हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ७२ – लघुकथा – जब लग गंग, जमुन जल धारा ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ७२ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ जब लग गंग, जमुन जल धारा ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

संजना प्रतिदिन यमुना के तट पर जाती और माँ यमुना से अपने बीमार पति की लम्बी उम्र का वरदान मांगती। वह यमुना को स्वच्छ देखना चाहती थी। लेकिन यमुना के जल में बहते कूड़ा करकट और मलबे को देखकर उसका मन विचलित हो जाता था। आख़िरकार उसने यमुना को स्वच्छ रखने का बीड़ा  उठा लिया। प्रारंभ में उसने अकेले, लेकिन बाद में एक बहुत बड़े समूह को साथ लेकर चलना शुरू किया। उसने इस कार्य को मिशन बना लिया।

बरसों पहले उसकी अपनी ही शादी के फेरे के समय गायी गई यह पंक्ति कि..”जब लग गंग, जमुन जल धारा। अमर रहे अहिवात तुम्हारा।।” आज तक उसके कान में गूँज रही थी l

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – जीत की असली कीमत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ जीत की असली कीमत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

आश्रम में एक दिन गुरुजी ने देखा, उनका प्रिय शिष्य नीरज उदास बैठा था।

“क्या बात है बेटा, आज इतने चुप क्यों हो?”

“गुरुजी, बहुत मेहनत करता हूँ, फिर भी संतुष्ट नहीं हूँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझसे आगे निकलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।”

गुरुजी उसे बगीचे में ले गए।

“देखो बेटा, यह आम का पेड़ कितनी धीरे बढ़ता है, फिर भी मीठे फल देता है।”

“लेकिन गुरुजी, दुनिया तो तेज़ चलने वालों की है!”

“अच्छा, बताओ… आख़िरी बार माँ के साथ बैठकर कब खाना खाया था?”

“याद नहीं।”

“दोस्तों से कब मिले?”

“समय ही नहीं मिला।”

“और खुलकर हँसे कब थे?”

नीरज निरुत्तर था।

गुरुजी ने पूछा, “जिस सफलता के लिए जी रहे हो, उसी के कारण जीना भूल रहे हो?”

“तो क्या मेहनत करना छोड़ दूँ?”

“नहीं बेटा, मेहनत ज़रूर करो, लेकिन अपनी सेहत और सुकून को उसकी कीमत मत बनाओ।”

“लेकिन पीछे रह गया तो?”

गुरुजी मुस्कुराए।

“बेटा, जीवन की दौड़ में सबसे आगे निकलकर भी क्या पाओगे, अगर अंत में तुम्हारे साथ चलने वाला कोई न हो?”

नीरज की आँखें नम हो गईं।

“गुरुजी, अब समझ आया… मैं सफलता कमाने निकला था, मगर ज़िंदगी ही खर्च करता जा रहा था।”

गुरुजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“बेटा, कमाई दोबारा हो सकती है, लेकिन बीता समय, खोई सेहत और छूटे रिश्ते हमेशा वापस नहीं आते।”

नीरज ने जेब से फ़ोन निकाला।

स्क्रीन पर माँ की पाँच मिस्ड कॉल थीं।

उसने काँपती उँगलियों से नंबर मिलाया-

“माँ… आज खाना आपके साथ खाऊँगा।”

उधर कुछ पल ख़ामोशी रही।

फिर माँ की आवाज़ आई-

“बेटा, आज अचानक छुट्टी मिल गई क्या?”

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६९ ☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘अम्माँ को पागल बनाया किसने?‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६९ ☆

☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘भाई! आज बहुत दिन बाद फोन पर बात कर रही हूँ तुमसे। क्या करती बात करके? तुम्हारे पास बातचीत का सिर्फ एक ही विषय है कि ‘अम्माँ पागल हो गई हैं’। उस दिन तो मैं दंग रह गई जब तुमने कहा –‘अम्माँ बनी-बनाई पागल हैं। भूलने की कोई बीमारी नहीं है उन्हें।’

‘मतलब’? मैंने पूछा 

‘जब चाहती हैं सब भूल जाती हैं, वैसे फ्रिज की चाभी ढ़ूंढ़कर सारी मिठाई खा जाती हैं। तब कैसे याद आ जाता है सब कुछ? अरे! वो बुढ़ापे में नहीं पगलाईं, पहले से ही पागल हैं।’  

