********                          

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ४७ – संस्मरण – मैनपाट शाखा का अनुभव ☆ डॉ अनिल कुमार वर्मा ☆

डॉ. अनिल कुमार वर्मा

संक्षिप्त परिचय –

  • शिक्षा : पीएचडी (वास्तु शास्त्र), बी.टेक., एफआईई, एफआईवी, चार्टर्ड इंजीनियर,
  • सम्प्रत्ति : वास्तु/जियोपैथिक स्ट्रेस सलाहकार, प्रॉपर्टी मूल्यांकनकर्ता, पूर्व फैकल्टी, कृषि अभियांत्रिकी कॉलेज, जेएनकेवीवी, जबलपुर, पूर्व चीफ मैनेजर, एसबीआई, भोपाल सर्कल
  • विशेषज्ञता: औद्योगिक/कॉरपोरेट वास्तु एवं जियोपैथिक स्ट्रेस
  • लिखित पुस्तकें: “विजयी चुनावी वास्तु”, “Vastu For Winning Election”
  • टीवी साक्षात्कार: ज़ी बिज़नेस, ज़ी 24 छत्तीसगढ़, आईबीसी 24
  • लेख: टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक भास्कर, जागरण, हरिभूमि, माय प्रॉपर्टी आदि
  • विभिन्न पुरस्कार विजेता

ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। 

वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं।

इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।
दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है…संस्मरण – मैनपाट शाखा का अनुभव. 

☆  दस्तावेज़ # ४७संस्मरण – मैनपाट शाखा का अनुभव ☆ डॉ अनिल कुमार वर्मा ☆

वर्ष 1997 से 20ओ1 के दौरान, मुझे शहडोल स्थित SBI रीजनल ऑफिस में CM (Credit) रहते हुए, कई बार कमलेश्वरपुर शाखा, यानी छत्तीसगढ़ के हिल स्टेशन मैनपाट जाने का अवसर मिला है। यह स्थान प्रकृति की गोद में बसा, बेहद मनोहारी और शांति से परिपूर्ण है। यहाँ तिब्बतियों का पगोडा (मंदिर) विशेष आकर्षण है और पूरा हिल स्टेशन अपने आप में एक अनुपम सौंदर्य का अनुभव कराता है। छत्तीसगढ़ सरकार भी वहाँ पर्यटन विकास के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।

मैनपाट के तिब्बती लोग अत्यंत परिश्रमी और ईमानदार थे। हर वर्ष सर्दियों के पूर्व वे अपने स्वेटर व्यापार के लिए शाखा से ओवरड्राफ्ट लेते, फिर लुधियाना जाकर स्वेटर और शॉल खरीदते। इसके बाद वे दलों में बँटकर अलग-अलग शहरों में अस्थायी दुकानें लगाते और पूरी सर्दियों मन लगाकर व्यापार करते। ठंड खत्म होते ही वे पूरा ऋण चुका देते थे। उनकी रिकवरी हमेशा 100% रहती थी, जो उनकी ईमानदारी और परिश्रम की मिसाल थी।

हालाँकि ऋण देने की प्रक्रिया आसान नहीं थी। चूँकि वे विदेशी शरणार्थी थे, उनके पासपोर्ट मंत्रालय को भेजकर अनुमति मिलने के बाद ही लोन सैंक्शन हो पाता था। इसके बावजूद उनकी निष्ठा और बैंक के प्रति विश्वास देखने योग्य था।

एक बार जब मैं शाखा में पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि एक ऑडिट ऑब्जेक्शन लंबे समय से अटका हुआ है। समस्या यह थी कि KYC की एक औपचारिकता—ग्राहक की फोटो—अधिकांश खातों में संलग्न नहीं थी। कारण यह था कि कमलेश्वरपुर जैसे दूरस्थ क्षेत्र में कोई फोटो स्टूडियो था ही नहीं। फोटो खिंचवाने के लिए ग्राहकों को अंबिकापुर जाना पड़ता था। परिणामस्वरूप खाते फोटो के बिना ही खोले गए थे। अब वर्षों बाद ग्राहकों को ढूँढकर भेजना और फोटो मँगवाना सचमुच टेढ़ी खीर साबित हो रहा था।

