हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४७ – लघुकथा- एक और फोन कॉल – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक हृदयस्पर्शी कथा “एक और फोन कॉल।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४७ 

☆ लघुकथा – एक और फोन कॉल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

फोन की घंटी बजती तो पूरे परिवार में सन्नाटा छा जाता। किसी की हिम्मत ही नहीं होती फोन उठाने की। पता नहीं कब, कहाँ से बुरी खबर आ जाए। ऐसे ही एक फोन कॉल ने तन्मय के ना होने की खबर दी थी।  तन्मय कोविड पॉजिटिव होने पर खुद ही गाडी चलाकर गया था अस्पताल में एडमिट होने के लिए। डॉक्टर्स बोल रहे थे कि चिंता की कोई बात नहीं, सब ठीक है। उसके बाद उसे क्या हुआ कुछ समझ में ही नहीं आया।अचानक एक दिन अस्पताल से फोन आया कि तन्मय नहीं रहा।  एक पल में  सब कुछ शून्य में बदल गया। ठहर गई जिंदगी। बच्चों के मासूम चेहरों पर उदासी मानों थम गई।  वह बहुत दिन तक समझ ही नहीं सकी कि जिंदगी  कहाँ से शुरू करे। हर तरह से उस पर ही तो निर्भर थी अब जैसे कटी पतंग। एकदम अकेली महसूस कर रही थी अपने आप को। कभी लगता क्या करना है जीकर ? अपने हाथ में कुछ है ही नहीं तो क्या फायदा इस जीवन का ? तन्मय का यूँ अचानक चले जाना भीतर तक खोखला कर गया उसे।

ऐसी ही एक उदास शाम को फोन की घंटी बज उठी, बेटी ने फोन उठाया।  अनजान आवाज में कोई कह रहा था – ‘बहुत अफसोस हुआ जानकर कि कोविड के कारण आपके मम्मी –पापा दोनों नहीं रहे।  बेटी ! कोई जरूरत हो तो बताना, मैं आपके सामनेवाले फ्लैट में ही रहता हूँ।’

बेटी फोन पर रोती हुई, काँपती आवाज में जोर–जोर से कह रही थी – ‘मेरी मम्मी जिंदा हैं, जिंदा हैं मम्मा। पापा को कोविड हुआ था, मम्मी को कुछ नहीं हुआ है। हमें आपकी कोई जरूरत नहीं है। मैंने कहा ना  मम्मी —‘

और तब से वह जिंदा है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बोझिल रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रोमा और अरुण दोनों एक बड़ी नेशनल कंपनी में नौकरी करते थे। अनिल की मां का देहांत बचपन में ही हो गया था, मौसी ने ही पालपोस के बड़ा किया। पिताजी मर्चेंट नेवी में थे इसलिए अक्सर उन्हें बाहर ही रहना पड़ता था। मौसी ने ही मां पिताजी का प्यार दिया। मौसी बहुत ही धार्मिक एवं कम पढ़ी-लिखी महिला थी। अरुण ने अपनी मरजी से शादी की थी। रोमा भी उसके साथ काम करती थी और दोनों ने साथ में पढ़ाई भी की थी। मौसी के कारण ही दोनों की शादी हुई।वैसे तो मौसी शादी के सख्त खिलाफ थी।

शीशे के सामने बैठकर रोमा इसी विचार में खोई थी कि आज मौसी आ रही है, जाने अब क्या कहेगी?

उसके साथ तो 1 घंटे रहना भी मुश्किल है मैं कैसे रहूंगी?

तभी अचानक घंटी बजती है वह उठकर दरवाजा खोलती है-  “मौसी जी प्रणाम।”

“खुश रहो तुम। रोमा कुछ खाना भी बना कर रखा है पहले एक कप चाय पिला दो।”

“आप खाना खुद बना लेती हो” कमला मौसी ने कहा।

“अनिल को तो मैंने खाना बनाना सिखाया है। अनिल बनाता है या नौकर। तुम तो कुछ नहीं करती होगी?”

“मौसी जी आप मेरे हाथ की चाय पीजिए” रोमा ने कहा।

“चाय पीकर तुम दोनों तैयार हो जाओ आज तुम्हें एक शादी के कार्यक्रम में लेकर चलती हूं देखो हमारे यहां शादियां कैसी होती हैं?”

