हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९१ – दिल की खातिर… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– दिल की खातिर…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — दिल की खातिर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

चोर ने एक ऐसा आईना चुराया जो आंतरिक दुनिया दिखाता था। उसने आईने में अपना दिल देखा। बड़ा प्यारा दिल था, लेकिन वह चोर होने से उसका दिल रोता था। उसने अपने दिल की खातिर चोरी छोड़ दी। अब उसे अपने दिल का हाल जानने के लिए आईने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पर ऐसा भी था उसने अपना दिल देखने के लिए कहीं से आईना चुराया नहीं था। बस अपने दिल की खातिर एक कल्पना ने उसे बांध लिया था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

13 – 01 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – हरि की माँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – हरि की माँ ? ?

हरि को गोद में आए केवल दस महीने हुए थे, जब हरि का बाप उसे हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। हरि की माँ ने हिम्मत नहीं हारी। हरि की माँ हरि के लिए डटकर खड़ी रही। हरि की माँ को कई बार मरने के हालात से गुज़रना पड़ा पर हरि की माँ नहीं मरी।

हरि की माँ बीते बाईस बरस मर-मरकर ज़िंदा रही। हरि की माँ मर सकती ही नहीं थी, उसे हरि को बड़ा जो करना था।

हरि बड़ा हो गया। हरि ने शादी कर ली। हरि की घरवाली पैसेवाली थी। हरि उसके साथ, अपने ससुराल में रहने लगा। हरि की माँ फिर अकेली हो गई।

हरि की माँ की साँसें उस रोज़ अकस्मात ऊपर-नीचे होने लगीं। हरि की माँ की पड़ोसन अपनी बेटी की मदद से किसी तरह उसे सरकारी अस्पताल ले आई। हरि की माँ को जाँचकर डॉक्टर ने बताया, ज़िंदा है, साँस चल रही है।

हरि की माँ नीमबेहोशी में बुदबुदाई, ‘साँस चलना याने ज़िंदा रहना होता है क्या?’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९५ ☆ लघुकथा – “पासवर्ड” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९५ ☆

?  लघुकथा – पासवर्ड ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

स्क्रीन पर तीसरी बार फिर वह संदेश फिर उभर आया “गलत पासवर्ड.”

शरद बाबू ने चश्मा ठीक किया, उँगलियाँ धीमे धीमे कुंजियों पर चलीं, पर मन डगमगा गया। 

पासवर्ड कभी लिख कर नहीं रखना चाहिए, जानते हुए भी इसी समस्या से बचने के लिए वे अपनी डायरी में पासवर्ड लिख लिया करते हैं। सावधानी के लिए बस किस अकाउंट का पासवर्ड है यह याददाश्त पर छोड़ रखा है, लेकिन फिर भी गड़बड़ हो ही जाती है।

नोटबुक के वे पन्ने पलटे हर जगह दर्ज अंक, प्रतीक और अंग्रेजी के छोटे बड़े अक्षर । मेल , बैंकों के अकाउंट , वाई फाई , नेटलिक्स , पेंशन ऐप वगैरह वगैरह के ढेर सारे विस्मृत,  गड्डम गड्ड होते पासवर्ड अब प्रायः उन्हें चिढ़ाते लगे हैं।

वे कमरे की छत देखते सोच रहे थे, अपने पुराने दिन जब उनकी याददाश्त का ऑफिस में सब लोहा मानते थे, उन्हें दस अंकों के मोबाइल नंबर तक जबानी याद रहते थे, जिन्हें वे जेब में मोबाइल होते हुए भी ऑफिस के लैंडलाइन से डायल कर लिया करते थे, शायद पैसे बचाने ।  

उन्हें खीजता देख ,बेटा हँसकर बोला, “पापा, इतनी दिक्कत है तो पासवर्ड मैनेजर एप रख लीजिए।” 

शरद बाबू मुस्करा कर रह गए ।  

*

रिटायरमेंट को पांच महीने भर तो हुए हैं। 

पहले समय पीछे भागता था, अब वे उसके पीछे दौड़ रहे हैं। 

पत्नी ने रसोई से पुकारा “ओटीपी आया क्या?” 

