हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०७ ⇒ पान खाएं सैंया हमारो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पान खाएं सैंया हमारो।)

?अभी अभी # ९०७ ⇒ आलेख – पान खाएं सैंया हमारो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सांवली सुरतिया होंठ लाल लाल ! जैसा कि तीसरी कसम के इस गीत से स्पष्ट है, पान पुरुषों का मुख श्रृंगार है। आप कह सकते हैं, यह मर्दों का लिपस्टिक है। पान को ताम्बुल भी कहते हैं। आयुर्वेद में इसका गुणगान है। भोजन के पश्चात् इससे मुखशुद्धि की जाती है।

पान और कुछ नहीं, एक प्रजाति का पत्ता है जिसमें कत्था, चूना, लौंग, इलायची मिलाकर बनारस वाला बीड़ा बनाया जाता है, और बिग बी के शब्दों में इसे गौरी का यार चबाता है। लगता है, बिना पान खाए, रंग नहीं बरसता।।

एक कहावत मशहूर है, नीचे पान की दूकान, ऊपर गौरी का मकान ! कुछ हद तक यह कहावत सही भी लगती है। एक समय था, जब किसी मजनू को पहचानना होता था, तो वह पान की दुकान पर खड़ा मिलता था। पान की दुकान पर सिर्फ पान ही नहीं खाया जाता, कई और गतिविधियां भी होती हैं। ताका – झांकी और छेड़छाड़ के लिए इससे अच्छा सत्संग स्थल और कहां मिल सकता है।

पान रसिकों की पहचान है। स्वच्छ भारत अभियान ने रसिकों की पीक पर लात मारी है। कोई भी गली मोहल्ला, सरकारी स्कूल, दफ्तर, थाना, अदालत, और तो और रास्तों में रखे पीकदान तक, पान की पीक की पहचान बन चुके थे। भला हो पान पराग, पान मसाला और पान पसंद जैसी गोलियों का, जो पान का स्वाद भी देती हैं और होंठ भी लाल नहीं करती। जो पीक कभी रास्तों को क्रिकेट का पिच बना देती थी, वह पिचकारी शनै: शनै: छोटी होती चली गई और स्वच्छता अभियान के चलते लुप्त – प्राय हो गई।।

खानदानी लोग आज भी घर में पान दान रखते हैं ! अपनी हैसियत के अनुसार यह चांदी अथवा पीतल का हो सकता है। एक गीले कपड़े में करीने से रखे हुए कुछ पान, सूखा कत्था, गीला चूना, लौंग, सुपारी, इलायची और पिपरमिंट के साथ थोड़ा किमाम भी नज़र आ ही जाता है। घर की सभ्रांत महिलाएं, तब चौराहों पर पान नहीं खाया करती थी। पान बनाना और पेश करने का भी एक अंदाज़ होता है।

राज पुरोहित और राजवैद्य की तरह उस ज़माने में सरकारी तंबोली भी होते थे। इंदौर के व्यस्ततम कोठारी मार्केट के सामने सरकारी तंबोली का प्रतिष्ठान आज भी इसका गवाह है। नुक्कड़ सीरियल के चौरसिया के विपरीत यहां का वातावरण शांत रहता है। सामने के छायादार वृक्ष पर लटकी एक पानी की छागल, आज भी आगंतुकों की प्यास बुझाती है।

पान, न तो जल्दी में लगाया जाता है, और न ही फुर्ती से खाया जाता है। शादी विवाह में हल्दी की रस्म की तरह ही, एक पान की रस्म भी होती है। जब दूल्हे राजा घोड़ी पर सवार होते हैं, तो उनके मुंह में पान अवश्य ठूंसा जाता है। हर शुभ कार्य, मुख शुद्धि से होता है।।

जो पान के शौकीन हैं, उनके पान की दुकानें भी निश्चित होती हैं। वे सिर्फ जाकर खड़े हो जाते हैं, उनका पान बनता रहता है। मीठा पत्ता, सिकी बारीक सुपारी, सौंफ, इलायची, गुलकंद, खोपरा बूरा, और हां एक लौंग।

महिलाएं भी पान की शौकीन होती हैं। वे पान की दुकान पर जाकर खड़ी नहीं होती, उनके हिसाब का पान जाकर लाना पड़ता है। अक्सर चाय पान की पार्टियों में चाय बिस्किट ही देखने में आते हैं। पान नदारद रहता है।।

बड़े खेद का विषय है, शराब जैसी बुरी चीज पर बच्चन जी ने मधुशाला जैसी अमर रचना कर डाली, लेकिन पान जैसे सात्विक, नवाबी शौक को नजर अंदाज कर दिया। है कोई पान का लाल, जो पान पर अपनी कलम चलाकर पान को अमर कर डाले ?

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०६ ⇒ वस्तुओं का अदृश्य पक्ष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वस्तुओं का अदृश्य पक्ष ।)

?अभी अभी # ९०६ ⇒ आलेख – वस्तुओं का अदृश्य पक्ष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

[HIDDEN SIDE OF THINGS]

हमारी सृष्टि दो भागों में बंटी हुई है, जड़ और चेतन ! Animate और inanimate.

नदियां, झरने, वृक्ष, पशु पक्षी और इंसान अगर चेतन हैं तो घर, सड़क, गांव, दरवाजे, खिड़की और फर्नीचर जड़। आप अपने परिवेश को दो भागों में बांट सकते हैं, सजीव और निर्जीव।

जो हमें पलटकर जवाब दे, कुछ अपनी कहे, कुछ हमारी सुने, जिसमें धड़कन हो, जो चलती फिरती नजर आए, जिसमें प्राण हो, जिसके शरीर में गतिविधि हो, कुछ हरकत हो, जिसमें चेतना हो, उसे आप जीव अथवा सजीव कह सकते हैं। जहां संवाद कायम हो, आंखों आंखों में बातें हों। जिसे आप गोद में उठा सकें, फिर भले ही वह आपका पालतू जानवर हो।।

लोग नवजात शिशुओं से बातें किया करते हैं। वे होते ही हैं इतने प्यारे।। माएं अपने बच्चों से घंटों बातें किया करती हैं। बस बच्चा उन्हें देखता रहता है, हंसता मुस्कुराता रहता है। मां ही सवाल करती है, मां ही जवाब दिया करती है। प्रेमिका की आंखों में तो डूबने के कई किस्से हैं। एक दूसरे के लिए जान छिड़कना आम है। बस दोनों में जान होना चाहिए।

