(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गो ब र…“।)
अभी अभी # १०२८ ⇒ आलेख – गो ब र श्री प्रदीप शर्मा
गो ग्रीन के बाद जब गो ऑर्गेनिक का अभियान चला तब मुझे गाय,गोबर और गांव की याद सताने लगी । हम नर्मदा का जल पीने वाले नल से नहाते वक्त नर्मदे हर और कभी कभी हर हर गंगे बोल लेते हैं । यहां गांव में गौरी आसानी से मिल जाती है,गंगा नहीं । गांव में हमने कभी गोबर से परहेज़ नहीं किया ,क्योंकि पूरा कच्चा घर गोबर से ही लीपा जाता था । जब से शहर आए,आज यह हालत है कि गाय और गोबर दोनों के लिए तरस गए ।
शुरू में कुछ पता नहीं चला ! धीरे धीरे सब्जियों से स्वाद गायब होता चला गया । जो सब्जियां बिना मसाले के अच्छी और स्वादिष्ट बनती थी,उनकी गुणवत्ता छुपाने के लिए तरह तरह के मसाले डाले जाने लगे । लोग सब्जियों का स्वाद भूल गए बस मसालों में उलझ गए । होटलों में गए,मलाई कोफ्ता और काजू करी बुलाई,दो तीन नान बुलाई,और उंगलियां चाटते हुए घर आ गए । इसमें सब्जी कहां,बस घी,मक्खन और मलाई । तभी मोटे हो रहे हैं मोटा भाई ।।
रासायनिक खाद अपना ज़हरीला प्रभाव तो छोड़ेगी ही । खाने के साथ वही ज़हर शरीर में जाता है,और बीमारियां पनपने लगती हैं । पता ही नहीं चलता,और अन्दर ही अन्दर कैंसर जैसी बीमारी घर कर लेती है । आर्थिक अभाव और जागरूकता की कमी के कारण जो मिल गया,उसी को मुकद्दर समझ कर खा लिया और प्रभु का गुण गा लिया ।
गाय का गुणगान करिये,भैंस का दुग्धपान करिये । भैंस के दूध की हमारे देश में ज़्यादा खपत है । उसमें मलाई अधिक जो आती है । देसी गाय का स्थान जर्सी गाय ने ले लिया,क्योंकि वह दूध अधिक देती है । दुधारू गाय किसे बुरी लगती है ।
दूध पर गाय का कॉपीराइट नहीं ! दूध तो बकरी भी देती है और ऊंटनी भी । सुना है,शेरनी भी अपने बच्चों को दूध ही पिलाती है,इसीलिए उसके बच्चे शेर बच्चे निकलते हैं । गोबर पर गाय का कॉपीराइट है । गोबर शब्द में ही गो समाया हुआ है । यों तो भैंस भी गोबर ही देती है लेकिन वह भी गोबर ही कहलाता है । जिसमें अक्ल ज़्यादा होती है, दुनिया में उसी की पूछ होती है । बस एक इंसान ही ऐसा प्राणी है, जिसकी पूंछ न होते हुए भी इतनी पूछ परख होती है ।।
सुना है इस बार की होली लकड़ी से नहीं, गोबर के कंडों से जलाई गई । अगर पर्यावरण बचाना है,तो वृक्षों को काटने से बचाना होगा । बचपन में बड़ा बुरा लगता था,जब सबक याद नहीं होने पर मास्टरजी क्लास में खड़ा करके कहते थे, तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है । आज सोचता हूं,जिस दिमाग में गोबर भरा होगा,वह कितना उर्वरक यानी fertile होगा । गो ऑर्गेनिक, ग्रो ऑर्गेनिक, थिंक ऑर्गेनिक …!!!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक दिन पिता का…“।)
अभी अभी # १०२७ ⇒ आलेख – एक दिन पिता का श्री प्रदीप शर्मा
father’s day
माता पिता का बराबरी का सौदा होता है,अगर मदर्स डे है तो फादर्स डे भी । महिला दिवस की तर्ज पर पुरुष दिवस कब मनाया जाता है,शायद इन तथाकथित “days” यानी “दिनों” का कोई कैलेंडर उपलब्ध हो, क्योंकि कभी कभी तो एक ही दिन में दो दो days टपक जाते है ।
खैर हमें इससे क्या,जिस तरह सुबह होती है,शाम होती है, इसी तरह कोई ना कोई day आता है,और चला जाता है । ऐसे ही पितृ दिवस यानी फादर्स डे कब आया और कब चला गया,हमें पता ही नहीं चला । हम भी कभी पिता थे,अब तो लोगों ने हमें अंकल से नाना जी और दादाजी बना दिया है ।।
हमने पिता को तो देखा है,लेकिन कभी परम पिता को नहीं देखा । पिता का और हमारा साथ 33 वर्ष का ही रहा । उसके बाद एक दिन हमारे पिता,परम पिता में विलीन हो गए, यानी हमारे सर से पिता का साया छिन गया और पिछले 42 वर्ष से हमें पिता का प्यार नहीं मिला । तब से हमने परम पिता को ही अपना पिता मान लिया है।
ईश्वर एक है,आप उसे खुदा कहें अथवा परम पिता परमेश्वर । लेकिन जिन अभागों ने अपने बाप को बाप नहीं माना,वे किसी पत्थर की मूरत को भगवान कैसे मान लेंगे । वास्तव में सबका मालिक एक का मतलब भी यही है,सबका बाप एक ।।
जिस तरह ईश्वर एक है,उसी तरह माता -पिता एक इकाई है,एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,दोनों एक दूसरे के पूरक हैं , और शायद इसीलिए उन्हें सम्मिलित रूप से पालक का दर्जा दिया गया है और साफ साफ शब्दों में कह दिया गया है ,”त्वमेव माता च पिता त्वमेव” । अंग्रेजी में एक शब्द है spouse, जिसका प्रयोग पति पत्नी दोनों के लिए किया जाता है,यानी दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं ।
पिताजी के गुजर जाने के बाद,जब तक माता का साया सर पर रहा,पिताजी का अभाव इतना नहीं खला,लेकिन मां के गुजर जाने के बाद महसूस हुआ,एक अनाथ किसे कहते हैं,और तब केवल नाथों के नाथ जगन्नाथ की शरण में जाना ही पड़ा । क्योंकि वही तो पूरे जगत का नाथ है ।।