‘भाई! तुम सही कह रहे हो – वह पागल थी, पागल हैं और जब तक जिंदा रहेंगी पागल ही रहेंगी।‘

‘अरे! आँखें फाड़े मेरा चेहरा क्या देख रहे हो? तुम्हारी बात का ही समर्थन कर रही हूँ।’ ये कहते हुए अम्माँ के पागलपन के अनेक पन्ने मेरी खुली आँखों के सामने फड़फड़ाने लगे।

‘भाई! अम्माँ का पागलपन तुम्हें तब समझ में आया, जब वह बेचारी बोझ बन गईं तुम पर। पागल ना होतीं तो तुम पति-पत्नी को घर से बाहर का रास्ता ना दिखा दिया होता? तुम्हारी मुफ्त की नौकर बनकर ना रहतीं अपने ही घर में। सबके समझाने पर भी अम्माँ ने बड़ी मेहनत से बनाया घर तुम्हारे नाम कर दिया।‘ मेरा राजा बेटा’ कहते उनकी जबान नहीं थकती थी, पागल ही थीं ना बेटे-बहू के मोह में? बात- बात में एक दिन मुझसे कह गईं – ‘बेटी ! बच्चों के मोह में कभी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी ना मार बैठना, मेरी तरह।‘ 

भाई! फोन रखती हूँ। कभी समय मिले तो सोच लेना अम्माँ को पागल बनाया किसने??

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अनिर्णय… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अनिर्णय… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

यहाँ से रास्ता दायें, बायें और सामने, तीन दिशाओं में बँटता था। राह से अनभिज्ञ दोनों पथिकों के लिए कठिन था कि कौनसी डगर चुनें। कुछ समय किंकर्तव्यविमूढ़-से ठिठके रहे दोनों।

फिर एक मुड़ गया बायें और चल पड़ा। बहुत दूर तक चलने के बाद उसे समझ में आया कि यह भूलभुलैया है। रास्ता कहीं नहीं जाता। घूम फिरकर एक ही बिंदु पर लौट आता है। बायें आने का, गलतछ दिशा चुनने का दुख हुआ उसे। वह फिर चल पड़ा तिराहे की ओर, जहाँ से यात्रा आरंभ की थी।

इस बार तिराहे से उसने दाहिने हाथ जानेवाला रास्ता चुना। आगे उसका क्या हुआ, यह तो पता नहीं पर दूसरा पथिक अब तक तिराहे पर खड़ा है वैसा ही किंकर्तव्यविमूढ़, राह कौनसी जाऊँ का संभ्रम लिए।

लेखक ने लिखा, ‘गलत निर्णय, मनुष्य की ऊर्जा और समय का बड़े पैमाने पर नाश करता है। तब भी गलत निर्णय को सुधारा जा सकता है पर अनिर्णय मनुष्य के जीवन का ही नाश कर डालता है। मन का संभ्रम, तन को जकड़ लेता है। तन-मन का साझा पक्षाघात असाध्य होता है।’

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© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नवरात्रि साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈`

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा : माँ का हिसाब ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ माँ का हिसाब ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

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“मम्मी! ये आइसक्रीम के खाली डिब्बे कब फेंकोगी?” बेटी ने पूछा।

“अरे, इनमें चटनी और मसाले रखती हूँ।”

“और ये पुरानी साड़ियाँ?”

“इनसे रजाइयाँ बनवा लूँगी।”

बेटी हँसी, “मम्मी, आप तो बेकार चीज़ों को भी काम का बना देती हो!”

माँ मुस्कुराईं, “बेटा, घर ऐसे ही चलता है।”

तभी पापा बोले, “लेकिन अपने लिए कुछ खरीदना हो तो तुम्हारी मम्मी को सब महँगा लगता है!”

बेटी ने पूछा, “माँ, पिछली बार अपने लिए नई साड़ी कब खरीदी थी?”

“अरे, मेरे पास बहुत हैं!”

“और पापा की नई शर्ट?”

“वो तो ज़रूरी थी। ऑफिस जाते हैं।”

“और आपकी साड़ी ज़रूरी नहीं?”

माँ चुप हो गईं।

“माँ, आप सबकी ज़रूरतें याद रखती हो, अपनी क्यों भूल जाती हो?”

