हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“तुम्हें मेरी बात की कभी परवाह ही नहीं रही…” साक्षी की आँखें भर आईं।

अभिषेक ने थके स्वर में कहा, “ऑफिस की परेशानियाँ थीं… इसलिए चुप था।”

कुछ दिनों बाद साक्षी पूरे दिन खामोश रही।

अभिषेक झल्लाया, “हर बात पर चुप्पी क्यों? रिश्ते ऐसे नहीं चलते!”

साक्षी ने उसकी ओर देखा और धीमे से बोली—

“जब तुम चुप रहते हो, उसे तनाव कहते हो…जब मैं चुप रहती हूँ, उसे अहंकार क्यों कहते हो?”

अभिषेक के पास कोई उत्तर नहीं था।

साक्षी की आवाज़ काँप गई-

“तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारी झुंझलाहट और तुम्हारा दर्द मैं पढ़ लेती हूँ। मेरी आँखें भीग जाएँ, तो तुम मेरा व्यवहार पढ़ते हो… मेरा दर्द नहीं।”

कमरे में सन्नाटा था।

अभिषेक ने उसका हाथ थाम लिया।

“मुझे माफ़ कर दो,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी गलतियाँ देखता रहा, तुम्हारी थकान नहीं।”

साक्षी मुस्कराई, “पति-पत्नी तब एक नहीं होते जब दोनों सही हों… बल्कि तब होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की गलतियों को भी एक ही दिल और एक ही तराजू से तौलें।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२४ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालय में देशभक्ति पर भाषण प्रतियोगिता होने वाली थी। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा, “बच्चो, बताओ, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में तुम क्या जानते हो?”

एक बच्चा सहजता से बोला, “मैडम, आप चिंता मत कीजिए। हम गूगल से भाषण खोजकर याद कर लेंगे। इस बार प्रतियोगिता हम ही जीतेंगे।”

शिक्षिका ने गंभीर होकर पूछा, “बेटा, बात केवल प्रतियोगिता जीतने की नहीं है। क्या तुम जानते हो कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई ने देश के लिए क्या किया था?”

बच्चा बोला, “मैडम, इंटरनेट पर सब मिल जाएगा।”

शिक्षिका ने कहा, “इंटरनेट जानकारी दे सकता है, उनके त्याग का एहसास नहीं। राष्ट्रभक्ति केवल भाषण देने का नाम नहीं, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है।”

बच्चा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मैडम, जब आज भी शिक्षा व्यवस्था में इतनी समस्याएँ हैं, परीक्षाओं में धांधली होती है और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तब हम राष्ट्रभक्ति की बातें क्यों करें?”

शिक्षिका ने कहा, “इसीलिए तो पढ़ो बेटा! राष्ट्रभक्ति केवल ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं है। ईमानदारी से पढ़ना, नकल न करना, गलत के विरुद्ध आवाज उठाना और अपने कर्तव्य को निष्ठा से निभाना भी राष्ट्रभक्ति है।”

बच्चा मुस्कुराया, “तो मैडम, इस बार मैं गूगल से भाषण याद नहीं करूँगा। पहले अपने देश को समझूँगा, फिर देश के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।”

शिक्षिका की आँखों में संतोष उतर आया।

तभी बच्चा फिर बोला, “लेकिन मैडम, एक बात पूछूँ? अगर मैं सच बोलूँगा, नकल नहीं करूँगा और गलत के खिलाफ आवाज उठाऊँगा… तो क्या अगली बार भी मुझे भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए गूगल से ही कोई ‘सफलता का मंत्र’ ढूँढ़ना पड़ेगा?”

शिक्षिका निरुत्तर थीं।

कक्षा में सन्नाटा छा गया।

बाहर विद्यालय की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ अच्छा लिखा था।

बच्चे ने उस वाक्य को देखा और धीमे से मुस्कुराया।

शायद उस दिन पहली बार उसने ‘सत्यमेव जयते’ पढ़ा नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े होकर देशभक्ति का असली आईना देख लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ – श्याम पट ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा श्याम पट”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ ☆

🌻लघु कथा🌻 श्याम पट 🌻

गिरधारी लाल आज कमरे की दिवाल पर काले रंग का श्याम पट बनवा रहें हैं। दौड़ता हुआ पारस—- पास आकर

दादा जी ये क्या बना रहे?

(ब्लैक ब्लैक)

आज के बच्चे रंगों को रेड ब्लू, ग्रीन, यलो—से ही पहचानते हैं

धूमिल हो गई सिंदूरी रंग, भोर की लालिमा, गोधूली की बेला—

दादा जी ने बाल सुलभ चंचलता को आंकते कहा–यहाँ तुम लिखाई करोगे और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनोगे। पारस गले में झूल गया मुझे तो आपके जैसा बनना है पापा तो दिनभर मोबाइल चलाते है क्या आपने उन्हें ये बोर्ड नही बनवाया था।

दादा ने कनकी लगा देखते फुसफुसा कर कहने लगे – – मोबाइल रिश्तों को काला करने लगा श्याम पट में आज भी वो ताकत है, जो परिवार जोड़ रखेगा।

देखते है श्याम पट पर पारस की छूअन कंचन बन कर कैसे निखरेगी। दादा श्याम पट को ध्यान से देखने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ईडन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा –  ईडन ? ?