जिंदगी तो ठहरती नहीं,लेकिन वक्त ठहर सा जाता है । अतीत में झांकने से अब क्या हासिल होना है, हां एक पछतावा जरूर होता है,क्योंकि हमने भी माता पिता की कदर जानी ना,हो कदर जानी ना ।
शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में पितृ पक्ष की व्यवस्था भी है । उस पखवाड़े में श्रद्धा के प्रतीक स्वरूप ही श्राद्ध कर्म किया जाता है । श्रद्धा का अर्पण ही वास्तविक तर्पण है । पछतावे की भरपाई है । भूल चूक लेनी देनी का सत्यापन है । उनके प्रति नतमस्तक होना ,उस परम पिता परमेश्वर के समक्ष नतमस्तक होने के बराबर है । आज की पीढ़ी के लिए ही शायद यह गीत लिखा गया है ;
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८२ ☆ देश-परदेश – विश्व शरणार्थी दिवस : 20 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆
करीब आठ दशक पूर्व, अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर लकीर खींच कर देश को विभाजित कर दिया था। पारिवारिक बंटवारे होने पर घर और दुकान के बीच एक दीवार खड़े होते हुए तो बहुत बार देखा हैं। धर्म के नाम से बंटवारा होना एक अलग बात होती है।
“जिस तन लागे, सो तन जाने, कोई ना जाने पीर पराई” हमारे परिवार के बड़ों ने उस वेदना को झेला था, इसलिए आज तक गाजे बाजे उसकी चर्चा होती रहती है।
विभाजन का दर्द सबसे अधिक बंगाल, पंजाब और सिंध के लोगों ने झेला था। शरणार्थी बनकर आए अधिकतर लोग पुरुषार्थी बन गए, अल्प समय में अपनी मेहनत और लगन से समाज में ना अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस ली, वरन देश के विभिन्न भागों में बस कर आज दूसरों को भी रोज़गार दे रहें हैं।
अस्सी के दशक के बाद हमारे कश्मीरी भाइयों ने तो बिना विभाजन के अपना घर बार छोड़कर देश के दूसरे भागों में जा कर आपकी जान बचाई थी।
सत्तर के दशक में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को हमारे देश में पनाह लेनी पड़ी थी हम सब ने उनके नाम से अतिरिक्त टैक्स भरा और कई स्थानों पर तो ये बांग्लादेशी आज भी बसे हुए हैं। हमारे साधनों के उपयोग से फल फूल रहें हैं।
हमारे जैसे शरणार्थी परिवारों से लोग आज भी जब पूछते है, कि आपका गांव कौन सा है ? तब हमारी जुबां वेदना के दर्द का कड़वा घूंट पी कर रह जाती हैं। कुछ लोग तो ये भी पूछ लेते है, गाँव में खेती की कितनी जमीन है ? “सब भूमि गोपाल की” कहकर बात को टाल दिया जाता है।
हमारी आयु के लोग तो सिर्फ बातें सुनकर ही बड़े हुए हैं। धन्य थे हमारे पूर्वज जिन्होंने निजी तौर से उस दर्द से उबर कर हमारा पालन पोषण कर हमें बड़ा किया था।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वर्क इज़ वर्शिप…“।)
अभी अभी # १०२६ ⇒ आलेख – वर्क इज़ वर्शिप श्री प्रदीप शर्मा
शीर्षक अंग्रेज़ी में और निबंध हिंदी में ! जी हाँ, कुछ ऐसा ही होता था हमारे ज़माने में। जिसे अंग्रेज़ी नहीं आती थी, वह भी इस मुहावरे का बड़े आत्म-विश्वास के साथ प्रयोग करता देखा जा सकता था। बर्क इज बर्शिप एंड लव इज ब्लाइंड, यू नो।
यह अंग्रेजों का मुहावरा है, जिसका आज़ादी के बाद भारतीयकरण कर दिया गया। वर्क को हिंदी में कर्म कहते हैं। प्रेम की तरह ये दोनों ही ढाई आखर के हैं। इन दोनों हिंदी अंग्रेज़ी शब्दों की केमिस्ट्री देखिये, कितनी मिलती जुलती है। वर्क मने कर्म ! यही हिंदी अंग्रेज़ी प्रेम है, जिसके हम आज भी कायल हैं।।
अंग्रेज़ चले गए, नेहरू छोड़ गए, जिन्होंने वर्क इज़ वर्शिप को आराम हराम है, कर दिया। वे पूजा में नहीं, काम में विश्वास रखते थे। कर्म को ही काम भी कहते हैं। काम ही पूजा है। अगर विश्वास न हो तो खजुराहो का एक ट्रिप मार आएँ, जहाँ रजनीश के अनुसार सभी मूर्तियाँ समाधि अवस्था में हैं।
अंग्रेज़ भारत में पहले कर्म अर्थात् व्यापार करने आए। धंधा अच्छा चल निकला तो कर्म को पूजा से जोड़ दिया। खुद साहब बन बैठे और देश को गुलाम बना दिया। प्रसाद स्वरूप कुछ सिविल सर्वेंट भी बँटवारे के समय भारत में छोड़ गए। जो काम पूजा था, वह सेवा हो गया। आज़ादी के बाद सेवा ही पूजा हो गई।।
हम बड़े धार्मिक लोग हैं। जो सेवा करता है, उसके बदले दान दक्षिणा तो बनती ही है। एक शब्द और, टिप के रूप में, अंग्रेज़ हमें दे गए, बख्शीश ! हमारे आदर्श संस्कारों ने इसे बहुत ज़ल्द मान्यता भी दे दी। करोगे सेवा तो पाओगे मेवा। कर्म ही पूजा है, कर्म ही सेवा है। गीता में श्रीकृष्ण कह गए हैं, हम बिना गीता पढ़े कह सकते हैं, अनासक्त कर्म कर, फल की चिंता तू मत कर। तू मत कर। अरे भोले, अर्जुन सदाशिवराव मतकर !