“मेरी खुशी तो तुम सबमें है बेटा।”

“लेकिन माँ, आपकी अपनी खुशी भी तो होगी?”

माँ ने बात बदल दी, “अच्छा छोड़, चाय बनाऊँ?”

बेटी ने धीरे से पूछा, “माँ, आपको कौन-सा रंग पसंद है?”

“पता नहीं बेटा… अब तो जो तुम लोग ले आते हो, वही अच्छा लगने लगता है।”

बेटी ने माँ की ओर देखा।

“माँ, आप सबकी पसंद बनते-बनते अपनी पसंद कहाँ छोड़ आईं?”

माँ चुप रहीं। शायद इस सवाल का जवाब उनकी अलमारी में नहीं, बीते हुए वर्षों में कहीं रखा था।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५२ ☆ लघुकथा – फूल की वेदना ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय लघुकथा – ‘फूल की वेदना‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३५२ ☆

☆ लघुकथा ☆ फूल की वेदना ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सुधीर एक मित्र को छोड़ने एयरपोर्ट गया था। लौटने में देखा सड़क के एक तरफ फूलों का मेला लगा है। तरह तरह के फूल, सुन्दरता में एक से बढ़कर एक। सुधीर मंत्रमुग्ध खड़ा देखता रह गया। इतने सारे फूल इतना सौंदर्य बिखेर रहे हैं और इस निर्जन में इन्हें देखने वाला, इनकी कद्र करने वाला कोई नहीं। इनका सारा सौंदर्य व्यर्थ ही जा रहा है। उसे अंग्रेज़ कवि थॉमस ग्रे के प्रसिद्ध शोकगीत की पंक्तियां याद आयीं— ‘Full many a flower is born to blush unseen, and waste its sweetness on the desert air.’

वह आगे बढ़ा। सोचा कुछ फूल तोड़ लिए जाएं। घर में गुलदान में सजाएंगे। पत्नी खुश होगी। इसी इरादे से आगे बढ़ा, तभी फूलों के बीच से आवाज़ आयी, ‘कहिए महोदय, क्या इरादे हैं?’

सुधीर चमत्कृत होकर बोला, ‘कौन बोल रहा है?’ जवाब आया, ‘हम फूल ही बोल रहे हैं। क्या हमें तोड़ना ज़रूरी है?’

सुधीर ने जवाब दिया, ‘तो फिर फूलों का उपयोग ही क्या है? यहां जंगल में तुम्हें देखने वाला कौन है?’

आवाज आयी, ‘हमारा काम संसार को सुंदर बनाना है। हमें अपनी डाल अपना जीवन पूरा करने दो। तोड़ने के घंटे दो घंटे बाद तुम हमें कचरे में फेंक देते हो। हमें अपनी उम्र पूरी करने दो। जिसे हमें देखना होगा वह स्वयं हमारे पास आएगा।

‘तुम हमारी उपयोगिता की बात करते हो, लेकिन आदमी से ज़्यादा हमारा दुरुपयोग कोई नहीं करता। तुम हत्यारों, बलात्कारियों को माला पहनाते हो, हमें शवों पर चढ़ाते हो, हमें अपनी नदियों में फेंक कर जल को प्रदूषित करते हो, अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए देवताओं पर चढ़ाते हो। दूसरों की खुशामद के लिए हमारा उपयोग करते हो। त्योहारों पर हमें पूरी तरह लूट लिया जाता है। कुल मिलाकर आदमी अपने स्वार्थ-साधन के लिए हमारे उपयोग करता है और हमारे युवावस्था में आते ही हमारे जीवन पर विराम लगा देता है।’

सुधीर कुछ देर चुप रह कर बोला, ‘आदमी तुम्हें तोड़ता है तो उसमें हर्ज़ क्या है? नहीं तोडेंगे तो एक दिन तुम डाल पर ही मुरझा कर गिर जाओगे।’

जवाब आया, ‘सो तो एक दिन मनुष्य भी मुरझा कर गिरता है। तो क्या उसका जीवन बीच में ही समाप्त कर देना चाहिए?’

