हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९७⇒ अभिशप्त स्वामिभक्त ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अभिशप्त स्वामिभक्त।)

?अभी अभी # ९९७ ⇒ आलेख – अभिशप्त स्वामिभक्त ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

महाभारत समाप्त हो चुका है, लीलाधर श्रीकृष्ण अपनी लीला समेट चुके हैं, पाँचों पांडव स्वर्गारोहण के लिए बद्रिकाश्रम के वन में प्रवेश कर चुके हैं। बर्फ़ के पहाड़ में धर्मराज के चारों भाइयों के शरीर गल चुके हैं, और उन्होंने बर्फ में ही समाधि ले ली है। अकेले धर्मराज अपने स्वामिभक्त कुत्ते के साथ स्वर्ग के द्वार में प्रवेश कर चुके हैं। द्वारपाल उनका तो स्वागत करता है, लेकिन कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं देता। युधिष्ठिर भी कह देते हैं कि अगर मेरे साथ मेरे कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता, तो मुझे भी स्वर्ग नहीं जाना। धर्मराज की जीत होती है। स्वामिभक्त श्वान धर्मराज के साथ शान से स्वर्ग में प्रवेश करते हैं।

यहां कहानी ख़त्म नहीं होती। एक कुत्ते की दास्तान शुरू होती है। कई प्रश्न खड़े होते हैं। धर्म की रक्षा के लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं माना जाता, शायद इसीलिए अश्वत्थामा हाथी के मरने पर नरो वा कुंजरो वा कहने पर भी धर्मराज के धर्म का सिंहासन नहीं डोलता। लेकिन द्यूत क्रीड़ा में उनकी हार यह दर्शाती है कि अधर्म के काम में कभी धर्म की विजय हो ही नहीं सकती। अगर द्यूत क्रीड़ा में धर्मराज जीत भी जाते तो मानवता को एक गलत संदेश जाता। जुए में हमेशा धर्म की हार ही होती है।।

कुत्ते की योनि भी भोग योनि ही है, लेकिन एक पशु योनि! केवल नर ही नहीं, सत्संग का असर तो पेड़ पौधों और पशु पक्षियों पर भी पड़ता है। गिरधर की मुरलिया हो या रविशंकर का सितार। बज जाता मन का तार तार। कुछ लोग उस कुत्ते के भाग्य को सराहते हैं, जो रईसों के यहां पलते, बढ़ते हैं। उसकी समझदारी और वफादारी की तारीफ करते नहीं थकते। लेकिन जब किसी आवारा कुत्ते को सड़क पर, किसी वाहन से कुचला पड़ा हुआ देखते हैं, तो मुंह से यही निकलता है, भगवान ऐसी कुत्ते की मौत किसी को ना दे।

एक ही पशु योनि का कुत्ता! एक धर्मराज के साथ स्वर्ग का भागी बनता है तो एक सड़क पर अपनी मौत मरता है। लेकिन दोनों जगह धर्मराज के धर्म की तरह, कुत्ते की स्वामिभक्ति कायम है, क्योंकि वफादारी उसका जन्मजात गुण है। धर्म को कभी वफादारी से अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी स्वामिभक्त होते हुए भी यह प्रजाति अभिशप्त है।।

हम इंसान हैं, कोई जंगली जानवर नहीं, इसलिए उस पालतू कुत्ते की ही बात करेंगे, जो सदियों से गांव गांव, डगर डगर और नगर नगर आदमी का साथ निभाता आया है। रोटी के बदले रखवाली और वफादारी के साथ साथ वह प्यार का भी भूखा होता है। कुत्ता किसी का भी हो, एक बार अगर वह आपको पहचान गया, तो समझो आपका हो गया। जो कुत्तों से डरते हैं, कुत्ता उन्हें और डराता है। जो कुत्तों को अपने से दूर भगाते हैं, कुत्ता उन्हें भी पीछा करके, बड़ी दूर तक भगाता है। कुत्ते का डर काटने से जुड़ा है और काटने का डर, कुत्ते के पागल होने के साथ। इसलिए जो अपनी जान से करे प्यार, वो कुत्ते से कैसे करे प्यार।

इंसान अगर पागल हो, तो उसके लिए मनोचिकित्सक हैं, पागलखाने हैं, लेकिन अगर कोई कुत्ता अगर पागल हो जाए और किसी इंसान को काट ले, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।

कौन कुत्ता कब पागल हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। उस पागल कुत्ते का केवल एक ही इलाज है, उसे गोली मार दी जाए। सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी यही कहता है। एक पागल कुत्ते की नियति भी शायद यही है, ” सरकार मैने आपका नमक, खाया है! ” तो अब गोली खा।।

रात भर जागते रहने से इसे आप निशाचर भी कह सकते हैं। लेकिन रामभक्त हनुमान की तरह इसकी स्वामिभक्ति वरदान नहीं, एक अभिशाप है। हनुमान जी के बिना राम दरबार अधूरा है। एक कुत्ते के ऐसे नसीब कहां ? उसे तो जब मन करा, टरका दिया जाता है, लकड़ी से मार भगा दिया जाता है। कई लोग शिकायत करते हैं, मुझे कुत्ते की तरह घर से निकाल दिया। मेरी घर में इज्जत, एक कुत्ते से भी गई गुजरी हो गई है।।

