हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆ कथा-कहानी – माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४० ☆

☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।

नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।

भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।

दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’

जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’

सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’

गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।

सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’

गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’

सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’

गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’

जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, इस बार प्रमोशन मिल जाए, फिर मैं चैन से जीऊँगा,” रवि ने कहा।

एक साल बाद प्रमोशन मिल गया।

“अब क्या बात है?” माँ ने पूछा।

“बस अपना घर हो जाए, फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।”

कुछ वर्षों बाद घर भी बन गया।

माँ ने फिर पूछा, “अब तो खुश हो?”

रवि बोला, “सोच रहा हूँ, थोड़ा बड़ा घर ले लूँ।”

माँ अलमारी से उसकी बचपन की तस्वीर निकाल लाई।

“याद है, तब तुम कहते थे—बस एक साइकिल मिल जाए, फिर कुछ नहीं चाहिए।”

रवि तस्वीर को देर तक देखता रहा।

माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, चीज़ें बदलती रहीं, लेकिन तुम्हारा ‘बस एक और’ कभी नहीं बदला।”

रवि के पास कोई उत्तर नहीं था।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कुर्सी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। पुलिस तैनात हो गयी और आम जनता का रास्ता बंद कर‌ दिया गया। हर अधिकारी मुआयना करने आया। क्या सिविल, क्या पुलिस के अधिकारी ! सब आते रहे, मुआयना करते रहे।

आखिर सीआईडी विभाग के उच्चाधिकारी ने कहा कि जिस कुर्सी पर मुख्यमंत्री को बैठना है, वह कुर्सी ठीक नहीं। इसे तुरंत बदलो। यह हमारे उच्चाधिकारियों का आदेश है।

हम वहां सारी तैयारियां कर चुके थे। अब कुर्सी में क्या खोट निकल आया?

हमने मज़ाक मज़ाक में पूछा -फिर यह भी बता दीजिये कि कौन सी कुर्सी लायें? तीन महीने वाली या पांच साल चलने वाली?

अधिकारी हमारा मुह देखते रह गये!!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कामवाली बाई पोंछा लगा रही थी। तभी आम के वृक्ष से अलग हुई एक पीली सूखी पत्ती खिड़की की राह कमरे में चली आई।

बाई ने उसे सोफे पर रख दिया।

मैं हैरान! कि क्या सोचकर उसने उस पीतवर्णा पत्ती को सोफे पर रखा होगा !

चाहती तो खिड़की के बाहर फेंक सकती थी, पर नहीं फेंका।

बड़ी देर तक मैं खुद से ही उलझती रही। पत्ती को हाथ में लिया। उसे उलट पलट कर देखती रही।

शायद मैं उसमें जीवन की नश्वरता तथा अपनी सोच का प्रतिबिंब देख रही थी। उसमें सारे मौसमों के अनुराग और आघात की धुन सुन रही थी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ – लघुकथा – मैं ऐसा नहीं – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारानी लघुकथा मैं ऐसा नहींकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ 

☆ लघुकथा – मैं ऐसा नहीं ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

वह फिर गिड़गिड़ाया, “साहब ! मेरी अर्जी मंजूर कर दीजिए. मेरा इकलौता पुत्र मर जाएगा.”

मगर, नरेश बाबु पर कोई असर नहीं हुआ, “साहब नहीं है. कल आना.”

“साहब, कल बहुत देर हो जाएगी. मेरा पुत्र बिना आपरेशन के मर जाएगा.आज ही उस के आपरेशन की फीस भरना है. मदद कर दीजिए साहब. आप का भला होगा,” वह असहाय दृष्टि से नरेश की ओर देख रहा था.

“ कह दिया ना, चले जाइए, यहां से,” नरेश बाबु ने नीची निगाहें किए हुए जोर से चिल्लाते हुए कहा.

तभी उस का दूसरा साथी महेश उसे पकड़ कर एक ओर ले गया.

“क्या बात है नरेश! आज तुम बहुत विचलित दिख रहे हो.” महेश बाबु ने पूछा, “वैसे तो तुम सभी की मदद किया करते हो ? मगर, इस व्यक्ति को देख कर तुम्हें क्या हो गया?” वह नरेश का अजीब व्यवहार समझ नहीं पाया था.