एक कर्म की दूकान भी होती है, जहाँ कर्म का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे वर्कशॉप भी कहते हैं। केवल पाठशाला ही नहीं होती, कार्यशाला भी होती है। महिलाओं की शॉपिंग से बढ़कर कोई कर्म नहीं ! ख़ाली दिमाग़ को शैतान का प्रशिक्षण केंद्र अर्थात devil’s workshop भी कहा जाता है। कर्म में कुशलता ही workmanship कहलाती है।।
सेवा ही पूजा है ! हम कितने भी उन्नत और प्रगतिशील क्यों न हो जाएं, लता जी का गीत तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, ही हमारा आदर्श रहेगा। हम पूजा और सेवा को अलग नहीं कर सकते। कर्म को पूजा समझें, या सेवा को पूजा, बात एक ही है।
सच तो यह है कि खाली पेट न तो सेवा होती है, और न ही पूजा। समय, काल और परिस्थिति अनुसार कभी रोटी और प्याज़ तो कभी बर्गर-पिज़्ज़ा ! पेट पूजा काम दूजा।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४१ ☆ क्या चल रहा है? …
एक विज्ञापन बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिलता था, ‘फलां-फलां बॉडी-स्प्रे चल रहा है।’ इसी तर्ज़ पर एक मित्र से पूछा,‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिला,‘यही सोच रहा हूँ कि इतना जीवन बीत गया, क्या किया और क्या कर रहा हूँ? जीवन में क्या चल रहा है?’ उत्तर चिंतन को दिशा दे गया।
स्तुतः यह प्रश्न हरेक को अपने आपसे अवश्य करना चाहिए-‘क्या चल रहा है?’ दिन में जितनी बार आईना देखते हो, उतनी बार पूछो खुद से-‘क्या चल रहा है?’ बकौल डॉ. हरिवंशराय बच्चन-‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’ चौबीस घंटे भौतिकता के संचय में डूबा मनुष्य जीवन में भौतिकता का भी उपभोग नहीं कर पाता। संचित धन को निहारने, हसरतें पालने और सब कुछ धरा पर धरा छोड़कर चले जानेवाले से बड़ा बावरा भिखारी और कौन होगा? पीछे दुनिया हँसती है-‘संपदा तो थी पर ज़िंदगी भर ‘मंगता’ ही रहा।’
बड़ा प्रश्न है कि क्या साँसें भी विधाता द्वारा प्रदत्त संपदा नहीं हैं? प्राणवायु अवशोषित करना-कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जित करना, इतना भर नहीं होता साँस लेना। मरीज़ ‘कोमा’ में हो तो रिश्तेदार कहते हैं-‘ कुछ बचा नहीं है, बस किसी तरह साँसें भर रहा है।’ हम में से अधिकांश लोग एक मानसिक ‘कोमा’ में हैं। साँसें भर रहे हैं, समय स्वतः जीवन में कालावधि जोड़ रहा है। काल के आने से पूर्व मिलनेवाली अवधि-कालावधि। हम अपनी सुविधा से ‘काल’ का लोप कर ‘अवधि’ के मोह में पड़े बस साँसें भर रहे हैं। फिर एक दिन एकाएक प्रकट होगा काल और पूछेगा-‘क्या चल रहा है?’ जीवन भर सटीक उत्तर देनेवाला भी काल के आगे हकलाने लगता है, बौरा जाता है, सूझता कुछ भी नहीं।
एक साधु से शिष्य ने पूछा कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था की जा सकती है जिसमें मनुष्य की मृत्यु का समय उसे पहले से पता चला जाए। ऐसा हो सके तो हर मनुष्य अपने जीवन में किए जा सकनेवाले कार्यों की सूची बनाकर निश्चित समय में उन्हें पूरा कर सकेगा, मृत्यु के समय किसी तरह का पश्चाताप नहीं रहेगा। साधु ने कहा, ‘जगत का तो मुझे पता नहीं पर तेरी मृत्यु आठ दिन बाद हो जाएगी। सारे काम उससे पहले कर लेना।’ कहकर साधु आठ दिन की यात्रा पर चले गए। इधर गुरु का वाक्य सुनना भर था कि शिष्य का चेहरा पीला पड़ गया। वह थरथर काँपने लगा। खड़े-खड़े उसे चक्कर आने लगा। कुछ ही मिनटों में उसने खटिया पकड़ ली। खाना-पीना छूट गया, हर क्षण उसे काल सिर पर खड़ा दिखने लगा। आठ दिन में तो वह सूख कर काँटा हो चला। यात्रा से लौटकर गुरु जी ने पूछा, ‘क्यों पुत्र, सब काम पूरे कर लिए न?’ शिष्य सुबकने लगा। आँखों में बहने के लिए जल भी नहीं बचा था। कहा, ‘गुरु जी, कैसे काम और कैसी पूर्ति? मृत्यु के भय से मैं तो अपनी सुध-बुध भी भूल गया हूँ। कुछ ही क्षण बचे हैं, काल बस अब प्राण हरण कर ही लेगा।’ गुरु जी मुस्कराए और बोले, ‘ यदि मृत्यु की पूर्व जानकारी देने की व्यवस्था हो जाए तो जगत की वही स्थिति होगी जो तुम्हारी हुई है।…और हाँ सुनो, तुमसे असत्य बोलने का प्रायश्चित करने मैं आठ दिन की साधना पर गया था।
तुम्हारी और मेरी भी मृत्यु कब होगी, मैं नहीं जानता।’
काल आया भी नहीं था, उसकी काल्पनिक छवि से यह हाल हुआ। वह जब साक्षात सम्मुख होगा तब क्या स्थिति होगी? जीवन ऐसा जिओ कि काल के आगे भी स्मित रूप से जा सको, उसके आगमन का भी आनंद मना सको। जैसा पहले कहा गया-साँस लेना भर नहीं होता जीवन। शब्द है-‘श्वासोच्छवास।’ प्रकृति में कोई भी प्रक्रिया एकांगी नहीं है। लेने के साथ देना भी जुड़ा है। जीवन भर लेने में, बटोरने में लगे रहे, भिखारी बने रहे। संचय होते हुए भी देने का मन बना ही नहीं, दाता कभी बन ही नहीं सके।
जीवन सरकती बालू वाले टाइमर की तरह है। रेत गति से सरक रही है, अवधि रीत रही है। काल निकट और निकट, सन्निकट है। कोई पूछे, न पूछे, बार-बार पूछो अपने आप से- ‘क्या चल रहा है?’ अपने उत्तर आप जानो पर हरेक पर अनिवार्य रूप से लागू होनेवाला मास्टर उत्तर स्मरण रहे-काल चल रहा है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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ऋषि परंपरा से वैश्विक मंच तक: 21 जून और एक सूत्र में बंधती दुनिया
प्राचीन भारतीय धरोहर से वैश्विक कल्याण तक: ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संकल्प को साकार करता 12वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
“वर्मा जी, आज पार्क में इतनी भीड़ क्यों है?”