…..उस रास्ते मत जाना, आदम को निर्देश मिला। आदम उस रास्ते गया। एक नया रास्ता खुला।

….पानी में खुद को कभी मत निहारना। हव्वा ने निहारा। खुद के होने का अहसास जगा।

 ….खूँख़ार जानवरों का इलाका है। वहाँ कभी मत घुसना।….आदम इलाके में घुसा, जानवरों से उलझा। उसे अपना बाहुबल समझ में आया।

…..आग से हमेशा दूर रहना, हव्वा को बताया गया। हव्वा ने आग को छूकर देखा। तपिश का अहसास हाथ और मन पर उभर आया।

….उस पेड़ का फल मत खाना। आदम और हव्वा ने फल खाया। ईडन धरती पर उतर आया।

 

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 8.09, 29.7.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११४ – वरदानी कलंक… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वरदानी कलंक…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११४  — वरदानी कलंक — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

इतिहास साक्षी है राजा एवं ऋषि भगवान की तपस्या करने पर अमरता का वरदान प्राप्त करते थे। पर वरदानी राजा अथवा ऋषि तो नीच अधम निकलते थे। वे भगवान को भस्म करते और स्वयं भगवान हो जाते। इतिहास और भी साक्षी है वैसे तपस्वियों को अमरता का वरदान मिलने पर भी वे मृत्यु की न टूटने वाली नींद में समाये। तभी तो युग बीते, लेकिन आज तक वरदानी अमरता का कोई प्राणी दृष्टिगत होता नहीं है। एक ऋषि हुआ उसने तपस्या से भगवानी वरदान पाया और उलटे भगवान पर टूट पड़ा। पर वह विस्मयकारी ऋषि हुआ। वह भगवान को भस्म नहीं करता। वह भगवान को अपनी परिभाषा से ललकारता। उसने शेर के जबड़ों में हाथ डाल कर भगवान से कहा मेरी अमरता दागदार न हो। पर उसकी अमरता दागदार हुई। शेर ने उसे निगल लिया। भगवान को अच्छा लगा, इस वरदानी झट्टू को भी मरना तो था ही।

 

 © श्री रामदेव धुरंधर

२६ — ०७ — २०२६

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा – स्टिकर ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

आज प्रस्तुत है लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा दर्शाती सुप्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक सर्वश्रेठ लघुकथा –  स्टिकर।  हम आपके साथ भविष्य में भी श्री कमलेश भारतीय जी की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ आपसे साझा करते रहेंगे। कृपया आत्मसात करें।

☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा : स्टिकर  

एक पार्टी के लोग मुझसे चंदा मांगने आए । उनके भले चेहरों को देखकर मैं इंकार न कर सका । चलते चलते वे अपनी पार्टी का स्टिकर भी ड्राइंगरूम में लगा गये । मैं विचारों से सहमत न होते हुए भी लोकलज्जावश चुप रह गया ।

अब जो भी आता, पहले मुझको, फिर स्टिकर को घूरने लगता । घुमा फिरा कर पूछ ही लेता कि क्या मैं फलां पार्टी का सदस्य हूं । मैं इंकार में सिर हिला देता । अगला सवाल फिर होता, यदि सदस्य नहीं तो क्या इस पार्टी के हमदर्द हो ? मैं मासूम सा इंकार फिर कर देता । फिर तो जैसे तोप का मुंह मेरी ओर हो जाता ।

मोटी सी बात कही जाती- जब सदस्य नहीं, हमदर्द नहीं, तो फिर चंदा किसलिए ?

अब मेरा माथा ठनका । यह मामूली सा स्टिकर मेरी जान का जंजाल बन गया । बात ठीक भी लगने लगी । यदि किसी पार्टी का स्टिकर मेरे ड्राइंगरूम में लगेगा तो मेरे ही विचारों का प्रतिरूप माना जायेगा । मैं मामूली से स्टिकर को अपना मुखौटा क्यों बनने दूं ? किसी की विचारधारा को मैं क्यों ढोता फिरूं ?

एक फैसले के तहत मैने चाकू लेकर स्टिकर को काट दिया और मुक्ति की सांस ली

 

©  कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघु कथा – आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघु कथा ☆ आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“मौसी, उँगली में फिर सुई चुभ गई?” राधा ने हँसते हुए पूछा।

अंजू ने उँगली से खून की बूँद पोंछी और मुस्करा दी, “अरे… इसकी आदत है।”

“इतने सालों से सिलाई कर रही हो, अब भी चुभ जाती है?”

