डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – शुभम भवतु !
☆ लघुकथा ☆ शुभम भवतु! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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सुबह-सुबह भक्त नहा-धोकर मंदिर पहुँचा। उसने दीप प्रज्वलित किया, दो अगरबत्ती जलाई, ग्यारह रुपए का प्रसाद और श्रीफल चढ़ाया, हाथ जोड़े, आँखें बंद की और आर्त्त स्वर में निवेदन किया- ‘प्रभु! प्लीज… प्लीज… कुछ कीजिए…!’
तभी भक्त को अपने कानों में प्रभु की मधुर स्वर सुनाई दिए- ‘भक्त क्या बात है…! बड़े उद्विग्न, भयाक्रांत और घबराए हुए लग रहे हो…! प्लीज़…के आगे भी कुछ कहोगे… या यूँ ही मेरे नाम की रट लगाए रहोगे।’
भक्त- ‘प्रभु! वो बात ऐसी है कि देश और दुनिया में घमासान मचा हुआ है। विभिन्न धर्मावलंबियों और देशों के मुखिया आपस में लड़-मरने पर आमादा हैं। उनके अहं की लड़ाई में अब तक कई निरीह और निर्दोष लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। दुनिया में त्राहिमाम मचा हुआ है।’
प्रभु ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा- ‘भक्त! यह जो कुछ तुम्हारे देश या दुनिया के दूसरे देशों में मारामरी, खूखराबा हो रहा है। इसके लिए न तो मैं दोषी हूँ, न ही ज़िम्मेदार। दरअसल तुम्हारी यह आदमजात क़ौम के नुमाइंदे हैं जो अपने और दूसरे देशों की अवाम पर अपना रुआब गाँठना और अपनी हुकूमत क़ायम करना चाहते हैं। दुनिया भर की सारी समस्याएँ इन्हीं अहंकारी और उजबकों द्वारा पैदा की हुई हैं, अतः समाधान भी उन्हीं आकाओं को मिल-बैठकर खोजना है। प्रभु ने अपने चक्षु बंद किए, भक्त को ‘शुभम भवतु’ का आशीर्वाद दिया और पलक झपकते अंतर्ध्यान हो गए…!
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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