श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रे व ड़ी ||।)

?अभी अभी # १०५४ ⇒ आलेख – || रे व ड़ी || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

SWEET MEAT

जो बांटा जाता है, वह प्रसाद कहलाता है। जिसका अपने इष्ट को भोग लगाया जाए, वह प्रसाद बन जाता है। प्रसाद का श्रीगणेश अक्सर लड्डू से ही किया जाता है क्योंकि गणेश जी मोदक प्रिय हैं। सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन बजरंग बली के मंदिर में चने चिरोंजी का प्रसाद चढ़ाया जाता है। थोड़ा मीठा और थोड़ा पौष्टिक हो जाए। भुने हुए चने और चिरोंजी, वाह क्या जोड़ी है प्रसाद की।

आरती हो अथवा कथा, प्रसाद की यही कथा ! कहीं रवे का हलवा, तो कहीं पिसे धनिये की पंजेरी, जिसमें शकर की मिठास भी शामिल होती है। पांच तरह का अमृत, जिसे हथेली में ग्रहण किया जाता है, पंचामृत कहलाता है। दूध, घी, दही, शहद और शक्कर। इसके अलावा अगर आपने कोई संकल्प लिया हो अथवा मन्नत मांगी हो, तो सवा रुपए से लगाकर सवा मनी तक की लिमिट होती है प्रसाद की। प्रसाद बांटना और ग्रहण करना पुण्य का काम होता है। ।

हमें अभी तक इसमें कहीं रेवड़ी यानी sweetmeat, नजर नहीं आई। आखिर क्या है यह रेवड़ी, जो इतनी मशहूर भी है और बदनाम भी। आइए, थोड़ा रेवड़ी चिंतन करें।

तिल गुड़ का जीवन में बहुत महत्व है। एक पर्व आता है, मकर सक्रांति, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर जाता है। आप चाहे पतंग उड़ाएं, अथवा किसी की पतंग काटें, लेकिन तिल गुड़ खाएं जरूर। मीठा गुड़ भी होता है और शकर भी। तिल और गुड़ के लड्डू भी बनते हैं और गजक भी। जैसे जैसे सर्दी बढ़ती जाती है, गजक की मांग बढ़ती जाती है। बस, रेवड़ी भी और कुछ नहीं, तिल गुड़ के लड्डू अथवा गजक का बोनसाई स्वरूप ही है। गुड़ अथवा शकर की गोली और उस पर तिल्ली का लेप। बस, यही तो है हमारी रेवड़ी जो अब बंटने के लिए तैयार है। ।

किसी भी प्रसाद में रेवड़ी भी, अन्य प्रसाद के साथ शामिल भी कर ली जाती है, अथवा रेवड़ी का प्रसाद का स्वतंत्र प्रभार भी होता है। महिलाओं में पहले शुभ अवसरों पर, सामूहिक रूप से गीत गाया जाता था, जिसके पश्चात शकर के बतासों का वितरण किया जाता था। हमारे यहां इन गीत वाले बताशों का एक कांच की बरनी में संग्रह किया जाता था, जो हम बच्चों के लिए चॉकलेट का काम भी करती थी और घर में शकर के अभाव में चाय में शकर का भी करती थी। इसी तरह प्रसाद के रूप में एकत्रित रेवडियों का भी संग्रह किया जाता था। रेवड़ी का स्वाद, खुद खाओ, खुद जान जाओ।

रेवड़ी में कुछ तो ऐसी खूबी है जो यह केवल अपनों अपनों में ही बांटी जाती है। महाराज धृतराष्ट्र को भी जब सत्ता रूपी रेवड़ियों का बंटवारा करना पड़ा, तो उन्हें केवल अपने सौ कौरव पुत्र ही याद आए।

कौन जानता था कि अपने अपनों को रेवड़ी बांटने के कारण महाभारत भी हो सकता था। ना रेवड़ियां बंटती, और ना महाभारत होता। ।

जब रेवड़ियों को लेकर बंदर बांट और लूटमार मचने लगे तो बेहतर है, रेवड़ियां बांटी ही ना जाएं। लेकिन भक्तों में तो तब तक रेवड़ियां बंटती रहेंगी, जब तक भगवान है, पूजा है, आरती है, और प्रसाद है। पंडित जी बांटें रेवड़ी, अपनों अपनों को दें। बच्चा लोग, रेवड़ी का प्रसाद खतम, अब कल आना ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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