कुत्ता अभिशप्त है, अकारण भौंकने को, रात रात भर जागने को, अपने स्वामी के आगे दुम हिलाने को। वह कितना भी वफादार हो, स्वामिभक्त हो, आपके घर की रखवाली करता हो, रहेगा एक कुत्ता ही। कुत्ते की पूंछ जिस तरह हमेशा टेढ़ी रहती है, उसका भौंकना कभी बंद नहीं होगा। वही उसका अस्त्र भी है और ब्रह्मास्त्र भी। आदमी कुत्ते से वफादारी भले ही नहीं सीख पाया हो, हां, भौंकना जरूर सीख गया है।

वह शायद जानता है, वह ऊपर वाला सभी की सुनता है। ईश्वर में भेद बुद्धि नहीं। वह इंसान और जानवर में भेद नहीं करता। उसका भौंकना ही उसका दर्द है, उसकी पुकार है, उसकी अजान है, अरदास है। उसे कोई नाम नहीं आता, शायद भौंकना ही उसका महामंत्र है। ईश्वर ही उसकी भाषा समझ सकता है। उसे उसकी वफादारी और स्वामिभक्ति का पुरस्कार दे सकता है। उसे इस अभिशाप से मुक्त कर सकता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८७ ☆ तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं? ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं?। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८७ ☆

तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं? ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

तपन जब अपने चरम पर होती है, तब मन किसी तर्क से नहीं, केवल अनुभव से चलता है। धूप में दो कदम चलते ही भीतर एक ही पुकार उठती है — “काश कहीं कोई पेड़ मिल जाए… बस एक पल की छाँव मिल जाए।” यह चाह केवल शरीर की थकान नहीं होती, यह आत्मा की प्यास भी होती है।

कभी आपने ध्यान दिया है—कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ पेड़ों की हरियाली सिर पर छतरी-सी तनी रहती है। उन्हीं रास्तों से गुजरते हुए, चाहे आप खुले में हों या गाड़ी के भीतर, गर्मी का तीखापन जैसे कहीं खो जाता है। हवा वही होती है, सूरज वही होता है, पर एहसास बदल जाता है। वहाँ धूप जलाती नहीं, बस छूकर निकल जाती है।

और दूसरी ओर, वे रास्ते जहाँ पेड़ नहीं हैं—जहाँ केवल कंक्रीट है, तपती ज़मीन है, और बिन छाँव का विस्तार है। वहाँ आप गाड़ी के भीतर बैठकर एसी चला लें, फिर भी भीतर कहीं न कहीं गर्मी का एक अदृश्य बोझ बना रहता है। जैसे वातावरण ही तपकर भीतर उतर रहा हो।

यह अंतर केवल तापमान का नहीं, यह प्रकृति के स्पर्श का अंतर है।

पेड़ केवल छाया नहीं देते, वे वातावरण को संतुलित करते हैं। उनकी पत्तियाँ हवा को ठहराती हैं, उसे शीतल बनाती हैं, और उनकी जड़ें धरती में जल को थामे रखती हैं। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, वहाँ धरती की नमी जीवित रहती है, वहाँ जीवन की साँसें गहरी होती हैं।

हरियाली दरअसल प्रकृति का वह मौन संगीत है, जो बिना शब्दों के हमें सुकून देता है। जब हम पेड़ों के बीच से गुजरते हैं, तो केवल शरीर नहीं, मन भी ठंडा होता है। जैसे कोई अदृश्य हाथ हमारे माथे को सहला रहा हो और कह रहा हो—“ठहरो, सब ठीक है।”

शायद इसी कारण, जब जीवन की भागदौड़ और गर्मी दोनों हमें थका देती हैं, तब हम अनायास ही हरियाली की ओर खिंचते हैं। क्योंकि पेड़ों की छाँव में केवल विश्राम नहीं, एक गहरा अपनापन मिलता है—एक ऐसा अपनापन, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ देता है।

तो इस तपते समय में, जब हर कोई सुकून की तलाश में है, क्यों न हम खुद भी उस सुकून का कारण बनें?

एक पेड़ लगाएँ, एक पौधे को बढ़ने दें, ताकि आने वाले समय में जब कोई राहगीर उस रास्ते से गुजरे, तो उसे भी वही शीतलता मिले, वही राहत मिले—जो हम आज तलाश रहे हैं।

क्योंकि पेड़ केवल आज का सहारा नहीं होते,

वे आने वाले कल की साँस होते हैं…

धूप तप रही तपन से, पेड़ों की नहि छाँव।

हरियाली उपचार है, चलो बसाएँ गाँव।।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९६⇒ फूल और पत्थर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और पत्थर ।)

?अभी अभी # ९९६ ⇒ आलेख – फूल और पत्थर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९६६ में धर्मेंद्र और मीना कुमारी की एक फिल्म आई थी, फूल और पत्थर ! एक पत्थर दिल इंसान और कोमल ह्रदय वाली मीनाकुमारी की यह फिल्म थी । उसके बाद से बहुत कुछ बदला है । और बदले की इस आग में एक नए किस्म का पत्थर, शक्ल ले चुका है,जिसका नामकरण किया गया है नफ़रत का पत्थर ।

कितना भाग्यशाली होगा,वह पत्थर,जो रामजी के नाम लेने से तैरने लगता है और पूरी वानर सेना को पुल बनाकर समुद्र के पार पहुंचाता है ।।