स्क्रीन पर छह अंकों का नंबर चमका… फिर एस एम एस ही गुम हो गया, सेशन टाइम आउट हो चुका था।

शरद बाबू ने लंबी साँस ली, लैपटॉप बंद किया। 

खिड़की से छनती धूप में धूल के कण चमक रहे थे, जैसे यादें कमरे में घुसी आ रही हों, रोशनी की एक बीम की तरह। 

उनके होंठों पर स्मित मुस्कान थी,

“नया पासवर्ड बनाना है..

bHULNANAHI@1

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – “निर्विरोध अनिर्वाचित” ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ निर्विरोध अनिर्वाचित ☆ हेमन्त बावनकर ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

विघ्नहर्ता हाऊसिंग सोसाइटी ने अपने वार्षिक चुनाव के लिए सर्व सम्मति से सेवकराम जी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया था. साथ ही उन्हें अपनी समिति के गठन के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी गई थी. मुख्य रूप से अध्यक्ष, सचिव् और कोषाध्यक्ष का चुनाव होना था.

पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चुनाव प्रक्रिया चलती रही. अंतिम तिथि पर प्रत्याशियों ने अपने फॉर्म जमा कर दिए. जब लिस्ट जारी करने का समय आया तो पता चला कि दो पैनल आमने सामने आ गए हैं. एक देसाई पेनल और दूसरा पटेल पेनल.

सभी ने जोर शोर से अपने अपने पेनल के लिये प्रचार शुरू कर दिया. माहौल में चुनावी गरमी आ गई. सेवकराम जी की चुनाव समिति को समझ में नहीं आ रहा था कि उस क्षेत्र की सबसे बड़ी हाऊसिंग सोसायटी के चुनाव में लोग इतना पैसा कहाँ से और क्यों खर्च करने को उतारू हैं? बाद में पता चला कि दोनों पेनल के पीछे उस क्षेत्र की राष्ट्रीय स्तर की बड़ी राजनीतिक पार्टियों का हाथ है जिनकी नजर विघ्नहर्ता हाऊसिंग सोसाइटी के पांच हजार से अधिक मतदाताओं पर है.

अंतिम तिथि के आते आते चुनाव का माहौल बदलने लगा. उनकी चुनाव समिति के कानों में तरह तरह की बातें सुनाई देने लगी. फिर वही हुआ जिसका सब को डर था,

विगत चार वर्षों से सत्ता में रहे पटेल पेनल ने धन और राजनीतिक बल पर देसाई पेनल को अपने फॉर्म वापिस लेने पर मजबूर कर दिया.

अब सबकी नजर चुनाव समिति के निर्णय पर टिकी थी. पटेल पेनल अपने आप को “निर्विरोध निर्वाचित” करने पर दबाव बना रहा था.

चुनाव समिति ने काफी मंथन के पश्चात् निर्णय स्वरुप अपनी सूचना जारी किया कि – “प्रत्येक मतदार के मत का अपना महत्व है जो उसका अधिकार है. प्रत्याशियों ने अपना निर्णय लिया है किन्तु मतदार ने अपना निर्णय कहाँ दिया? उसने अपने मताधिकार का प्रयोग कहाँ किया? अतः निर्धारित तिथि को मतदान होगा. बैलट पेपर पर प्रत्येक मतदार को अपना मत देने के लिए “NOTA” (None of the above) अर्थात- “इनमे से कोई भी नहीं”का विकल्प भी रहेगा.”

इसका काफी विरोध हुआ किन्तु, सेवकराम जी की समिति टस से मस नहीं हुई. समय पर मतदान हुआ. पटेल पेनल के सभी प्रत्याशियों के विरोध में NOTA को अधिक मत मिले.

