श्री परम शिवम

(श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी संस्मरणात्मक कथा – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है!.)

 

कथा कहानी – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम

(‘सतरंगी दस्तरख्वान’ (संपादन- सुमना रॉय, कुणाल रे अनुवाद- वंदना राग, गीत चतुर्वेदी) में खाने की कहानियाँ हैं, अन्न की कहानियाँ- फार्मचे पाव, साउरडॉ, रसम, सारस्वत तमड़ी, भाकरी, पचडी-हुग्गी, किकोड़े, बैंगुनभाजा….. भोजन के विविध रूपों, व्यंजनों, पाक-कला की कहानियाँ, पर दुनिया का ऐसा कौन सा स्वाद जो मेरी ‘भूख’ की कहानी के बिना पूरा हो जाए-  श्री परम शिवम् )

बेसिक ट्रेनिंग संपन्न हो गयी थी और चालीस किलोमीटर की रेस सफलतापूर्वक करने के बाद कमांडो-ट्रेनिंग की भी इति हो आयी थी. अब प्रयाण था- बटालियन की पहली तैनाती पे सुदूर उत्तर पूर्व में मणिपुर जाना था, यही जीवन मे ‘दूर’ का आरम्भ था इसके बाद जीवन में अनगिन ‘दूर’ आए, करीबी शायद एकाध !

अकादमी से निकलते बरास्ता तीन दिन की छुट्टी ली गयी थी उसके बाद कमज़ोर मन ने पाँच दिन एक्स्ट्रा भी निकाल लिए थे, फिर भी तैयार ना था. अप्रेल-मई की गर्मियों की साँय-साँय करती दोपहर में ‘घर’ सोचते तो घर का कोना-कोना रस्सी होकर पाँव से लिपटने लगता, पाँव खुद-ब-ख़ुद स्तम्भित हो जाते, अडिग…अचल…अहिल.

यात्रा लम्बी थी-पहले जबलपुर से गुवाहाटी फिर आगे दीमापुर और फिर उसके बाद कॉन्वॉय से इम्फाल, लगे कित्ता दूर है, मन नहीं सोचता था पाँव ही सोचने लग पड़े थे और सोच-सोच जमते जाते थे, सून-सपाटा ऐसा कि कोई बोलने वाला भी न था-

सूखी रोटी तोड़ लें, कोई कहीं न जाए

आ पिया घर रहें मैं कमाउँ तू खाए

मन को मारा गया, कोनों की रस्सियों को खोला गया, पाँव उठाए गए और घर को छोड़ा गया, अजानी दिशाओं का प्रयाण और विलम्बित नहीं किया जा सकता था पर रत्ती भर भी मन नही, जबलपुर में हिले-डुले का धर्म भूलने वाले पाँव दादर-गुवाहाटी के स्लीपर कोच में चढ़े हैं, रात के दो बजे. जबलपुर से टिकट कन्फर्म नही हुई थी, टी टी ने मरी सी आश्वस्ति कर रखी थी-देखते हैं !

सिहोरा, स्लीमनाबाद, कटनी, मैहर, सतना… सब निकल रहे खड़े-खड़े, आस-पास ‘खड़ों’ की भीड़ है, सब खड़े-खड़े ही जा रहे, किसी के पास आश्वस्ति है, बाकियों के पास वो भी नहीं. सामान- एक सूटकेस, एक ट्रंक, एक बैग और एक होल्डाल-बेडिंग भी इधर-उधर हो रखी, मन के क्षेत्रफल मे किसी अन्य बात का अवसर ही न हो रहा, बस टुकुर-टुकुर टी टी को ताके जाएं, वो भी दृष्टि बचाते दूसरे कोच निकल गए. बाहर पौ फट रही, उषा की चमकीली रेख उभर रही किन्तु बर्थ-रहित अंतस में प्रत्यूषा का कोई आकर्षण नहीं, आंतरिकता निश्चिंत हो तो कोई सौंदर्य जगे इस अनिश्चय में क्या तो तुम्हें निरखें जगती ! मन, चेतना, ह्रदय, मस्तिष्क सब का केंद्र एक- बर्थ मिले तो प्रकृतिस्थ हों,तब बताते तुम्हें ओ दृश्यावलियों !