हम आज बेजान चीजों की बात करेंगे। ऐसी चीजें जो हैं तो हमारे आसपास, लेकिन हमारी नजर में तब ही आती है, जब हमें उनसे काम पड़ता है। आप घर में बैठे हैं, जूता बाहर पड़ा हुआ है। जब बाहर जाते हैं, तो जूते की याद आती है। पांव में पहना और चल दिए। जूते की अपनी जगह है। जूते की भी हमारे जीवन में जगह है, उपयोगिता है। लोग सस्ते और महंगे दोनों तरह के जूते पहनते हैं। जो जूतों के शौकीन होते हैं, उनके यहां शू स्टैंड नहीं, जूतों का भी वॉर्डरोब होता है। लेकिन जब किसी को जूते पड़ते हैं, तो यह घोर अपमान कहलाता है।।

रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूलभूत आवश्यकताएं हैं। तीनों में जान नहीं, लेकिन पेट की भूख रोटी से ही मिटती है। तन पर कपड़ा हमारी इज्जत है और मकान है तो हमारे सर पर छत है। पेट की भूख इंसान से क्या नहीं कराती। यही भूख जब बढ़ जाती है तो आदमी पैसा भी खाने लग जाता है। पैसे की भूख, कपड़े लत्ते की भूख, गहनों की भूख, प्रशंसा की भूख। सभी बेजान, लेकिन सबमें अटकी हमारी जान।

व्ही.शांताराम की एक फिल्म आई थी, गीत गाया पत्थरों ने ! क्या पत्थर भी बोलते हैं ? जब दीवारों के भी कान हो सकते हैं, तो पत्थर क्यों नहीं गीत गा सकते। आपके घर की टेबल पर अगर धूल जमी है, तो क्या आपने कभी सोचा है, टेबल क्या सोचती होगी ! जब आप टेबल साफ करते हैं, तो वह आपको धन्यवाद देती है, लेकिन आप सुन, समझ, देख नहीं सकते। आप गुस्से में जब जूता पटकते हैं, तो जूते को भी दर्द होता है, जिसे आप महसूस नहीं कर सकते। जब आप प्यार से मोजे पहनते हैं, तो मोजे बहुत खुश होते हैं, बस आप महसूस नहीं कर पाते।।

एक घर की जब साफ़ सफाई, रंग रोगन होती है तो उसके चेहरे पर भी वही चमक और ताजगी होती है, जो हमें नहाने और सजने संवरने के बाद महसूस होती है। अक्सर गुस्से में हम जोर से दरवाजा बंद करते हैं, यह जाने बिना, कि दरवाजे की आवाज़ में भी आह होती है और किसी प्रिय के आगमन पर जब हम खुश होकर दरवाजा खोलते हैं, तो उसमें भी दरवाजे की वाह होती है।

थियोसोफिस्ट सी.डब्ल्यू.लेडबीटर की सन् १९१३ में प्रकाशित एक पुस्तक है, Hidden Side of things, जिसमें बेजान अथवा निर्जीव और जड़ चीजों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है। हम आसमान से यूं ही बात नहीं करते। घर हमें कब काटने को दौड़ता है। दरिद्रता दबे पांव कैसे हममें प्रवेश करती है, जब हम आसपास की वस्तुओं के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। वस्तुएं स्पर्श पहचानती हैं, तभी तो वे हमारी हो पाती हैं। पसंद की साड़ी, पसंद की शर्ट ! बहुत से ऐसे सवाल हैं, जो कभी हमारे मन में उठते ही नहीं। और जब उठते हैं, जो जवाब भी मिलने लगते हैं। आगे से जब भी कोई चीज गुस्से में पटकें, तो कान खोलकर सुनें !

शायद वह कह रही हो, मैं भी मुंह में जबान रखती हूं। फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाजुक होते हैं। सिर्फ फूल में ही नहीं, मुझमें भी रब बसता है।

कण कण में भगवान। मान सके तो मान।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६४ – देश-परदेश – बिका हुआ समान वापिस नहीं होगा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६४ ☆ देश-परदेश – बिका हुआ समान वापिस नहीं होगा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त सूचना अधिकतर दुकानों पर लगे हुए बोर्ड पर प्रमुखता से लिखी हुई मिल जाती हैं। आजकल तो इसके स्टीकर भी मिलते हैं।

अब समय ऑनलाइन का हो गया है, मतलब जिस सामान को देखा भी नहीं उसको भी क्रय कर लो। वापसी में भी कोई कठिनाई नहीं होती हैं। हम तो एक दो बार गर्म स्वेटर बिना स्टीकर उतारे उपयोग कर वापस भुना लेते हैं। नए कपड़े पहने हुए फोटो अपने मोबाइल की डी पी या फेस बुक में चिपका कर अपनी रईसी का परचम लहराते रहते हैं।

इस कड़कती ठंड में मुफ्त का मॉल डकारने के लिए ऑनलाइन एक जैकेट मंगवा कर उसका विवाह में उपयोग भी कर किया। जब उसकी जेब में हाथ डाला तो उसमें एक हरा पांच सौ का नोट पड़ा मिला था। वो ही नोट विवाह के शगुन में काम आ गया। रात्रि वापसी पर जब हमारा हैंगओवर कम हुआ, तब हमारी समझ में आया ये जैकेट हमसे पूर्व भी किसी ने ऑनलाइन मंगवाकर उपयोग करके वापसी कर दी होगी। कुल मिलाकर हमने सैकंड हैंड कपड़े उपयोग किए।

विदेश में तो कपड़े इत्यादि लम्बे समय तक भी वापिस ले लिए जाते हैं। एक बार मित्र ने जब छह माह पहले खरीदी हुई कमीज़ वापिस की तो दुकानदार ने तीस प्रतिशत काट कर राशि वापिस करने की जानकारी दी क्योंकि वो शर्ट अब तीस प्रतिशत डिस्काउंट पर दुकान में विक्रय हो रही थी। मित्र ने कुछ बहाना बताकर कमीज़ वापसी नहीं करी थी। विदेशों में तो शहर के मध्य में ऑनलाइन विक्रेताओं ने सिर्फ वापसी के लिए अलग से दुकानें तक भी खोल कर सुविधा प्रदान करी हुई हैं।

आप तो बस बिना आवश्यकता के खरीदी करो, वापसी, उधार, डिस्काउंट जैसे लुभाने वाले अनगिनत ऑफर आप की सेवा में हाजिर हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०५ ⇒ राग द्वेष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “राग द्वेष।)

?अभी अभी # ९०५ ⇒ आलेख – राग द्वेष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

राग – द्वेष और निंदा – स्तुति को अध्यात्म में विकार के रूप में परिभाषित किया गया है। राग आसक्ति को कहते हैं। सांसारिक प्रेम भी राग की श्रेणी में आता है। घर परिवार, पत्नी, बच्चे और भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण मनुष्य के लिए एक अत्यंत स्वाभाविक एवं सहज स्थिति है। यही राग जब ईश्वर के प्रति होता है, तो उसका स्वरूप बदल जाता है।

अपने बच्चे से प्यार कौन मां नहीं करती ! उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे ? ओनिडा टीवी का वह विज्ञापन याद कीजिए ;