अंत में सेवकराम जी की चुनाव समिति ने अपना अंतिम निर्णय दिया – “पटेल पेनल के सभी सदस्यनिर्विरोध अनिर्वाचित”अगले चुनाव की तिथि समिति शीघ्र घोषित करेगी।”

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ – तिल गुड़ की मिठास ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “तिल गुड़ की मिठास”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ ☆

🌻लघु कथा🌻 तिल गुड़ की मिठास🌻

माँ रेवा के घाट पर उतरने चढ़ने वाले सीढ़ियों पर दान की आस लगाए जो बैठे रहते हैं। उनमें से एक महिला बहुत ही साफ सुथरी परंतु गंभीर सोचनीय अवस्था में माला जाप करती दिखी।

मकर संक्रांति का पर्व सभी खिचड़ी कोई तिल चाँवल, कोई चाँवल दाल, कोई गुड़ तिल, कोई एक-एक लड्डू देते चला जा रहा था। मानो सारा पुण्य कमा रहे हो।

पंडितों की पंक्तियां बड़े-बड़े लकड़ी के तख्तों पर आसन जमाए बैठे थे। थोड़ी देर बाद वहीं महिला सुंदर से एक प्लेट पर दान से मिले कुछ लड्डुओं को कपकपाते हाथ से पंडित जी के पास आकर कुछ रुपए रख संकल्प करने के लिए कहने लगी।

उसकी शालीनता को देख पंडित जी भी मुस्कुरा दिए। उसी समय सामने के लकड़ी के तख्त पर नजर पर पड़ी। बड़ी श्रद्धा के साथ जो गाँव की महिला अपने बच्चों के साथ हाथ लगाकर संकल्प कर रही थी और कोई नहीं उसके अपने बेटा बहू थी।

पंडित ने नगद नारायण अपने कब्जे में लेते हुए  बाकी कच्ची रसोई पुरी सब्जी उसी अम्मा को देते हुए कहा— ले जा रख तेरा आज का दिन अच्छा है। तुझे मकर संक्रांति मिल रही है तिल के लड्डू मिल रहे हैं। लेजा दान का सीधा आज अच्छे से भोजन करना।

उनके जाने के बाद आँचल फैला, वह दुआ देती कहने लगी जहाँ मैं हूँ, वहाँ कभी मेरे अपने बैठने ना आए।

बस यही दान की दुआ मै मांगती हूँ। बेटा बहू तिल महादान करके बड़े खुश नजर आ रहे थे। वही सर से मुँह छुपाई वह सोच रही थी– यह तिल गुड़ मिठास, या मिलने वाला त्रास।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९० – चरित्र – मंथन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– चरित्र – मंथन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९० — चरित्र – मंथन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

बिल्ली अपने सामने खड़े चूहे को मजे – मजे देख रही थी। चूहा अपनी ओर से सतर्क ही था। सहसा भूकंप आने पर चूहा और बिल्ली दोनों एक खंडहर में फँस गए। बिल्ली की साँसें उखड़ने पर आईं। जब कि चूहा तो मज़े – मज़े जी सकता था। बिल्ली तो मर ही जाती कि चूहे ने मिट्टी खोद कर बाहर निकलने का रास्ता बना दिया। खंडहर से मुक्त होने पर चूहे के प्रति कृतज्ञ होते भी बिल्ली ने उसका शिकार कर लिया। बिल्ली चूहों का शिकार करने की अपनी प्रकृति से मजबूर थी। उधर ऐसी बात नहीं कि चूहा न जानता हो कि बिल्ली उसे खा जाएगी। पर मिट्टी खोदने की अपनी प्रकृति से चूहा भी मजबूर था।

 © श्री रामदेव धुरंधर
08 – 01 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बाइज़्ज़त…!

☆ लघुकथा  बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

पागल पाशा दिन-दहाड़े दोपहरी के समय सर पर पाँव रखकर सड़क पर बेतहाशा भागा जा रहा था और साथ में अपनी बुलंद आवाज़ में ज़ोर-शोर से चिल्ला रहा था… ‘चल गई… चल गई…! चल गई…!’