घर से निकले आठ घण्टे हो चुके, अंधकार का चँदोवा तो सतना में ही उठ गया था अब सूरज पूरा का पूरा चढ़ आया है, दिन का चमकीला थान खुल-बिछ गया. गाड़ी मुगलसराय पहुँची है, टी टी ने बर्थ भी कन्फर्म कर दी – साइड अपर ! सामान व्यवस्थित कर लिया गया है, बर्थ मिलते ही खंड-खंड व्यवस्थित हो आया है, अणु-परमाणु अपने घेरे में घूमने लगे हैं- आत्मस्थ, प्रकृतिस्थ, चेतनस्थ सब हो आया. सारी अनाश्वस्तियाँ पलक झपकते लुप्त हुई हैं, नासिका में वास आने लगी, कानों को सुनाई दे रहा, दृष्टि को दिखाई देने लगा-सामने जूस सेंटर है, कोई तृष्णा नहीं, बस नई-नई आश्वस्ति को सेलिब्रेट करना है, उतरता हूँ.

सद्य हासिल अचिंता को एन्जॉय करते एप्पल-जूस पिया गया है, हर घूँट में बर्थ प्राप्ति की स्वास्ति उतरी है, मन्यस्कता स्थिर हो रही, भुगतान के लिए पैसे बाहर निकाले फिर वापिस रखे है, कोई दो हज़ार रु कत्थई, ढीली जीन्स की पिछली पॉकेट में और आकर आश्वस्ति की पुष्टि के लिए बर्थ पर लेटता हूँ, जाने किस कौंध में पीछे पॉकेट पे हाथ मारता हूँ-‘अरे दूसरे पॉकेट में होंगे’ हाथ तत्क्षण दूसरे पॉकेट पर जाता है, हड़बड़ाहट सी हो जाती है, एक धड़के में वाशरूम की तरफ भागता हूँ, क्या उतार दूँ, क्या निकाल फेंकू कि दो हज़ार वापिस मिल जाएं, कहीं से झटक आएं, माँ ने बोला भी था सारे पैसे एक जगह मत रखना पर मलंग को किसका सुनना ठहरा, नहीं सुनी अब भुगतो ! वाशरूम की सीमित जगह में क्या-क्या न झटका गया, बस ट्रेन को झटकना रह गया था, दो हज़ार रुपए जा चुके थे, जेब कट गई थी. मन कैसा-कैसा हो आया था और कैसी तो नाउम्मीदी उतर आई थी ट्रेन के उस गंधाते प्रसाधन में. इधर-उधर खंगालने में सिर्फ छह रुपए और गुवाहाटी तक का टिकट ही निकल पाया. निढाल और विरक्त कदमों से बर्थ तक पहुँचता हूँ, ट्रेन कहाँ जा रही, क्यों जा रही, क्या जा रही, कोई लेना-देना नही, बोध-दर्पण हठात ही चटक-तिड़क उठा है, जगत बहा जा रहा पर कोई बिम्ब, कोई छवि नही उभर रही और तो और माँ के गर्भ से साथ हो लिया ‘आत्मालाप’ भी गूँगा पड़ गया है, सन्न पड़ा है, एक सपाटता सी पसर गयी है हर ओर हर छोर !

पिछली रात खाना खाया था, मुगलसराय में जूस पिया अब पेट पकड़ के साइड अपर पे लेटा हूँ, आँतों में हलचल है, भूख लग रही…

