श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है।आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी  आलेख  “संरक्षकता”)

☆ आलेख #83 – संरक्षकता”☆ 

आज 29 सितंबर है और आज से ठीक तीन दिन बाद सारा विश्व महात्मा गांधी की जन्म जयंती ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाएगा।  मैं विगत अनेक वर्षों से, इन सात दिनों तक गांधी चर्चा करने और इस विश्व-मानव के सदविचारों, जो पीड़ित मानवता को राहत पहुंचाने के लिए किसी मलहम से कम नहीं है, पर लिखता रहा हूँ। इस बार मैंने सोचा कि  महात्माजी के संरक्षकता या trusteeship के सिद्धांत पर आपसे चर्चा करूँ।  मेरी यह कोशिश होगी कि  पहले छह-सात दिन तक गांधीजी के विचार, इस सिद्धांत को लेकर, पढ़ें और फिर उसका विश्लेषण आधुनिक समय के अनुसार करते हुए, उसकी वर्तमान में उपादेयता का आंकलन करें।  

– अरुण कुमार डनायक

संरक्षकता (Trustee-ship) का सिद्धांत (2)

आप कह सकते हैं की ट्रस्टीशिप तो कानून शास्त्र  की एक कल्पना मात्र है; व्यवहार में उसका कहीं कोई अस्तित्व दिखाई नहीं पड़ता।  लेकिन यदि लोग उस पर सतत विचार करें और उसे आचरण में उतारने की कोशिश भी करते रहें, तो मनुष्य-जाति के जीवन की नियामक शक्ति के रूप प्रेम आज जितना प्रभावशाली दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक दिखाई पड़ेगा। बेशक, पूर्ण ट्रस्टीशिप तो यूक्लिड की बिन्दु की व्याख्या की तरह कल्पना ही है और उतनी ही अप्राप्य भी है। लेकिन यदि उसके लिए कोशिश की जाए, तो दुनिया में समानता की स्थापना की दिशा में हम किसी दूसरे उपाय से जितनी दूर तक जा सकते हैं, उसके बजाय इस उपाय से ज्यादा दूर तक जा सकेंगे। ….. मेरा दृढ़ निश्चय है कि यदि राज्य ने पूंजीवाद को हिंसा के द्वारा दबाने की, तो वह खुद ही हिंसा के जाल में फंस जाएगा और फिर कभी भी अहिंसा का विकास नहीं कर सकेगा। राज्य हिंसा का एक केंद्रित और संघटित रूप ही है। व्यक्ति में आत्मा होती है, परंतु चूंकि राज्य एक जड़ यंत्रमात्र है इसलिए उसे हिंसा से कभी नहीं छुड़ाया जा सकता। क्योंकि हिंसा से ही तो उसका जन्म होता है। इसीलिए मैं ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को तरजीह देता हूं।  यह डर हमेशा बना रहता है कि कहीं राज्य उन लोगों के खिलाफ, जो उससे मतभेद रखते हैं, बहुत ज्यादा हिंसा का उपयोग न करे।  लोग यदि स्वेच्छा से ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें, तो मुझे  सचमुच बड़ी खुशी होगी। लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा ख्याल है कि  हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का आश्रय  लेकर उनसे उनकी संपत्ति ले लेनी पड़ेगी। …. (यही कारण है की मैंने गोलमेज परिषद में यह कहा था की सभी निहित हित वालों की संपत्ति की जांच होनी चाहिए और जहां आवश्यक हो वहां उनकी संपत्ति राज्य को मुआवजा देकर या मुआवजा दिए बिना ही, जहां जैसा उचित हो, अपने हाथ में कर लेनी चाहिए।  ) व्यक्तिगत तौर पर तो मैं यह चाहूंगा  कि राज्य के हाथों में शक्ति का ज्यादा केन्द्रीकरण न हो, उसके बजाय ट्रस्टीशिप की भावना का विस्तार हो। क्योंकि मेरी राय में राज्य की हिंसा की तुलना में वैयक्तिक मालिकी की हिंसा कम खतरनाक है। लेकिन यदि राज्य की मालिकी अनिवार्य ही हो,  तो मैं भरसक कम से कम राज्य की मालिकी की सिफारिश करूंगा।  

 दी  माडर्न रिव्यू 1935

( यह लेख मैंने गांधीजी के विचारों के संग्रह पुस्तक ‘मेरे सपनों का भारत’ से लिया है और कतिपय जगह ऐसा लगा कि उनके विचारों में काट छांट की गई है।  गांधीजी का इस संबंध में लिखा मूल आलेख खोजने का प्रयास कर रहा हूं )

संरक्षकता (Trustee-ship) का सिद्धांत (3)

आजकल यह कहना एक फैशन हो गया है कि  समाज को अहिंसा के आधार पर न तो संघटित किया जा सकता है और न चलाया जा सकता है। मैं इस कथन का विरोध करता हूं। परिवार  में जब पिता अपने पुत्र को अपराध करने पर थप्पड़ मार देता है, तो पुत्र उसका बदला लेने की बात नहीं सोचता।  वह अपने पिता की आज्ञा इसलिए स्वीकार कर लेता है कि इस थप्पड़ के पीछे वह अपने पिता के प्यार को आहत हुआ देखता है, इसलिए नहीं कि थप्पड़ उसे वैसा अपराध दुबारा करने से रोकता है।  मेरी  राय में समाज की व्यवस्था इस तरह होनी चाहिए; यह उसका छोटा रूप है।  जो बात परिवार के लिए सही है, वही समाज के लिए सही है, क्योंकि समाज एक बड़ा परिवार ही है।   

हरिजन, 01.12.1938 

मेरी धारणा है कि अहिंसा केवल वैयक्तिक गुण नहीं है।  वह एक सामाजिक गुण भी है और अन्य गुणों की तरह उसका भी विकास किया जाना चाहिए।  यह तो मानना ही होगा कि समाज के पारस्परिक व्यवहारों का नियमन बहुत हद तक अहिंसा के द्वारा होता है।  मैं इतना ही चाहता हूं कि इस सिद्धांत का बड़े पैमाने पर, राष्ट्रीय और आंतरराष्ट्रीय पैमाने पर विस्तार किया जाए। 

हरिजन, 07.01.1939

(गांधीजी के अहिंसा संबंधी विचारों को ‘मेरे सपनों का भारत’ के एक अध्याय ‘संरक्षकता का सिद्धांत’ में स्थान दिया गया है। आगे जब हम संरक्षकता पर उनके विचार पढ़ेंगे तो यह भी समझने का प्रयास करेंगे कि अहिंसा केवल सत्याग्रह और दमन का प्रतिकार करने का साधन मात्र नहीं है।  यह एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसे महात्मा गांधी ने धन कमाने की असीमित लिप्सा को शांत करने का उपाय बताया था)

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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