“मौसी जी जब आपको खाना नहीं खाना था तो हमसे क्यों खाना बनवा कर रखा” रोमा ने कहा।

“तो क्या हो गया” कमला मौसी ने कहा।

“यहां पर मैं अपनी सहेली के पोते की शादी में आई हूं तुम दोनों भी वहां चलो।”

रोमा ने कहा “मौसी मैं तो चलूंगी लेकिन क्या करूंगी वहां जाकर?”

कमला मौसी ने कहा “तू ठीक कह रही है अनिल मेरे साथ चलेगा तेरे बच्चे नहीं है इसलिए जाना अच्छा नहीं लगेगा।”

“मौसी यह कैसी बात कर रही हो” अनिल ने कहा।

“मैं कौन सा गलत बात कह रही हूं” कमला ने कहा “7 साल हो गए हैं कोई बच्चे नहीं है तुम्हारे।”

“तू ही यह रिश्ता ढो रहा है यदि मेरी सगी बहन होती तो उसकी बात तो मानता ना।”

रोमा की आंखों से आंसू निकलने लग गए और वह अंदर चली गई।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – अक्षय मिलन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अक्षय मिलन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻अक्षय मिलन🛕

मोहनी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चली जा रही थी। हाथों में पूजन की थाली, जिसमें गुड़ चना, सत्तू, मेवा, मौसमी फल पूजन का सामान।

मन में वही दृढ विश्वास मेरा अक्षय मिलन अटूट अमर है। सुंदर सादगी से भरा परिधान परन्तु चेहरे पर अब मासूमियत की जगह बेबसी ने ले लिया है। आँखे आज निहार रही है—सुना था अक्षय तृतीया को जो दान पुण्य किया जाता है वह अमर हो जाता है। मोहनी ने तो अपने अक्षय का ही दान कर दिया था।

जानती थी वह अक्षय के बिना नही रह पायेगी। परन्तु अक्षय किसी और का है ये वह कैसे निभा कर जी सकती थी।

नमः पार्वती पतये हर – हर महादेव के उच्चारण से निर्मल जल की धार अर्पण कर रही थी।

लाल चुनरी उसके सिर पर पीछे से सिर ढकते गिरा – – –

अक्षय सुहाग वर शुभ वर पीछे पलट कर देखी कोई और नही अक्षय ही तो थे। जल का लोटा पति चरणों पर अर्पित कर अक्षय मिलन का आनंद लेने लगी।

किसी ने ऊपर लगे घंटे को लगातार बजा कर अक्षय तृतीया की बधाइयाँ दी।

विवाह वर्षगांठ की हार्दिक बधाई से मंदिर परिसर गूँज उठा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०३ – मौत की फकीरी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मौत की फकीरी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०३ — मौत की फकीरी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

गरीब और धनवान धरती पर जीवन से बने रहे। धनवान ने खूब पाया और गरीब ने खूब खोया। गरीब कपड़े के लिए तरसता था और धनवान कपड़ों में बादशाह था। पर दोनों दो गज के कफन में लिपट कर भगवान के घर जाते। जाने में गरीब अपने दायरे से होताऔर धनवान इस तरह से होता दो गज से अधिक कफन में जाने की व्यवस्था हो तो वह जाने का रास्ता भूल जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

14 — 04 — 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

राजेशजी मन ही मन बुदबुदा रहे थे–कयामत की धूप है पर जाना तो पड़ेगा। श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी। मन, हां कहे या ना कहे, समाज के कायदे कानून निभाने ही पड़ते हैं। उन्होंने  अल्मारी खोली और एक सफेद पुराना सा कुर्ता पाजामा निकाला। अवसर के अनुकूल परिधान पहनने ही पड़ते हैं। पड़ोसी चन्द्रप्रकाश को फोन किया साथ चलने के लिये। रमन इन दोनों का अच्छा मित्र है। लेखक होने के साथ समाज सेवक भी है।

वे रास्ते में बात करते हुये जा रहे थे। यार राजेश — रमन के पिता की उम्र 90 वर्ष थी ना। पकी उम्र में गये।