Neighbour’s envy, owner’s pride. सौतिया डाह पर महिलाओं का ही कॉपीराइट नहीं, हम पुरुष भी इसके शिकार हैं। कहीं सिगरेट सौत है तो कहीं किताब अथवा आज की मुई फेसबुक। कृष्ण कुमार की जलती हुई सिगरेट किसी कन्हैया की बांसुरी से कम नहीं, जिसे आज की राधा ने कई बार के.के. के मुंह से निकाल ना फेंका हो। आज की अमृता प्रीतम एक आदर्श राधा है जिसने साहिर को एक सिगरेट की तरह पीया है और उसके धुएं से अपना कलेजा जलाया है। हम प्यार में जलने वालों को चैन कहां, आराम कहां।।

दो प्यार करने वालों के बीच रागात्मक संबंध होता है लेकिन तीसरे के बीच में आते ही द्वेष का जन्म हो जाता है। कहते हैं प्यार का फल मीठा होता है, लेकिन जब प्यार के वृक्ष पर ज़्यादा फल लद जाते हैं, तो प्यार बंट जाता है। हमारे प्यार की जड़ें किसी फलदार वृक्ष की जड़ों जितनी मजबूत नहीं, और ना ही हमारा प्यार उन ऊंचाइयों तक पहुंच पाया है, जिसकी मिसाल राधा और मीरा के रूप में दी जाती है। कृष्ण हमारे आराध्य हैं, लेकिन हमारे आदर्श आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम ही हैं। चोरी छुपे रास में और वृंदावन के रास में जमीन आसमान का अंतर है। हमारे समाज को आज भी रुकमणी ही पत्नी के रूप में ही स्वीकार्य है, राधा नहीं। प्रेम से बोलें राधे राधे।

जब सारे राग विराग हो जाते हैं, मोह का स्थान त्याग ले लेता है, तब कृष्ण की बांसुरी से प्रेम होता है। तब मन में द्वेष नहीं रास का जन्म होता है, बिन सुर ताल, पचीसों राग जन्म ले लेते हैं, पायल की झंकार गूंजने लगती है, मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।

कुछ लोग अपने प्यार को सहेजकर रखते हैं। उसमें बड़ा खतरा है। प्यार को लॉकर में बंद नहीं किया जा सकता। प्यार का अचार नहीं डाला जाता। अगर डालें भी तो उसे बांटें भी। प्यार को छुपाकर रखने से उसे नजर लग जाती है। ज्ञान की तरह, प्यार बांटने से बढ़ता है।

प्यार का पैमाना कभी खाली ना हो। प्यार सबसे किया जाय, प्यार सबको बांटा जाय, विरक्ति और वैराग्य वाले प्यार में न राग होता है, ना द्वेष। लेकिन इस विपक्ष और कांग्रेस का क्या किया जाए,

इसी ने तो मचा रखा है क्लेश। काश प्रेम में इतनी शक्ति होती। न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। कोई ऐसा प्रेम का पियाला पिला दे, कि हम राग द्वेष को भूल जाएं। किसी ने सही कहा है। ज़िन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है। चाहे थोड़ी ही हो, ये उमर बड़ी होती है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२१ ☆ वैचारिकी – गांधी और हम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘वैचारिकी – गांधी और हम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२१ ☆

☆ आलेख ☆ वैचारिकी – गांधी और हम

गांधी जी की 78 वीं पुण्यतिथि आयी और गुज़र गयी। मालाएं चढ़ गयीं, चित्रों की पोंछा-पांछी हो गयी, भाषण  हो गये, ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ का गायन हो गया। वैसे कुछ दिन पहले पटना में जब उनका भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाया गया तो कुछ लोगों ने ‘ईश्वर’ के साथ ‘अल्ला’ का नाम जोड़ने पर आपत्ति की। नतीजतन भजन की गायिका को क्षमा  मांगनी पड़ी। यह दिखाता है कि हम गांधी के ज़माने से कितना आगे बढ़ आये हैं। यहां अब ईश्वर और अल्लाह का एक साथ गुज़र मुश्किल हो गया है।

गांधी अब हमें बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। कहीं उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ माने जाने पर ऐतराज़ है, तो कहीं उन पर देश का विभाजन मंज़ूर करने का इल्ज़ाम लगाया जाता है, जब कि विभाजन के मुद्दे पर गांधी जी द्वारा कहे गये शब्द सर्वविदित हैं। इसीलिए वे आज़ादी के जश्न में शामिल नहीं हुए थे। उस वक्त वे बंगाल के दंगाग्रस्त इलाकों में घूम रहे थे। कुछ समझदार लोग 1947 में मिली आज़ादी को आज़ादी नहीं मानते क्योंकि उनकी नज़र में वह ‘भीख’ में मिली थी। असली आजादी वह है जो युद्ध के द्वारा मिले।

दो-तीन वर्ष पहले देखा कि 30 जनवरी को एक साध्वी ने गांधी के चित्र पर तीन गोलियां चलाकर मिठाई का वितरण किया। साध्वी जी के विरुद्ध इस जघन्य अपराध के लिए क्या कार्यवाही हुई इसका पता नहीं, लेकिन अपना सिर शर्म से ज़रूर झुक गया। मनाया कि देश से बाहर किसी ने इस शर्मनाक दृश्य को न देखा हो।

गांधी के व्यक्तित्व ने दुनिया पर क्या असर डाला यह इस बात से सिद्ध होता है कि दुनिया के 84 देशों में गांधी जी की 110 से अधिक मूर्तियां हैं। इनमें रूस और चीन भी शामिल हैं। इनमें से 8 मूर्तियां अमेरिका में और 11 जर्मनी में हैं। ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, इटली, ब्राज़ील, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, इराक, इंडोनेशिया, फ्रांस, मिश्र, जापान, कुवैत, नेपाल, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, कतर, सऊदी अरब, श्रीलंका आदि देशों में भी बापू की मूर्तियां स्थापित हैं।

ताज्जुब होता है कि दूसरे देशों के लोग एक विदेशी सामान्य नागरिक की प्रतिमा को कैसे बर्दाश्त कर रहे हैं। गांधी के अपने देश में कभी उनकी मूर्ति का चश्मा तोड़ दिया जाता है, कभी नाक तोड़ दी जाती है, कभी काला-नीला रंग पोत दिया जाता है। मूर्तियों के रख-रखाव में अधिकारियों को पसीना आ रहा है। यहां अपने महापुरुषों को संभालना मुश्किल हो रहा है, बाहरी विभूतियों की मूर्तियां कौन संभालेगा? बांग्लादेश में भी जनता अपने महानायक की मूर्ति की कपाल- क्रिया कर रही है।

