(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – धरती माँ की पुकार।)
पर्यावरण दिवस पर शहर के एक बड़े विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित था। मंच पर बड़े-बड़े भाषण गूँज रहे थे—
“पेड़ बचाओ… पानी बचाओ… धरती बचाओ…”
सभागार तालियों से गूँज उठा। कार्यक्रम के बाद लोगों ने जलपान किया और जाते-जाते आधी भरी प्लेटें, प्लास्टिक की बोतलें और बचा हुआ पानी यूँ ही इधर-उधर फेंक दिया।
भीड़ छँटने लगी तो एक शिक्षक की नजर विद्यालय के बाहर सूखे पेड़ के नीचे बैठी एक नन्ही बच्ची पर पड़ी। वह जमीन पर गिरी अधूरी पानी की बोतलों से बचा पानी अपनी छोटी-सी बोतल में भर रही थी।
शिक्षक उसके पास गए और स्नेह से बोले,
“बेटी, ये क्या कर रही हो?”
बच्ची ने मासूम आँखों से उनकी ओर देखा—
“अंकल, माँ कहती हैं… पानी और अन्न कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए। ये धरती माँ का आशीर्वाद होते हैं।”
शिक्षक कुछ क्षण निरुत्तर खड़े रहे।
तभी बच्ची ने पास खड़े सूखे पेड़ को सहलाते हुए कहा—
“जब पेड़ रोते होंगे ना अंकल… तब ही बारिश कम हो जाती होगी। फिर खेत सूख जाते होंगे… और गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती होगी…।”
उसकी बात सुन शिक्षक का मन भीतर तक भीग गया। मंच पर दिए गए सारे भाषण उस मासूम बच्ची की एक बात के आगे फीके पड़ गए थे।
उन्होंने देखा—
धरती को बचाने की बातें करने वाले लोग ही धरती का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे थे।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक विचारणीय बाल कथा – “समझ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१७ ☆
बाल कथा – समझ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(सच्ची घटना , राम मंदिर के वर्तमान घटना क्रम के परिदृश्य पर )
सूरज की सुनहरी किरणें मंदिर के शिखर को चूम रही थीं। वातावरण में शंख की ध्वनि और धूप-बत्ती की मंद सुगंध घुली हुई थी।
मैं अपने सात वर्षीय बेटे अमित के साथ मंदिर गया था, जो अपनी मासूम आंखों से दुनिया समझने की कोशिश कर रहा था । मेरे हाथ का स्पर्श थामे हुए , मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैने देखा कि वह पीछे मुड़कर कोने में भीख के लिए बैठी बूढ़ी अम्मा को देख रहा था।
दर्शन कर मैने उसके छोटे से हाथों में सौ का नोट देकर उसे दान पेटी में डालने के लिए कहा। वह धीमे कदमों से आगे दान पेटी के सामने झुका भी ।
फिर हम बाहर आ गए ।
बाहर निकल वह उसी बूढ़ी अम्मा के पास जा रुका । उसने अपनी जेब टटोली और वह सौ का नोट निकाल कर उस बूढ़ी अम्मा की हथेली पर रख दिया।
अम्मा की आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए और उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया।
मैं स्तब्ध खड़ा यह सब देख रहा था। और उसकी बाल बुद्धि पर मन ही मन प्रसन्न भी था ।
(अब, जब भी समाचारों में बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों के चंदे में हेराफेरी, भ्रष्टाचार या उन पेटियों के पैसों चोरी होने अथवा गलत हाथों में जाने की खबरें सुनता हूं, तो मुझे उस दिन सीढ़ियों पर बैठी उस बूढ़ी अम्मा के झुर्रीदार चेहरे और अमित की समझ की बरबस याद आ जाती है। दान किसी बड़े ताले वाली पेटी के भीतर कैद नहीं, बल्कि उस साक्षात ईश्वर के हाथों में सौंपना अधिक उचित है जो दीन बंधु है।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जीभारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा“.)