यही वह क्षण था जब मैंने एक तकनीकी समाधान खोज निकाला। समाधान था—इंस्टेंट फोटो कैमरा (पोलरॉइड कैमरा)। यह वही कैमरा था जो प्रायः पर्यटक स्थलों पर देखने को मिलता था, जहाँ खींची गई तस्वीर तुरंत रंगीन प्रिंट के रूप में हाथ में मिल जाती थी। मैंने ऐसा कैमरा जबलपुर से मँगवाकर शाखा को भिजवाया।

इसके आ जाने से मानो शाखा प्रबंधक की बड़ी समस्या का अंत हो गया। उन्होंने अपने सामने की दीवार पर एक बैकग्राउंड स्क्रीन टाँग दी। अब ग्राहक शाखा प्रबंधक के सामने कुर्सी पर बैठ जाता और प्रबंधक अपनी सीट से ही फोटो खींच लेते। धीरे-धीरे सभी खातों में फोटो संलग्न हो गईं और वह जटिल ऑडिट ऑब्जेक्शन भी दूर हो गया।

यह अनुभव आज भी मेरे लिए यादगार है। यह केवल बैंकिंग समाधान नहीं था, बल्कि इस बात का प्रतीक था कि यदि हम नवोन्मेषी सोच (innovative thinking) अपनाएँ, तो कितनी भी कठिन समस्या को सरल बनाया जा सकता है।

♥♥♥♥

© डॉ अनिल कुमार वर्मा 

कार्यालय-सह-आवास: बंगला नंबर B 27 चौहान टाउन, जुंनवानी, भिलाई, छत्तीसगढ़ मोबाइल: 9425028600 वेबसाइट: www.askvastu.com

यूट्यूब चैनल: askvastu.com  ईमेल: vermanilg@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ४६ – नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। 

वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं।

इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।
दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है…

☆  दस्तावेज़ # ४६ – नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

🪷🪷🪷🪷

एक थे बलवंत सर – धीर-गंभीर, गरिमामय व्यक्तित्व। हमारे स्कूल में अध्यापक थे। हम लोग (बच्चे) तब मैदान में खेलने जाते थे। यह उन्नीस सौ साठ और सत्तर के बीच की बात होगी।

जबलपुर के उपनगर रांझी का वो क्षेत्र अब रावण पार्क कहलाता है। यहां हजारों मकानों की अनंत श्रृंखला है। दूर ईंट के भट्ठे दिखाई देते थे, वो भी अब लुप्त हो गए हैं। स्कूल के पीछे जो खुली जगह थी, वो भी मकानों से भर गई है। आगे, मानेगांव था जहां हम छुपकर मूली उखाड़ने जाते थे। वहां भी अब मकान ही मकान हैं।

एक दिन बलवंत सर बोले, “आओ, शाखा में। वहां तुम्हारा चरित्र निर्माण और सर्वांगीण विकास होगा।” संघ की शाखा में पहली बार सूर्य नमस्कार और दंड प्रहार (डंडों का अभ्यास) सीखा। “आत्म-बोध”, “स्व-बोध की भावना”, “अहं से वयं की यात्रा”, “राष्ट्र-चेतना” और “समाज-कल्याण” की बातें तब थोड़ी-बहुत ही समझ में आती थीं। कबड्डी के खेल में अलबत्ता मज़ा आता था। अंत में प्रार्थना होती थी और “भारत माता की जय” का उद्घोष।

कालांतर में ये सब भूली-बिसरी यादें बनकर रह गईं। अभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शताब्दी वर्ष में एक वीडियो रिलीज़ हुआ जिसमें “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” प्रार्थना को शंकर माधवन ने प्रभावी ढंग से गाया है और लन्दन के फिल हारमोनिक ऑर्केस्ट्रा ने संगीतबद्ध किया है। इसकी विशेषता है कि मूल प्रार्थना के साथ-साथ, उसका भावार्थ हिंदी में सहज-सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

इतने वर्षों बाद इस प्रार्थना का निहितार्थ समझ में आया। लगा, कितनी अद्भुत रचना है, कितने गहरे – कितने उच्च भाव हैं! इतनी ओजस्वी, प्रेरणादायी, भावभीनी, अर्थपूर्ण, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत, परिष्कृत, और प्रभावशाली प्रार्थना बहुत कम ही होंगी।

इसमें समर्पण है, त्याग है, गहन आभार, प्रभु से निस्वार्थ प्रार्थना, आशा, उज्ज्वल भविष्य की कामना, पुरुषार्थ, और कुछ मूल्यवान योगदान देने की उत्कंठा है। अप्रतिम है ये प्रार्थना!

