श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विशेष ☆

(पुस्तक मित्र लाइब्रेरी – एक किताब रखो – एक ले जाओ – पढो पढाओ – सौजन्य – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव)

?  आलेख – ओपन डब्बा लाइब्रेरी: एक अनूठी पहल ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भोपाल के मीनाल रेजीडेंसी में एक अनोखी और प्रेरणादायक पहल ने जन्म लिया है, जिसका नाम है “ओपन डब्बा लाइब्रेरी”। कालोनी में प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी जब 2021 में शिफ्ट हुए, तो उन्होंने अपनी ढेर सारी किताबों के साथ तथा उनके साहित्य को कालोनी के साहित्य में अभिरुचि रखने वाले लोगों के साथ साझा किया।

उनकी इसी आकांक्षा की पूर्ति करता यह पुस्तकालय पारंपरिक पुस्तकालयों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि यह न तो किसी बड़े भवन में स्थित है और न ही इसमें कोई ताला-चाबी है। न ही किसी लाइब्रेरियन से किताबें इशू करवानी पड़ती हैं। यह एक साधारण-सा बुक शेल्फ है, जो श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव के घर की बाउंड्री वाल पर लगा हुआ है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 24 घंटे खुला रहता है और सड़क से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति कभी भी यहां से किताब ले सकता है या अपनी किताब इसमें रख सकता है। इस पुस्तक मित्र लाइब्रेरी की शुरुआत श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ने की है। इस छोटे से बुक शेल्फ में शुरुआत में लगभग 4000 रुपये मूल्य की पुस्तकें रखी गईं, जो विभिन्न लेखकों और प्रकाशकों की ओर से संग्रहित की गई थीं। इनमें प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध, श्री सुरेश पटवा, स्वयं विवेक रंजन श्रीवास्तव और ज्ञानगंगा प्रकाशन की किताबें शामिल हैं। ये पुस्तकें साहित्य, ज्ञान और मनोरंजन का खजाना लेकर आई हैं, जो हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए उपयोगी हैं।इस लाइब्रेरी का मूल मंत्र है- “एक किताब रखो, एक ले जाओ”। यह सिद्धांत न केवल किताबों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है, बल्कि “पढ़ो और पढ़ाओ” के सुविचार को भी बढ़ावा देता है। आज के दौर में, जब डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के कारण किताबों की पठनीयता में कमी देखी जा रही है, यह पहल एक ताजी हवा के झोंके की तरह है। लोग अक्सर अपने घरों में पढ़ी हुई किताबों और पत्रिकाओं को इधर-उधर रख देते हैं या उन्हें बेकार समझकर रद्दी में बेच देते हैं या फेंक देते हैं। ऐसे में ओपन डब्बा लाइब्रेरी इन किताबों को नया जीवन दे रही है, जिससे वे दूसरों के लिए उपयोगी बन रही हैं।इस अभियान की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मीनाल रेजीडेंसी के निवासी और आसपास के लोग इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं। कॉलोनी में किताबों के प्रति उत्सुकता और उत्साह साफ देखा जा सकता है। लोग न केवल किताबें लेने आते हैं, बल्कि अपनी पढ़ी हुई किताबें भी इस शेल्फ में रखकर दूसरों के साथ साझा कर रहे हैं। यह एक ऐसा चक्र बन गया है, जो ज्ञान और साहित्य के प्रेम को बढ़ावा दे रहा है।

सामने ही पानी की टंकी के निकट सिक्यूरिटी गार्ड, मिनाल रेजीडेंसी के सफाई , जल , कर्मचारियों का जमघट रहता है, वे इस पुस्तकालय का खूब लाभ उठाते दिखते हैं। छुट्टियों में जो मेहमान मिनाल रेजीडेंसी में आते हैं, और घूमने निकलते हैं वे इस अनूठे प्रयोग का लाभ तो लेते ही हैं ,फोटो लिए बगैर नहीं रहते। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव का यह प्रयास समाज के लिए एक मिसाल बन गया है। इस छोटी-सी पहल ने न केवल किताबों को घरों की अलमारियों से बाहर निकाला है, बल्कि लोगों को पढ़ने और साझा करने की आदत को भी पुनर्जनन दिया है। इस डब्बा लाइब्रेरी की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है और यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में ऐसी और भी पहलें देखने को मिलेंगी, जो समाज में ज्ञान के प्रकाश को फैलाने में सहायक होंगी।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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