☆ कथा कहानी ☆ दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
आप लोग महान व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ते होंगे , और उनकी आत्मकथा से प्रेरणा भी लेते होंगे. मेरे जीवन में ऐसा कुछ है नहीं. मैं तो मात्र लेन -देन का एक माध्यम हूॅं. मैं जिसकी जेब में रहता हूॅं, वह बहुत खुश रहता है. फिर लोग समझते होंगे कि मैं भी सदा खुश रहता हूॅं, पर यह पूरा सत्य नहीं है, बल्कि अधूरा सत्य है . आइये मैं आपको अपनी आत्मव्यथा बताऊॅं .
भारत सरकार के नोट छापने के प्रेस में मेरा जन्म हुआ. जन्म भी संगीनों के साये में हुआ और ऐसी जगह हुआ जहाॅं परिंदे भी पर नहीं मार सकते थे. जो भी कर्मचारी अथवा अधिकारी अन्दर आता था, उसकी पूरी तलाशी ली जाती थी, यहाॅं तक कि उनके जूते और मोज़े भी उतरवा कर चेक किया जाता था. मैं एकदम कड़क और खूबसूरत था. मुझे मेरे अन्य निन्नानबे भाईयों के साथ मिलाकर एक सौ की गड्डी बनायी गई. मेरी तरह बहुत सारे नोटों की गड्डियों को मिला कर बंडल बनाया गया. हम सारे नोटों को देश के विभिन्न बैंकों में, एक लकड़ी के बक्से में बंद कर के, कड़ी सुरक्षा में पहुंचा दिया गया. अब यहाॅं से मेरी वास्तविक जीवन यात्रा शुरू होती है.
एक दिन मुझे बैंक के कैशियर को दे दिया गया, और वहाॅं पर बैंक से मुझे एक व्यक्ति, जिसने बहुत सारे रुपए निकाले थे, उसे अन्य नोटों के साथ ( जिसमें पांच सौ, सौ, पचास,बीस , दस आदि के नोट भी थे ) मुझे भी दे दिया गया. अब मैं बैंक से, उस व्यक्ति के पर्स में पहुंच चुका था. मैं मुड़ा हुआ, चुपचाप उसके पर्स में पड़ा हुआ था. बैंक से बाहर आने के बाद उस व्यक्ति ने रामआसरे के पान की दूकान पर पान खाया और उसे मुझे दे दिया. रामआसरे ने भी पान के पांच रुपए काट कर, बाकी पांच रुपए उसे वापस कर दिया और उसने मुझे अपने पैरों के पास में रखे हुए एक डिब्बे में रख दिया. मैं अन्य नोटों के साथ उसी डिब्बे में पड़ा हुआ था.
शाम को रामआसरे ने डिब्बे से कुछ नोट निकाले, जिसमें मैं भी एक था, और अपने जेब में रख कर, अच्छे कपड़े पहन कर, अपने दोस्त कल्लू के बेटे की शादी में चल दिया. थोड़ी देर बाद, रात हो चुका था और मेरे कानों में बैंड बाजा की आवाज और लोगों के नाचने की आवाज सुनाई पड़ी और ” आज मेरे यार की शादी है” गाना सुनाई पड़ने लगा. रामआसरे यह गाना सुन कर इतना खुश हुआ कि वह खुद भी नाचने लगा. अचानक नाचते – नाचते उसने जेब में रखे हुए नोटों को अपने हाथ में लेकर लहराने लगा, लहराते हुए नोटों में मैं भी एक था. लहराते- लहराते उसने हाथ के सारे नोटों को हवा में उछाल दिया. सारे बैंड वाले, बजाना बन्द कर के हमें बटोरने लगे. इस आपाधापी में कितनों के जूतों के नीचे मैं कुचला गया, मुझे याद नहीं. जीवन में पहली बार मुझे बुरी तरह से जूते से कुचला गया. खैर, थोड़ी ही देर में, एक बैंड वाले के हाथ मैं लग गई और उसने मुझे अपनी जेब में जल्दी से रख लिया. दर्द से मैं कराह रही थी, लेकिन वहाॅं मेरी चीखें कौन सुनता! खैर कुछ देर उसकी जेब में पड़े रहने के बाद,मेरा दर्द कुछ कम हुआ .