सुधीर असमंजस में चुप हो गया।

फूलों से आवाज़ आयी, ‘एक अंग्रेज कवि ने ‘डेफ़ोडिल्स’ शीर्षक की कविता लिखी है। उसे पढ़ो। उसमें कवि ने सिर्फ डेफ़ोडिल्स के दर्शन से प्राप्त उल्लास की बात की है, तोड़ने की बात नहीं की। कविता की आखिरी पंक्तियां हैं, ‘And then my heart with pleasure fills, and dances with the daffodils.’

‘हमारे देश के ही एक बड़े कवि ने हमारी भावना को अपनी कविता में बहुत अच्छी तरह से व्यक्त किया है। पुष्प की अभिलाषा लिखते हुए वे कहते हैं कि पुष्प न तो सुरबाला के गहनों में गूंथा जाना चाहता है, न प्रेमी की माला में बिंधना चाहता है, न सम्राटों के शव पर चढ़ना चाहता है, न देवों पर चढ़कर इठलाना चाहता है। पुष्प की अभिलाषा केवल यह है कि उसे मातृभूमि के लिए जीवन देने जा रहे वीरों के पथ में फेंक दिया जाए।’

फूलों की बात सुनकर सुधीर कुछ शर्मिंदा होकर बिना फूल तोड़े ही लौट पड़ा।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२३ – स्वान्तः सुखाय… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– स्वान्तः सुखाय…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२३ — स्वान्तः सुखाय — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

लेखक की कृति पूरी होते ही उस पर जलता हुआ चिराग उलट गया। लेखक ने कुछ बचाया और कुछ जल गया। उसे बहुत रोदन आया। वह सोच में पड़ गया। उसे जले हुए भागों को फिर से लिखना पड़ता। पर वह कहाँ तक याद करके लिख पाता। दूसरे शब्दों में यह टूटे को जोड़ना था। यह उससे हो नहीं पाता। उसे लगा उसका वास्तविक सुख चला गया। उसने आधी शेष कृति को सदा के लिए विस्मृत कर दिया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

22 – 10 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – तीर्थयात्रा… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – तीर्थयात्रा।)

☆ कथा-कहानी – लघुकथा – तीर्थयात्रा… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

(चुनिंदा २५ लघुकथाओं में से एक)

वे भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी रहे थे। सेवा के दौरान उन्होंने अवकाश से अधिक अवसरों का हिसाब रखा। कभी मन ऊबता तो किसी रमणीय स्थल पर बैठक आयोजित हो जाती और पाँच सितारा आतिथ्य का आनंद मिल जाता। उसका खर्च कौन उठाता था, यह प्रश्न कभी किसी ने नहीं पूछा।

सेवानिवृत्ति के बाद पत्नी बोली, “जीवन भर जाने-अनजाने बहुत कुछ हुआ होगा। चलिए, तीर्थयात्रा कर आते हैं।”

उन्हें भी अपने कुछ फैसले याद आ गए। प्रस्ताव तुरंत स्वीकार हो गया।

तीर्थों की यात्रा करते हुए पवित्र नदियों में स्नान, प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन, संतों के प्रवचन—कुछ भी नहीं छोड़ा।

लौटने पर मित्रों ने यात्रा का हाल पूछा। उन्होंने रेल, होटल, टैक्सी, दक्षिणा—हर खर्च का विस्तार से हिसाब सुनाया।

एक मित्र मुस्कराया, “भोजन का खर्च तो बताया ही नहीं। लगता है पूरी यात्रा उपवास में निकाली।”

वे हँस पड़े, “अरे नहीं! आजकल हर बड़े तीर्थ पर शानदार भंडारे चलते हैं। महीने भर छप्पन भोग खाते रहे।”

तभी एक सज्जन ने सहज भाव से पूछा, “इतने विशाल भंडारे करवाता कौन है?”

बगल में बैठे व्यक्ति ने कहा, “आजकल पुल-सड़क बनाने वाले बड़े ठेकेदार, टोल वसूलने वाले… वही। पाप की कमाई से पुण्य खरीदने का सबसे आसान रास्ता है।”

कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया।

पति-पत्नी देर तक यही तय नहीं कर पाए कि तीर्थयात्रा सफल हुई थी या पापों का हिसाब और बढ़ गया था।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – घुटन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ घुटन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“चाय में देर क्यों हुई?” अजय की आवाज़ गूँजी।

“बस दो मिनट…”

“जवाब मत दो!”