पत्थर अभिशप्त है,रास्ते में पड़े रहने के लिए ! जो ठोकर खाता है पत्थर से,वह पत्थर को कोसता भी है और ठोकर खाने के बावजूद उसी पत्थर को एक ठोकर और मारता है । बेजुबान पत्थर हमें यह समझाता है,तुमने मुझे ठोकर मारी । ठीक है, अब तो संभल जाओ । देखकर चलो ! नहीं तो ज़िन्दगी भर ठोकरें ही खाते रहोगे ।

नसीब अपना अपना ! कोई फूल कहाता,कोई पत्थर । कांटों को तो गुलाब अपने गले लगाता है,पत्थर का ऐसा नसीब नहीं । पत्थर को कोई गले नहीं लगाता ।

जब कोई पहाड़ टूटता है ,तब पत्थर का जन्म होता है । अगर बहती नदी में गिरे, तो घिस घिस कर या तो शालिग्राम हो जाता है या फिर कंकर से शंकर । वही

पत्थर जब किसी मूर्तिकार द्वारा तराशा जाता है,तो किसी मंदिर में विराजमान हो जाता है, लोग उसी पत्थर को पूजने लग जाते हैं ,उस पर फूल चढ़ाए जाते हैं ।

पत्थर से इमारतें बनती हैं तो कोई पत्थर मील का पत्थर कहलाता है । सुना है पत्थर दिल इंसान भी होते हैं । वह पत्थर कितना भाग्यशाली होगा,जिस पर रोजाना फूल चढ़ते होंगे ।।

शिव शंकर तो इतने पत्थर दिल है कि एक पत्थर में ही समा गए । कोई कंकर शंकर कहलाया तो कोई पत्थर शिव लिंग । कभी भोले भंडारी तो कभी रौद्र रूप धारी । हम उसी पत्थर का अभिषेक करते हैं ।

श्रृद्धा और भक्ति को पुष्प द्वारा प्रकट किया जाता है और नफरत को ,पत्थर फेंककर । इसमें पत्थर का कोई दोष नहीं ;

इक लोहा पूजा में राख्यो

एक घर बधिक धरयो ।

पारस गुन अवगुन नहिं परखत

कंचन करत खरयो ।।

ठीक इसी प्रकार वही पत्थर जब मंदिर में रखा जाता है तो पूजा जाता है । पत्थर तो इतना बेबस है कि जब तक हम अपना सर उस पर नहीं पटकें,वह हमें हानि नहीं पहुंचा सकता । हमारी हिंसा ही उसे एक अस्त्र बनाती है ।

पत्थर बचपन में हमने भी फेंका है । गणेश चतुर्थी के चंद्रमा को देखना निषेध है । ऐसी मान्यता है कि कोई आप पर झूठी चोरी का इल्ज़ाम लगा देता है । हमारे लिए यह खेल बन गया था । चन्द्रमा को देखना, और किसी की छत पर पत्थर फेंकना । तब अधिकांश छतें पतरे की होती थी ।

बाद में यही पत्थर पहले कुत्तों पर और बाद में भीड़ में बरसने लगे । पत्थरबाजी,पतंगबाजी की तरह एक शौक हो गया । और आज वही पत्थर पूरी तरह बदनाम हो गया,जब उसे नफरत का पत्थर नाम दे दिया गया । नफ़रत हमारी,और बदनाम पत्थर । पत्थर को पत्थर ही रहने दो,उसे बदनाम ना करो । उसे अपनी नफरत का भागीदार तो मत बनाओ ।

आजकल किसी के घर शीशे के नहीं होते । शब्द बाण भी नफरत का पत्थर ही है । प्रेम और भक्ति में पुष्पों की वर्षा होती है,पुष्पगुच्छ का आदान प्रदान होता है । श्रद्धा में पुष्पांजलि भी अर्पित की जाती है । हमारे मुंह से भी शब्द पुष्प की तरह झरें ।

हमारे हाथों में पत्थर की जगह हमेशा फूल हो । जो पाषाण हृदय हैं,उनका हृदय पिघले । उसमें सदा करुणा का वास हो । आमीन ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

सुविधाओं की दौड़ में हमने सिर्फ पानी नहीं, रिश्तों की मिठास भी खो दी

गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना कुआँ अब बूढ़े आदमी जैसा लगता है।

चुप… थका हुआ… और भुला दिया गया।

उसके किनारों पर अब बच्चों की हँसी नहीं गूंजती। रस्सी की “चर्र-चर्र” वाली आवाज़ अब इतिहास बन चुकी है। जहाँ कभी औरतों की बातें, ठहाके और गीत गूंजते थे, बुज़ुर्ग वहीं बैठकर हुक्का पीते थे। वहाँ अब सिर्फ सूखी पत्तियाँ उड़ती हैं और कभी-कभी कोई छिपकली दीवार पर भागती दिखाई दे जाती है।

कुआँ मरता नहीं है। वह बस इंतज़ार करता है। किसी अपने के लौटने का।

लेकिन अब कौन लौटेगा?