उस बैंड वाले व्यक्ति ने बारात के बाद घर आकर सारे नोट अपनी पत्नी अर्चना को दे दिया, और उसने सहेज कर अपने पर्स में हम सबको रख लिया. अब तक आधी रात बीत चुकी थी . घर के सब लोग सो चुके थे, हम सारे नोट भी पर्स में आराम से पड़े हुए थे. सुबह होते ही अर्चना के बेटे गजेन्द्र ने कहा मम्मी मुझे दस रुपए दे दो, आज मंगलवार है, हनुमानजी को मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा. अर्चना ने पर्स से मुझे निकाल कर गजेन्द्र को दे दिया. गजेन्द्र ने हनुमानजी के मंदिर के पास के चौधरी के दूकान से बतासा खरीद कर, हनुमानजी को चढ़ा दिया. चौधरी ने अभी मुझे अपने गल्ले में रखा ही था कि एक भीखमंगा आ गया और उससे भगवान के नाम पर कुछ मांगने लगा. चौधरी ने मुझे उठा कर उसे दे दिया और बोला कि एक रुपया रख लो और नौ रुपया वापस करो. अब मैं भिखमंगा बटौहा के झोले में पहुंच गया. दिन भर भीख मांगने के बाद शाम को बटौहा ने एक दूकान से कुछ चावल – दाल खरीदा और सब्जी मंडी से कुछ सब्जी. अब मैं सब्जी बेचने वाली लक्षमिनिया के पैरों के नीचे, जिस बोरे पर वह बैठी थी, उसके भीतर मैं पहुंच गया. भीषण बदबू हो रही थी, ऊपर से लक्षमिनिया मेरे ऊपर बैठी थी, और मैं अन्य नोटों के साथ दबा हुआ था. लक्षमिनिया ने रात में पता नहीं क्या खाया था, वह थोड़ी- थोड़ी देर के बाद बदबूदार हवा छोड़ती रहती और हम सब नोटों की हालत नारकीय हो रही थी.
इस प्रकार से हमारी यात्रा चलती रही, कहने को तो मेरा एक बहुत ही लम्बा जीवन है, लेकिन मैं अपने जीवन के अन्तिम समय के पहले की कुछ मर्मांतक घटनाओं को कह कर, मैं अपनी कहानी समाप्त कर दूंगा.
एक दिन मुझे एक आदमी ने किशोर आटो चालक को दे दिया. दिन भर किशोर आटो चलाने के बाद रात में मयूरी डांस बार पहुंचा. उसकी वहां पर पसंद की डांस गर्ल थी बिंदिया. बिंदिया बिल्कुल बिंदास थी. उसके लिए दोस्ती अपनी जगह, धंधा अपनी जगह. धंधे में बिंदिया कोई लफड़ा नहीं मांगती थी. खैर उस रात किशोर के साथ उसने काफी समय बिताया, चलते समय किशोर ने उसके हाथ में कुछ नोट रख दिए. बिंदिया ने नोटों को गिना. कुल नोट थे, चार सौ दस! अब बिंदिया क्रोध से चिल्लाने लगी, किशोर को संसार की जितनी भी भद्दी गालियां हो सकती थी, उसने दिया. किशोर ने कहा बिंदिया रानी, आज कमाई कम हुई है, रख लें, रोज़ तो तुम्हारे लायक देता ही हूॅं. बिंदिया भड़क गई, बोली देख, लूंगी तो पूरा लूंगी, नहीं तो यह अपना रुपया रख, मैं ऐसे रुपए पर थूकती हूं. इतना कहकर बिंदिया ने मुझ पर थूक दिया. जिंदगी में पहली बार मुझे यह भी दिन देखना पड़ा. किशोर एकदम भड़क गया, पहले तो उसने हम नोटों को उठाकर अपने रुमाल से पोंछा और अपने जेब में रखा, उसके बाद उसने जो बिंदिया को गाली देना शुरू किया कि पूछो मत. फिर उसने बिंदिया को कहा कि आज तूने दौलत के नशे में लक्ष्मी पर थूका है ( हम नोटों को कुछ लोग लक्ष्मी भी कहते हैं, और प्रणाम करते हैं), जा मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुमको कोढ़ हो जायेगा.