बापू के प्रशंसक और अनुयायी पूरे विश्व में रहे हैं। नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) उनके अनुयायी थे। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने उनके विषय में लिखा—‘अगली पीढ़ियों को विश्वास करना कठिन होगा कि ऐसा हाड़-मांस का व्यक्ति कभी पैदा हुआ।’ जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से पूछा गया कि वे किस दिवंगत या जीवित व्यक्ति के साथ डिनर करना पसंद करेंगे तो उन्होंने महात्मा गांधी का नाम लिया, जो उनकी नज़र में ‘रियल हीरो’ थे।

उनकी महानता के बारे में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन का कथन था, ‘यदि इतिहास आपका निष्पक्ष मूल्यांकन कर सका तो वह आपको ईसा और बुद्ध की कोटि में रखेगा।’

ध्यान देने की बात है कि गांधी जी ने देश की आज़ादी उन अंग्रेज़ों के जबड़े से छीनी जिनके राज में सूरज नहीं डूबता था, जिन्होंने नवाब वाजिद अली शाह, महारानी लक्ष्मीबाई और बहादुर शाह ज़फ़र का घोर अपमान कर सत्ताच्युत किया था। बड़े-बड़े राजा उनके दरबार में कोर्निश बजाते थे। उन्हें ही एक फ़कीर के अहिंसक आंदोलन के आगे हथियार फेंकने पड़े।

1931 में गांधी जी की सम्राट जार्ज पंचम से बकिंघम पैलेस में मुलाकात ऐतिहासिक थी। गांधी जी वही अपनी घुटनों तक धोती और शॉल की वेशभूषा में थे। उन्होंने पश्चिमी वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया था। भेंट के बाद जब संवाददाताओं ने उनकी पोशाक के बारे में प्रश्न किये तब गांधी ने हंसकर जवाब दिया, ‘वह (सम्राट) हम दोनों के हिस्से के कपड़े पहने थे।’

गांधी एक करिश्मा थे। उन्होंने हमारे देश के लिए जो किया वह दैवी प्रेरणा के बिना संभव नहीं हो सकता। हमारा देश खुशकिस्मत है कि यहां गांधी ने जन्म लिया, अन्यथा शायद हम आज़ादी की सुबह न देख पाते।

भारत के इतिहास में गांधी की अमूल्य भूमिका को ठीक से समझने के लिए स्कूली बच्चों को उनकी आत्मकथा पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। सिर्फ मूर्तियां खड़ी करना और भाषण देना पर्याप्त नहीं है। हम गांधी के प्रति इतनी कृतज्ञता तो दिखा ही सकते हैं कि अकृतज्ञता के सबूत न दें। वैसे गांधी ने दिखा दिया है कि वे हमारी कृतज्ञता के मोहताज नहीं हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२२ – अहं और अहंकार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२२ अहं और अहंकार… ?

प्रबोधन और व्याख्यान के लिए विभिन्न समुदायों के बीच जाना होता रहता है। प्रायः हर मंच से कहा जाता है कि फलां समुदाय या वर्ग की एकता देखो, पर हम ऐसी केकड़ा प्रवृत्ति के हैं कि हमारा वर्ग कभी एक नहीं हो सकता। जबकि सत्य यह है कि कोई भी समुदाय  इसका अपवाद नहीं है। अलबत्ता अहंकार की अधिकता व्यक्ति विशेष को  सर्वमान्य बनने से रोकती है।

सिक्के का दूसरा पहलू है कि अहँ के भाव के बिना कोई प्रगति कर भी नहीं सकता। यहाँ  ‘अहं’ का संदर्भ अपने अस्तित्व के प्रति सचेत रहने, अपने पर विश्वास रखने से है। तथापि ‘अति सर्वत्र वर्ज्येत’, यहाँ भी लागू होता है। इस अहम् को विस्तार न दें, आकार न दें। यह ऐसा ही है जैसे थोड़ी सी आग से हाथ सेंककर ठंड दूर कर ली जाए या भोजन बना लिया जाए, पर आग यदि बढ़ जाए, अलाव दावानल में बदल जाए तो उसमें व्यक्ति स्वयं ही भस्मीभूत हो जाएगा। अहं को आकार देना ही अहंकार है, इससे बचें।

फिर अहंकार भी किसलिए ! नीति कहती है कि हर मूल का मूल पहले से ही मौजूद है। सृष्टि में मौलिक कुछ भी नहीं है। जो बात हमने आज जानी, वह हम से पहले लाखों जानते थे, हमारे बाद करोड़ों जानेंगे। अपने ज्ञान की तुलना यदि हम अपने अज्ञान से करें तो कथित ज्ञान स्वयं ही लज्जित हो जाएगा, उसका आकार बहुत छोटा हो जाएगा, अतः आवश्यक है-अहंकार का निर्मूलन।

कबीर लिखते हैं-

जब मैं था तब हरि नाहिं, अब हरि हैं मैं नाहिं,

प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहिं।

अहंकार होगा तो हरि कैसे मिलेंगे, यदि हरि नहीं मिलेंगे तो अज्ञान का तम कौन हरेगा? मनुष्य के हाथ में कर्म तो है पर फल की निष्पत्ति उसके बस में नहीं।

समय के कुप्रबंधन के शिकार प्रायः कहते हैं, ‘आज इतना व्यस्त रहा कि भोजन के लिए समय ही नहीं रहा।’ अर्थात्‌ सारी भाग-दौड़ के बाद भी उस दिन भोजन पाना या ना पाना उसके हाथ में नहीं है। ‘मैं’ की अति व्यक्ति को दृष्टिहीन-सा कर देती है। वह कर्म का नियंता और उपभोक्ता भी खुद को ही समझने लगता है।

किसी नगर में एक साधु आए। नगरसेठ ने मुनीम के हाथ उस दिन के भोजन का निमंत्रण भेजा। नगरसेठ के यहाँ काम करते-करते मुनीम की ज़बान पर अहंकार चढ़ गया था। जाकर साधु से कहा,”आपको आजका भोजन हमारे सेठ खिलायेंगेे।” साधु फक्कड़ था, कहा,”अपने सेठ से कहना आज तो तू खिला रहा है, कल कौन खिलायेगा?” मुनीम ने सारा किस्सा जाकर सेठ को सुनाया। सेठ बुद्धिमान और विनम्र था। सारी बात समझ गया। स्वयं साधु के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला,” महाराज कल जिसने खिलाया था, आज भी वही खिला रहा है और आनेवाले कल भी वही खिलायेगा।  मुझे तो उसने आज के लिए निमित्त भर बनाया है।”

मनुष्य के लिए अपनी इस नैमित्तिक स्थिति को समझना ज़रूरी है। पथिक यदि यह मान ले कि वह नहीं चलेगा तो पगडंडी कहीं जाएगी ही नहीं, वहीं पड़ी रहेगी, तो इससे बड़ी नादानी कोई नहीं।