अब तो हर घर में आरओ (RO) लगा है, हर हाथ में प्लास्टिक की बोतल है और हर इंसान खुद को “हाइजीनिक” समझकर मिट्टी की खुशबू से भाग रहा है।

दादी उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं –  मुझे याद है गर्मियों की दोपहरें।

जब सूरज आग उगलता था और खेतों की मिट्टी पैर जला देती थी।

तब एक पीतल की गागर लेकर कुएँ तक जाती थीं। रस्सी फेंकती थीं… बाल्टी “छपाक” से पानी में गिरती थी… और फिर दोनों हाथों से रस्सी खींचती थीं।

वह सिर्फ पानी नहीं निकाल रही होती थीं। वह धरती का दिल बाहर खींच रही होती थीं। उस पानी में ठंडक नहीं, दुआ होती थी। पहला घूंट गले से उतरता नहीं था… आत्मा तक पहुँच जाता था।

आज की बोतल वाला पानी? वह पानी नहीं, प्लास्टिक का घमंड है। उस पर लिखा होगा – “मिनरल वॉटर”, “प्योर”, “हिमालयन”।

कुएँ का पानी इंसान को जोड़ता था। बोतल का पानी इंसान को अकेला कर गया। पहले लोग कुएँ पर मिलते थे। कोई रस्सी पकड़ लेता था, कोई बाल्टी खींच देता था, कोई हालचाल पूछ लेता था। पानी भरते-भरते रिश्ते बन जाते थे। कई प्रेम कहानियाँ वहीं शुरू हुई थीं। कई झगड़े वहीं खत्म हुए थे।

अब?

अब हर कोई अपनी-अपनी बोतल लेकर घूम रहा है जैसे दिल नहीं, “पर्सनल पैकेजिंग” लेकर पैदा हुआ हो। पहले माँ मटके में कुएँ का पानी भरती थीं। उस मटके के ऊपर रखा पीतल का गिलास पूरे घर की प्यास बुझाता था। कोई “माय बोतल”, “योर बोतल” नहीं होता था। आज हर बच्चे के बैग में अलग बोतल है और हर इंसान के दिल में अलग अकेलापन।

कुएँ का पानी सिर्फ शरीर नहीं ठंडा करता था। वह इंसान का दिमाग भी शांत करता था। कुएँ के पास बैठो तो हवा अलग लगती थी। ऐसा लगता था जैसे धरती धीरे-धीरे तुम्हारे सिर पर हाथ फेर रही हो।

अब आरओ (RO) मशीन दीवार पर टंगी रहती है जैसे कोई सरकारी क्लर्क हो। उस मशीन में कोई आत्मा नहीं है। कुएँ में आत्मा थी। कुएँ के पानी में मिट्टी की हल्की-सी खुशबू होती थी।

वही खुशबू जो पहली बारिश में आती है और आदमी को बचपन में पहुँचा देती है। आज के फिल्टर उस खुशबू को “इम्प्योरिटी” बोलकर मार देते हैं।

कितनी अजीब बात है। हमने स्वाद को बीमारी मान लिया और केमिकल को शुद्धता।

अब गाँवों में भी लोग कहते हैं – “कुएँ का पानी मत पीना, सेफ नहीं है।” लेकिन वही लोग पिघला हुआ प्लास्टिक मिला पानी पी जाते हैं।

फिर डॉक्टर के पास जाकर पूछते हैं –  “पता नहीं शरीर में इतनी गर्मी क्यों बढ़ रही है?”

कुआँ गाँव का व्हाट्सऐप  (Whatsapp) था। हर खबर वहीं मिलती थी। किसके घर मेहमान आए, किसकी फसल अच्छी हुई, किसकी बेटी की शादी तय हुई – सब कुछ वहीं पता चलता था।

आज मोबाइल में हजारों कॉन्टैक्ट्स (Contacts) हैं, लेकिन दरवाज़ा खटखटाने वाला एक इंसान नहीं।

हमने सुविधा के चक्कर में जीवन का स्वाद खो दिया।

फ्रिज ठंडा दे सकता है, लेकिन ताज़गी नहीं।

आरओ साफ पानी दे सकता है, लेकिन अपनापन नहीं।

बोतल स्टेटस दे सकती है, लेकिन संतोष नहीं।

और सबसे दुखद बात?

अब कुएँ सिर्फ फिल्मों में दिखते हैं। हीरोइन वहाँ गाना गाती है, लोग फोटो खींचते हैं और फिर वापस मिनरल वॉटर पीने चले जाते हैं। कुएँ को हमने विरासत नहीं रहने दिया। उसे “बैकग्राउंड एस्थेटिक” बना दिया।

जिस कुएँ ने पीढ़ियों की प्यास बुझाई, आज उसी में लोग कूड़ा फेंक देते हैं।

प्लास्टिक की बोतलें… चिप्स के पैकेट… टूटी चप्पलें…

कभी-कभी लगता है, धरती माँ भी थक गई होगी।

वह सोचती होगी –  “मैंने इन्हें नदियाँ दीं, कुएँ दिए, बारिश दी… और इन्होंने बदले में मुझे प्लास्टिक लौटा दिया।”

अगली बार जब आप फ्रिज से बोतल निकालकर पानी पिएँ, तो एक पल रुकिएगा।

आँखें बंद करके उस पुराने कुएँ को याद कीजिएगा।

रस्सी की आवाज़… बाल्टी की छपाक… मटके की ठंडक…और दादी के हाथों का वह पीतल का गिलास।