सुबह की सैर करते हुए शर्मा जी ने पूछा।
“अरे भाई, आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देखिए, बच्चे भी आए हैं, युवा भी और बुजुर्ग भी।”
शर्मा जी कुछ देर तक लोगों को योग करते हुए देखते रहे। फिर मुस्कुराकर बोले, “अद्भुत बात है। हजारों साल पहले हमारे ऋषियों ने जंगलों और आश्रमों में जो साधना की थी, आज वही पूरी दुनिया को जोड़ रही है।”
वर्मा जी ने सहमति में सिर हिलाया।
“यही तो भारत की सबसे बड़ी देन है। ऐसा ज्ञान जो किसी एक देश, जाति या धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है।”
उनकी बात सुनकर मन अनायास ही उस भारत की ओर चला जाता है, जहाँ ऋषि-मुनियों ने जीवन को केवल जीने का नहीं, बल्कि समझने का प्रयास किया। उन्होंने शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने की जो विधि खोजी, वही आगे चलकर योग के रूप में विश्व को मिली।
आज जब दुनिया 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाती है, तो यह केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं होता। यह उस सांस्कृतिक विरासत का उत्सव होता है जिसने मानवता को जोड़ने का मार्ग दिखाया है।
योग का अर्थ ही है – जोड़ना।
शरीर को मन से जोड़ना।
मन को आत्मा से जोड़ना।
और व्यक्ति को समस्त सृष्टि से जोड़ना।
शायद यही कारण है कि योग की यात्रा आश्रमों से शुरू होकर आज वैश्विक मंच तक पहुँच चुकी है।
वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारत के प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन देते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। इसके बाद से हर वर्ष दुनिया के कोने-कोने में लाखों लोग एक साथ योग का अभ्यास करते हैं। यह दृश्य केवल स्वास्थ्य जागरूकता का नहीं, बल्कि वैश्विक एकता का भी प्रतीक है।
भारत की संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” के दर्शन को मानती रही है।
अर्थात् पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
आज जब दुनिया युद्धों, तनाव, मानसिक असंतुलन, अकेलेपन और जीवनशैली जनित रोगों से जूझ रही है, तब योग इस दर्शन को व्यवहार में बदलने का माध्यम बनकर सामने आया है।
योग किसी सीमा में बंधा हुआ विचार नहीं है।
न यह किसी धर्म का प्रचार है और न किसी विशेष वर्ग का अधिकार।
यह तो जीवन को संतुलित बनाने की सार्वभौमिक कला है।
इसी भावना को और अधिक अर्थपूर्ण बनाती है वर्ष 2026 के 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम –
“स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” (Yoga for Healthy Ageing)।
यह विषय केवल लंबी उम्र की बात नहीं करता।
यह स्वस्थ, सम्मानजनक और सक्रिय जीवन की बात करता है।
आज चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ा दी है। लोग पहले से अधिक वर्षों तक जीवित रह रहे हैं। लेकिन क्या वे उतने ही स्वस्थ और आत्मनिर्भर भी हैं?
यही प्रश्न आज पूरी दुनिया के सामने है।
बढ़ती उम्र के साथ गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्मृति ह्रास, तनाव और अकेलापन जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने का माध्यम बनकर उभरा है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि नियमित योगाभ्यास शरीर की लचक बनाए रखने, संतुलन सुधारने, रक्तचाप नियंत्रित करने और मानसिक तनाव को कम करने में अत्यंत प्रभावी है। प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है, ध्यान मानसिक शांति देता है और योगासन शरीर को सक्रिय बनाए रखते हैं।
लेकिन योग की सबसे बड़ी शक्ति उसके शारीरिक लाभों से भी आगे है। आज का मनुष्य पहले से अधिक सुविधासंपन्न है, फिर भी भीतर से बेचैन है।
हमारे पास संवाद के अनेक साधन हैं, लेकिन संवाद कम होते जा रहे हैं।
हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मज्ञान कम होता जा रहा है।
हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन स्वयं से दूर होते जा रहे हैं।
योग हमें इसी खोए हुए संतुलन की ओर वापस ले जाता है।
महर्षि पतंजलि ने कहा था – “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों को शांत करना ही योग है।
यह सूत्र आज उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।
जब हम कुछ क्षणों के लिए अपनी साँसों पर ध्यान देते हैं, तो हम वर्तमान में लौट आते हैं।
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हम स्वयं से मिलते हैं।
और जब हम स्वयं से जुड़ते हैं, तभी दूसरों से भी सही अर्थों में जुड़ पाते हैं।
यही योग का आध्यात्मिक पक्ष है।
यही उसकी वैश्विक शक्ति है।
योग हमें सिखाता है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है।
जीवन संतुलन का नाम है।
सफलता का भी महत्व है, लेकिन शांति का भी।
प्रगति आवश्यक है, लेकिन स्वास्थ्य भी।
भौतिक समृद्धि जरूरी है, लेकिन मानसिक संतोष भी।
आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा।
परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा।
और समाज स्वस्थ होगा तो विश्व में शांति और समरसता का मार्ग प्रशस्त होगा।
अंततः 21 जून केवल एक तिथि नहीं है। यह हमें अपनी जड़ों की याद दिलाने वाला दिवस है।
यह हमें बताता है कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर सकती है।यह हमें विश्वास दिलाता है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर संतुलन, करुणा और जागरूकता का दीप जलाएँ।
क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तब परिवार जुड़ता है। जब परिवार जुड़ते हैं, तब समाज जुड़ता है।
और जब समाज जुड़ते हैं, तब सचमुच पूरी दुनिया एक सूत्र में बंध जाती है।
यही योग का संदेश है। यही भारत की विरासत है और यही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का साकार रूप है।
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – विमर्श: योग दिवस…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८३ ☆
☆ विमर्श: योग दिवस…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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योग क्या?
जोड़ना, संचय करना.
संचय क्या और क्यों करना?
सृष्टि का निर्माण और विलय का कारक है ‘ऊर्जा’, अत: संचय ऊर्जा का… लक्ष्य ऊर्जा को रूपांतरित कर परम ऊर्जा तक आरोहण कर पाना.
ऊर्जा संचय और योग में क्या संबंध है?
योग शारीरिक, मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को चैतन्य कर, उनकी वृद्धि करता है .फलत: नकारात्मकता का ह्रास होकर सकारात्मकता की वृद्धि होती है. व्यक्ति का स्वास्थ्य और चिंतन दोनों का परिष्कार होता है.
योग धनाढ्यों और ढोंगियों का पाखंड है.
योग के क्षेत्र में कुछ धनाढ्य और ढोंगी हैं. धनाढ्य होना अपराध नहीं है, ढोंगी होना और ठगना अपराध है. पहचानना और बचना अपनी जागरूकता और विवेक से ही संभव है, गेहूं के बोर में कुछ कंकर होने से पूरा गेहूं नहीं फेंका जा सकता. इसी तरह कुछ पाखंडियों के कारण पूरा योग त्याज्य नहीं हो सकता.
दैनिक जीवन की व्यस्तता और समयाभाव के कारण योग करने नहीं जाया जा सकता.
योग करने के लिए कहीं जाना नहीं है, न अलग से समय चाहिए. एक बार सीखने के बाद अभ्यास अपना काम करते हुए भी किया जा सकता है. कार्यालय, कारखाना, खेत, रसोई हर जगह योग किया जा सकता है, वह भी अपना काम करते-करते.
योग कैसे कार्य करता है?
योग मुद्राएँ शरीर की शिराओं में रक्त प्रवाह की गति को सुधरती हैं. मन को प्रसन्न करती है. फलत: थकान और ऊब समाप्त होती है. प्रसन्न मन काम करने पर परिणाम की मात्रा और गुण दोनों में वृद्धि होती है. इससे मिली प्रशंसा और सफलता अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देती है.
योग खर्ची ला है.
नहीं योग बिन किसी अतिरिक्त व्यय के किया जा सकता है. योग रोग घटाकर बचत कराता है.
कैसे?