दोपहर भूखे पेट ही निकाल दी, पानी की बोतल साथ है, वही पी लेते हैं. मन रो रहा, घर वापिस लौट जाएं ! माँ ने सूजी के लड्डू साथ दिए थे, एकाध जैसे-तैसे गटका गया है, गला सूख रहा. कैसी तो बेकसी पसर रही अस्ति के सारे संभव में, जीवन का प्रवाह, आत्मा का प्रवाह, देह का प्रवाह, सारे प्रवाह रुद्ध हो आए हैं. बक्सर-दानापुर के आस-पास का इलाका है कुछ विद्यार्थी कोच में चढ़ें हैं, भीड़ बढ़ गयी है, मैने मुद्रा बदल ली है और उठ बैठा हूँ, एक छात्र बची जगह में ऊपर चढ़ आया है, साथ बैठ गया है. मन होता है उससे कुछ अनुरोध करूँ, आँतें बात-बात में ख़ुद को उमेठने सी लगती हैं. बातों का सिलसिला शुरू करता हूँ, अपना दुखड़ा रोता हूँ, बताता हूँ कि जेब कट गयी है अब पास कुछ नहीं किन्तु इसके आगे स्पष्ट रूप से माँग नहीं पाता, माँगने की सामर्थ्य नहीं, दीनता नहीं जुटा पा रहा, भूख के आगे अभी समर्पण नहीं, किसी के आगे समर्पण नहीं !

छात्र से कोई खाद्य न जुटता वो बस इतना ही बोलता है -“अरे ! मुगलसराय बहुत खराब है वहाँ तो यही होता है”

चौबीस घण्टे बीत गए कुछ खाए हुए, अन्न को देखे उसकी गंध लिए हुए…अन्न, अनाज, गंदुम, दालें, बासमती कितने नाम-रूप सब भीतर बन-बिगड़ रहे. रात के तिमिर को चीरती ट्रेन भागी जा रही.

गर्मियों के दिन, कोच में भी गर्मी पसरी है  पर प्यास नहीं लग रही, भूख लग रही है,

नींद नहीं आ रही, भूख लग रही है,

आँख नहीं लग रही, भूख लग रही है,

घर की याद आ रही, भूख लग रही है,

लौट जाऊँ, लौट जाऊँ भूख लग रही है.

आस-पास सबने खाना खाया है, किसी ने शिष्टतावश भी नहीं पूछा, भूख लग रही है.

कैसी कातरता है ! घर से लेकर चले ग्लूकोज़ पैकेट से बीच-बीच में ग्लूकोज़ मिला पानी पीता हूँ तो घड़ी दो घड़ी राहत होती है जैसे आँतें सो गई हों किन्तु थोड़ी देर में ही फिर मरोड़ उठने लगते हैं जैसे कोई शक्तिशाली पँजों से गीले कपड़ों के समान आँतों को मरोड़ रहा हो, यही क्रम हो रखा. थोड़ा ग्लुकोज-पानी पीता हूँ आँतें भ्रमित हुई हैं, आँख लग जाती है, करवट नहीं लेटता, पीठ के बल भी नहीं, पेट के बल लेटता हूँ आँतों पर दबाव डाल उनके उमेठ, उनके दर्द को काबू करता.

एक बस व्यवधान हो रखा शेष सब क्रम से हो रहा- दूसरी सुबह भी समय पर खुल रही, भगवान भुवन भास्कर, अनंत रश्मियों के चमकीले रथ पर सवार धरा तक आए तो, किंतु निपट खाली हाथ – ऐसे सूरज का मैं क्या करूँ, अन्नहीन…. खाद्यहीन….नाश्ता हीन ! तुम्हारा प्रकाश लेकर क्या करूँ अंशुमाली ! गेहूँ चाहिए चावल चाहिए मुझे ! क्षुधा की अरश्मियों ने तिमिर फैला रखा है उदर में, एक दाने का प्रकाश ही इस तिमिराच्छन्न को भेद पाएगा, इस जठराग्नि का शमन कर पाएगा जिसमें तिल-तिल मै स्वाहा हो रहा.

खाने को कुछ नहीं तो क्या ब्रश का स्वांग किया जाए. जिनके पास अन्न है, अन्न की सामर्थ्य है, ब्रश कर रहे, मुँह धो रहे, हँस-हँस कर अन्न की बातें कर रहे. मैं एक निरान्न आँतों को भरमाए रखने की जुगत में लगा हूँ- बोतल में पानी भर लिया जाए, ग्लूकोज़ मिलाकर घूँट-घूँट उतारते रहेंगे, बरगलाएँगे उन आँतों को जिनमें सहस्त्रों कांटे से उग आए हैं, जिनकी नोक हरपल आँतों की भीतरी दीवार को छेद रही. ट्रेन किसी छोटे निर्जन स्टेशन पर खड़ी है, नल से पानी भर लिया जाए !