किशोर फिर बार से बाहर आया और सीधे एक देशी दारु की दुकान पर गया. दुकान के सामने एक औरत जिसका नाम सुरजिया था और उसने चिकने की दूकान जमीन पर लगा रखी थी, जहां वह भूजी हुई मछली, उबले हुए अंडे आदि बेचती थी और लोग दारु पीने के पहले उसकी दूकान से चिकना खाते थे. किशोर ने भी भूजी हुई मछली खरीदी और अन्य नोटों के साथ मुझे सुरजिया को दे दिया. सुरजिया ने हमें अपने पैरों के नीचे रखें बोरे में घुसा दिया. अब मैं उसके पैरों के नीचे, जहाॅं कच्ची दारु की बदबू आ रही थी, दबा था. लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय वहीं पड़े रहने के. ग्राहक आते, चिकना लेते और फिर भट्टे पर दारू पीने चले जाते. आधी रात के बाद सुरजिया ने अपनी दूकान समेटी और दारु की दूकान पर जा कर एक पौआ दारु पिया और कुछ नोटों के साथ मुझे भी भट्टे वाले को दे दिया. भट्टे वाले ने बिना गिने मुझे अपने गल्ले में रख दिया. चारों ओर कच्ची दारु की बदबू फैली थी और उसी में मैं पड़ा हुआ था.
सुबह हुआ और एक आदमी ने हम सारे नोटों को एक बोरे में रखा और बाजार में जा कर एक बैंक में , वहां के एक कैशियर को दे दिया. कैशियर ने कहा क्या तुम गंदे नोट ले आते हो, मुझे साहब से डांट खाना पड़ता है. उस आदमी ने हंसते हुए कहा साहब हमारे पास तो ऐसे नोट और ऐसे ही लोग आते हैं, मैं साफ नोट कहां से लाऊॅं ! फिर उस आदमी ने अपने दूसरे झोले से एक शैम्पेन की बोतल निकाली और कैशियर को देते हुए बोला साहब यह आप के लिए है. कैशियर ने कहा इसकी क्या जरूरत थी! उस आदमी ने कहा नहीं साहब जरुरत क्यों नहीं है, आप लोग भी बड़ी मेहनत करते हैं. और इस प्रकार से मैं बैंक में पुनः पहुंच गया. शाम को हेड कैशियर ने कहा कि साफ नोट और गन्दे नोट अलग-अलग कर दो और जो गन्दे नोट हैं, उन्हें non – issuable नोटों की आलमारी में रख दो, जिससे कि उन्हें दुबारा ग्राहकों को नहीं दिया जाय.
दूसरे दिन मेरी तरह न जाने कितने गन्दे नोट एक अलग आलमारी में बंद कर दिए गए. कितने समय उस आलमारी में मैं पड़ा रहा, मुझे पता नहीं, लेकिन एक दिन हम सारे गन्दे नोटों को बक्से में बंद कर, भारतीय रिजर्व बैंक भेज दिया गया. वहां भी हम , सालों बक्से में बंद पड़े रहे और एक दिन हम सबको बाहर निकाल कर, मशीन से छोटे – छोटे टुकड़े कर के, एक बड़े से बिजली के ओवन में, भारतीय रिजर्व बैंक के बड़े साहबों के उपस्थित में , हमें सामूहिक जला दिया गया और इस प्रकार से मेरी जीवन यात्रा समाप्त हो गई.
☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆
(आज पिता दिवस पर एक लघुकथा )
शहर के फुटपाथ से लगे बिजली के खम्भे अपनी पीली रोशनी से सारे शहर को चमकातेथे, किन्तु उन्ही खम्भों के नीचे खड़े भिखारियों की खुली हथेलियों पर अंधेरा ही रहता। उनकी हथेलियाँ तो तभी चमकतीं जब कोई दाता उन पर छोटे या बड़े पैसों का सिक्का रख देता। तब, ये हथेलियाँ सिक्कों के अनुपात में 25, 40 या 100 पाॅवर के बल्ब के समान चमक उठती। ऐसी ही एक हथेली का नाम रमदू था। यह नाम उसे कब, किसने और कैसे दिया, कोई नहीं जानता। स्वंय रमदू भी नहीं। बचपन से लेकर आज तक इसी खम्भे के नीचे खड़े होकर भीख माँगते-माँगते उसे साठ वर्ष हो गए।
कुछ महीनों से वह सुबह दस बजे और शाम पाँच बजे एक-एक घण्टे के लिए चौराहे पर चला जाता। इस समय चौराहे पर ट्रैफिक जाम रहता। पाँच-पाँच मिनट तक हरा सिग्नल नहीं होता। कारों की लाइनें लग जाती। रमदू इन्हीं कारों के शीशे में अपनी हथेली फैला देता। उसकी अनुभवी आँखें कार व कार मालिकों को पहचानने लगी थीं। अतः उसकी हथेली प्रायः खुली नहीं आती थी। जब ट्रेफिक कम हो जाता, वह अपने खम्भे के पास आ जाता। यदि वहाँ कोई दूसरा भिखारी खड़ा होता तो वह चीख-चीखकर, गालियाँ देकर उसे भगा देता। अक्सर भिखारी उसे देखते ही उसका खम्मा छोड़ देते।
उस दिन भी रमदू ने रुकी हुई कारों में से एक कार में अपनी हथेली फैला दी। क्षणभर के बाद ही उसे लगा कि आज उसने गलत कार चुनी है। इस कार ने कई बार उसे निराश लौटाया है। सेठ बुलाकीदास बड़े कंजूस और चिड़चिड़े व्यक्ति थे।
रमदू अपनी हथेली खींच ही रहा था कि सेठ बुलाकीदास ने उसं रुकने का संकेत दिया और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकालकर उसकी हथेली पर रख दिया। रमदू ने अपनी लम्बी जिन्दगी में सिर्फ़ सुना भर था कि सौ का नोट कारवालों के पास होता है। आज वह न केवल उसे इतने करीब से देख रहा था, बल्कि उसकी गर्म छुअन भी महसूस कर रहा था। एक अजीब से स्वप्न की तरह कभी सेठ को और कभी नोट को देख रहा था। सेठ ने मुसकुराते हुए कहा- “डरो नहीँ बाबा, रख लो। असली है। जाओ मौज करो। आज मैं पहली बार इस उम्र में बाप बना हूँ। अभी-अभी अस्पताल से खबर आई है कि मेरी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया है। वहीं जा रहा हूँ। बच्चे के लिए दुआ करो बाबा। जाओ मौज करो।”
बुढ़ापे में बाप बनने की कितनी खुशी होती है कि आदमी यह भी भूल जाता है कि वह अपनी खुशी किसके सामने व्यक्त कर रहा है। रमदू ने नोट को अपनी मुट्ठी में कैद कर बन्द मुट्ठी से ही सेठ को हाथ जोड़े। सिग्नल हरा हो गया। रमदू ने सेठ पर दुआ भरी नजर डाल अपना हाथ खींच लिया। कारों के समान रमदू भी सरकते-सरकते सड़क पार की। वह तेजी से अपने खम्भे की ओर बढ़ने लगा। उसका चेहरा मारे खुशी के सेठ बुलाकीदास के चेहरे की तरह चमकने लगा। उसकी मुट्ठी में सौ का नोट है, उसकी चाल में एक सेठपन आ गया ।
उसने देखा कि उसके खम्भे के नीचे एक मरियल-सा भिखारी खड़ा है। पर आज उसके चेहरे पर गुर्राहट की जगह। मुस्कुराहट खेल रही थी। वह दबे पाँव उस भिखारी के पीछे खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और पीछे से उस भिखारी की खुली हथेली पर रख दिया। मरियल-से भिखारी ने चौंककर देखा तो वह काँपने लगा। रमदू मुस्कुरा रहा था। उसे मुस्कुराते देखकर वह भय और आश्चर्य से कभी सिक्के को, तो कभी रमदू को देख रहा था। गाली के बजाय रमदू से सिक्का जो मिला। रमदू ने हँसते हुए कहा- “डरो नहीं, आज दिनभर यहीं डटे रहो। तुम भी मौज करो। अपुन आज इस उम्र में पहली बार बाप बना है।” यह कह वह जेब में रखे सौ के नोट को यूँ थपथपाने लगा, मानो वह सौ का नोट नहीं, एक नन्हा-सा शिशु हो।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– लेखक की बेईमानी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य – भँवर # ११० — लेखक की बेईमानी —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
वयोवद्ध सनत से पढ़ना तो छूट ही जाता, लेकिन उन्होंने जारी रखा। बच्चे उनकी रुचि के अनुसार पुस्तकें खरीद लाते थे। चालीस साल पहले की बात थी सनत अपने आंगन में फूल बो रहे थे। तभी एक मोटर खराब हो जाने पर उनके घर के सामने रुकी थी। सनत ने स्वयं मोटर ठीक कर दी थी। उन्होंने एकाकी आदमी को अतिथि स्वरूप चाय पिलायी थी। इस परिवार और घर से प्रभावित आदमी के पूछने पर उन्होंने संघर्षों से भरा अपना जीवन और पारिवारिक अनुराग उसे बताया था। वही लिखा गया था और आज सनत वही पढ़ रहे थे। आदमी से जब बात हुई थी सनत पढ़ने में कमजोर ही थे। उन्होंने कहा था पढ़ना आता नहीं है। आदमी जो एक सुविख्यात लेखक था उनकी अनपढ़ता का लाभ उठा कर उनकी अद्भुत जीवन यात्रा और आदर्श परिवार की कहानी को अपने विशद संस्मरण के नाम से लिखा था।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “आज का रांझा”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।
लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।
– हूं।
लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।
– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।
– हूं।
लड़की तेज चलती गयी।
बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।
क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?
चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।
पर्दा हटा और ,,,,
लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।
– चाय नहीं लोगे?
लड़का चुप बैठा रहा।
लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।
लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।
– चाय नहीं लोगे?
लड़की ने पूछा।
– फिर कब आओगे?
– अब नहीं आऊंगा।
– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?
और वह खिलखिला कर हंस दी।
लड़के ने पलट कर देखा,,,
लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।
लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
माँ ने रसोई से आवाज़ दी- “बेटा, चाय बना दूँ?”
रवि ने थके हुए स्वर में कहा- “हाँ माँ… आज बहुत थक गया हूँ।”
कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में चाय का कप थमा दिया।
रवि ने एक घूंट लिया।
फिर मुस्कुराकर बोला-
“माँ, पता है… जब भी जिंदगी उलझती है, मुझे लगता है बस एक कप चाय मिल जाए, सब ठीक हो जाएगा।”
माँ हँस पड़ीं- “चाय में ऐसा क्या है?”
रवि ने कप को देखते हुए कहा- “चाय में सिर्फ दूध, पानी और पत्ती नहीं होती माँ…
उसमें आपका अपनापन, दोस्तों की बातें, बारिश की यादें और मन को सुकून देने वाला थोड़ा-सा प्यार भी घुला होता है।”
माँ चुप रहीं।
और रवि चाय के घूंट के साथ दिनभर की थकान पीता रहा।
तभी उसे लगा- हम सिर्फ चाय नहीं पीते,
उसके साथ रिश्तों की गर्माहट भी घूंट-घूंट पीते हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)
शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।
भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।
शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,
“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”
बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।
शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,
“और भूख लगेगी क्या?”
बालक की आँखें झुक गईं—
“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”
बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।
शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”
“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆
🌻लघुकथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔
मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।
ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”
“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”
“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”
कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।
आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस गई थी।”
“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”
ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “राजनीति के कान”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
– मंत्री जी, बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने।
– किस मामले में भाई?
– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके।
– अरे , वह मास्टर? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,
– क्या कहते हैं हुजूर?
– उस पर यही इल्जाम है।
– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?
– क्यों?
– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए। जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया। बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं। और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता, वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा?
– अच्छा भाई। तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं। खैर। आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा।
खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था।