प्रार्थना का मूलपाठ संस्कृत में, भावार्थ हिंदी और अंग्रेज़ी में, और इसकी नवीनतम प्रस्तुति की यूट्यूब लिंक आपकी सुविधा, पठन, श्रवण, गहन चिंतन, और यथासंभव अनुसरण के लिए प्रस्तुत हैं:

🌱प्रार्थना:

*

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे 

त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्। 

महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे 

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ॥१॥

*

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता 

इमे सादरं त्वां नमामो वयम्। 

त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं 

शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये। 

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं 

सुशीलं जगद् येन नम्रं भवेत्। 

श्रुतं चैव यत् कण्टकाकीर्णमार्गं 

स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ॥२॥

*

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं 

परं साधनं नाम वीरव्रतम्। 

तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा 

हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्। 

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् 

विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्। 

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं 

समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ॥३॥

*

भारत माता की जय।

🔸

🌱भावार्थ हिंदी में:

हे वत्सला (संतानों को स्नेह करने वाली) मातृभूमि! तुम्हें सदा नमस्कार है, तुम पावन हिंदू भूमि मेरे सुख को बढ़ाती हो। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तुम्हारी रक्षा के लिए मैं अपने इस शरीर को अर्पित करता हूँ, तुम्हें बार-बार नमस्कार करता हूँ।

हे सर्वशक्तिमान प्रभु! हम इस हिंदू राष्ट्र के अंग (हिस्से) के रूप में तुम्हें सादर प्रणाम करते हैं। आपके कार्य के लिए हम कमर कसकर तैयार हैं, इस कार्य की पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वाद दीजिए। विश्व में अजेय होने वाली शक्ति, शील (सद्गुण) जिससे जगत विनम्र हो, तथा अपने द्वारा स्वीकार किए गए काँटों से भरे मार्ग को सुगम करने की क्षमता भी दीजिए।

श्रेष्ठ उत्कर्ष और निःश्रेयस (सर्वोत्तम कल्याण) का एकमात्र साधन वीरव्रत (वीरों का व्रत) है, वही हमारे अन्तःकरण में सदैव स्फुरित हो। दृढ़ ध्येय-निष्ठा हमारे हृदय में प्रज्वलित रहे। आपकी कृपा से हमारी संयुक्त कार्यशक्ति धर्म की रक्षा हेतु सक्षम हो और हमारे राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाने में समर्थ हो सके।

भारत माता की जय।

🔸

🌱Prayer:

Namaste sadaa vatsale maatribhume,

Tvaya hindubhoome sukham vardhitoham.

Mahaamangale punyabhoome tvadarthe,

Patatvesha kaayo namaste namaste.

*

Prabho shaktiman hinduraashtraangbhoota,

Ime saadaram tvaam namaamo vayam.

Tvadiyaaya kaaryaaya baddha kateeyam,

Shubhaamaashisham dehi tatpurtaye.

*

Ajayyaam cha vishvasya deheesha shaktim,

Sushilam jagad yena namram bhavet.

Shrutam chaiva yat kantakaakīrnamargam,

Svayam svikritam nah sugam kaarayet.

*

Samutkarshanihshreyasasyaikamugram,

Param saadhanam naam veeravratam.

Tadantahsphuratvakshayaa dhyeyanishthaa,

Hridantah prajagartu teevraanishaam.

*

Vijetri cha nah sanhataa kaaryashaktir,

Vidhayaasyadharmasya samrakshanam.

Param vaibhavam netumetat swaraashtram,

Samarthaa bhavatvaa shisha te bhrisham.

*

Bharat mataa ki jay.

🔸

🌱Meaning in English:

Greetings to you, O loving Motherland! You, the sacred land of Hindus, have always increased my happiness. O great and auspicious land of virtue! For your cause, I offer my very body again and again.

Almighty Lord! As members of this Hindu nation, we greet you with reverence. Our waist is girded for your work—please bless us so we may accomplish this task. Grant us strength unconquerable in the world, noble character to make the world humble, and the wisdom to make the thorny path we have chosen easier to walk.

The single, supreme and intense means for collective and ultimate well-being is the resolve of valor; let this always ignite in our hearts. May unwavering commitment to the goal be ever awake in our hearts. With your blessings, may our victorious and united workforce protect righteousness and bring our nation to the highest glory.

Victory to Mother India!