आह ! अब यही बचा था, विपदा ! ऐसी परीक्षा करोगी भूख-आपदा में फँसे और होम-सिकनेस से जूझते मन की बोतल का ढक्कन गिरकर ट्रेन के नीचे पटरियों में चला गया है.

हे मालिक ! यही बोतल तो जीवन-रेखा हो रखी, इसके बिना तो आँतों को भ्रमित करना भी मुश्किल हो जाएगा.

जान की परवाह नहीं करता, भूख की परवाह करता हूँ, उतरता हूँ, ट्रेन के नीचे जाता हूँ, कोई भय नही, ट्रेन चल पड़ने की कोई आशंका नहीं, बस आँतों को शांत रखने का ध्येय ही आत्मा पर फहरा रहा, आत्मा भी रिक्त, क्षीण और कृश हो चली, अन्नहीन देहता में आत्मा का वो स्वरूप नहीं होता जो खाते-पीते इतराते बदनों में होता है.

तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है

बाग के बाग़ को बीमार बना देती है

भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालों

पेट की भूख इन्सान को ग़द्दार बना देती है

‘नीरज’ याद आते हैं और तिरोहित भी हो जाते हैं

नीचे वाली बर्थ पर सफेद कुर्ते पाजामे में तुंदियल से सज्जन जमे हैं. आते-जाते हर फेरीवाले से कुछ न कुछ लेकर खाने और लगातार चना-मूँगफली से अपना मुँह चलाते रहने के कारण सिंधी लगते हैं, मन में आता इनसे याचना करता हूँ , टूटने लगा हूँ, अब टूटने लगा है सब-कुछ, घर वाले कहते रहे हैं घुन्ना है,संकोची है, जिसे अब तक किसी संपदा सा सम्हाला वो संकोच भी टूटा जा रहा, माँग लेता हूँ, भयँकर भूख लग रही, माँग की अनुनय भीतरों में भाषा हो आयी है, बस ध्वनि होने को है, लेकिन जो भी चेष्टा सी पनपी थी गले में फंसकर रह जाती है फड़फड़ाती सी, नहीं माँग पाता ! उन्हें खाते देखता हूँ, बर्थ पे लेटा सामने पीली सी छत देखता हूँ, घरघराते पँखे को देखता हूँ, छत पे आड़ी-तिरछी लकीरों से उभर आई भिन्न-भिन्न आकृतियाँ देखता हूँ, आँते फिर दुखने लगी हैं सहन नहीं हो रहा.

सिंधी सज्जन उठकर वाशरूम की तरफ गए हैं, कोई स्टेशन आया है हबड़-तबड़ मची है. सज्जन की बर्थ पर सिक्का नज़र आता है, और दिन होते तो सोने के सिक्कों के ढेर को भी हेय-दृष्टि देखता किन्तु आज यही सिक्का समूची दृष्टि में भर आया है, उतरकर सिक्का उठा लेता हूँ. अपने पास से एक रुपए मिलाकर दो रुपए का खीरा खरीदा है. समय को खींचकर, तानकर एक-एक टुकड़ा खाया जा रहा ताकि अधिक लगते समय से अधिक परिमाप का भ्रम-बोध हो, ख़ुद को नहीं आँतों को छलने का उपक्रम है किन्तु एकाध घण्टे बाद आंतें फिर दुखने लगी हैं इस बार दुगुनी प्रबलता से, असहनीय मरोड़ उठती है, अब ग्लूकोज़ पानी भी आँतों को तुष्ट नहीं कर पा रहा, गला इतना सूख गया है कि सूजी के लड्डू निगलने के क्रम में लगता जैसे गले के भीतर खरोंचे पड़ रहीं, गला छिल जाएगा. कमांडो ट्रेनिंग के सर्वाइवल कोर्स में भी ‘बर्दाश्त का माद्दा’ बढ़ाने भूखा रखा गया था पर ऐसा भूखा नहीं कि दाने को तरस जाए आदमी, मोहताजी हो जाए.

