कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्
(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)
कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन ‘आफ़ताब’ उपनाम से अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “ईश्वर कटघरे में…”।
ईश्वर कटघरे में… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆
☆
जब पोथियाँ फ़ैसले लिखती हैं
तो मनुष्य कटघरे में नहीं
अपने ही सामने खड़ा होता है
क़ानून मौन रहता है
परंपरा हथौड़ा चलाती है
और सत्य हाशिए पर
अपने ही ख़ून से दस्तख़त करता है…
मेरे गाँव में
हर साल यज्ञ होते हैं
पर अब धुएँ में प्रार्थना नहीं
कुत्सित संदेह उठता है
हाथ आकाश की ओर नहीं
किसी गढ़े हुए शत्रु की तरह उठते हैं
और अग्नि
ईश्वर से पहले
मनुष्य को जलाने लगती है…
नीम पर टँगा लाल हिंडोल
अब बचपन नहीं झुलाता
वह अघोषित भय की घोषणा है
क्योंकि अब यह समाज
अपने ही हलाहल से
स्वयं के भविष्य को पाल रहा है
जब आस्था बीमार होती है
तो सबसे पहले करुणा मरती है-
फिर विवेक
फिर मनुष्य
और अंत में
ईश्वर को भी
भीड़ की जेब में रख लिया जाता है…
वे कहते हैं —
धर्म ख़तरे में है
मैं कहता हूँ —
मानवता ख़तरे में है
क्योंकि जहाँ धर्म बचाने के लिए
मनुष्य को जलाया जाए
वहाँ कोई भी देवी-देवता
खड़ा नहीं रह सकता
अगर तुम्हें सच में धर्म चाहिए
तो उसे मंदिरों- मस्जिदों में नहीं
लोगों में खोजो
उन आँखों में
जो भूख से डरती हैं
उन हाथों में
जो किसी से नफ़रत नहीं कर पाते
क्योंकि ईश्वर
कभी भी
नारों में नहीं,
भीड़ की आग में नहीं
वह वहाँ होता है
जहाँ कोई एक मनुष्य
स्वयं को संकट में डाल
दूसरे मनुष्य को
मृत्युपाश से बचा लेता है…!
☆
~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’
© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्
पुणे
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