फिर समझ आएगा –  

प्यास सिर्फ गले की नहीं थी। प्यास रिश्तों की भी थी। और वह प्यास… बोतलों से कभी नहीं बुझ सकती।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९५ ⇒ योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि।)

?अभी अभी # ९९५ ⇒ आलेख – योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम यहां वेद और आयुर्वेद की चर्चा नहीं कर रहे, ना ही उस जठरग्नि का जिक्र कर रहे, जिसके कारण हमारे पेट मेंअक्सर चूहे दौड़ा करते हैं, और जब कड़ाके की भूख लगती है, तो जो खाने को मिले, उसे कच्चा चबा जाने का मन करता है।

हमारा शरीर हो, अथवा यह सृष्टि, पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश, इन पांच तत्वों का ही तो सब खेल है। अग्नि को साधारण बोलचाल की भाषा में हम आग बोलते हैं। सोलर सिस्टम तक हम भले ही नहीं जाएं, सोलर एनर्जी तक हम जरूर पहुंच गए हैं। गरीब का चूल्हा और एक मजदूर की बीड़ी आज भी आग से ही जलती है। इतनी दूर बैठा सूरज, देखिए कैसा आग उगल रहा है। आपके पास जो आयेगा, वो जल जायेगा।।

अग्नि का धर्म ही जलाना है, खाक करना है। कलयुग में हम कितने सुखी हैं, कोई कितना भी जले, हमें बददुआ दे, हमारा बाल भी बांका नहीं होता। अगर सतयुग होता तो कोई भी सिद्ध पुरुष क्रोध में हमें शाप देकर भस्म कर देता।

आज भी आयुर्वेदिक चिकित्सा में भस्म का बहुत महत्व है। हमने बचपन में अपनी मां को राख से बर्तन मांजते देखा है, और यज्ञ और हवन की भस्म हमने भी माथे पर लगाई है।

एक अग्नि योग की होती है, जहां यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अवस्था के पश्चात योगियों के सारे काम, क्रोध, लोभ और मोह के विकार जल कर खाक हो जाते हैं, और उसमें योगाग्नि प्रज्वलित हो जाती है। हजारों वर्षों तक ये योगी तपस्या किया करते थे, तब जाकर भोलेनाथ प्रसन्न होते थे। मांग वत्स वरदान।।

यह सब सुनी सुनाई गप नहीं, हमारा सनातन धर्म है। मत करो भरोसा, हमें क्या। लेकिन हमारी बात अभी खत्म नहीं हुई। परशुराम, महर्षि विश्वामित्र और दुर्वासा के क्रोध के चर्चे तो आपने सुने ही होंगे। शिव जी के तीसरे नेत्र से कौन नहीं डरता। जहां योगाग्नि होगी, वहीं क्रोधाग्नि भी अवश्य मौजूद होगी। अग्नि तो अग्नि है, उसका काम ही भस्म करना है।

मर्यादा पुरुषोत्तम हों अथवा वासुदेव कृष्ण, कहीं अचूक रामबाण तो कहीं सुदर्शन चक्र, अगर एक बार चल गए तो बिना अपना काम किए, कभी वापस नहीं आते। बहुत सोच समझकर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जाता था।।

हमारे पास आज योगाग्नि तो है नहीं, लेकिन क्रोधाग्नि की कोई कमी नहीं। क्रोध में खुद ही जलते भुनते रहते हैं। शक्ति का प्रयोग उन्हें ही करना चाहिए, जिनमें विवेक बुद्धि हो, तप और स्वाध्याय का बल हो।

अग्नि से ही ओज है,

अग्नि से ही संहार है।

दुधारी तलवार है, योगाग्नि क्रोधाग्नि।

क्रोध आया, किसी पर हाथ उठा दिया, गाली गलौच कर ली, अपने ही कपड़े फाड़ लिए, हद से हद, अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली, लो जी, हो गई तसल्ली। क्या करें योगाग्नि तो है नहीं। ईश्वर समझदार है, कभी बंदर के हाथ में तलवार नहीं देता।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९४ ⇒ मि. एंड मिसेस कोयल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मि.एंड मिसेस कोयल।)

?अभी अभी # ९९४ ⇒ आलेख – मि. एंड मिसेस कोयल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो कूकती है, उसे कोयल कहते हैं। बचपन से आज दिन तक मैने केवल दो आवाजें ऐसी सुनी हैं, जिन पर समय, काल और परिस्थिति कोई प्रभाव नहीं पड़ पाया, एक तो स्वयं कोयल और एक कोकिल कंठी, लता मंगेशकर। अक्सर, दिन यही गर्मियों के होते थे, जब अचानक वातावरण में, किसी पेड़ की ऊंची शाखा से, कुहू कुहू की आवाज गूंज जाती थी। हम भी प्रत्युत्तर में उसकी नकल करते हुए कुहू कुहू दोहराते। हम थक जाते, लेकिन वह कभी नहीं थकती। आज भी वही

कोयल है, और वही उसकी चिर परिचित मीठी कूक।

हमने बचपन में एक अंग्रेजी कविता पढ़ी थी, जिसमें कोयल की कूक का जिक्र तो नहीं था, लेकिन एक मुर्गे महाशय का जरूर था।

The cock is crowing

And the birds doth twitter.

