कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “अहं से आत्मा तक…

? अहं से आत्मा तक…  ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

मैं करता नहीं

मात्र घटित होता हूँ

यह समझ आते ही

जीवन का भार

स्वतः ही उतरने लगता है

अहं भी आवश्यक है

वरना जीवन-यात्रा संभव नहीं

पर वही अहं

जब विराट आकार ले ले

तो अहंकार बन जाता है

और नाश का कारण बनता है

दीप यदि दीप रहे

तो उजाला देता है

आग दावानल बने

तो सब राख कर देती है

कर्म मेरे हाथ में है

फल मेरी मुट्ठी से बाहर

इस सत्य को स्वीकार लेना

आध्यात्मिक परिपक्वता की

पहली देहरी है

मैं मार्ग नहीं

मात्र पथिक हूँ

पगडंडी मेरे बिना भी रहेगी

समय मेरे बिना भी बहेगा

अपने को अपरिहार्य मानना

सबसे गहरा भ्रम है

ज्ञान बढ़े

तो सिर झुके

यदि गर्दन अकड़ जाए

तो समझ लेना —

वह ज्ञान नहीं

केवल एकत्रित सूचना है

जो जोड़ा

वह बोझ बना

जो बाँटा

वही आलोकित हुआ

मनुष्य संग्रह से नहीं

संवेदना से ऊँचा होता है

मैंने दिया

यह अहंकार है

मेरे द्वारा दिया गया

यह विनय है

इन दोनों के बीच

पूरा जीवन खड़ा है

जहाँ मैं भरा है

वहाँ मौन नहीं उतरता

जहाँ स्वयं को रिक्त किया

वहीं शांति ठहरती है

मैं छोटा हुआ

तो संसार बड़ा दिखा

कर्ता का मोह छोड़ा

तो जीवन सरल हुआ

मैं आवश्यक नहीं हूँ

मैं केवल निमित्त हूँ

यह समझ आते ही

संघर्ष गलने लगता है

और स्वीकार खिल उठता है

अहं साधन बने

तो उन्नति

अहं राजा बने

तो पतन निश्चित

जिस दिन जाना

कि मैं केंद्र नहीं

प्रवाह हूँ

उसी दिन

भीतर पहली बार

स्वतंत्रता उतरी

अंतिम सूत्र

घटने से मत डरो

झुकने से मत भागो

जितना घटेगा अहंकार

उतना बढ़ेगा मनुष्य

और जितना बढ़ेगा मनुष्य

उतना निकट आएगा

अपने ही सत्य के

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

(श्री संजय भारद्वाज जी के आलेख अहं और अहंकार से प्रेरित कविता

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि –  अहं और अहंकार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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