मीरा चुपचाप कप रखकर बैठ गई।

“शाम को मेरे साथ चलना है। तैयार रहना।”

“आज सहेली के घर जाना था।”

“मेरी मर्ज़ी के बिना कहीं नहीं!”

मीरा ने नज़रें झुका लीं।

“अब मुँह क्यों फुलाया है?” अजय झुँझलाया।

“कुछ नहीं।”

“तो चेहरा ऐसा क्यों है?”

मीरा खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर पक्षी खुले आसमान में उड़ रहे थे। उसकी साँस जैसे भीतर ही अटक गई थी।

“मीरा! सुनाई नहीं देता?” अजय फिर चिल्लाया।

वह पलटी।

“कभी मेरी भी सुन लिया कीजिए।”

“क्या कहा?”

“कुछ नहीं।”

“ज़ोर से बोलो!”

मीरा की आँखें भर आईं। “कहने से क्या होगा? आप सुनते कहाँ हैं?”

“बहुत ज़ुबान चलने लगी है तुम्हारी!”

वह चुप हो गई।

अजय टीवी देखने लगा। कुछ देर बाद उसने आवाज़ लगाई, “खाना लगा दो!”

मीरा रसोई की ओर बढ़ी, फिर अचानक रुक गई।

“क्या हुआ अब?” अजय ने पूछा।

उसने उसकी ओर देखा, “इस घर में मेरी इच्छा की कोई जगह है?”

“फिर वही बात!”

मीरा ने होंठ भींच लिए। उसकी नज़र दरवाज़े पर टिक गई।

वह बाहर जाना चाहती थी या बस कुछ पल अपने भीतर से बाहर निकलना- उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६८ ☆ लघुकथा – कबिरा आप ठगाइए… ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘कबिरा आप ठगाइए…। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६८ ☆

☆ लघुकथा – कबिरा आप ठगाइए… ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

गरीब किसानों की आत्महत्या की खबर उसे द्रवित कर देती थी| अपनी माँगों के लिए किसानों के देशव्यापी आंदोलन में भी कई किसान मारे गए। नेताओं के कोरे वादे किसानों को आश्वस्त नहीं कर पाए। आत्महत्या का सिलसिला नहीं थमा। वह कई बार सोचता कि क्या कर सकता हूँ इनके लिए ? पैसों से हाथ तंग है, बस किसी तरह दाल – रोटी चल रही है परिवार की। क्या करूँ कि किसी किसान परिवार की कुछ तो मदद कर सकूँ। यही सोच-विचार करता हुआ वह घर से सब्जी लेने के लिए निकल पड़ा।

सब्जी मंडी बड़े किसानों और व्यापारियों से भरी पड़ी थी। भीड़ में किनारे एक बुढ़िया बैठी दिखाई दी, जिसके सामने थोड़े टमाटर और एक-दो सब्जियाँ रखी थीं। वह उसी की तरफ बढ़ गया और पास जाकर बोला—

“सब्जी ताजी है ना माई ?” 

बुढ़िया ने बड़ी आशा से पूछा- “ हाँ,का चाही बेटवा!” 

जमीन पर बिछाए बोरे पर रखे टमाटर के ढेर पर नजर डालकर वह बोला – “ ऐसा करो ये सारे टमाटर दे दो, कितने हैं ये ?”

बुढ़िया ने तराजू के एक पलड़े पर बटखरा रखा और दूसरे पलड़े पर बोरे पर रखे हुए टमाटर उलट दिए, बोली – “अभी तौल देते हैं भैया। ” तराजू के काँटे को देखती हुई बोली – “दो किलो हैं।”

“किलो का क्या भाव लगाया माई ? “

“चालीस रुपया ” 

“चालीस रुपया किलो ?” एकबारगी वह चौंक गया। कीमत तो ज्यादा थी ही, टमाटर भी ताजे नहीं थे। सब्जी बिना मोल भाव के वह नहीं खरीदता था। यह तो घाटे का सौदा है ? तभी उसकी नजर बुढ़िया के चेहरे पर पड़ी जो बिक्री होने की आस से खुश नजर आ रही थी। उसने और कुछ सोचे बिना टमाटर थैले में डलवा लिए और चल दिया।

वह गुनगुना रहा था- ‘कबिरा आप ठगाइए…‘

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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