–मुझे एक बात समझ में नहीं आती लोग सबसे पहले मरनेवाले की उम्र क्यों पूछते हैं। नब्बे से ऊपर सुनते ही ऐसी मुद्रा बनाते हैं मानों मृतक बेचारा धरती पर रहकर गुनाह कर रहा था। अच्छा हुआ चला गया। ज्यादा जीकर भी क्या करता।

—-राजेश ऐसे सवालों के गणित में उत्तर नहीं दिये जा सकते। मरनेवाला कोई बेहद अपना हो तब भी क्या उनका यही जवाब होगा।

बातों बातों में उन्होंने चार किलोमीटर की दूरी कब तै कर ली पता भी नहीं चला। देखा तो श्मशान घाट सामने था।

रमन के पिता का शव रखा था फूल-मालाओं से सजा हुआ।

कुछ रिश्तेदार और आठ दस पत्रकार /समाज सेवक/ राजनीतिक कार्यकर्ता /लेखक प्रजाति के लोग।

शोक सभा में विलंब था। सब आपस में बतियाने लगे। किसी ने अपने सद्यः प्रकाशित नाटक संग्रह की खासियत बताई। दूसरा कुछ लोगों के कड़क इस्त्रीदार कपड़ों पर टिप्पणी कर रहा था। तीसरा जाति धर्म को लेकर अंत्यविधियों का अंतर बता रहा था। सारे कसमसा रहे थे कि कब कब श्रद्धांजलि सभा खत्म हो और पिंड छूटे।

इतने में नुक्कड़ वाले नेताजी भी आ गये जिनकी प्रतीक्षा हो रही थी।

फोटोग्राफर और माइक का इंतजाम हो चुका था। सभी को फिक्र थी कि कल के अखबार में वे प्रमुखता से नज़र आयें। वर्ना इतनी मशक्कत करके जानलेवा धूप में इतनी दूर आने का क्या फायदा।

वैसे भी दो मिनट खामोश रहकर शोक व्यक्त करना किसी हर्क्युलियन टास्क से कम नहीं लगता।

नेताजी ने बोलना शुरू किया। इतने में एक शव यात्रा श्मशान में प्रकट हुई। बैंड-बाजे के साथ। बैंड-बाजे शोख धुनें बजा रहे थे जैसे किसी शादी में बजाते हैं।

राजेश जी सकपका गये। वे समझ नहीं पाये आखिर माजरा क्या है !

चन्द्रप्रकाश का कहना था – यह मृतक की अंतिम इच्छा रही होगी। या फिर ओशो का अनुगामी रहा होगा।

उधर नेताजी परेशान निगलते बने न उगलते। बैंड बाजे की उग्र तेजतर धुनों के बीच लोगों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच पा रही थी। एक तो शोकाकुल चेहरा बनाओ दूसरे सबसे महत्वपूर्ण उनके श्रीवचन अनसुने रह जाने की टीस।

खैर। राजेशजी, रमन से मिले और श्मशान के बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश से बोले–एक बात का जवाब दोगे ?

–बोलो

— रमन ने पिताजी की मृत्यु की सूचना दी तो fb. पर 400 लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये और श्मशान में केवल आठ ?

–बस इतना जान लो, अब रिश्ते भी आभासी हो गये हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सर…

-कहो। क्या बात है?

-सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।

-कोई जरूरत नहीं इसकी।

-फिर बिल पास नहीं होगा, सर !

-न हो। बोलो जो आब्जेक्शन‌ लगाना हो लगा दो !

वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर‌ चला गया ! कुछ पल बाद वापस आया।

-सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो !

-बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं !

वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया !

अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।

-क्यों?

-क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा ! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?

वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया !

वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका !

-हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं ! बोलो चाय मंगवा लूं?

राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!

-फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।

उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा – “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(महान अभिनेता बलराज साहनी के स्मरण दिवस पर प्रणाम स्वरुप यह लघुकथा)

बलराज साहनी  यह लोक छोड़कर देवलोक चले गये। वहाँ नारदमुनी इन्द्र को बता  रहे थे कि आज पृथ्वी लोक से एक बहुत बड़ा अभिनेता आया  है। आप उसे अपने अभिनय विभाग में अभिनय का देवता  बना ले ।”

” हे नारद, हमारे यहाँ तो बड़े-बडे कलाकार रोज ही आते रहते हैं। हमारे विभाग में एक से बढ़कर एक अभिनय सम्भ्राट हैं। यूँ  हर किसी को अभिनय का देवता बनाते रहे तो हो लिया…, फिर भी तुम्हारी बात पर कल हम उसकी परीक्षा लेगे।” कहकर इन्द्र ने अपने अभिनय विभाग के सभी देवताओं को बुलाया और उन्हें बलराज साहनी के सभी फिल्मों की सीडी देते हुए कहा-” तुम इनमें से अपना-अपना किरदार चुन लो। तुम्हें इससे बढ़कर अभिनय करना  है। निर्णायक के लिए बी आर चोपड़ा और  बिमल राय  को बुलाया है। देखो, ये देवताओं की इज्जत का सवाल है। तुम्हें  बलराज साहनी के किरदारों को उससे बढ़कर करके दिखाना है। अब जाओ, और तैयारी में लग जाओ। ” सारे देवता सीडी लेकर चले गए।

दूसरे दिन परीक्षा शुरू हुई। देवताओं ने उनके किरदारों का इतना हूबहू अभिनय किया कि बिमल राय और बी आर चोपडा दोनों “O.K.-O.K  वाह-वाह ” कहते रहे। बस अब एक-दो किरदार ही बचे थे। इन्द्र ने गर्व से नारद की ओर देखते कहा- ” देखा नारद, मेरे देवताओं का कमाल! हमने बहुत देखे ऐसे बलराज – वलराज साहनी को। अब तो परीक्षा भी पूरी  होने को है। “

” पूरी होने को है, पर पूरी  हुई नहीं ” नारद के इतना कहते ही दो देवता सिर झुकाये आये और बोले-” क्षमा  करें देवराज । हम हार गये।

“दो बीघा जमीन ” के शम्भू महतो व काबुलीवाला का रोल कोई देवता करने को तैयार नहीं । तीनों लोक हो आये।

सभी कहते हैं कि ये रोल बलराज साहनी के सिवा इसे कोई  नहीं  कर सकता। हमें क्षमा करे देवराज ।”

इन्द्र  फिर झुकाये  सोचते रहे। तब नारद ने हँसते हुए कहा-” क्या सोच रहै हो इन्द्र ? कहीँ  ऐसा न हो कि ये दो बीघा जमीन व काबुलीवाला के रोल की ताकत लेकर यदि इसने तुम्हारा यानी इन्द्र का रोल कर लिया तो, ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनों इसे ही असली  इन्द्र मानकर इसे तुम्हारा इन्द्रासन सौंप दे। और तुम पर दफा चार सौ..बीस , नहीं -नहीं,श्रीचारसो…बीस लगा दे। “

” नहीं-नहीं । गर ऐसा हुआ तो मैं …., हे देवर्षी हे महर्षी, हे महामुनि अब आप ही कोई रास्ता निकालिये। हाथ जोड़ते हुए  इन्द्र ने कहा।

” ना..रायण-ना..रायण “। नारदजी ने  शरद जोशी की तरह व्यंग्य से मुस्कुराते हुए इन्द्र की ओर देखा। जो कुछ देर पहले तक नारद-नारद बोलता था, जब बोलती बंद हुई तो देवर्षी-महर्षी- महामुनि बोलने लगा। इसे कहते हैं- ” वक्त पड़ा बाँका तो….,हँसते हुए नारदजी  बोले-“

हम तो पहले ही कह रहे वे, इसे अभिनय का देवता बना ले । इससे तुम्हारा देवलोक और भी समृध्द होगा। दिलीप कुमार से भी तो  बात करने वाला कोई तो देवलोक में  होना चाहिए  न। ना..रायण-ना..रायण।”

” आप ठीक कहते हैं  ऋषिराज। ” हाथ जोड़ते हुए इन्द्र बोले।

दोनों  बलराज साहनी के पास आकर कहते हैं-”

हे अभिनय के देवता, देवलोक में आपका स्वागत  है। आइये- पधारिये “

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११० – प्रीति की डोर… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – प्रीति की डोर।)

☆ लघुकथा # ११० – प्रीति की डोर श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

कामवाली बाई एकदम से बोली-“दीदी यह कितनी सुंदर साड़ी है आज आप अपनी अलमारी की सफाई कर रही हो क्या?”

