श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  रिश्ता)

☆ लघुकथा – रिश्ता ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

एक परिवार के मुखिया का नाम गुरदित्त सिंह था, दूसरे परिवार के मुखिया का नाम हरदित्त सिंह था। दोनों परिवारों के मुखिया एक ही दादा की संतान थे। दोनों परिवारों में अनबन हुई, अनबन मनमुटाव में बदली और मनमुटाव एक तरह की दुश्मनी में। इस दुश्मनी में एक-दूसरे के ख़ून की प्यास नहीं थी, बहिष्कार था। दोनों परिवारों के बीच अब कोई रिश्ता नहीं रहा था। गुरदित्त सिंह अपने परिवार के साथ ‘अ’ ज़िले के अपने पैतृक गाँव अलीपुर में रह रहा था, जबकि हरदित्त सिंह अपने परिवार के साथ ‘ब’ ज़िले के एक गाँव दरियापुर में जा बसा था। हरदित्त सिंह के पोते संदीप सिंह का चयन बतौर गणित अध्यापक हो गया और उसकी पहली नियुक्ति अलीपुर के निकटवर्ती गाँव शेखूपुर के स्कूल में हुई। अब संदीप सिंह ‘अ’ ज़िले के शेखूपुर के निकटवर्ती एक क़स्बे में रह रहा था। यहाँ से उस समेत चार अध्यापक एक कार में एक साथ शेखूपुर जाते थे। शेखूपुर वाली सड़क अलीपुर के खेतों से होकर गुज़रती थी। सड़क के साथ लगते अपने खेत में गुरदित्त सिंह अक्सर काम करते दिखाई देता। संदीप सिंह वहाँ गाड़ी रुकवाता और झुककर रिश्ते के दादा के पाँव छुते हुए ‘पैरी पोना’ कहता। दादा भी उसे आशीर्वाद दे देता।

एक दिन जब उसने हमेशा की तरह पाँव छूकर ‘पैरी पोना’ किया तो गुरदित्त सिंह ने कहा, “सुन भई संदीपे, इस महीने की चौबीस तारीख़ को मेरे पोते सुरजीत सिंह का ब्याह है। न तो मैं तेरे घर कोई कार्ड भेजूँगा, न तेरे परिवार को बुलाऊँगा, पर तू शादी में आ जाणा।” यह बात उसने इतने सहज और सरल तरीक़े से कही कि संदीप के साथी अध्यापक हैरान रह गए। रास्ते में एक साथी अध्यापक ने छेड़ा, “यह कैसा रिश्ता है संदीप कि मैं बुलाऊँगा नहीं, पर तू आ जाणा?”

दूसरे अध्यापक ने कहा, “यह इसके पैरी पोना का इनाम है।”

“वैसे बात अगले ने मुँह पर दे मारी। कमाल है, कोई ऐसे भी कर सकता है कि ख़ुद जिसको शादी में बुला रहा है, उसी के सामने उसके परिवार का अपमान कर रहा है।” तीसरे ने कहा।

“आज मौक़ा है, बनाओ मज़ाक मेरा, पर एक बात कहूँ, ज़माना बेशक बहुत बदल गया है, लेकिन मेरे यह दादा अब भी पुराने ज़माने के खरे किसान ही हैं। बातें गढ़ना नहीं सीखा। इसलिए न उनकी दुश्मनी में कोई खोट है और न प्यार में।”

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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