🔸

🌱Video Link:

​Artha-Sahit Sangh Prarthana – Sankrit Prarthana Reimagined

​Video Details:

​Title: Artha-Sahit Sangh Prarthana – Sankrit Prarthana Reimagined

​Channel: siddharth shirole

​Published: 2025-09-27

​Length: PT7M3S (7:03)

🔸🔸🔸

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Memoir ☆ दस्तावेज़ # 45 ☆ The TATA Memorial Hospital (TMH) Parel, Mumbai ☆ Shri Hemant Tarey ☆ 

Shri Hemant Tarey

 

(This is an effort to preserve old invaluable and historical memories through e-abhivyakti’s “दस्तावेज़” series. In the words of Shri Jagat Singh Bisht Ji – “The present is being recorded on the Internet in some form or the other. But some earlier memories related to parents, grandparents, their lifetime achievements are slowly fading and getting forgotten. It is our responsibility to document them in time. Our generation can do this else nobody will know the history and everything will be forgotten.”

In the next part of this series, we present a memoir by Shri Hemant Tarey Ji The TATA Memorial Hospital (TMH) Parel, Mumbai.“)

☆ दस्तावेज़ # 27 – The TATA Memorial Hospital (TMH) Parel, Mumbai. ☆ Shri Hemant Tarey ☆

This pioneer institution in the area of Prevention, treatment and research of Cancer disease came into being on 28/2/1941.

In the year 1931, Sir Dorabji Tata ( Chairman of TATA Sons ) had lost his wife, Lady Meherbai Tata of Leukaemia, after treatment abroad. The tragic incidence touched the man deeply and he resolved to develop medical facility in India itself for treatment of this dreaded disease. Though, Sir Dorabji Tata expired in 1932, the clear vision of Sir Dorab Tata Trust and commitment from the house of TATA eventually culminated in the birth of TMH in 1941. Since then, the Institution has attained many milestones. From 1962, the administrative control of this institution vests with the Department of Atomic Energy, GOI. Currently, the Institution receives about 64000 patients annually and it’s annual expenditure budget is close to Rs 200 crore.

In 1990, I too fell prey to the disease and visited the Hospital many times in a spell of following 2- 3 years. The Institution can really boast of world class treatment facilities and highly professional team of Doctors, other medical staff and administrative support staff. They all deserve kudos for the wholehearted service (with very high ethical and moral values) of the mankind 🙏🏼

♥♥♥♥

Photo courtesy – https://tmc.gov.in/TMH/Home

© Hemant Tarey

मो.  8989792935

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ४४ – भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत / The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत / The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories ।) 

☆  दस्तावेज़ # ४४ – भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(लोगों से बातचीत, AI पर रिसर्च के आधार पर और अपनी पूर्व में संग्रहित जानकारी को मिलजुला कर एक दस्तावेज़)

भारतीय आयुध निर्माणी, जिसका इतिहास 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है, देश की सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा रही है। कभी अंग्रेजों के शासन में शुरू हुए ये कारखाने बाद में भारत की सबसे बड़ी रक्षा उत्पादन इकाइयाँ बन गईं।

कोलकाता में मुख्यालय रखने वाला ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) 41 फैक्ट्रियों और लगभग 80,000 कर्मचारियों का समूह था, जो हथियारों, गोला-बारूद, और सैनिकों के उपकरण बनाता था।

परंपरा और चुनौतियाँ

200 वर्षों की गौरवशाली परंपरा के बीच, कई समस्याएं सामने आईं। उत्पादन में देरी, गुणवत्ता की शिकायतें, और प्रबंधन का हठधर्मी रवैया – ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की कमजोरियां थीं।

सरकारी नियमों की वजह से तेजी से बदलते वैश्विक रक्षा बाजार में तालमेल बिठाने में कठिनाई होती थी। कर्मचारियों की मेहनत के बावजूद, सुधार की जरूरत बढ़ती गई।

निगमीकरण से क्या बदला?

सरकार ने यह निर्णय लिया कि OFB को खत्म करके इसकी फैक्ट्रियों को 7 नए, स्वतंत्र, लेकिन पूरी तरह से सरकारी स्वामित्व वाले, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) में बदला जाएगा।

यह निगमीकरण है, ना कि निजीकरण। इसका मतलब है कि ये नई कंपनियां सरकार की ही होंगी, लेकिन प्रबंधन अधिक पेशेवर, कुशल, और बाज़ार उन्मुख होगा।

इन 7 DPSUs के नाम हैं:

  • म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड, बख्तरबंद वाहन निगम लिमिटेड,
  • एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड,
  • ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड,
  • यंत्र इंडिया लिमिटेड,
  • इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड, ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड।