“दीदी यह साड़ी आपने कहां से खरीदी कितने की है मेरे लिए भी एक ऐसी ला देना अपनी तनख्वाह में से थोड़े-थोड़े पैसे में आपको दे दूंगी” कामवाली कमलाबाई ने कहा।

नेहा बोली -“अच्छा काम तो करो जल्दी-जल्दी आज मुझे अपनी फ्रेंड के यहाँ जाना है।”

“दीदी  मेरे भाई की बेटी की भी शादी है तो आप ऐसे दो साड़ी ला सकती है।”

“एक अपनी भतीजी को गिफ्ट करूंगी और एक मैं खुद पहनूंगी।”

नेहा ने कहा-“अच्छा ठीक है ला दूंगी अब जा बाहर घंटी बज रही है, देख दरवाजे पर कौन आया है?”

“दीदी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आई है” कमला ने कहा।

नेहा ने कहा-” ठीक है उन्हें बताओ मैं आ रही हूँ चाय भी बना देना।”

 

“शर्मा आंटी आज कैसे आना हुआ आपका आप तो हमें भूल ही गए?”

शर्मा आंटी ने कहा “नहीं बेटा आज सुबह मेरे पड़ोस में जो मिस्टर मैसेज चड्ढा जी रहते हैं  अपनी कार से सुबह अपने बेटे बहू के पास जा रहे थे खबर आई उनका एक्सीडेंट हो गया है अभी कुछ देर बाद उनकी डेड बॉडी घर आएगी मैं उनके पास जा रही हूँ तुम भी वहां आ जाना बस यही बात बताने आई हूँ।“

सुनते ही नेहा चौक गई “आंटी रुकिए मैं आपके साथ आती हूँ।“

“पर शर्मा आंटी मैंने आज सुबह ही उन्हें देखा था वह सब्जी वाले के साथ झगड़ा कर रही थी फल खरीद रही थी ₹10 कम भी दिए उन्होंने।”

रोते हुए नेहा बोली “उनके पास इतनी प्रॉपर्टी थी खेती बाड़ी चार मकान किराए के तभी आंटी कंजूसी से हमेशा रहती थी। बेटे बहु किसी को अपने पास रहने नहीं देती थी हमेशा सबसे झगड़ा ही करती थी।”

श्रीमती शर्मा ने बोला “छोड़ बेटा नेहा जो हुआ सो हुआ जीते जी हम ऐसे ही करते हैं जैसे सारा कुछ जमीन जैसा हमें लेकर ऊपर ही जाना है”

“ठीक है आंटी 2 मिनट रुकिए मैं आती हूँ।”

अंदर से दो साड़ी निकाल के लाती है और कहती है “कमल में थोड़ी देर में आ रही हूं यह साड़ी तुम्हें पसंद थी तुम पहन लेना यह नई साड़ी ही मैंने खरीदी थी आज किट्टी में पहन के जाने वाली थी, यह अपने भतीजी को दे देना घर का ध्यान रखना खाना बना कर रखना मैं थोड़ी देर में आता हूँ”, वह रोने लगाती हैं।

कमला ने कहा “नेहा दीदी मत रो अब मैं कौन सा आपको छोड़कर कहीं जाऊंगी चिंता मत करो एक साड़ी से नहीं मानूंगी अभी और साड़ियाँ आपसे लेनी है।”

“सच कह रही हो कमल तुमसे मेरी प्रीत की डोर जो है अब यह टूटेगी नहीं।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु कथा # १०२ – राज — तंत्र… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– राज — तंत्र …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ लघु कथा # १०२ राज — तंत्र  ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