ट्रेन पता नहीं किस भू-भाग से गुज़र रही, लेट हो आयी है- शाम तक गुवाहाटी पहुँचना था पर रात ग्यारह बजे पहुंची है. अगली ट्रेन कल सुबह दस बजे वो भी एक नम्बर प्लेटफार्म से. चार नम्बर प्लेटफार्म पर माँदा सा खड़ा, सामान एक नम्बर प्लेटफार्म तक ले जाने की योजना बनाता हूँ, खाली पेट योजना नहीं बनती. पीछे बाकी सामान छोड़ ट्रंक उठाता हूँ, प्लेटफार्म से सीधे पटरियों पे उतरता, पार करता, अगले प्लेटफार्म पे चढ़ता, फिर उतरता, पार करता अन्ततः एक नम्बर पर पहुँच ट्रंक रखता हूँ, लौट पड़ता हूँ. यही क्रम बाकी सामान के लिए भी दोहराता हूँ. लोगों का आना-जाना लगा है, सब खाए-पिये लग रहे, क्या-क्या खाया होगा इन लोगों ने, दुनिया भर के स्टॉल लगे हैं,हर स्टॉल पे भीड़ लगी है सबको कुछ न कुछ मिल रहा, कोई मेरा पेट क्यों नहीं पढ़ता, कोई मेरी निरीहता क्यों नहीं पढ़ता. चारों सामान एक नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचा ट्रंक पर ही दुहरा हो जाता हूँ. 48 घण्टे से अधिक हो रहे पेट में अन्न का दाना नहीं, आँखों के नीचे हल्की कालिमा उभर रही.

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक एक पर तीसरी सुबह खुल रही पर जीवन का क्रम वही आँतों पे टिका हुआ, मन में आया कि जी आर पी थाने में जाकर बात करता हूँ, पर सामान का क्या करूँ, कहाँ ढोउँ, जेब तो कटवा ही ली अब यदि सामान भी हाथ से जाए ? तिस पर संकोच अलग, कहीं नहीं जाता नियति के समक्ष अड़ा रहता हूँ.

आगे दीमापुर की तरफ जाने वाली गाड़ी को दस बजे इसी एक नम्बर पे लगना था किन्तु ऐन वक्त पे घोषणा हुई कि ट्रेन एक नम्बर पर नहीं सात नम्बर पर लगेगी एक भूखे-टूटे मनुष्य की असहायता की ऐसी पराकाष्ठा, ऐसी परीक्षा !

भारतीय रेल व्यवस्था ! तुम नहीं जानतीं क्या पाप कर रही हो, क्या अघट कर दिया है तुमने ! तुम्हारे लिए प्लेटफार्म बदलना एक प्रशासनिक आदेश है किन्तु एक मनुज टूटन की कगार पे है, नियति के षड्यंत्र में भारतीय-रेल तुम भी शामिल हो रही ! रोज़े-महशर ये हिसाब भी रखा जाएगा दावरे-हश्र के हुज़ूर में ताकता हूँ इधर-उधर, कैसी विदीर्णता है, कैसी लाचारी ने जकड़ लिया है कि कोई कँधे पे हाथ भी धर दे तो फूट-फूट कर रो पडूँ, सोचता हूँ चारों सामान उठा लूँ किन्तु उठाऊँ तो उठाऊँ कैसे

ट्रेन की तरफ भाग रहे लोगों पर दृष्टि बिछलती है. ‘सामान उठाए साहेब !’ बाजू से ध्वनि आयी है, चन्द्रभान कुली,-” बटालियन जॉइन करने जा रहे…जेब कट गई…पाँच रुपए बचे हैं, दे देंगे, उठाना है तो उठाओ !” बहुत करके भी इतना ही माँग पाता हूँ.

-“आइये ! एकाध आप उठाइये बाकी हम ले चलते हैं”.

चन्द्रभान ने लाकर लामडिंग जाने वाली पैसेंजर ट्रेन की काष्ठ-कुर्सी पर बिठा दिया है. सामने साधु बाबा हैं. पाँच रुपए चन्द्रभान को दे दिए गए हैं अब दमड़ी नहीं, हाय ! क्या तो घट रहा.