“सुई से ज़्यादा ज़िंदगी चुभती है, बिटिया।”

राधा चुप हो गई।

कुछ देर बाद उसने कमरे में टँगे दर्जनों नए सूट देखे और फिर अंजू की फीकी, कई जगह से रफू की हुई साड़ी पर नज़र टिक गई।

“मौसी… अपने लिए कब सिलोगी?”

अंजू ने मशीन का पहिया फिर घुमा दिया।

“पहले यह ऑर्डर पूरा कर लूँ…”

खट… खट… खट…

कमरे में फिर वही आवाज़ गूँजने लगी।

राधा दरवाज़े पर खड़ी रही।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौसी कपड़े सिल रही थीं…

या अपनी पूरी ज़िंदगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११३ – शहरी जंगल राज… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– शहरी जंगल राज…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११३  — शहरी जंगल राज — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(शब्द सीमा : 150)

ऐसे लोग संख्या में अपरिमित होते हैं जो मात्र अपनी जाति की बढ़ोत्तरी चाहते हैं। पर सवाल यह भी है क्या ये लोग अपने उद्देश्य में सफल हो पाते हैं? ये रौंद कर जाएँ, लेकिन वापसी के क्षण में देखें अपना रौंदा हुआ तो यथावत अपनी काया में वापसी कर चुका है। रौंदे जाने की इसी रौ के बीच से मैं एक भावभीनी छोटी सी कहानी लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। गाँव के चौराहे पर तंबू लगा कर बैठे हुए लोगों ने बालक का जाति परिवर्तन किया और उसे रोटी थमा दी। उसने रोटी लिये घर आने पर अपनी अपाहिज माँ के साथ बाँट कर खाया। अगली सुबह वह रोटी की चाह में वहाँ पहुँचा तो वे लोग न हो कर एक कुत्ता बैठा हुआ था। वह तो इस कुत्ते से बातें करता था। कुत्ते ने ही उसे बताया वे लोग कहीं और तंबू लगाने चले गये। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – डर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – डर ? ?

पिता की खाँसी की आवाज़ सुनकर उसने रेडियो की आवाज़ बेहद धीमी कर दी। उन दिनों संयुक्त परिवार थे, पुरुष खाँस कर ही भीतर आते ताकि महिलाओं को सूचना मिल जाए।

…”संतोष की मॉं, ये तुम्हारे लल्ला को बताय देना कि वो आज के बाद उस रघुवंस के आवारा छोकरे के साथ दीख गया तो टाँग तोड़कर घर बिठाय देंगे, कौनो पढ़ाई-वढ़ाई नाय, सब बंद कर देंगे”…. वह मन मसोस कर रह गया।

रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा कि 17 बरस का तो हो लिया, अब और कितना बड़ा होना पड़ेगा कि पिता से डरना न पड़े।.. शायद बेटे का जन्म बाप से डरने के लिए ही होता है…वह मन ही मन बड़बड़ाया और औंधे होकर सो गया।

आज उसका अपना बेटा 17 बरस का हो चुका। बेहद जिद्‌दी! कल-से उसने घर में कोहराम मचा रखा था। उसे अपने जन्मदिन पर मोटरसाइकिल चाहिए थी और अभी तो उसकी आयु लाइसेंस लेने की भी नहीं हुई थी। ऊपर से शहर का ये विकराल ट्रैैफिक, उसने सोच लिया था कि अबकी बार बेटे की ये जिद्‌द पूरी नहीं करेगा।

…”मॉम, डैड को साफ-साफ बता देना, नेक्स्ट वीक मेरे बर्थडे से एक दिन पहले तक बाइक नहीं आई न, तो मैं घर छोड़कर चला जाऊँगा.. और हाँ, कभी वापस नहीं आऊँँगा।”… उसने बेटे की माँ के हाथ में बाइक के लिए चेक दे दिया।

रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा-…शायद बाप का जन्म बेटे से डरने के लिए ही होता है.., और वह सीधा होकर पीठ के बल सो गया।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६१ – लघुकथा – नेक इन्सान ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ नेक इन्सान ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था, लेकिन आज ग्राहक नदारत थे। सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा। बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले। पॉकेट में पैसा कहां से होता, उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।

अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे, … एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा।

बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी। इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे। उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे। उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..

अबे, बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है..

कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।

तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना, .. हता है कि नही। चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया।

नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी। उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी।

जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता, तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी। वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था।

आइये बाबूजी, आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा . अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों? यह लड़का किसका है?… शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि “चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी।”

 मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा। थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है। सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए। तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है।

उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..

बाबूजी, महेश अब इस दुनिया में नहीं है। उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।

महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में। अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो।

अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से, नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ। मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

 दिनांक 23 जुलाई 2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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