धन, प्रसिद्धि, रूप आदि का संचय व्यक्ति को बौरा देता है। लोग बटोरकर बड़ा होना चाहते हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ, “बाँटकर देखो, जितना बाँटोगे, अहंकार घटेगा। जितना अहंकार घटेगा, उतना तुम्हारा कद बढ़ेगा।”… विश्वास न हो तो प्रयोग करके देख लो।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट? ☆ डॉ. सिद्धार्थ वर्मा ☆

डॉ. सिद्धार्थ वर्मा

संक्षिप्त परिचय

डायरेक्टर मिरेकल मेडीकेयर, जबलपुर म. प्र., प्रोफेसर ◊ डॉ भगतसिंह राय कॉलेज, सिवनी ◊ पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर ◊ सी एस एस मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज ◊ स्वास्थ्य एवं जन जागरूकता विशेषज्ञ  ◊ कई राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियानों से जुड़े हुए ◊ समाज में वैज्ञानिक सोच के प्रचार-प्रसार हेतु सक्रिय।

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट?

☆ आलेख ☆ कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट? ☆ डॉ. सिद्धार्थ वर्मा ☆

कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट?

जब खेल का आकाश राजनीति के बादलों से ढक जाए।

कभी खेल का मैदान मंदिर जैसा पवित्र हुआ करता था — जहाँ पसीने की हर बूँद प्रार्थना थी, हर जीत विनम्रता और हर हार एक नई सीख। वहाँ राष्ट्रध्वज से पहले मनुष्यता का सम्मान होता था, और प्रतिद्वंद्वी शत्रु नहीं, सहयात्री माना जाता था। पर आज उसी मैदान पर प्रश्न खड़ा है — क्या खेल अब भी अपनी आत्मा के साथ जीवित है?

खेल केवल शरीर की प्रतिस्पर्धा नहीं, आत्माओं का संवाद है। यह वह भाषा है जो बिना शब्दों के देशों को जोड़ती है, वह पुल है जो सीमाओं के ऊपर से गुजरता है। ओलंपिक के पाँच छल्लों में गुँथी मित्रता हो या विश्व कप की चमक में छिपा संघर्ष — हर जगह खेल ने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का प्रयास किया है। रंतु समय की धूल में यह पुल अब धीरे-धीरे दरकने लगा है।

हालिया घटनाएँ — बांग्लादेश का टी-20 विश्व कप से बाहर होना और उस पर पाकिस्तान का समर्थन — केवल खेल समाचार नहीं, बल्कि हमारे समय की एक गहरी कथा है। यह कथा बताती है कि कैसे निर्णय अब बल्ले और गेंद से नहीं, बल्कि कूटनीति की मेज़ पर तय होने लगे हैं। यहाँ प्रश्न किसी एक देश का नहीं, उस प्रवृत्ति का है जो खेल की आत्मा को राजनीति की बेड़ियों में बाँध रही है।

जब राजनीति मैदान में उतर आए

राजनीति का खेल में प्रवेश कोई नई घटना नहीं। इतिहास के पन्नों में ओलंपिक बहिष्कारों की स्याही अभी सूखी नहीं है। रंगभेद के अंधकार में डूबा दक्षिण अफ्रीका हो या शीतयुद्ध की ठंडी हवाओं में जमे खेल — हर युग ने देखा है कि सत्ता ने खेल को अपने स्वार्थ का औज़ार बनाया।

पर आज यह हस्तक्षेप अपवाद नहीं, आदत बनता जा रहा है। खेल का वह मैदान, जो संवाद का सेतु था, अब आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बन रहा है। वहाँ अब तालियों से अधिक नारे गूँजते हैं और खेल से अधिक राजनीति खेली जाती है।

स्पोर्ट्समैन स्पिरिट : घायल आत्मा

स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कोई नियम पुस्तिका का शब्द नहीं, वह खेल की आत्मा है। वह भावना है जो प्रतिद्वंद्वी की आँखों में सम्मान खोजती है, जो निर्णायक की सीटी को सिर झुकाकर स्वीकार करती है, जो हार में भी गरिमा बचाए रखती है।

पर जब खिलाड़ी यह जानने लगें कि उनकी किस्मत प्रदर्शन से नहीं, राजनीतिक समीकरणों से तय होगी, तो यह आत्मा घायल हो जाती है। योग्य हाथ खाली रह जाते हैं और अयोग्य निर्णय मंच पा जाते हैं। दर्शक भी यह सोचने लगते हैं कि वे खेल देख रहे हैं या किसी सत्ता-नाटक का दृश्य।

लाभ या भ्रम?

राजनीति के शिल्पी यह मानते हैं कि खेल मंच से दिया गया संदेश दूर तक जाता है। सच है — जाता है। पर वह संदेश अक्सर शांति का नहीं, विभाजन का होता है।

क्षणिक तालियाँ मिल जाती हैं, राष्ट्रवादी ज्वार उठ जाता है, पर भीतर-ही-भीतर रिश्तों की जड़ें सूखने लगती हैं। खेल, जो “सॉफ्ट डिप्लोमेसी” का सबसे सुंदर फूल हो सकता था, अविश्वास का काँटा बन जाता है।

कचरा राजनीति और टूटते आदर्श

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि राजनीति ने शालीनता त्याग दी है। अब न मंच पवित्र है, न माध्यम। शिक्षा हो, संस्कृति हो या धर्म — सब प्रचार के औज़ार बन चुके हैं। खेल भी इस गंदे प्रवाह से अछूता नहीं रहा।

इसका सबसे गहरा घाव बच्चों के मन पर पड़ता है। खेल उन्हें ईमानदारी सिखाता था, पर अब वे सीखते हैं कि ताकत और चालाकी ही सबसे बड़ा हुनर है। जिन नायकों को देखकर वे सपने बुनते थे, आज वही उन्हें निराशा का पाठ पढ़ा रहे हैं।

जिम्मेदारी किसकी?

अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाएँ यदि आज भी मौन रहीं, तो इतिहास उन्हें कठघरे में खड़ा करेगा। उन्हें राजनीति से स्वतंत्र, निर्भीक और पारदर्शी निर्णय लेने होंगे। सरकारों को भी यह स्वीकार करना होगा कि खिलाड़ी सैनिक नहीं होते और ट्रॉफियाँ युद्ध-विजय का प्रतीक नहीं।

आज खेल को बचाना केवल खिलाड़ियों या संगठनों की जिम्मेदारी नहीं, हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। हमें फिर से उस मैदान की तलाश करनी होगी जहाँ प्रतियोगिता में भी करुणा हो, जीत में भी शालीनता और हार में भी मुस्कान।

वरना आने वाली पीढ़ियाँ किसी सूने स्टेडियम में खड़ी होकर पूछेंगी —

कहाँ गई वह स्पोर्ट्समैन स्पिरिट,

और किसने उसे राजनीति की धूल में गुम कर दिया? ”

© डॉ. सिद्धार्थ वर्मा

डायरेक्टर मिरेकल मेडीकेयर, जबलपुर म. प्र.

article.pbs2025@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४३ – आलेख – राष्ट्रकवि स्व जयशंकर प्रसाद जी के जन्मदिवस पर विशेष ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४३ ☆

☆ आलेख ☆ ~ राष्ट्रकवि स्व जयशंकर प्रसाद जी के जन्मदिवस पर विशेष ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

स्मृतिशेष जयशंकर प्रसाद – (30 जनवरी 1889 – 15 जनवरी 1937)

हिंदी साहित्य जगत के श्रेष्ठ साहित्यकार, महाकवि जयशंकर प्रसाद की बेशकीमती रचना… नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में पीयूष-स्रोत-सी बहा करो · देवों की विजय, दानवों की हारों का… जब आधुनिक युग के श्रेष्ठ गीतकार आदरणीय कुमार विश्वास जी स्वर के माध्यम से, जन मानस के हृदय पट पर तैरती है तो यह यह बताने के लिए सक्षम होती है, इस रचना की गुरुता, गंभीरता और गहराई, कितनी हैl

महाकवि जयशंकर प्रसाद शब्दों के चिंतन, मनन और स्पंदन के अद्वितीय संवाहक हैl विचारों के महासमुद्र से एक से एक भाव मणियों को चुनकर उससे एक महाकाव्य महामाला का सृजन करने वाले इस महाकवि का महाकाव्य ग्रंथ “कामायनी” अनंत ब्रह्मांड से लेकर समुद्र की गहराई तक यात्रा करने में सक्षम हैl

विचारों एवं आध्यात्म की नगरी काशी में जन्मे इस साहित्यकार के शब्दों के महाप्रवाह को उनके गीतों के माध्यम से गुना और देखा जा सकता हैl

बाबा भोलेनाथ की काशी जहां के निकले हुए प्रत्येक स्वर हर बार, हर युग में बड़े साहित्य का सृजन करने की सामर्थ्य रखते रहे हैं..

चाहे वह कबीर, तुलसी, रविदास, मुंशी प्रेमचंद या जयशंकर प्रसाद होl

मानव स्वर ही क्या अलग वाद्य यंत्रों से निकले हुए स्वर भी बहुत दूर तक सुनाई देते हैंl चाहे वह बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से निकला हुआ स्वर हो या बिरजू महाराज के घुंघरू से निकली हुई घूँघनाहट के स्वर होंl

काशी के गोवर्धन सराय की गलियों से गुजरते हुए, आम लोगों से पूछते हुए मैं आगे बढ़ता हूं तो लोग कहते हैं कि बाबू! सुघनी साव के हाता जइबा का..? मैं कहता हूँ हांl तो मेरे बचपन की वह दिन याद आते हैं कि जब मैं पुस्तकों में पढ़ता था, तो प्रसाद जी को एक प्रतिष्ठित सुघनी साव परिवार में जन्म लेने की बात लिखी हैl तंबाकू के व्यवसाय से जुड़े रहने के कारण, इस परिवार नाम की पहचान हुई, ऐसा भी मैंने पढ़ा और जब मैं पावन प्रसाद मंदिर पहुंचता हूँ तो, मेरे मानस पटल पर प्रसाद जी की वही पंक्तियां पुनः गुजरते लगती है..

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में पीयूष-स्रोत-सी बहा करो · देवों की विजय, दानवों की हारों की …

सुंदर-सुंदर भाव शब्दों का रेला बिछाते हुए महाकाव्य की रचना करने वाले प्रसाद जी जिनका विशाल रचना संसार है, उनका जन्म इसी घर में हुआ तो वहाँ मै स्वयं को धन्य पाता हूँ और यह मेरी काशी की साहित्य के तीर्थ यात्रा हुईl

प्रसाद जी एक विशाल व्यक्तित्व हैl प्रसाद साहित्य जगत के ऐसे प्रकाश पुंज है जो कि अपनी छवि अपनी छटा को अत्यंत ही कम समय में इतना बड़ा विस्तार देते हैं, कि यह विश्वास ही नहीं होता है कि प्रसाद जी ने अपने इतने छोटे जीवन काल में कैसे इतना बड़ा कार्य कर दियाl

विगत दिनों आदरणीय जयशंकर प्रसाद की प्रपोत्री, कविता कुमारी प्रसाद, जो कि मेरे मंच की सह सचिव भी है ने मेरे युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच उप्र इकाई के पटल पर एक वीडियो शेयर किया थाl

इस वीडियो के माध्यम से मै शीर्ष लेखक साहित्यकार श्याम बिहारी श्यामल द्वारा प्रसाद की जीवन पर लिखी पुस्तक कंथा पर एक युवा साहित्यकारा, बिटिया आदिति तोमर द्वारा प्रस्तुत विमर्श सुन रहा था… पूरे व्याख्यान को सुनने के बाद ऐसा लगा की प्रसाद जी से जीवन से जुड़ी हुई छोटी से छोटी घटनाओं को इस युवा साहित्यकारा ने जिस ढंग से प्रस्तुत किया, लगता था कि एक एक दृश्य हमारे सामने गुजर रहे हैंl

कुछ घटनाओं को सुनकर तो मन ऐसे प्रफुल्लित होता है, जैसे भ्रमर के लिए मकरंद पुष्प मिल गयाl

बिटिया बोलती है..

प्रसाद जी और प्रेमचंद जी रोज बेनियाबाद में टहलते थेl

एक अंश में एक वाकये का वर्णन करते हुए अदिति कहतीं हैं .

गौड़ जी और प्रेमचंद जी और एक साहित्यकार एक जगह बैठे हुए होते हैं, और ठहाका लगता है तो प्रसाद जी उधर से गुजरते हुए कहते हैंl जरूर कोई अच्छी बात हुई होगी इसीलिए हंसा गया है, तो प्रेमचंद जी कहते हैं कि असली हंसी तो आपके बकवास में ही होती हैl

 

ऐसे भाव – स्नेहल रिश्ते होते हैं काशी के साहित्यकारों में..

प्रसाद जी के जीवन के एक पल एक-एक पहलुओं का इस बिटिया ने इतना सुंदर वर्णन किया है, कि केवल इसके इस विमर्श को ही सुन लिया जाए तो हमें प्रसाद के जीवन से जुड़े हुए बहुत से ऐसे ऐसे अनछुए अंश मिल जाएंगे, जिसकी एक साहित्यकार को तलाश होगीl

 वैसे भी हमें यदि साहित्य की गहराइयों तक जाना चाहते है और यदि अपनी साहित्यिक समझ को और ऊंचाइयों तक ले जाना है, तो हमें बड़े साहित्यकारों के साहित्य का साहित्य को न सिर्फ पढ़ना चाहिए, बल्कि उनके जीवन से बहुत कुछ सीखना चाहिएl

जैसा कि मैं इस लेख के शुरुआत में नारी की बात कही है तो प्रसाद जी के परिवार से ही निकली हुई एक बिटिया, ( कविता कुमारी प्रसाद ) प्रसाद जी के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व को जन-जन तक पहुंचाने के लिए, जिस गति से आगे बढ़ रही है, मैं कह सकता हूं कि..

