श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – कुंडलिनी ☆

अजगर की कुंडली कसती जा रही थी। शिकार छटपटा रहा था। कुंडली और कसी, छटपटाहट और घटी। मंद होती छटपटाहट द्योतक थी कि उसने नियति के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है। भीड़ तमाशबीन बनी खड़ी थी। केवल खड़ी ही नहीं थी बल्कि उसके निगले जाने के क्लाइमेक्स को कैद करने के लिए मोबाइल के वीडियो कैमरा शूटिंग में जुटे थे।

क्लाइमेक्स की दम साधे प्रतीक्षा थी। एकाएक भीड़ में से एक सच्चा आदमी चिल्लाया, ‘मुक्त होने की शक्ति तुम्हारे भीतर है। जगाओ अपनी कुंडलिनी। काटो, चुभोओ, लड़ो, लड़ने से पहले मत मरो। …तुम ज़िंदा रह सकते हो।…तुम अजगर को हरा सकते हो।…हरा सकते हो तुम अजगर को।..लड़ो, लड़ो, लड़ो!’

अंतिम साँसें गिनते शिकार के शरीर छोड़ते प्राण, शरीर में लौटने लगे। वह काटने, चुभोने, मारने लगा अजगर को। संघर्ष बढ़ने लगा, चरम पर पहुँचा। वेदना भी चरम पर पहुँची। अवसरवादी वेदना ने शीघ्र ही पाला बदल लिया। बिलबिलाते अजगर की कुंडली ढीली पड़ने लगी।

कुछ समय बाद शिकार आज़ाद था। उसने विजयी भाव से अजगर की ओर देखा। भागते अजगर ने कहा, ‘आज एक बात जानी। कितना ही कस और जकड़ ले, कितनी ही मारक हो कुंडली, अंततः कुंडलिनी से हारना ही पड़ता है।’

©  संजय भारद्वाज

(21.1.2016, प्रात: 9:11बजे)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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Rita Singh

आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा शस्त्र है।कुंडलिनी की क्षमता की मनुष्य को कम ही जानकारी होती है।बहुत अच्छी प्रस्तुति

Sanjay k Bhardwaj

हृदय से आपका धन्यवाद आदरणीय।

अलका अग्रवाल

जब तक श्वास है तब तक मनुष्य को आस नहीं खोनी चाहिए कठिनाइयों से उबरने की।श्वास रुकने पर तो अंत निश्चित ही है। साधु, संत कुंडलिनी जगाकर असाध्य को भी साध्य करने की क्षमता रखते हैं।

Sanjay k Bhardwaj

हृदय से आपका धन्यवाद आदरणीय।

Shyam Khaparde

बहुत सुंदर लघुकथा, उत्साहवर्धक

माया कटारा

‘कुंडलिनी ‘ लघुकथा -भयमुक्त होकर अंतिम साँस तक डटकर सामना कर , जीव आत्मरक्षा के लिए संघर्ष करता है, ऐनकेन प्रकारेण अपनी जान बचाता है – प्रेरक लघुकथा …

Sanjay k Bhardwaj

हृदय से आपका धन्यवाद आदरणीय।