समय के साथ भले ही मुर्गे की आवाज दबती चली गई और घर की मुर्गी दाल बराबर हो गई हो, न तो मुर्गे ने बांग देना बंद किया और ने ही मुर्गी ने अंडे देना। कैसे कैसे वॉरियर्स हैं, वॉलंटियर्स हैं प्रकृति में, निष्काम, निःशब्द, निरहंकार।।

कोयल की बात हो, और सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जिक्र ना हो, यह मुमकिन नहीं। जब लताजी ने स्वर्ण सुंदरी का यह खूबसूरत गीत राग यमन में गाया होगा तो कोयल ने भी मुदित मन से ना केवल अपना सिर हिलाया होगा, लता जी के साथ जरूर कुहू कुहू दोहराया होगा। गीत देखिए ;

कुहू कुहू बोले कोयलिया

कुंज कुंज में भंवरे डोले

गुन गुन बोले, अमृत घोले।

इन पक्षियों को राग रागिनी कौन सिखलाता है। जो पक्षी गा सकता है, वह मूक कैसे कहला सकता है।

हम उसकी भाषा नहीं जानते, यह कहना ही ठीक होगा। ऐसा क्या है जिस कारण इन पक्षियों का शोर कलरव कहलाता है और हमारा शोर ध्वनि प्रदूषण। ।

जंगल में मोर नाचा, किसने देखा ! मोर महाशय कभी हमारे लिए नहीं नाचते। वे तो मिसेस मोरनी को प्रभावित करने के लिए अपने मोर पंख फैलाकर गोपीकृष्ण की तरह अपनी छटा बिखेरते हैं। यह एक आम धारणा है कि कोयल भी मादा ही है। बचपन की एक कविता तो यही कहती है ;

कौआ कोयल दोनों काले

पर दोनों के नाम निराले।

कांव कांव कौआ करता है,

कोयल कू कू बहुत सुहाती

डाल डाल पर वह है गाती। ।

अब जो गाती है, वह अगर कोयल हुई, तो कहीं ना कहीं उसके मिस्टर भी तो होंगे ही। जब मामले की तह में जाने की कोशिश की तो विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ कि हम जिसकी आवाज़ पर फिदा हैं, वे तो मिस्टर कोयल निकले। ये मिस्टर कोयल काले जरूर हैं, लेकिन इनकी ही कूक में दम है। यानी यहां भी मोर मोरनी वाला ही मामला दिखता है। हमें मिसेस कोयल से पूरी सहानुभूति है। हम कोई पक्षी विशेषज्ञ नहीं, अधूरा ज्ञान बांटने से अच्छा है, क्यों न किसी जानकार की राय ले ली जाए। हम तो इस विषय में पक्षी विशेषज्ञ सलीम अली को ही अथॉरिटी मानते हैं। इस विषय में क्या कहता है आपका पक्षी ज्ञान, पूछता है भारत।

यह हमारी भी आस्था का सवाल है। क्या नारी विमर्श की तरह पक्षी संगठन में मिसेस कोयल के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठा सकता। जिसकी आवाज मधुर है, जिसकी कुहू कुहू हमें बहुत सुहाती, वह कोयल ही है।

या यहां भी कोई धर्मराज इनकी आवाज को दबा देगा। नरो वा किं मादा वा। निष्कर्ष कुछ भी हो, कोकिल कंठ तो भारत रत्न लता ही हैं और सदैव रहेंगी। ।

स्वर तो स्वर होता है, हमारी भेद बुद्धि ही उसे स्त्री पुरुष के सांचे में ढालती है। नाद ब्रह्म भेद रहित होता है। जब प्रकृति और पुरुष का भी भेद समाप्त हो जाता है, तब ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है। लेकिन हमें इससे क्या।

मूक बेजुबान पशु पक्षियों को पालतू बनाना, उनके साथ अन्याय करना है। कोयल पक्षी भी बहुत समझदार है। दूर के ढोल की तरह वह भी, मनुष्य की पहुंच से ऊपर, वृक्ष की किसी ऊंची डाल पर ही अपना डेरा जमाता है।

इनके बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती है। इनके पास जाएं, इन्हें परखें, अपनाएं, लेकिन इनकी आजादी में बाधा ना पहुंचाए। इतना बड़ा आंचल है इस वसुंधरा का। प्रेम और दया के पात्र इन शांति दूतों की रक्षा और सुरक्षा ही पर्यावरण की सुरक्षा है। कभी आप मिसेस कोयल की आवाज सुनें तो बताएं, यकीनन, मिस्टर कोयल से उन्नीस ही होगी, बीस नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७७ – देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७७ ☆ देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वैसे तो अपने हर शहर की लस्सी प्रसिद्ध होती हैं। लेकिन गुलाबी शहर का ये लस्सीवाला तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पूर्व काल (1944) का है। ये भी कह सकते हैं, अंग्रेजों के जमाने का है।

दही की लस्सी को पंजाब वाले अपना आविष्कार मानते हैं। हरियाणा वाले भी हिसार की भैंसों के दूध की दही की लस्सी को विश्व की सर्वोत्तम लस्सी का खिताब देते हैं। आप इसको चंडीगढ़ जैसा मसला मान सकते हैं, या फिर रसगुल्ला के जन्म स्थान बंगाल और उड़ीसा के बीच के विवाद जैसा समझ सकते हैं।