होनहार बिरवान के होत चिकने पात .. वाली कहावत यहां चरितार्थ होती हुई प्रतीत होती है…

मुझे यह भी लगता है कि इस बिटिया के द्वारा किए गए प्रयासों से महाकवि श्री जय शंकर प्रसाद जी के साहित्य को समझने के लिए आगे बहुत सारे अवसर मिलने वाले हैंl

“आज इस अवसर पर मैं महाकवि जयशंकर प्रसाद जी को सादर नमन करता हूं।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०३ ⇒ ख़याल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ख़याल।)

?अभी अभी # ९०४ ⇒ आलेख – ख़याल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उनके ख़याल आए, तो आते चले गए ! हम कभी विचार-शून्य नहीं रहते। विचारों का आवागमन निरंतर चला करता है। इन्हीं विचारों के प्रवाह में, अचानक हमें किसी का खयाल आ जाता है। कोई कितना भी कहता रहे, खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते। जिसे आना होता है, वह आ ही जाता है।

ख़याल भारतीय संगीत का एक प्रकार भी है ! मुझे अपने शहर की दो संगीत हस्तियों का एकाएक ख़याल आता है, एक सुश्री कल्पना झोकरकर और दूसरे पुष्टि-मार्ग के प्रवर्तक पद्मभूषण गोस्वामी गोकुलोत्सव महाराज। ईश्वर का स्मरण ही ख़याल है। संगीत हमें ईश्वर से जोड़ता है।।

ईश्वर हमारा उतना ही ख़याल रखता है, जितना एक माँ अपने बच्चे का ! जब तक बालक अबोध होता है, माँ की गोद ही उसका घर होता है, और माँ का आँचल ही उसके लिए छाँव। माँ की उंगली पकड़, वह चलना सीखता है। लेकिन एक बार पाँव पर खड़ा होने के बाद माँ भी निश्चिंत हो जाती है और बालक भी खेलने में उलझ जाता है।

जब भूख लगती है, तब ही उसे माँ का खयाल आता है।

हमारा भी कुछ ऐसा ही है ! हम भी किसी बालक से कम नहीं। जब तक हमारे हाथ में माया का खिलौना है, हमें ईश्वर याद नहीं आता, लेकिन जैसे ही मुसीबत हम पर हावी हुई, कोई दुःख का पहाड़ टूटा, हमें उस ऊपर वाले का खयाल आता है।।

हमारे अवचेतन में स्मृतियों का भंडार भरा पड़ा है ! कब किस परिस्थिति में किसी व्यक्ति अथवा घटना का स्मरण आ जाए, कहना मुश्किल है। गहरी नींद में हमें भले ही कुछ ख़याल ना हो, लेकिन सपनों में किस किसका ख़याल आ सकता है, आप कुछ कह नहीं सकते।

ख़याल ही सिमरन है, स्मरण है ! आशंका और असुरक्षा की भावना में डरावने ख़याल ही आते हैं। बच्चे तो क्या बड़े-बूढ़े भी सपनों में डर जाते हैं। हमारी सोच ही ख़याल है। सयाने कह गए हैं, कि ईश्वर से डरो, तो बाकी सब डर ग़ायब हो जाएँगे। अगर ईश्वर से डर के बजाय प्रेम कर लिया तो डर का खयाल भी नहीं रहेगा और सबसे प्रेम बढ़ेगा।।

जग को जीतने के लिए, और उस जगत-नियंता को सदा स्मरण करने के लिए ही शायद जगजीत यह ग़ज़ल कह गए हैं ;

तुमको देखा तो ये ख़याल आया

ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया …।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०७ ☆ अनुकरणीय सीख… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनुकरणीय सीख। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०७ ☆

☆ अनुकरणीय सीख… ☆

‘तुम्हारी ज़िंदगी में होने वाली हर चीज़ के लिए ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। इस बात को जितनी जल्दी मान लोगे, ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाएगी’ अब्दुल कलाम जी की यह सीख अनुकरणीय है। आप अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं, क्योंकि जैसे कर्म आप करते हैं, वैसा ही फल आपको प्राप्त होता है। सो! आपके कर्मों के लिए दोषी कोई अन्य कैसे हो सकता है? वैसे दोषारोपण करना मानव का स्वभाव होता है, क्योंकि दूसरों पर कीचड़ उछालना अत्यंत सरल होता है। दुर्भाग्य से हम यह भूल जाते हैं कि कीचड़ में पत्थर फेंकने से उसके छींटे हमारे दामन को भी अवश्य मलिन कर देते हैं और जितनी जल्दी हम इस तथ्य को स्वीकार कर लेते हैं; ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाती है। वास्तव में मानव ग़लतियों का पुतला है, परंतु वह दूसरों पर आरोप लगा कर सुक़ून पाना चाहता है, जो असंभव है।

‘विचारों को पढ़कर बदलाव नहीं आता; विचारों पर चलकर आता है।’ कोरा ज्ञान हमें जीने की राह नहीं दिखाता, बल्कि हमारी दशा ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ व ‘थोथा चना, बाजे घना’ जैसी हो जाती है। जब तक हमारे अंतर्मन में चिन्तन-मनन की प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती; भटकाव निश्चित् है। इसलिए हमें कोई भी निर्णय लेने से पूर्व उसके सभी पक्षों पर दृष्टिपात करना आवश्यक है। यदि हम तुरंत निर्णय दे देते हैं, तो उलझनें व समस्याएं बढ़ जाती हैं। इसलिए कहा गया है ‘पहले तोलो, फिर बोलो’ क्योंकि जिह्वा से निकले शब्द व कमान से निकला तीर कभी लौटकर नहीं आता। द्रौपदी का एक वाक्य ‘अंधे की औलाद अंधी’ महाभारत के युद्ध का कारण बना। वैसे शब्द व वाक्य जीवन की दिशा बदलने का कारण भी बनते हैं। तुलसीदास व कालिदास के जीवन में बदलाव उनकी पत्नी के एक वाक्य के कारण आया। ऐसे अनगिनत उदाहरण विश्व में उपलब्ध हैं। सो! मात्र अध्ययन करने से हमारे विचारों में बदलाव नहीं आता, बल्कि उन्हें अपने जीवन में धारण करने पर उसकी दशा व दिशा बदल जाती है। इसलिए जीवन में जो भी अच्छा मिले, उसे अपना लें।