जिसको सुनकर बाजार की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर ब्रेक लग गए। आबादी के विस्फोट से लावे की तरह फैलते शहर में अचानक सन्नाटा छा गया।

देश के किसी जागरूक नागरिक ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए पुलिस स्टेशन को मोबाइल लगा दिया। सुना है, शहर में चल गई है… आधी-अधूरी सूचना पर पुलिस की गाड़ियाँ सड़कों पर दौड़ने लगी, सायरन बजने लगे, पर किसी भी व्यक्ति ने यह जानने की जरा भी ज़हमत उठाई, न कोशिश की, कि कहाँ और क्या चल गई है…!

पुलिस की बड़ी देर तक चली खोज-बीन और भाग-दौड़ के बाद आखिरकार पाशा पकड़ा गया। उसे पूछताछ के लिए कोतवाली लाया गया। थानेदार के पूछने पर उसने बताया कि कल उसे चलन से बाहर हो चुके चंद अठन्नी के सिक्कों से भरी थैली नाली में पड़ी मिल गई थी जिसे लेकर उसने बॉर से एक पव्वा खरीदा। बगल वाली होटल में बैठकर पीया और साथ में भर पेट बिरयानी खाई। उसके बाद उसे ऐसा नशा चढ़ा कि उसके मुँह से इतना भर निकला… चल गई… चल गई…, लेकिन शहर के दहशतज़दा लोगों ने समझ लिया… गोली चल गई…!

दूसरे दिन शहर की शाँति भंग करने के जुर्म में पुलिस ने पागल पाशा को न्यायाधीश के समक्ष पेश किया। न्यायाधीश ने भूखे पाशा की मनोदशा को ध्यान में रखते हुए सरकार को आदेश दिया कि देश में जितने भी भूखे, नंगे, बेघर हैं उनके लिए खाने, पहनने और रहने का बंदोबस्त किया जाए और पाशा को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। अदालत से बाहर निकलते हुए, पाशा रहमान का शेर-

‘’वो जो एक पागल है कहते हैं जिसे पाशा,

गुल-रुख़ों की सोहबत में और भी सनकता है।’’

गुनगुनाते हुए हवा में विलुप्त हो गया।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ऊहापोह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ऊहापोह ? ?

हिरण मोहित था पानी में अपनी छवि निहारने में। ‘मैं’ का मोह इतना बढ़ा कि आसपास का भान ही नहीं रहा। सुधबुध खो बैठा हिरण।

अकस्मात दबे पाँव एक लम्बी छलांग और हिरण की गरदन, शेर के जबड़ों में थी। पानी से परछाई अदृश्य हो गई।

जाने क्या हुआ है मुझे कि हिरण की जगह मनुष्य और शेर की जगह काल के जबड़े दिखते हैं।

ऊहापोह में हूँ, मुझे दृष्टिभ्रम हुआ है या सत्य दिखने लगा है?

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 6:57, 28.7.2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९८ – विद्या… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – विद्या।)

☆ लघुकथा # ९८ – विद्या श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“तुम्हारा नाम क्या है?” गायत्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“दीदी हमें हमारा नाम नहीं पता, कोई काली कह देता है, कोई गुड़िया कह देता है, कोई मुनिया कह देता है, कोई कहता अरे ओ सुन, लेकिन दीदी ज्यादातर लोग कामवाली बाई कहते हैं।”

“ठीक है, ठीक है, ज्यादा बातें मत कर, सीधे काम पर लग जाओ, जल्दी से मुझे रोटी सब्जी बना दो। रसोई में राजमा भीगा पड़ा है, दोपहर में चावल बना लेना। राजमा रोटी मुझे दे दो, बच्चे स्कूल से आएंगे उन्हें खाना खिला देना। रोज के काम की लिस्ट मैं सामने टेबल पर रख चली जाऊंगी पढ़ी-लिखी हो ना।”

“जी दीदी वैसे पांचवी क्लास तक पढ़ी हूं। थोड़ा-थोड़ा जोड़ के अक्षरों को पढ़ लेती हूं आप चिंता मत करो मैं खाना अच्छा बनाती हूं। आपके यहां जो पहले काम करती थी झुमरी वह मेरी मौसी है उसी से मैंने सारा घर का काम खाना बनाना सीखा है, आप किसी बात की चिंता मत करो।”