कुछ समय बीतता है

चन्द्रभान वापिस आया है

-” यदि आपके पास पैसे नहीं तो ये दस रुपए रख लीजिए”

-“नहीं, हो जाएगा”

‘हाय रे संकोची ! तेरे संकोच को आग लगे’ आँतें बिफर पड़ी हैं. पेट की भूख के आगे चन्द्रभान के लिए कृतज्ञता भी आकार नहीं ले पाती, हल्की नमी है आँख के कोरों में. चेहरे का हाल-मुहाल देख सामने वाले साधु बाबा भी पूछ बैठते हैं-“परेशान दिखता है बच्चा !”

घर-घर जाते हैं, हर घर से न मिले फिर भी विविध तो मिलता ही होगा सो एकाध रोटी तो होगी बाबा के झोले में इसी आस में झोले को ताकते साधु को पूरा दुखड़ा सुना डालते हैं वो पूरा सुनते हैं पर मिलता कुछ नहीं तो क्या खुलकर ही माँगना पड़ेगा ‘कोई रोटी वोटी है तो दो”

अजब समय है जब तक हाथ पसारकर नहीं मांगेंगे तो क्या कोई देगा नहीं, क्यों ये जगत ऐसा संवेदनहीन हो रखा, क्यों कोई इस असहनीय भूख को नही पढ़ पा रहा

न ! नहीं माँगूगा !

साधु दो लड्डू ले लेते हैं, देते कुछ नहीं.

गुवाहाटी स्टेशन से ट्रेन चल पड़ी है. असम की भू-दृश्यावली खिड़की के पार एक चक्कर में गुज़र रही पर भीतर कोई भाव नहीं उपजता, सारी शक्तता जैसे लुट गयी हो, पेट में दाना होता तो इन दृश्यों को पी रहा होता- दृश्यों को तरल बनाकर पीने की कला आती है मुझे !

प्रथमतया गुज़र रहा अहोम भूमि से, ओ ब्रह्मपुत्र ! ओ सुपारी के पेड़ों की श्रृंखला तुम ही साक्षी रहना मेरी इस भूख की जिसने तुम्हें न निरखने दिया.

शाम तक ट्रेन लामडिंग पहुँचाती है, प्लेटफार्म पर सामान रख ट्रंक के ऊपर ही ढेर हो जाता हूं. यहां से दीमापुर के लिए ट्रेन पकड़नी जो देर रात आएगी. समीप ही जवानों का एक ग्रुप पटरी पार बाज़ार में मिल रही स्वादिष्ट मछली और दाल का चटखारे लेकर ज़िक्र कर रहा, सी आर पी एफ के ही जवान लग रहे.

“इनसे माँग लेता हूँ”

किन्तु कैसे स्वयं को दयनीय प्रस्तुत करूँ, देह अशक्त हुई है पर अभी भी दैन्य नहीं, नहीं माँगता !

यहाँ-वहाँ दृष्टि दौड़ाता हूँ, प्लेटफार्म में कही रोटी का टुकड़ा दिख जाए तो उठाकर खा लूँ, खड़े नहीं हुआ जा रहा आँतें तो लगता मर चुकीं, अब दर्द नहीं बल्कि अब दर्द महसूसने की क्षमता ही नहीं.

ट्रंक पर ही पड़ा रह जाता हूँ.

रात दो बजे दीमापुर की ट्रेन आयी है सुबह सात बजे दीमापुर पहुँचा हूँ.

हवलदार नायर आया है लेने, “क्या हुआ साब !” आंखों के नीचे गाढ़े काले घेरे और चेहरे पे उतर आई दीनता को देख पूछता है

कुछ नहीं बोलता

मेस पहुँचा हूँ

तीन पूरे दिन और एक रात के बाद अन्न सामने है

रोटी और भिंडी की सूखी सब्ज़ी

पहला कौर लेता हूँ…

अन्न पधारो आँत में भूखन को सुख दो

सबकी विधी में जा बसो कोई को न दुख दो

© श्री परम शिवम्  

डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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