पुराने जयपुर (walled city) और नए शहर के मध्य में मिर्जा इस्माइल रोड पर ये दुकान स्थित है। आस पास में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी लस्सीवाला के नाम से मिलते जुलते नाम रख कर लस्सी बेचकर चांदी काटे जा रहे हैं।                            

लस्सी का सेवन मिट्टी के छोटे और बड़े सिकोरे (ग्लास) में उपलब्ध रहता है। सुबह सात बजे से तीन बजे दोपहर तक या स्टॉक रहने पर ही इसकी सप्लाई चालू रहती है। लस्सी अपेक्षाकृत गाढ़ी रहती है और लकड़ी की चम्मच से खाई भी जाती है। हमारे जैसे तो एक बार मुंह में ग्लास लगाने के बाद पेंदा देखकर ही रुकते हैं। बचपन से ही परिवार में इसका चलन था। दादाजी का एक कांसे का ग्लास जिसकी क्षमता तीन पाव करीब सात सौ मिलीलीटर थी। हमारा भी प्रिय बर्तन हुआ करता था।

युवावस्था में हमारे बैंक की जबलपुर सिटी शाखा से जुड़ी हुई लस्सी की प्रसिद्ध दुकान हुआ करती थी। सन ’75 के आस पास सवा रुपे का एक ग्लास मिलता था। उन दिनों में रेजगारी की किल्लत हुआ करती थी, इसलिए अकेले ही अनेकों बार चार ग्लास गटक जाया करते थे, ताकि रेजगारी की झंझट ही ना हो।

वर्तमान समय में नींबू के भाव कम करने में लस्सी सबसे अचूक हो रहीं हैं। मन में विचार आया, इसकी चर्चा कर लेते हैं, क्योंकि मीठा का सेवन तो अब प्रतिबंधित हो चुका है। कम से कम चर्चा तो कर ही सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९३ ⇒ व्यास पीठ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “व्यास पीठ।)

?अभी अभी # ९९३ ⇒ आलेख – व्यास पीठ ? श्री प्रदीप शर्मा ?

सृष्टि में पहले व्यास पीठ की स्थापना हुई, तत्पश्चात ज्ञानपीठ की ! ज्ञानपीठ तो केवल पुरस्कार प्रदान करता है, भक्ति और ज्ञान की गंगा तो केवल व्यास पीठ से ही प्रवाहित होती है !

ज्ञानपीठ में तो कई विद्वान पीठासीन होते हैं, लेकिन व्यास पीठ पर जो वक्ता विराजमान होते हैं, उसी में साक्षात महर्षि वेदव्यास पीठासीन हो जाते हैं।

हरि अनंत हरि कथा अनंता ! जो कथा है वही साहित्य है, कहानी है। संस्कृत में तो कई महाकाव्य रचे गए हैं, लेकिन रानी केतकी की कहानी ही, हिंदी की पहली कहानी कहलाती है। कथा हक़ीक़त होती है, कहानी में यथार्थ और कल्पना का मिश्रण होता है।।

बुद्धि और ज्ञान का जहाँ मिलन होता है, वह ज्ञानपीठ कहलाता है। ज्ञान और भक्ति का मार्ग वैराग्य का मार्ग है। जहाँ सरस्वती का वास है, वही वास्तव में व्यास पीठ है।

भागवत कथाओं का सागर है ! व्यास पीठ की कुछ मर्यादा है। कथा सामने बैठकर सुनी जाती है, पीछे बैठकर अथवा वक्ता के स्थान से ऊपर बैठकर नहीं। शुकतार में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिनों में जो कथा सुनाई, वही भागवत का सार है। भय से मुक्ति ही मोक्ष का आधार है। तक्षक नाग के काटने से सात दिनों में मृत्यु तो निश्चित है ही, क्यों न समय रहते भागवत कथा के जरिये भगवत स्मरण कर लिया जाए।।

कलयुग में मोक्ष अथवा मुक्ति इतनी आसान नहीं। सात दिनों में अंग्रेज़ी सीखिए की तर्ज़ पर केवल व्यासपीठ से भागवत कथा सुनने से आत्मिक शांति तो मिल सकती है, वैराग्य अथवा मुक्ति नहीं।

भय से मुक्ति और मनोविकारों से छुटकारा ही वैराग्य का आधार है। मृत्यु का भय ही वह तक्षक नाग है। वैराग्य पलायन नहीं, स्थूल संन्यास नहीं, केवल उस परम तत्व की तलाश है। ज्ञानपीठ हो या कोई व्यासपीठ, सत्य की खोज ही इनका आधार है। चिंतन, मनन, ध्यान, धारणा उस अज्ञात और अज्ञेय को पाने की, अथवा जानने की एक सतत प्रक्रिया है, जो अनादिकाल से चली आ रही है। जिन खोजां तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। बुद्धि, ज्ञान और विवेक को पीठ न देना ही ज्ञानपीठ का सम्मान करना है, किसी व्यासपीठ का हृदय से आदर करना है।।

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३५ – मैराथन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३५ मैराथन… ?

…मैं यह काम करना चाहता था पर उसने अड़ंगा लगा दिया।

…मैं वह काम करना चाहती थी पर इसने टांग अड़ा दी।

…उसमें है ही क्या, उससे बेहतर तो इसे मैं करता पर मेरी स्थितियों के चलते..!

 ….अलां ने मेरे खिलाफ ये किया, फलां ने मेरे विरोध में यह किया…!

