हेमन्त बावनकर
☆ ई- अभिव्यक्ति का विशेष आलेख ☆
☆ “शब्द-साधना का शताब्दी वर्ष : प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ की अक्षय विरासत” ☆
25 जुलाई 2026, यह तिथि केवल एक पुण्यस्मरण का अवसर नहीं है। यह एक ऐसे साहित्य-साधक के जीवन का स्मरण है, जिनकी प्रथम पुण्यतिथि और उनकी संभावित जन्मशती का भावपूर्ण संगम एक साथ उपस्थित हुआ है। यदि वे हमारे बीच होते तो इस वर्ष उनके जीवन का शताब्दी वर्ष आरंभ होता। नियति ने उन्हें शतायु होने का अवसर नहीं दिया, किंतु उन्होंने अपनी साधना से शब्दों को शतायु ही नहीं, कालजयी बना दिया। उनका जीवन भले 99 वर्षों तक सीमित रहा, पर उनकी रचनाएँ समय की सीमाओं से परे चली गई हैं।
प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ उन दुर्लभ साहित्यकारों में थे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व में कोई द्वैत नहीं था। उन्होंने जो लिखा, वही जिया; और जो जिया, वही लिखा। आज जब समाज में शब्द और आचरण के बीच दूरी बढ़ती जा रही है, तब उनका जीवन “सादा जीवन, उच्च विचार” का जीवंत प्रमाण बनकर हमारे सामने खड़ा है। उनका सादापन बाहरी प्रदर्शन नहीं था; वह उनके चिंतन, व्यवहार, अध्ययन, अनुशासन और सेवा का स्वाभाविक विस्तार था। गीता के कर्मयोग को उन्होंने केवल अनूदित नहीं किया, उसे अपने जीवन में आत्मसात भी किया। यही कारण है कि उन्हें जानने वाले बार-बार कहते हैं, वे गीता को पढ़ते नहीं थे, गीता को जीते थे।
आज जब हम उनकी रचनाओं का अवलोकन करते हैं तो सहज ही अनुभव होता है कि उन्होंने किसी एक विधा या विषय तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। कविता, गीत, दोहा, ग़ज़ल, निबंध, बाल साहित्य, शैक्षिक चिंतन, नैतिक साहित्य, भाषा-विज्ञान, संस्कृत ग्रंथों का काव्यानुवाद—हर क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं माना; वह उनके लिए समाज निर्माण, राष्ट्र निर्माण और मनुष्य निर्माण का साधन था। यही कारण है कि उनके साहित्य में राष्ट्रीय चेतना है, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का गौरव है, अध्यात्म की शीतल धारा है और मानवता की व्यापक संवेदना है।
विशेष रूप से संस्कृत के महान ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता, मेघदूतम् और रघुवंशम् का उनका हिंदी पद्यानुवाद हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए। उन्होंने केवल भाषांतरण नहीं किया, बल्कि मूल काव्य के रस, लय और भाव-सौंदर्य को हिंदी में पुनः सृजित किया। आज जब संस्कृत से हिंदी में गुणवत्तापूर्ण काव्यानुवाद के उदाहरण सीमित हैं, तब उनका कार्य नए मानदंड स्थापित करता है। यह क्षेत्र अभी भी गंभीर शोध की प्रतीक्षा कर रहा है।
वास्तव में, प्रो. ‘विदग्ध’ का समग्र साहित्य विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के लिए एक विशाल संभावनाओं का क्षेत्र है। यह स्मरण अंक केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक शोध-यात्रा का प्रारंभ बने, यही हमारी आकांक्षा है। उनके साहित्य पर अनेक मौलिक शोध-विषय विकसित किए जा सकते हैं, जैसे—
- प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव के साहित्य में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय चेतना।
- प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की कविताओं में छायावादी संवेदना एवं प्रकृति-दृष्टि।
- प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ के रचनाकर्म के आध्यात्मिक आयाम।
- संस्कृत से हिंदी काव्यानुवाद की परंपरा में प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव का योगदान : एक मीमांसात्मक अध्ययन।
- उनके बाल साहित्य में नैतिक शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण की अवधारणा।
- उनके शैक्षिक साहित्य में नवाचार, शिक्षाशास्त्र और मूल्यपरक शिक्षा।
- उनके काव्य में भारतीय संस्कृति, लोकमंगल और मानवीय मूल्यों का स्वरूप।
- उनकी गद्य रचनाओं का सामाजिक एवं सांस्कृतिक विमर्श।
इन विषयों पर एम.फिल., पीएच.डी. तथा डी.लिट्. स्तर के गंभीर शोध न केवल उनके साहित्य को उचित स्थान देंगे, बल्कि हिंदी साहित्य के अध्ययन को भी समृद्ध करेंगे।
यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने स्वयं अपने एक साक्षात्कार में युवा रचनाकारों को संदेश दिया था कि साहित्य में स्थायित्व तभी आता है जब रचना परिश्रम, परिपक्वता और बार-बार के आत्मसंपादन से गुज़रे। उनका यह विश्वास था कि “दीर्घजीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर। ” यही वाक्य उनके अपने साहित्यिक जीवन का भी सबसे सटीक परिचय बन गया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उनके साहित्य का समग्र संकलन, आलोचनात्मक संपादन, डिजिटलीकरण और अकादमिक मूल्यांकन किया जाए। उनकी अप्रकाशित पांडुलिपियाँ, पत्र, संस्मरण और अनुवाद सुरक्षित रखे जाएँ। विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य पर संगोष्ठियाँ आयोजित हों, शोधवृत्तियाँ प्रदान की जाएँ तथा उनकी प्रमुख कृतियों को पाठ्यक्रमों में सम्मिलित करने की पहल हो। किसी भी साहित्यकार के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होती है कि उसकी रचनाएँ नई पीढ़ियों तक पहुँचें और नए विमर्शों का आधार बनें।
उपरोक्त स्मरण अंक उसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है। इसमें संकलित संस्मरण, शोध आलेख, समीक्षाएँ और श्रद्धांजलियाँ केवल अतीत का स्मरण नहीं, भविष्य की साहित्यिक जिम्मेदारी का उद्घोष हैं। हमारा विश्वास है कि आने वाले वर्षों में प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ का साहित्य नई पीढ़ी के शोधार्थियों, साहित्यकारों और पाठकों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत सिद्ध होगा।
साहित्य जगत के देदीप्यमान नक्षत्र, वरिष्ठ कवि, अर्थशास्त्री और अद्वितीय शिक्षाविद स्वर्गीय प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी (23 मार्च, 1927 – 25 जुलाई, 2025) अपनी लेखनी और आदर्शों के माध्यम से सदैव हमारे बीच जीवंत हैं। 35 से अधिक पुस्तकों के प्रणेता विदग्ध जी ने कविता, निबंध, बाल साहित्य और विशेषकर संस्कृत महाकाव्यों (श्रीमद्भगवद्गीता, मेघदूतम, रघुवंशम) के हिंदी पद्यानुवाद में जो मानक स्थापित किए हैं, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए पाथेय हैं।
उनकी प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर, ‘ई-अभिव्यक्ति’ पोर्टल द्वारा उनके विराट व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व पर केंद्रित इस विशेष वेब पत्रिका स्मृतिशेष चित्र भूषण ‘विदग्ध’ विशेष का प्रकाशन किया जा रहा है।
इस पावन अवसर पर हम समस्त विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं उनके स्नेहपात्रों से के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने आदरणीय विदग्ध जी के साहित्यिक योगदान, उनकी आध्यात्मिक, दार्शनिक, राष्ट्रीयता की दृष्टि या उनके प्रेरक जीवन से जुड़े संस्मरणों पर अपने शोधपूर्ण लेख, संस्मरण अथवा समीक्षात्मक आलेख हमें भेजकर अनुग्रहित किया है।
इसके अतिरिक्त –
- विदग्ध जी के काव्य संग्रहों (वतन को नमन, अनुगुंजन, स्वयंप्रभा, अंतर्ध्वनि, गजल संग्रह, आदि) की समीक्षा। (उनकी कई पुस्तकें किंडल पर शून्य मूल्य पर उपलब्ध हैं)
- संस्कृत कृतियों के उनके पद्यानुवाद की साहित्यिक विशेषताएँ।
- बाल साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान।
- उनके व्यक्तित्व के विविध आयाम: एक शिक्षाविद और मार्गदर्शक के रूप में।
संदर्भ स्वरुप उनसे सम्बंधित सामग्री उनकी रचनाएँ और विस्तृत परिचय ‘ई-अभिव्यक्ति’ पोर्टल www.e–abhivyakti.com, उनके ब्लॉग (pitashrikirachnaye.blogspot.com) तथा इंटरनेट पर हिंदी में उनका नाम सर्च करने पर भी उपलब्ध हैं।
दूरदर्शन द्वारा उन पर निर्मित फिल्म “एक व्यक्तित्व ऐसा भी” को यूट्यूब (YouTube) पर देखकर भी उनके जीवन की झलक पाई जा सकती है।
https://youtu.be/m2HpeDqoJho?si=Ml0ru_CJbrK3znSR
हमें विश्वास है कि आपका आत्मीय लेखन इस अंक को और अधिक संग्रहणीय यथा महत्वपूर्ण बनाएगा।
उनकी स्मृति को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके शब्दों की लौ को आगे बढ़ाएँ। शरीर काल के अधीन होता है, पर शब्द नहीं। इसलिए प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ आज भी अपने साहित्य, अपने आदर्शों और अपने मौन कर्मयोग के माध्यम से हमारे बीच उपस्थित हैं, और रहेंगे।
उनकी जन्मशती के इस भावपूर्ण वर्ष में उन्हें शत-शत नमन।
हेमन्त बावनकर