नरेश कुछ नहीं बोला. मगर, जब महेश बाबु ने बहुत कुरैदा तो नरेश बाबु ने कहा, “क्या बताऊ महेश ! यह वही बाबु है, जिस ने मेरी अर्जी रिश्वत  के पैसे नहीं मिलने की वजह से खारिज कर दी थी और मेरे पिता बिना इलाज के मर गए थे.”

“क्या !’’ महेश चौंका.

“हां, ये वहीं व्यक्ति है.”

“तब तू क्या करेगा?” महेश ने धीरे धीरे से कहा, “जैसे को तैसा?”

“नहीं यार, मैं ऐसा नहीं हूं,” नरेश ने कहा, “मैंने इस व्यक्ति की अर्जी कब की मंजूर कर दी है और इलाज का चैक अस्पताल पहुंचा दिया है. यह बात इसे नहीं मालुम है.’’ कहते हुए नरेश खामोश हो गया.

महेश यह सुन कर कभी नरेश को देख रहा था कभी उस व्यक्ति को. जब कि वह व्यक्ति माथे पर हाथ रख कर वहीं ऑफिस में बैठा था. 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“मम्मी, आपके बचपन की फ़ोटो इतनी कम क्यों हैं?” रिया ने पुराना एल्बम पलटते हुए पूछा।

माँ मुस्कुराईं, “क्योंकि बेटा, तब हर पल को कैमरे में नहीं, दिल में कैद किया जाता था।”

“मतलब?”

“मतलब, जब गर्मियों में हम सब खुले आँगन में चारपाइयाँ बिछाकर सोते थे, तब किसी ने फ़ोटो नहीं ली। जब नानी अपने हाथों से आम काटकर खिलाती थीं, जब मोहल्ले के बच्चे गिल्ली-डंडा, कंचे और पिट्ठू खेलते थे, तब भी कोई रिकॉर्डिंग नहीं होती थी।”

“फिर याद कैसे है सब?”

“क्योंकि उन पलों में मोबाइल नहीं, अपने लोग साथ होते थे। ट्रेन के सफ़र में सुराही का पानी, घर से बने पराठे, छत पर पतंगबाज़ी, बरसात में कागज़ की नाव, दादी की कहानियाँ, त्योहारों की रौनक—इन सबकी तस्वीरें नहीं हैं, लेकिन यादें आज भी ताज़ा हैं।”

रिया ने अपना मोबाइल मेज़ पर रख दिया।

“मम्मी, आज शाम दादी से उनकी पुरानी कहानियाँ सुनेंगे?”

माँ की आँखें चमक उठीं।

“हाँ बेटा, कुछ यादें कैमरे से नहीं, अपनों के साथ बिताए समय से बनती हैं।” ❤️

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७० ☆ लघुकथा – अमोघ ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  – “अमोघ“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७० ☆

✍ लघुकथा – अमोघ ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

घर बन रहा था। इंजीनियर बार बार बुलाया करते कि घर का निर्माण कार्य देख लीजिए। मैं कहता कि आप इंजीनियर हैं, निर्माण कार्य की जिम्मेदारी आपकी है और तकनीकी रूप से मैं तो कुछ जानता नहीं। उनके बार बार अनुरोध करने पर गया। बनते हुए घर को देख रहा था। कमरे छोटे लग रहे थे। लिविंग रूम और किचन के बीच दीवार बनी खड़ी थी। दीवार गीली थी। मैंने उस पर हाथ रखा तो लगा कि वह बहुत कमजोर है। मैं धक रह गया क्योंकि इतनी कमजोर दीवार रहेगी तो घर मजबूत कैसे रहेगा। अंदर ही अंदर मुझे क्रोध आ रहा था।