योग से सही आसन सीख कर कार्य करते समय शरीर को सही स्थिति में रखें तो थकान कम होगी, श्वास-प्रश्वास नियमित हो तो रक्त प्रवाह की गति और उनमें ओषजन की मात्रा बढ़ेगी.फलत: ऊर्जा, उत्साह, प्रसन्नता और सामर्थ्य में वृद्धि होगी.
योग सिखाने वाले बाबा ढोंगी और विलासी होते हैं.
निस्संदेह कुछ बाबा ऐसे हो सकते हैं. उन्हें छोड़कर सच्च्ररित्र प्रशिक्षक को चुना जा सकता है. दूरदर्शन, अंतरजाल आदि की मदद से बिना खर्च भी सीखा जा सकता है.
योग और भोग में क्या अंतर है?
योग और भोग एक सिक्के के दो पहलू हैं. ‘दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’, जीने के लिए अन्न, वस्त्र, मकान का भोग करना ही होगा. बेहतर जीवन स्तर और आपदा-प्रबंधन हेतु संचय भी करना होगा. राग और विराग का संतुलन और समन्वय ही ‘सम्भोग’ है. इसे केवल दैहिक क्रिया मानना भूल है. ‘सम्भोग’ की प्राप्ति में योग सहायक होता है. ‘सम्भोग’ से ‘समाधि’ अर्थात आत्म और परमात्म के ऐक्य की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है. अत्यधिक योग और अत्यधिक भोग दोनों अतृप्ति, अरुचि और अंत में विनाश के कारण बनते हैं. ‘योग; ‘भोग’ का प्रेरक और ‘भोग’ ‘योग’ का पूरक है.
योग कौन कर सकता है?
योग हर जीवित प्राणी कर सकता है. पशु-पक्षी स्वचेतना से प्रकृति अनुसार आचरण करते हैं जो योग है. मनुष्य में बुद्धितत्व की प्रधानता उसे सर्वार्थ से दूर कर स्वार्थ के निकट कर देती है. योग उसे आत्म तत्व के निकट ले जाकर ब्रम्हांश होने की प्रतीति कराता है. कंकर-कंकर में शंकर होने की अनुभूति होते ही वह सृष्टि के कण-कण से आत्मीयता अनुभव करता है. योग मौन से संवाद की कला है. बिन बोले सुनना-कहना और ग्रहण करना और बाँट देना ही सच्चा योग है.
योग दिवस क्यों?
योग दिवस केवल स्मरण करने के लिए कि अगले योग दिवस तक योगरत रहकर अपने और सबके जीवन को बेहतर और प्रसन्नता पूर्ण बनाएँ.
☆ आलेख ☆ ~ सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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सूर्य की किरणे शरीर को छुकर लौट पड़ी, लगा कि किसी ने जलते लाल तप्त लौह को बदन पर ही रख दिया हो। गनीमत बस इतनी थी कि किरणे छु कर ही निकल गयीं थीं। असंख्य – अनगिनत विषाणु -कीटाणु बिलबिला कर रह गये और यह कहते सुने गये कि हे भगवन् ! जान बची तो लाखों पाए।
हालांकि आधुनिक घोर शीतक यन्त्र से निकली बर्फ़ीली हवाओं से चिल्ड हो रहे कमरे से निकल कर बाहर आने की जुर्रत उसने मज़बूरी में ही कि थी। मन का सुकून शबाश पर था लेकिन उसे यह पता नही था कि असंख्य दुश्मन भी सुकून से उसे चूस रहे थे। घुटनों और जोड़ों के दर्द से कराहते शरीर के पास बेचारा नींद आने से डर रहा था। एक गिलास दूध में घोल कर पिए गये सेसेस का इतना असर जरूर हुआ कि अगले कुछ दिनों- हफ्तों वह बिना दर्द के सो पाया।
पच्चास वर्ष पहले बचपन में अलगू चाचा को खुली पीठ को घंटों हल जोतते लेखक ने देखा था, जिनके नंगे बदन को सूर्य की यहीं घनघोर किरणे घंटो चूमती रहती थीं और वे ची करना तो दूर की बाद, पूर्बी की धुन में खो गये होते थे। उन असंख्य बिषाणुओं – किटाणुओं का दूर दूर तक पता नही लगता था, यूँ कहे सूर्य की तप्त किरणों में उनका अस्तित्व ही नही बचा था। अलगू चाचा का शरीर बिना बिस्तर बिछे बसखट पर जब एक बार गिरा तो उसके बाद वे चैन की वाली दुनियां में जाकर भूल गये कि कोई दर्द वाली दुनियां भी होती है।
बैलो के गर्दन में बधे घुघुरुओ की आवाज ने उन्हें हौले से जगाया, तो ठंडी ठंडी भोर ने उनका आलिंगन करते हुए पूछा, अलगू चाचा पक्षियों का कलरव आपको कैसा लगा ?
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नोट : तब दादा की पीठ पर सूर्य की किरणे कहर बरसाती थी, लेकिन जिन्दगी रोग रहित चैन की थी, आज पोते के पीठ पर जब ए. सी बर्फ जमाती है, लेकिन जिंदगी दर्द भरी, पीड़ा में है.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ओज़ोन…“।)
अभी अभी # १०२४ ⇒ आलेख – ओज़ोन श्री प्रदीप शर्मा
OZONE
मेरे घर से कुछ ही दूर, सर्विस रोड पर एक होटल है जिसका नाम ozone है! जाहिर है, अंग्रेजी नाम है तो हिंदी में तो लिखने से रहे। कभी शहर की सबसे पुरानी एक होटल थी, जिसका नाम लेन्टर्न था, आज यह होटल अतीत हो चुकी है, ठीक उसी तरह जैसे कभी इंदौर में मिल्की वे और स्टार लिट टॉकीज थे। वहीं पास में एक खूबसूरत जगह शबे मालवा भी थी। कुछ फिल्मों के शौकीन दर्शकों को शायद बेम्बिनो टॉकीज भी याद हो।
बाजारवाद और विज्ञापन की दुनिया में हम किसी ब्रांड से इतने जुड़ जाते है, कि उसके नाम को महज एक नाम मानकर आगे बढ़ जाते हैं। एक ईगल फ्लास्क आता था, जो उस समय हर घर की जरूरत था। वीआईपी तब केवल एक सूटकेस का नाम होता था। आजकल हर वीआईपी के हाथ में एक सूटकेस होता है।।
मैं कभी ozone होटल में गया नहीं, लेकिन जब भी इस होटल के सामने से गुजरता हूं, इसका नाम मुझे पर्यावरण की याद दिलाता है। होटल वाले अपने आसपास हरियाली बनाए रखते हैं, और सुरूचिपूर्ण साज सज्जा भी। आइए, इसी बहाने आज ozone की भी संक्षिप्त चर्चा कर ली जाए।
आप चाहें तो इसे ट्राई ऑक्सीजन भी कह सकते हैं। ऑक्सीजन के तीन अणुओं से बनी, एक रंगहीन और गंध हीन गैस है ओजोन, जो पर्यावरण का एक प्राकृतिक हिस्सा है। बोलचाल की भाषा में जितनी क्रीमी लेयर आम है, ओजोन परत, उतनी ही पर्यावरण के संबंध में खास है।