भ्रांतियों का समाधान

कई बार यह गलतफहमी फैलती रही है कि इन नई कंपनियों का संचालन निजी कॉर्पोरेट्स जैसे अदाणी समूह द्वारा किया जा रहा है, जो सच नहीं है।

सभी DPSUs पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में हैं और उनका संचालन सरकार द्वारा नियुक्त बोर्ड करता है।

कोलकाता में नियुक्त डीजीओएफ का कार्यालय भी अब बंद हो चुका है।

आगे का रास्ता

यह निगमीकरण हमारी रक्षा उत्पादन व्यवस्था को और मजबूत करेगा। उत्पादन में सुधार, गुणवत्ता में सुधार, और नई तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। कर्मचारियों के हितों की रक्षा की गई है और उन्हें आधुनिक औद्योगिक माहौल में नए कौशल सीखने का मौका मिलेगा।

यह बदलाव केवल एक नयी शुरुआत है, जिसमें हमारे आयुध निर्माणी के शौर्य को बनाए रखते हुए, उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा है। हर कर्मचारी की मेहनत, समर्पण, और परंपरा से जुड़ाव, इस परिवर्तन की सफलता की कुंजी है।

🔸

 – जगत सिंह बिष्ट

🍀The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories 🍀

India’s ordnance factories stand as a proud symbol of the nation’s defense manufacturing heritage, tracing back over 200 years to the early 1800s.

The journey began under British colonial rule when the first gunpowder factory was established in 1787 at Ishapore near Kolkata, starting production in 1791. The Gun Carriage Agency at Cossipore (now Kolkata), which began production in 1802, remains the oldest ordnance factory still operational today.

These factories have supported India’s armed forces through multiple wars— from the 1947 independence battle to the Kargil conflict in 1999 — serving as the “arsenal of the nation.”

Over two centuries, the Ordnance Factory Board (OFB), headquartered in Kolkata, expanded to include 41 factories that manufactured a wide range of weapons, ammunition, vehicles, and equipment, employing over 80,000 workers.

The factories prided themselves on a glorious legacy of steadfast support to the defense forces, technological contribution to India’s industrial rise, and pioneering roles in setting up research and industrial institutions across the country.

🌱Challenges Behind the Legacy

However, this illustrious history was also marked by deep-rooted challenges. Despite the vast workforce and legacy, productivity remained low; factories were often criticised for delayed deliveries, substandard product quality, and operational inefficiencies.

The OFB operated under rigid government structures that limited autonomy and innovation, making modernization a slow process. Many workers dedicated decades to their craft, yet the system struggled to keep pace with evolving defense demands and global defense manufacturing standards.

🌱The Corporate Reform:

♦️Corporatisation, Not Privatisation

Recognising the urgent need for reform, the Government of India, after extensive deliberation and consultations, initiated a landmark decision in 2021: the dissolution of the Ordnance Factory Board and the corporatisation of its factories into seven new Defence Public Sector Undertakings (DPSUs).

It is important to note that this was a corporatisation and not a privatisation. The new DPSUs remain 100% government-owned and controlled, operating with greater autonomy, professional management, and commercial agility.

The seven DPSUs are:

✅Munitions India Limited

✅Armoured Vehicles Nigam Limited

✅Advanced Weapons and Equipment India Limited

✅Troop Comforts Limited

✅Yantra India Limited

✅India Optel Limited

✅Gliders India Limited

This transition was designed to create entities that are more efficient, accountable, and competitive while preserving the legacy and welfare of the workers.

Salaries, pensions, and employment terms were protected during the transition, easing initial apprehensions among employees.

♦️Dispelling Misconceptions

Despite official clarifications, rumours have persisted that the DPSUs are being handed over to private corporates like Adani for management. This is a false narrative.

The seven DPSUs are fully owned by the government and managed by government-appointed boards. No private company controls or manages these defense units.

The former Directorate General of Ordnance Factories in Kolkata was closed along with the OFB, and the centralized command structure replaced by autonomous DPSUs, each with its own board, but under the Ministry of Defence and Department of Defence Production’s oversight.

🌷The Road Ahead: Vision and Optimism

The corporatisation has already shown positive signs with increased financial discipline, improved productivity, and a rise in exports. Efforts are underway to modernize infrastructure, enhance quality standards, and actively pursue technological collaborations.