मैंने बिल्डर से बात की और अपना क्रोध दबाते हुए कमजोर घर की चिंता जताई तो बिल्डर थोड़ा हँस पड़े। बोले कि दीवार बनते समय कमजोर रहती है पर सूखने पर मजबूत हो जाती है और उसके ऊपर प्लास्टर होने पर एकदम मजबूत हो जाती है। ऐसी ही दीवारों से बना घर अच्छा और मजबूत बनता है। बिल्डर की बात मैंने सुनी और ठीक है साहब कहकर वहां से चला आया। बिल्डर और इंजीनियर अनुभवी थे और मुझे निर्माण कार्य का कोई अनुभव नहीं। चिंता थी और क्षोभ भी।

घर बन गया और बिल्डर ने चाभी दे दी परन्तु मैं नये घर में जो नहीं रहा था। किराए पर रहता था परन्तु मकान मालिक अब खाली करने को कह रहे थे। उन्हें पता चल गया था कि मेरा घर बन गया है। परिणामस्वरूप मुझे अपने घर में जाना पड़ा। नया घर सबको अच्छा लग रहा था। अच्छा तो मुझे भी लग रहा था पर मन में वह बनने वाली दीवार कोंध जाती। आज घर में रहते हुए दस वर्ष हो गए। कभी एक बूँद पानी नहीं आया। इंजीनियर बिल्डर पर बसा झूठा अविश्वास मजबूत विश्वास में बदलता गया। और विश्वास मेरे लिए अमोघ विश्वास बनता गया।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रसेदार सब्ज़ी)

☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शाम के पाँच बज चुके थे। सरकारी दफ़्तर में हिसाब-किताब देखते-देखते रामप्रसाद बाबू की आँख लग गई थी।

नींद में वह मुस्कुरा रहे थे—”आज घर जाऊँगा तो रसेदार सब्ज़ी बनी होगी। सुबह दाल बनाने को भी कह दिया था। दाँत अब पहले जैसे नहीं रहे, पर रसेदार सब्ज़ी के साथ रोटी आराम से खा लेता हूँ।”

तभी चपरासी ने आवाज़ दी, “बाबूजी! पाँच बज गए। घर नहीं जाना क्या?”

वह चौंककर उठे, झोला उठाया और रास्ते में आलू-टमाटर खरीद लिए। एक दुकान पर नज़र पड़ी तो पत्नी के लिए एक छोटा-सा पर्स भी ले लिया। मन ही मन सोचने लगे, “बहुत खुश होगी।”

घर पहुँचे। ताला खोला। भीतर सन्नाटा था।

उन्होंने सब्ज़ियाँ मेज़ पर रखीं और नया पर्स निकालकर दीवार पर टँगी पत्नी की तस्वीर के सामने रख दिया।

काँपती आवाज़ में बोले, “देखो… तुम्हारे लिए पर्स लाया हूँ।”

फिर रसोई में जाकर डिब्बे से सूखी रोटियाँ निकालीं, पानी में भिगोकर खाने लगे।

आँखों से आँसू लगातार गिरते रहे।

पत्नी को गुज़रे तीन वर्ष हो चुके थे, पर प्रेम ने आज तक यह स्वीकार नहीं किया था कि वह अब लौटकर नहीं आएगी।

उधर उसी समय उनका बेटा और बहू एक महंगे भोजनालय में परिवार के साथ भोजन कर रहे थे। तस्वीर खिंची और सामाजिक माध्यम पर लिखा गया—

“माता-पिता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ी दौलत है।”

कुछ ही देर में सैकड़ों प्रशंसाएँ मिल गईं।

इधर रामप्रसाद बाबू की थाली में आज भी सूखी रोटी थी… और उधर बेटे की तस्वीर में संस्कार।

विडंबना यह नहीं कि पिता अकेला था, विडंबना यह थी कि उसका बेटा कभी अकेला दिखाई नहीं देता था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७० – बारिश ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बारिश”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७०  ☆

🌻 अति लघु कथा (अ ल क) 🌻 🌧️बारिश🌧️

आज बारिश की बूँदों ने श्रेया के मन में ही नही, तन को भी फफोले बना रही थी। तेज, तर्रार, तीखे नयन नक्श, चुल्हे के जैसी धधकी ज्वाला जिसे अनजाने में ही किसी ने सुलगती धुंआ- धुंआ कर डाला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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