क्रांति — दूत के अपाहिज होने पर राज द्रोह के उसके खाते बंद कर दिये गए। इसके पीछे जानी बूझी सोच यह थी जो अपाहिज हो गया उससे अब आतंकित होने का काई कारण शेष रहा नहीं। पर इस कोण से सतर्कता की एक दृष्टि तो रखी ही जाती थी जो निढाल हो गया कहीं वह फिर से सक्रिय न हो जाए। कुछ दिनों बाद क्रांति — दूत की दयनीय मृत्यु होने पर वे खाते जला दिये गए। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था। इन लोगों के दुर्योग से अगले चुनाव में इनकी हार हो जाती और नई सरकार क्रांति — दूत के उन बंद खातों को खुलवाती तो शर्म के मारे इन्हें नर्क में भी मुँह छिपाना भारी पड़ता। वास्तव में क्रांति — दूत के राज द्रोह थे कहाँ। उसकी तो समर्पित राज भक्ति थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

10 — 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – यादें पुरानी।)

☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

तुम्हें कुछ याद नहीं रहता ।

महीने में एक दिन किटी पार्टी के लिए  समय नहीं निकल सकती क्या इतनी देर से क्यों आई कमला जी ने कहा।

नेहा ने बड़ी विनम्रता से कहा- “क्या करूँ! घर में काम इतने हो जाते हैं कि समय का पता नहीं चलता।”

कमल जी ने कहा- “भाई हमें भी काम होता है फिर भी हम लोग महीने में एक दिन सब कुछ छोड़कर अपने लिए समय निकालते हैं।”

“ठीक है दीदी अब अगली बार किटी पार्टी में मैं सबसे पहले आ जाऊंगी आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”

अच्छा यह तो बताइए कि “आप लोग  इतनी जोर से हॅंस रहे थे और मुझे देखकर अचानक चुप हो गए?”

“कुछ नहीं हम सभी सहेलियाँ बात कर रही थीं ।” पुराने दिन कितने अच्छे थे जब हम लोग घर के बाहर बैठकर एक दूसरे से सुख-दुख की बातें करते थे। स्वेटर बुनते ,आचा,र बड़ी ,पापड़, चिप्स बनाते थे ।

आज वह सब दिन जाने कहाँ चले गए अब तो लोग बाजार से सब चीज खरीद लाते हैं मेरी बहू को तो यह सब काम फालतू और फिजूल खर्ची लगता है।

“कोई बात नहीं दीदी आप मेरे घर आइएगा मैं आपको यह सारी चीज अपने हाथों से बनी हुई खिलाऊंगी।”

“ठीक है तुम्हारे यहां आकर मैं यह सब चीज बनवाऊंगी।”

“अच्छा तुम सभी को दिखाने के लिए मैं एक पुराने जमाने की चीज लाई हूँ।”

“दीदी यह तो लालटेन है” जोर से चिल्लाते हुए नेहा बोली।

“हाँ यह मेरी अम्मा ने मुझे शादी में दिया था बहु को मेरे यह कबाड़ लगता है मेरे कमरे में मेरे साथ मेरी नातिन रहती है उसे भी यह अच्छा नहीं लगती ।”

“बहुत दिनों से इसे लपेटकर अलमारी में आदर पूर्वक रखी हूँ।”

” बिजली और नए युग के आने की खुशी तो बहुत है लेकिन क्या करूँ?”

“इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि मेरी माँ मेरे पास है।”

नेहा बोली-” दीदी सच कह रही हो आजकल की पीढ़ी भी प्लास्टिक की दुनिया में खो गई है।”

“सारे सामान इस्तेमाल करके फेंक देती है उन्हें संभालना रखना यह अच्छा ही नहीं लगता।”

“बस बाहर जाना, नौकरी करना, घूमना, फास्ट फूड खाना हमारे पास बैठने तक का वक्त नहीं है?”

कमल जी ऑंखों से ऑंसू से बहने लगते हैं।  उनके मन का सूनापन उनकी ऑंखों में उभर आता है।

कमल जी रोते हुए कहा -“एक दिन मैं भी ऐसे ही डिब्बे में पैक होकर भगवान के घर चली जाऊंगी।”

  “क्या तुम लोग मुझे इस लालटेन की तरह याद करोगी।”

 नेहा यह लालटेन  निशानी समझ कर तुम संभाल कर अपने पास रख लो। देर से आने की  यही तुम्हारी सजा है।

सभी सहेलियों मुस्कुराते हुए कहती हैं कमल दीदी अब हम सभी देर से आएंगे तो आप हमें इसी तरह उपहार देना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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