स्वयं को अधिक सक्षम, अधिक स्पर्धात्मक बनानेे का कोई प्रयास न करना, आत्मावलोकन न कर व्यक्तियों या स्थितियों को दोष देना, हताशाग्रस्त जीवन जीनेवालों से भरी पड़ी है दुनिया।

वस्तुतः जीवन मैराथन है। अपनी दौड़ खुद लगानी होती है। रास्ते, आयोजक, प्रतिभागी, मौसम किसी को भी दोष देकर पूरी नहीं होती मैराथन।

निदा फाज़ली जी ने लिखा है,

रास्ते को भी दोष दे, आँखें भी कर लाल,

चप्पल में जो कील है, पहले उसे निकाल।

अधिकांश लोग जीवन भर ये कील नहीं निकाल पाते। कील की चुभन पीड़ा देती है। दौड़ना तो दूर, चलना भी दूभर हो जाता है।

जिस किसीने यह कील निकाल ली, वह दौड़ने लगा। हार-जीत का निर्णय तो रेफरी करेगा पर दौड़ने से ऊर्जा का प्रवाह तो शुरू हुआ।

प्रवाह का आनंद लेने के लिए इसे पढ़ने या सुनने भर से कुछ नहीं होगा। इसे अपनाना होगा।

उम्मीद करता हूँ अपनी-अपनी चप्पल सबके हाथ में है और कील के निष्कासन की कार्यवाही शुरू हो चुकी है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९२ ⇒ आप किस मिट्टी के बने हैं ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आप किस मिट्टी के बने हैं।)

?अभी अभी # ९९२ ⇒ आलेख – आप किस मिट्टी के बने हैं ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

माना कि इंसान हाड़ मांस का पुतला है, लेकिन जब तक इस तन में सांस है, तब तक ही जीता जागता वन पीस है, बाद में तो इस मिट्टी में मिल ही जाना है। व्हाट्सएप ज्ञान की तरह ही कुछ ज्ञान इल्मी भी होता है, और कुछ फिल्मी भी। इल्म और फिल्म का जब कॉकटेल बनता है, तब यह कहा जाता है ;

माटी के पुतले

इतना ना कर तू गुमान

पल भर का तू मेहमान …

मतलब इस माटी के पुतले को वापस मिट्टी में ही मिल जाना है। यह शरीर ही तो हमारा घर है। यानी घर भी मिट्टी का और यह शरीर भी मिट्टी का। घर बनाते समय तो हम बढ़िया बिल्डिंग मटेरियल लगाते हैं। छांट छांटकर बढ़िया गारा, ईंट, मिट्टी, सरिया और सीमेंट लाते हैं। कहीं सागौन की लकड़ी तो कहीं शीशम के दरवाज़े। बढ़िया फर्नीचर और बढ़िया कांच का सामान। इंटीरियर पर कितना खर्च करते हैं। मकान कहां जिंदगी में बार बार बनता है। इसलिए जिंदगी भर की कमाई हमने शानदार मकान में लगाई।।

और हमारा यह शरीर किस मिट्टी का बना है, कभी सोचा है। जब हमारा शरीर बन रहा था, तब तो हम आराम से सो रहे थे अथवा रो रहे थे, हमें कुछ नहीं पता। जिस तरह मिट्टी को तराशा जाकर, कुम्हार द्वारा, उसे कोई आकार दिया जाता है, वैसे ही हमें भी एक आकार मिला। किस शक्ति ने हममें प्राण फूंके, हमें पता नहीं। लेकिन हम जब पैदा हुए तब किसी की गोद में, हाथ पांव मारते हुए कभी किलकारी मार रहे थे, तो कभी रो रहे थे।

एक पानी के मटके को देखकर आप भले ही यह अंदाज लगा लें कि वह किस मिट्टी का बना है, लाल अथवा काली मिट्टी का। एक मटके में भले ही जान ना हो, लेकिन जब उस मटके का ठंडा पानी, हलक से नीचे उतरता है, तो ऐसा महसूस होता है मानो किसी ने शरीर में प्राण फूंक दिए हों। जल ही जीवन है।।

अगर किसी माटी के घड़े ने रत्ती भर भी यह गुमान कर लिया कि कुम्हार ने जैसा मुझे घढ़ा है और जिस मिट्टी से घढ़ा है, उससे बेहतर कोई मिट्टी नहीं और उससे बढ़िया कोई घड़ा नहीं, तो घड़े में सिर्फ एक छेद ही काफी है उसके अहंकार को पानी पानी करने के लिए। एक कंकर से मटकी फूट जाती है, और घड़े की किस्मत भी फूट जाती है। जल्द ही उसे परंडे से बेदखल कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

माटी के इस पुतले पर इतना गुमान ठीक नहीं। हम सब एक ही मिट्टी के घड़े हैं। हमारा कुम्हार कोई छोटा मोटा कुम्हार नहीं, उसने पूरी दुनिया बनाई है। अलग मिट्टी के मुगालते मत पाल हे जीव !

उसी मिट्टी से उसने कीड़े मकोड़े बनाए हैं, बस शुक्र मना उस कुम्हार का, जिसने तुझे जीता जागता माटी का पुतला बना डाला। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हम सब एक ही माटी के पुतले हैं। वही मिट्टी तो हमारी भारत माता है। उसका हमारा जन्म जन्मांतरों का नाता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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