The government’s vision is to transform these DPSUs into world-class defense manufacturers, supporting India’s goal of becoming self-reliant in defense production while preserving the industrial heritage and workforce welfare.

For workers and staff, the journey might feel like entering a new era of challenges and opportunities. The hope is that this corporate model will allow their valuable skills and dedication to shine, with better resources, management, and future prospects.

🔸

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ४३ – उर्दू से मेरा आत्मिक लगाव  ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे

हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है।)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री हेमंत तारे जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ उर्दू से मेरा आत्मिक लगाव।) 

 ☆  दस्तावेज़ # ४३ – उर्दू से मेरा आत्मिक लगाव ☆ श्री हेमंत तारे ☆

उर्दू भाषा ने बचपन से ही मेरे मन को एक अनकही, रहस्यमयी सी मोहकता से बाँधे रखा है। इसकी मनमोहक लिपि, और इसे दाहिनी ओर से बायीं ओर लिखे जाने कि पध्दति ने मुझे सदैव इस भाषा की और आकर्षित किये रखा.  यह कहना भी आवश्यक होगा कि सुन्दर लिपी से परे इसके चाशनी से पगे उच्चारण हमेशा से मेरे हृदय को  झंकृत करते रहे हैं। बचपन के दिनों में ही इसकी छाप मेरे मन पर पड़ गई थी। यदि मैं अपनी इस रुचि की जड़ों को तलाशने जाऊँ, तो पाता हूँ कि शायद मेरे कुछ बालसखा, जो मुस्लिम समुदाय से थे, उनके माध्यम से उर्दू लिपि और भाषा के प्रति यह आकर्षण जन्मा।

अक्सर,  हमारे साथ ऐसा होता है कि हम जिन चीज़ों से प्रेम करते हैं, उन्हें पाने की राह सहज प्रतीत होती है, लेकिन व्यवहार में हम पहला कदम उठाने से अमूमन चूक जाते हैं। मेरी उर्दू के प्रति प्रेम कहानी भी कुछ ऐसी ही रही— मन में चाह थी, पर कदम ठिठके रहे।

सौभाग्यवश, जब मैं बैंक सेवा से सेवानिवृत्त हुआ,  तब यह दबी हुई रुचि पुनः पूरे जोश और उत्साह के साथ उभर आई। उस समय मुझे शाहरुख़ ख़ान की एक फ़िल्म की निम्न प्रसिद्ध पंक्तियां याद आई:

“किसी चीज़ को अगर शिद्दत से चाहो, तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है”

ऐसा लगा मानो ये शब्द मेरे लिए ही कहे गए हों। उत्साहवर्धक इन शब्दों ने मेरी सुषुप्त चाह को मानो राह दिखा दी हो.

बस, यहीं से मेरी उर्दू सीखने की यात्रा का आरंभ हुआ। पहला कदम था — एक योग्य “उस्ताद” की तलाश। और यह कार्य मेरे लिए आश्चर्यजनक रूप से सरल सिद्ध हुआ। संयोग ऐसा बना कि मेरे पचास वर्षों से अधिक पुराने मित्र, साहेबान ग़नी, जो स्वयं उर्दू में तालीमयाफ्ता रहे हैं, मेरी सहायता के लिए आगे आए और उन्होंने मेरे उर्दू भाषा पढ़ाने के प्रस्ताव का सहर्ष स्वागत किया । मैं अभिभूत तो तब रह गया जब उनकी पत्नी, जो उर्दू विषय में अलीगढ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण है, ने भी मुझे उर्दू सिखाने के लिए मनोयोग से तत्परता दिखाई.

इस प्रकार, कृतज्ञता से भरे हृदय और वर्षों से संजोए हुए सपने को साकार करने के संकल्प के साथ, मैंने इस सुंदर यात्रा की शुरुआत लगभग 10 वर्ष पूर्व प्रारंभ की.  शुरूआत दुरूह थी.  मैं ने उर्दू लिपी का ककहरा जुगाडा, और कुछ इस तरह मैं उस भाषा की और चहलकदमी करने लगा जो वर्षों से चुपचाप मेरा इंतज़ार कर रही थी।

आज मैं उर्दू सहजता से पढ लिख लेता हूँ और मेरे घर नियमित रूप से उर्दू समाचार पत्र “इंकलाब” आता है.  उर्दू सीखने का क्रम अब भी जारी है और अपनी उर्दू शब्द संपदा संवर्धित करने का मेरा प्रयास भी. 🙏

♥♥♥♥

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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