॥ मार्गदर्शक चिंतन॥
☆ ॥ उत्साह ॥ – प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆
किसी भी कार्य को बिना आलस्य के संपादित कर डालने की तत्परता को उत्साह कहा जाता है। बहुत से लोगों में कार्य करने का बड़ा उत्साह होता है। काम चाहे जो और जैसा भी हो उसे सही ढंग से पूरा कर लेने की भावना कुछ लोगों में होती है। वे किसी काम के करने में न तो पीछे हटते हैं न आलस्य करते हैं। ऐसे लोगों को उत्साही कहा जाता है। मन का सदा उत्साह से कार्य करने की उत्सुकता एक बड़ा अच्छा गुण है। इसके विपरीत कुछ लोग स्वभाव से ढीले होते हैं। उनमें उत्साह की कमी होती है। काम को तुरंत न कर धीमी गति से या मन मौजी ढंग से करना उनका स्वभाव हो जाता है। यह उस व्यक्ति के लिये तथा समाज के लिये भी अहितकर है। उत्साही व्यक्ति के मन में कार्य को यथाशीघ्र सम्पन्न करने की आतुरता होती है जो व्यक्ति के लिये भी अच्छी बात है और जो उसके संपर्क में होते हैं उनके लिये भी। समय का सदा सदुपयोग करना अच्छा है क्योंकि समय बीत जाने पर फिर वह वापस मिलता नहीं और आगे अन्य कार्यों की व्यस्तता होने या परिस्थितियों में बदल होने से फिर कार्य को सही विधि से करने का अवसर नहीं मिल पाता है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है-
काल करन्ते आज कर, आज करन्ते अब।
पल में परलय होत है, बहुरि करोगे कब?
जीवन की अवधि भी छोटी है। समय पर व्यक्ति का अधिकार नहीं है इससे जो काम आ पड़ा उसे उत्साह से पूरा कर लेना अच्छी आदत है। जो शीघ्र कार्य संपन्न करने की आदत डाल लेते हैं उन्हें कोई काम कठिन नहीं लगता और हर काम को निपटा लेने का स्वभाव बन जाता है। उत्साह एक अच्छा गुण है इसका विकास बचपन से ही किया जाना चाहिये। छोटी-बड़ी उम्र, जानकारी या उसकी कमी और स्थान तथा समय, कार्यसंपादन के लिये उत्साही व्यक्ति की राह में कोई रोड़ा नहीं अटकाते। हम सब जानते हैं कि हनुमान जी में कार्य संपादन का कितना उत्साह था। हर छोटे-बड़े काम को शीघ्र उत्साह से पूर्ण कर डालने में उनकी बड़ी रुचि थी। पराक्रम, उत्साह से वे हर काम न करते होते तो एक रात्रि में ही लंका से हिमालय पर्वत तक जाकर संजीवनी बूटी जिससे लक्ष्मण जी की वैद्य की सलाह के अनुसार प्राण रक्षा हो सकी, नहीं लाई जा सकती थी। उत्साही व्यक्ति को कार्य करते देख दूसरों को भी कार्य शीघ्र संपन्न करने की प्रेरणा मिलती है। कठिनाइयों का हल पाने में सहायता होती है। जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह की आवश्यकता है। छात्र जीवन में पुस्तकों को पढक़र आत्मसात करने, गृहकार्य पूर्ण करने, परीक्षा देने, क्रीड़ागन में खेल खेलने कोई नया गुण सीखने में उत्साह होना चाहिये। फैक्टरी में उत्पादन में लगे कार्यकर्ता को उत्साह हो तो उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादन के परिमाण में बढ़त होती है। इसी प्रकार क्षेत्र कोई भी हो उत्साह कार्य को सरल बना देता है और शीघ्र संपन्न करने की क्षमता बढ़ा देता है। जिसमें उत्साह नहीं वह आलसी होता है। आलसी व्यक्ति को स्वत: दुख होता है और सभी को कार्य में विलम्ब सहना पड़ता है। उत्साह में भरा हुआ व्यक्ति प्रसन्न हंसमुख और सुखी होता है। सभी लोग उत्साही व्यक्ति को पसंद करते हैं। उसकी प्रशंसा भी होती है और वह व्यक्ति अपने साथ काम करने वालों को प्रेरणा भी देता है व प्रसन्न करता है। उत्साह जीवन में आनन्द प्रदान करने वाला बड़ा आवश्यक गुण है। मन में जब उत्साह होता है तो समय और स्थान की दूरी भी व्यक्ति के लिये शायद छोटी हो जाती है और हर कार्य में सफलता आसान हो जाती है। उत्साह के विपरीत अवसाद का जन्म होता है जो प्रगति के पथ पर रुकावट होती है।
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
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