जब भी मौसम बईमान होता है, पहाड़ बर्फ विहीन होकर अपनी जगह छोड़ने लग जाते हैं, प्रकृति तांडव करने लग जाती है। समुद्र अपनी सीमाएं लांघकर, अठखेलियों की जगह उत्पात मचाने लगता है। एक ही मौसम में, गर्मी, आंधी, तूफान और बरसात का सामना एक साथ करना पड़ता है।।
जितनी चिंता हमें इस देश की और इसके पर्यावरण की है, उतनी शायद ही किसी को हो। स्वच्छ भारत अब नारा नहीं, एक हकीकत हो गया है। वृक्षारोपण ने भले ही समारोह की शक्ल ले ली हो, फिर भी आम आदमी हरियाली और पेड़ पौधों से प्यार करता है। लेकिन यह विकास की आंधी, कहीं न कहीं, पहले वृक्षों को उजाड़ती है और फिर वापस उन्हें उगाने की भी चिंता करती है।
प्राकृतिक और धार्मिक स्थानों तक दर्शक, श्रद्धालु ही नहीं, पर्यटक भी पहुंचे, इसलिए इन स्थलों का विकास भी जरूरी हो जाता है। जहां अधिक लोग, वहां अधिक सुविधा और इन सबसे ओजोन परत को बड़ी असुविधा। पहाड़ की ऊंचाइयों पर बर्फ जमता है, ग्लेशियर पिघलते हैं, नदियां निकलती हैं। पूरी सृष्टि का यही चक्र है।।
कुदरत से हम हैं, हम से कुदरत नहीं ! यह अमानत हमें विरासत में मिली है। अमानत में खयानत होगा अपराध, लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ के खिलाफ कोई कानून नहीं, कोई दंड नहीं। और तो और, जब बागड़ ही खेत को खाने लगे, तो खेत की रखवाली कौन करे।
इसलिए प्रकृति खुद कानून अपने हाथ में ले लेती है, वह पहले आगाह करती है, लेकिन जब कथित पर्यावरण का विनाश रथ, रुकने का नाम नहीं लेता, तो कयामत आ जाती है। यही वह दंड है, लेकिन यह लोभी, लालची इंसान कितना उद्दंड है।।
कल सुबह टहलते हुए हमने भी अपनी ozone होटल की खबर ली। कोरोना काल में यह बंद रही। वैसे भी कुछ विशिष्ट व्यक्ति ही यहां आते थे। इस होटल से हमारे जैसे लोगों की दूरी का एक ही कारण था, wine & dine
जो इनके विज्ञापन का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
हमें लगा, शायद यह होटल बंद होने के कगार पर है, लेकिन अचानक यहां फिर से चहल पहल शुरू हुई, पुरानी रौनक लौटी, लेकिन एक मामूली के बदलाव के साथ। जाहिर है, मालिक ही बदले होंगे, क्योंकि ozone होटल के wine & dine स्वरूप को अब थोड़ा बदल दिया गया है। किसी ने wine शब्द को काले रंग से ढंका नहीं, मिटा ही दिया है। अब केवल dine ही दिखाई देता है। मतलब अब यहां भोजन के साथ मदिरा पान नहीं।।
शायद यह एक संकेत है, ओजोन परत के साथ खिलवाड़ अब बंद होना चाहिए। पहाड़ों और तीर्थ स्थलों को अपने मूल स्वरूप में ही रहने दें। हर तरह की खाने पीने और मौज मस्ती की सुविधा मानवता को बहुत भारी पड़ ही रही है। हमारी ozone होटल तो शायद ठोकर लगने के बाद होश में आ जाए, हम कब होश में आएंगे, पूछता है पहाड़, पूछता है ग्लेशियर और पूछती है ट्राई ऑक्सीजन जिसे हम आम भाषा में पर्यावरण कहते हैं ..!!
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख बालश्रम निषेध के संदर्भ में। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन चढ़ी नाम खुमारी / स्वर- विभा जी योगाश्रम प्रस्तुति, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२६ ☆
☆ बालश्रम निषेध के संदर्भ में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
मज़दूरी इनकी मजबूरी
‘मज़दूरी इनकी मजबूरी’ एक विवादास्पद विषय है, जो अनेक प्रश्नों व समस्याओं को जन्म देता है। अनगिनत पात्र मनोमस्तिष्क में ग़ाहे-बेग़ाहे दस्तक देते हैं, क्योंकि लम्बे समय तक मुझे इनके अंग-संग रहने का अवसर प्राप्त हुआ है। यह पात्र कभी लुकाछिपी का खेल खेलते हैं; कभी करुणामय नेत्रों से निहारते हैं; कभी व्यंग्य करते भासते हैं– मानो विधाता के न्याय पर अंगुली उठा रहे हों।
—कैसा न्याय है यह? जब सृष्टि-नियंता ने सबको समान बनाया है— सब में एक-सा रक्त प्रवाहित हो रहा…तो हमसे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों? एक ओर बड़ी-बड़ी अट्टालिकायों में रहने वाले लब्ध- प्रतिष्ठित धनी लोग और दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले, खुले आकाश के नीचे ज़िन्दगी बसर करने वाले लोगों में इतनी असमानता क्यों? हमारे देश में इंडिया और भारत में वैषम्य क्यों… ये प्रश्न अंतर्मन को निरंतर कचोटते हैं तथा अत्यंत चिंतनीय, व विचारणीय हैं। जब हम मासूम बच्चों को मज़दूरी करते देखते हैं; तो आत्मग्लानि होती है। ढाबे पर बर्तन धोते; चाय व खाना परोसते, रैड लाइट पर गाड़ियां साफ करते; फल-फूल, खिलौने आदि खरीदने का अनुरोध करते; सड़क किनारे अपने छोटे भाई-बहिन का ख्याल रखते; जूठन को देख अधिक पाने के निमित्त एक-दूसरे पर झपटते-झगड़ते, मरने -मारने पर उतारू नंग-धड़ंग बच्चों को देख हृदय में उथल-पुथल ही नहीं होती, एक आक्रोश फूट निकलता। इतना ही नहीं, रेलवे स्टेशन पर बूट- पालिश करते; ट्रेन में अपनी कमीज़ से कंपार्टमेंट की सफाई करते व कंधे पर अखबार व मैगज़ीन का भारी-भरकम बोझ लादे बच्चों को देख, उनकी ओर ध्यान स्वतः आकर्षित हो जाता और हृदय उनकी मजबूरी के बारे में जानने को आतुर-आकुल हो, प्रश्नों की बौछार लगा देता है। बालपन में इन दुश्वारियों से जूझते मासूम बच्चों की अंतहीन पीड़ा व अवसाद के बारे में जानकर हृदय द्रवित हो जाता…कलेजा मुंह को आता। परंतु हम उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने के अतिरिक्त कुछ कर पाने में, स्वयं को विवश, असमर्थ व असहाय पाते हैं।