“मेरे घर से जाते ही तुम अकेली घर में रहोगी ध्यान रखना कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। बगल में शर्मा जी का नौकर बहुत तेज है वह जरूर आएगा। ज्यादा किसी से बात मत करना दोपहर में बच्चे आएंगे उन्हें खाना खिला देना शाम को मैं आऊंगी तब तुम्हें घर जाने की छुट्टी मिलेगी। अभी शुरू में तुम्हें ₹5000 दूंगी। काम देखूंगी, फिर पैसे बढ़ाऊंगी।”

“दीदी, स्कूल के बहार तो बहुत भीड़ लगी थी। सब लोग वोट डालने गए हैं क्या आप वोट नहीं डालते?”

“मैं ऑफिस से आते हुए वोट डालते हुए आऊंगी। चलो कोई बात नहीं मैं भी तुम्हारा वोटर आईडी बनवा दूंगी और धीरे-धीरे सारी चीज सिखा दूंगी।”

“दीदी एक बात तो सुनो  हमारे मोहल्ले में कुछ लोग आते हैं। वह हमें बड़ी सी गाड़ी में भरकर ले जाते हैं एक पर्चा देते हैं उसमें बहुत सारे चित्र बने रहते हैं, हमें एक चित्र की ओर इशारा कर देते हैं, हम उस पर ठप्पा लगा देते हैं और हमें पैसे भी मिलते हैं, दीदी साड़ी और रुपया मिलता है। खाना भी बन रहा है मैंने अपने आदमी से कहा कि शाम को घर लेते आना खाने को।”

“कोई बात नहीं अब तुम हमारे यहां काम करने लग गई हो धीरे-धीरे तुझे मैं पढ़ना लिखना और बातें सिखा दूंगी अभी मुझे ऑफिस जाने दें।”

“मैं रविवार को एक बस्ती में गरीब  महिला और बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। तुझे भी साथ लिए चलूंगी। तब तो किसी भी कागज में क्या लिखा है खुद पढ़कर समझ सको। अब से तुम्हारा नाम विद्या और अपने विद्या नाम को सफल कर सकोगी। शाम को बढ़िया खाना बना कर रखना।”

मुस्कुराते हुए गायत्री जी अपने कर को स्टार्ट करके ऑफिस चली जाती हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बलि” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बलि” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

पता नहीं क्यों सब गड्ढमड्ढ सा हुआ जा रहा है। ‌वह एक राजनीतिक समारोह की कवरेज करने आया हुआ है। रोज़ का काम जो ठहरा पत्रकार का ! रोज़ कुआं खोदो, रोज़ पानी पियो ! रोज़‌‌ नयी खबर की तलाश ।

फिर भी आज सब गड्ढमड्ढ क्यों हुआ जा रहा है? क्या पहली बार किसी को दलबदल करते देख रहा है? यह तो अब आम बात हो चुकी ! इसमें क्या और किस बात की हैरानी? फिर भी दिल है कि मानता नहीं । मंच पर जिस नेता को दलबदल करवा शामिल किया जा रहा है, उसके तिलक लगाया जा रहा है और मैं हूं कि बचपन में देखे एक दृश्य को याद कर रहा हूँ। ‌किसी बहुत बड़े मंदिर में‌ पुराने जमाने के चलन के अनुसार एक बकरे को बांधकर लाया गया है और उसके माथे पर तिलक लगाया जा रहा है और‌ वह डर से थरथर कांप रहा है और यहां भी दलबदल करने वाले के चेहरे पर कोई खुशी दिखाई नहीं दे रही । बस, एक औपचारिकता पूरी की जा रही है और‌ गले में पार्टी का पटका लटका दिया गया है । चारों ओर तालियों की गूंज‌ है और मंदिर में‌ बकरा बहुत डरा सहमा हुआ है । दोनों एक साथ क्यों याद‌ आ रहे हैं ? यह मुझे क्या हुआ है? किसने धकेला पार्टी बदलने के लिए? सवाल मन ही मन उठता रह जाता है लेकिन बकरे की बेबसी सब बयान कर रही है….

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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