अनुमान ग़लत हो सकता है, अनुभव नहीं। यदि जीवन को क़ामयाब बनाना है, तो याद रखें – ‘पांव भले ही फिसल जाए, ज़ुबान को कभी ना फिसलने दें।’ अनुभव जीवन की सीख है और अनुमान मन की कल्पना। मन बहुत चंचल होता है। पल-भर में ख़्वाबों के महल सजा लेता है और अपनी इच्छानुसार मिटा डालता है। वह हमें बड़े-बड़े स्वप्न दिखाता है और हम उनके पीछे चल पड़ते हैं। वास्तव में हमें अनुभव से काम लेना चाहिए; भले ही वे दूसरों के ही क्यों न हों? वैसे बुद्धिमान लोग दूसरों के अनुभव से सीख लेते हैं और सामान्य लोग अपने अनुभव से ज्ञान प्राप्त करते हैं। परंतु मूर्ख लोग अपना घर जलाकर तमाशा देखते हैं। हमारे ग्रंथ व संत दोनों हमें जीवन को उन्नत करने की सीख देते और ग़लत राहों का अनुसरण करने से बचाते हैं। विवेकी पुरुष उन द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना भाग्य बना लेते हैं, परंतु अन्य उनकी निंदा कर पाप के भागी बनते हैं। वैसे भी मानव अपने अनुभव से ही सीखता है। कबीरदास जी ने भी कानों-सुनी बात पर कभी विश्वास नहीं किया। वे आंखिन देखी पर विश्वास करते थे, क्योंकि हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती और उसका पता हमें उसे परखने पर ही लगता है। हीरे की परख जौहरी को होती है। उसका मूल्य भी वही समझता है। चंदन का महत्व भी वही जानता है, जिसे उसकी पहचान होती है, अन्यथा उसे लकड़ी समझ जला दिया जाता है।

यदि नीयत साफ व मक़सद सही हो, तो यक़ीनन किसी न किसी रूप में ईश्वर आपकी सहायता अवश्य करते हैं, जिसके फलस्वरूप आपकी चिंताओं का अंत हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि परमात्मा में विश्वास रखते हुए सत्कर्म करते जाओ; आपका कभी भी बुरा नहीं होगा। यदि हमारी नीयत साफ है अर्थात् हम में दोग़लापन नहीं है; किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर का भाव नहीं है, तो वह हर विषम परिस्थिति में आपकी सहायता करता है। हमारा लक्ष्य सही होना चाहिए और हमें ग़लत ढंग से उसे प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यदि हमारी सोच नकारात्मक होगी, तो हम कभी भी अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाएंगे; अधर में लटके रह जाएंगे। इसके साथ एक अन्य बात की ओर भी मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगी कि हमारे पाँव सदैव ज़मीन पर टिके रहने चाहिए। उस स्थिति में हमारे अंतर्मन में अहं का भाव जाग्रत नहीं होगा, जो हमें सत्य की राह पर चलने को प्रेरित करेगा और भटकन की स्थिति से हमारी रक्षा करेगा। इसके विपरीत अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता का भाव हमें वस्तुस्थिति व व्यक्ति का सही आकलन नहीं करने देता, बल्कि हम दूसरों को स्वयं से हेय समझने लगते हैं। अहं दौलत का भी भी हो सकता है; पद-प्रतिष्ठा व ओहदे का भी हो सकता है। दोनों स्थितियाँ घातक होती हैं। वे मानव को सामान्य व कर्त्तव्यनिष्ठ नहीं रहने देती। हम दूसरों पर आधिपत्य स्थापित कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं।यह अकाट्य सत्य है कि ‘पैसा बिस्तर दे सकता है, नींद नहीं; भोजन दे सकता है, भूख नहीं: अच्छे कपड़े दे सकता है, सौंदर्य नहीं; ऐशो-आराम के साधन दे सकता है, सुक़ून नहीं। सो! दौलत पर कभी भी ग़ुरूर नहीं करना चाहिए।’

अहंकार व संस्कार में फ़र्क होता है। अहंकार दूसरों को झुकाकर खुश होता है; संस्कार स्वयं झुक कर खुश होता है। इसलिए बच्चों को सुसंस्कृत करने की सीख दी जाती है; जो परमात्मा में अटूट आस्था, विश्वास व निष्ठा रखने से आती है। तुलसीदास जी ने भी ‘तुलसी साथी विपद् के विद्या, विनय, विवेक’ का संदेश दिया है। जब भगवान हमें कठिनाई में छोड़ देते हैं, तो विश्वास रखें कि या तो वे तुम्हें गिरते हुए थाम लेंगे या तुम्हें उड़ना सिखा देंगे। प्रभु की लीला अपरंपार है, जिसे समझना अत्यंत कठिन है। परंतु इतना निश्चित है कि वह संसार में हमारा सबसे बड़ा हितैषी है। इंसान संसार में भाग्य लेकर आता है और कर्म लेकर जाता है। अक्सर लोग कहते हैं कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है। परंतु वह अपने कृत-कर्म लेकर जाता है, जो भविष्य में उसके जीवन का मूलाधार बनते हैं। इसलिए रहीम जी कहते हैं कि ‘मन चंगा, तो कठौती में गंगा।’

सो! संसार में मन की शांति से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है। महात्मा बुद्ध शांत मन की महिमा का गुणगान करते हैं। ‘दुनियादारी सिखा देती है मक्कारियां/ वरना पैदा तो हर इंसान साफ़ दिल से होता है।’ इसलिए मानव को ऐसे लोगों से सचेत व सावधान रहना चाहिए, जिनका ‘तन उजला और मन मैला’ होता है।’ ऐसे लोग कभी भी आपके मित्र व हितैषी नहीं हो सकते। वे किसी पल भी आपकी पीठ में छुरा घोंप सकते हैं। ‘भरोसा है तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के कई-कई अर्थ निकलते हैं।’ इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न कीजिए; ज़िंदगी छोटी हो जाती है। ‘गुस्से के वक्त रुक जाना/ ग़लती के वक्त झुक जाना/ फिर पाना जीवन में/ सरलता और आनंद/ आनंद ही आनंद।’ हमारी सोच, विचार व कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं। कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं, जो दुआ की तरह मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं, जो किस्मत बदल देते हैं। ऐसे लोगों की कद्र करें; वे भाग्य से मिलते हैं। अंत में मैं कहना चाहूंगी कि मानव स्वयं अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है और उस तथ्य को स्वीकारना ही बुद्धिमानी है, महानता है। सो! अपनी सोच, व्यवहार व विचार सकारात्मक रखें; वे ही आपके भाग्य-निर्माता व भाग्य-विधाता हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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