मुझे स्मरण हो रही है– एक ऐसी ही घटना, जब मैं गुवाहाटी की ओर जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में दिल्ली रेलवे-स्टेशन पर बैठी थी। सहसा बच्चों के एक हुजूम को वेश-भूषा बदलते; स्वयं को मिट्टी से लथपथ करते; घाव दर्शाने हेतु रंगीन दवा व मरहम लगाते; एक जैसी टोपियां ओढ़ते देख… मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पायी और एक बच्चे से संवाद कर बैठी। परंतु वह मौन रहा और थोड़ी देर के पश्चात् एक व्यक्ति उन सब के लिए भोजन लेकर आया। भोजन करने के पश्चात् वे अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए तथा उस बच्चे ने मेरी जिज्ञासा के बारे में अपने मालिक को जानकारी दी। वह मुझे देर तक घूरता रहा… मानो देख लेने की अर्थात् अंजाम भुगतने को तैयार रहने की चेतावनी अथवा धमकी दे रहा हो…और चंद मिनट बाद ही मुझे उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा।
बच्चे ट्रेन के अलग-अलग डिब्बों में सवार हो गए। परंतु उस गैंग के बाशिंदों ने मुझे ट्रेन में नहीं चढ़ने से बहुत समय तक रोके रखा। चार-पांच लोग, जिनमें एक युवती भी थी… वे सब ए•सी• कंपार्टमेंट के दरवाज़े के बीच रास्ता रोक कर खड़े हो गए और बड़ी ज़द्दोज़हद के पश्चात् मैं उनके व्यूह को तोड़, भीतर प्रवेश पाने में सफल हो पायी। मुझे सीट पर पहुंचने में भी उतनी ही कठिनाई का सामना करना पड़ा। टी•टी• के आने के पश्चात् मैंने टिकट निकालने के लिए जैसे ही पर्स में हाथ डाला, मैं सन्न रह गयी। मेरा मोबाइल व पैसे पर्स से ग़ायब हो चुके थे। ट्रेन चलने के कारण मैं कोई कार्यवाही भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि जहां घटना घटित होती है; शिकायत भी वहीं दर्ज कराई जा सकती है। इस बीच वे लोग अपने मिशन को अंजाम देकर उस डिब्बे से रफू-चक्कर हो चुके थे।
मैं हैरान-परेशान-सी पूरा रास्ता यही सोचती रही… कितने शातिर हैं वे लोग…जो इन बच्चों से भीख मांगने का धंधा करवाते हैं और यह बच्चे भी डर के मारे उनके इशारों पर नाचते रहते हैं। यह भी हो सकता है कि इनके माता-पिता इन कारिंदों से, रात को बच्चों की एवज़ में पैसा वसूलते हों। वैसे भी आजकल छोटे बच्चों को तो शातिर महिलाएं किराए पर ले जाती हैं …अपना धंधा चलाने के निमित्त और रात को उनके माता-पिता को लौटा जाती हैं… दिहाड़ी के साथ। जहां तक दिहाड़ी का संबंध है, बच्चों व महिलाओं को कम पैसे देने का प्रचलन तो आज भी बदस्तूर जारी हैं। वैसे भी बाल मज़दूरी तो दण्डनीय कानूनी अपराध है। परंतु इन बच्चों के सक्रिय योगदान के बिना तो बहुत से लोगों का धंधा चल ही नहीं सकता।
सुबह जब बच्चे, कंधे पर बैग लटकाए, स्कूल बस या कार में यूनीफ़ॉर्म पहनकर जाते हैं, तो इन मासूमों के हृदय का आक्रोश सहसा फूट निकलता है और वे अपने माता-पिता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर देते हैं। वे उन्हें स्कूल भेजने की अपेक्षा; उनके हाथ में कटोरा थमाकर भीख मांगने को क्यों भेज देते हैं? उनके साथ यह दोग़ला व्यवहार क्यों?
माता-पिता भाग्य व नियति का वास्ता देकर उन्हें समझाते हैं कि यह उनके पूर्व-जन्मों का फल है, सो! यह सब तो उन्हें सहर्ष भुगतना ही पड़ेगा। परंतु बच्चों को उनके उत्तर से संतोष नहीं होता। उनके कोमल मन में समानाधिकारों व व्यवस्था के प्रति आक्रोश उत्पन्न होता है और वे उन्हें आग़ाह करते हैं कि वे भविष्य में कूड़ा बीनने व भीख मांगने नहीं जायेंगे और न ही मेहनत-मज़दूरी करेंगे। वे भी शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं; उन जैसा जीवन जीना चाहते हैं। जब भगवान ने सबको समान बनाया है, तो हमसे यह भेदभाव क्यों? इस स्थिति में उनके माता-पिता मासूम बच्चों के प्रश्नों के सम्मुख निरुत्तर हो जाते हैं।
चलिए! रुख करते हैं–घरों में काम करने वाली बाईयों की ओर…जिन्हें उनके परिचित सब्ज़बाग दिखा कर दूसरे प्रदेशों से ले आते हैं और उन्हें बंधक बना कर रखा जाता है। चंद दिनों देह-व्यापार के धंधे में धकेल दिया जाता है; जहां उनका भरपूर शोषण होता है और वे नारकीय जीवन ढोने को विवश होती हैं। हां! कुछ नाबालिग़ लड़कियों को वे दूसरों के घरों में काम पर लगा देते हैं; जिसकी एवज़ में वे मोटी रकम वसूलते हैं। ग्यारह महीने तक वे उस घर में दिन-रात काम करती हैं। परन्तु जब वे घर छोड़ कर, चंद दिनों के लिए अपने गांव लौटती हैं, तो बहुत उदास होती हैं…भले ही काम करना इनकी मजबूरी होता है। परंतु धीरे-धीरे वे मालकिन की भांति व्यवहार करने लगती हैं, जिसका ख़ामियाज़ा घर के बुज़ुर्गों को ग़ाहे-बेग़ाहे अपने आत्म-सम्मान को दांव पर लगा कर चुकाना पड़ता है, क्योंकि वे तो अनुपयोगी अर्थात् बोझ होते हैं। सारे घर का दारोमदार तो उन काम वाली बाईयों के कंधों पर होता है और वे तो घर-परिवार के लिए प्राण-वायु सम होती हैं। सो! आजकल तो इनकी मांग ज़ोरों पर है। इसलिए वे बहुत अधिक भाव खाने लगी हैं।
परंतु कई घरों में तो उनका शोषण किया जाता है। दिन-रात काम करने के पश्चात् उन्हें पेट-भर भोजन भी नहीं दिया जाता। साथ ही उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है; मारा-पीटा जाता है और शारीरिक- शोषण तक भी किया जाता है। अक्सर उनकी तनख्वाह भी वे कारिंदे वसूलते रहते हैं। सो! वे मासूम तो अपनी मनोव्यथा किसी से कह भी नहीं सकतीं। जुल्म सहते-सहते, तंग आकर वे भाग निकलती हैं और आत्महत्या तक कर लेती हैं। सो! आजकल तो एजेंटों का यह धंधा भी खूब पनप रहा है। वे लड़की को किसी के घर छोड़ कर साल-भर का एडवांस ले जाते हैं और चंद घंटों बाद, अवसर पाकर वह लड़की अपने साथ कीमती सामान व नकदी लेकर भाग निकलती है। मालिक बेचारे पुलिस-स्टेशन के चक्कर लगाते रह जाते हैं, क्योंकि उनके पास तो उनका पहचान-पत्र तक भी नहीं होता। वहां जाकर उन्हें आभास होता है कि वे ठगी के शिकार हो चुके हैं। सो! उस स्थिति वे प्रायश्चित्त करने के अतिरिक्त कर ही क्या सकते हैं।
परंतु बहुत से बच्चों के लिए मज़दूरी करना, उनकी मजबूरी बन जाती है… विषम पारिवारिक परिस्थितियों व आकस्मिक आपदाओं व किसी अनहोनी के घटित हो जाने के कारण; उन मासूमों के कंधों पर परिवार का बोझ आन पड़ता है और वे उम्र से पहले बड़े हो जाते हैं। यदि उन्हें मज़दूरी न मिले, तो असामान्य परिस्थितियों में परिवार-जन ख़ुदकुशी तक करने को विवश हो जाते हैं। इसलिए भीख मांगने के अतिरिक्त उनके सम्मुख दूसरा विकल्प शेष नहीं रहता। परन्तु कुछ बच्चों में आत्म-सम्मान का भाव अत्यंत प्रबल होता है। वे मेहनत-मज़दूरी करना चाहते हैं, क्योंकि भीख मांगना उनकी फ़ितरत नहीं होती और उनके संस्कार उन्हें झुकने नहीं देते।
चंद लोग क्षणिक सुख के निमित्त अपनी संतान को जन्म देकर सड़कों पर भीख मांगने को छोड़ देते हैं। अक्सर वे बच्चे नशे के आदी होने के कारण अपराध जगत् की अंधी गलियों में अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। वे समाज में अव्यवस्था व दहशत फैलाने का उपक्रम करते हैं तथा वे बाल-अपराधी रिश्तों को दरकिनार कर, अपने माता-पिता व परिवारजनों के प्राण तक लेने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। लूटपाट, फ़िरौती, हत्या, बलात्कार, अपहरण आदि को अंजाम देना इनकी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। मुझे ऐसे बहुत से बच्चों के संपर्क में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। लाख प्रयास करने पर भी मैं उन्हें बुरी आदतों से सदैव के लिए मुक्त नहीं करवा पाई। ऐसे लोग वादा करके अक्सर भूल जाते हैं और फिर उसी दल-दल में लौट जाते हैं। उनके चाहने वाले दबंग लोग उन्हें सत्मार्ग पर चलने नहीं देते, क्योंकि इससे उनका धंधा चौपट हो जाता है।
‘मज़दूरी इनकी मजबूरी’ अर्थात् ऐसे सत्पात्रों पर विश्वास करना कठिन हो गया है, क्योंकि आजकल तो सब मुखौटा धारण किए हुए हैं। अपनी मजबूरी का प्रदर्शन कर लोगों की सहानुभूति अर्जित कर, उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर उन्हें लूटना… उनका पेशा बन गया है। वे बच्चे; जिन्हें मजबूरी के कारण मज़दूरी करनी है– सचमुच वे करुणा के पात्र हैं। समाज के लोगों व सरकार के नुमाइंदों को उनकी सहायता-सुरक्षा हेतु हाथ बढ़ाने चाहिएं, ताकि स्वस्थ समाज की संरचना संभव हो सके और हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हो सके… मानव- मूल्यों का संरक्षण हो सके तथा संबंधों की गरिमा बनी रहे। स्नेह, प्रेम, सौहार्द, सहयोग,परोपकार, सहनशीलता, सहानुभूति आदि दैवीय गुणों का समाज में अस्तित्व कायम रह सके। इंसान के मन में दूसरे की मजबूरी का लाभ उठाने का भाव कभी भी जाग्रत न हो और समाज में समन्वय, सामंजस्य व समरसता का साम्राज्य हो। मानव स्व-पर और राग-द्वेष से ऊपर उठकर एक अच्छा इंसान बन सके।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगी, यदि हम सब मिलकर प्रयासरत रहें और एक बच्चे की शिक्षा का दायित्व- निर्वहन कर लें, तो हम दस में से एक बच्चे को अच्छा प्रशासक, अच्छा इंसान व अच्छा नागरिक बना पाने में सफलता प्राप्त कर सकेंगे और शेष बच्चे भले ही जीवन की सुख-सुविधाएं जुटाने में सक्षम न हों; शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् आत्म- सम्मान से जीना सीख जाएंगे और अपराध-जगत् की अंधी गलियों में भटकने से बच पायेंगे। निरंतर अभ्यास, अथक परिश्रम व निरंतर प्रयास के द्वारा, हमारा मंज़िल पर पहुंचना निश्चित है। सो! हमें इस मुहिम को आगे बढ़ाना होगा, जैसा कि हमारी सरकार इन मासूम बच्चों के उत्थान के लिये नवीन योजनाएं प्रारम्भ कर रही है; जिसके अच्छे परिणाम हमारे समक्ष हैं। परंतु सकारात्मक परिणामों की प्राप्ति के लिए संविधान में संशोधन करना अपेक्षित व अनिवार्य है। हमें जाति-विशेष को प्रदत्त आरक्षण सुविधा को समाप्त करना होगा; जिसे संविधान के अनुसार केवल दस वर्ष के लिए दिया जाना सुनिश्चित किया गया था। परंतु हम आज तक वैयक्तिक स्वार्थ व लोभ-संवरण के विशेष आकर्षण व मोह के कारण उससे निज़ात नहीं पा सके हैं। सो! हमें अच्छी शिक्षा-प्राप्ति व जीवन-स्तर उन्नत करने के निमित्त, उन्हें आर्थिक-सुविधाएं प्रदान करनी होंगी, ताकि उनमें हीन-भावना घर न कर सके। देश की अन्य प्रतिभाओं को भी प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर समान अवसर प्रदत्त हों और प्रतिस्पर्द्धा में निर्धारित अहर्ताओं के मापदंडों पर सब खरे उतर सकें तथा जाति-पाति के भेदभाव को नकार, वे भी सिर उठा कर कह सकें…’हम भी किसी से कम नही।’