श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “आर्यावर्त में बरस छब्बीस के सामने चुनौतियाँ…” ।)
☆ शेष कुशल # ५९ ☆
☆ व्यंग्य – “आर्यावर्त में बरस छब्बीस के सामने चुनौतियाँ…” – शांतिलाल जैन ☆
हैलो 1 जनवरी, 2026,
मैं 2025 बोल रहा हूँ. जा रहा हूँ मैं, मगर बताता चलूँ कि तुम साल भले नए हो चुनौतियाँ तुम्हारे सामने वे ही पुरानी हैं. बस उसका स्केल बढ़ाते जाना है. बीते पूरे बरस अनैतिकताओं की खाईयों में आर्यावर्त के गिरते रहने का मैंने सिलसिला थमने नहीं दिया, बल्कि उसे बढ़ाया ही है. 2024 के बरक्स मैंने झूठ, कपट, छल, धोखे के नए कीर्तिमान गढ़े हैं, अब बैटन तुम्हारे हाथ है, निचाईयों के नए कीर्तिमान गढ़ने की चुनौती है तुम्हारे सामने.
मैंने रिहा करवाए हत्याओं के, बलात्कार के सज़ायाफ्ता मुजरिम. जिन्हें मु’आफ़ नहीं करा सका उनको परोल पर बाहर लाकर दिखाया है. संख्या में वे दस-बीस हैं मगर हैं रसूखवाले. धार्मिक और संस्कारी इस कदर कि परोल पर भी आते हैं तो सत्संग-कथा करना नहीं भूलते. वे उन लाखों कैदियों से अलग हैं जिनके पास न वकील की फीस है न मुचलका भरने का पैसा. वे विचाराधीन हैं मगर उनको न्याय दिलानेवाला सिस्टम विचारशून्य. उनकी चुनौती तो चुनौती है भी नहीं. असल खेल तो रसूखदारों को आज़ाद करने करवाने का है. इससे बड़ी चुनौती रसूखदारों को कानून की पहली सीढ़ी से ही बचा ले जाने की है. कामियाब रहा हूँ मैं. तुम कर सकोगे?
अपने समयकाल में पूरी शिद्दत से मैंने रिश्वतें कम नहीं होने दीं. लेने वालों में जिनको बचाना था उनको बचाए भी रखा. जिन्हें यहाँ महफूज़ नहीं रख सका उन्हें सात समंदर पार बसा दिया है. सीढ़ीयाँ मुहैया करवाईं कि कुछ लोग अमीरी के टॉप इतने या टॉप उतने में पहुँच सकें, गरीबी की खाईयाँ गहरी-चौड़ी करवाईं कि जो किसी तरह मुहाने पर खड़े हैं वे गिर सकें, जो गिरे हैं गिरे रहें. चुनौती है तुम्हारे सामने हमारे समय के रसूख़दार कितना भी भ्रष्ट आचरण करें मगर रहें क़ानून की गिरफ्त से दूर-दूर. इसे तुम हलके में मत लेना डियर, बचाने का एक ही पैमाना रखना –‘वो उनके साथ है, वो उनके साथ नहीं है.’
ओ छब्बीस, सुनिश्चित करना कि नफरतों के परनालों का उफान कायम रहे. रंग बेशर्म हो न हो रंगदार बेशर्म हों, रंगदारी बेशर्म हो. जातियों, धर्मों, भाषाओं के पचड़े में इंसान भूल जाए कि वो इंसान है और एक इंसान को बरत रहा है. इंसान का खून काऊ-यूरिन से सस्ता हो. वो शंका-आशंका में भीड़ बनाकर किसी को भी मार डाले, वो होस्टल में नारे लगाने, नहीं लगाने की हिंसा का शिकारहो. वो किताबों से ज्यादा कपड़ों पर आन्दोलन करे. जिससे प्यार करे उसके टुकड़े टुकड़े जंगलों में फैला दे. जिसे नहीं कर पाए उस पर एसिड अटैक कर डाले. महिलाएँ बचनी नहीं चाहिए. अबला किसी भी धरम की हो, जाति की हो, उम्र की हो–उस पर अत्याचार कम मत होने देना ओ अनुवर्ती बरस.
नफरत के पुआल में लगी चिंगारी को मैंने बहुत कुछ हवा तो दी मगर आर्यावर्त अभी पूरी तरह जलना बाकी है. तुम्हें करना है. शांति, करूणा, अहिंसा, सहिष्णुता के पाठ पढ़ानेवाले धर्म के नाम पर अशांति, घृणा, हिंसा का बोलबाला हो. देश आहत आस्थाओं का देश बना रहे. विश्वास अंधविश्वास में बदलता रहे. तारीख़ इक्कीसवीं सदी की हो, तवारीख़ सोलहवीं सदी की. तर्क और विज्ञान कुरीतियों के समक्ष नाक रगड़ते आएँ. शिक्षा मिले तो मदरसों, मिशनरियों, आश्रमों में मिले. जहां भी मिले मध्ययुगीन मिले. पढ़े-लिखे लोग भी गंडे-ताबीज़ में भरोसा रखें. सोच दकियानूसी बने और जनमानस तांत्रिकों के फेर में अकर्मण्य. बारह मास बाद एक नफरतों से जलता मुल्क देते हुए जाना डियर.
मैंने अपने पूरे साल में कीमतों के आकाशगामी होने को बनाए रखा. अब तुम्हारे सामने दोहरी चुनौती है – जरूरी जिंसों के दाम अव्वल तो कम न हों बल्कि बढ़ें. रहें तो मेरे लेवल से उपर ही रहें. निज़ाम जैसे जैसे नियंत्रण में होने के बयान दे वैसे वैसे दाम बढ़ते रहें. सिक्का लुढ़कने की नई निचाईयों को छुए. जो रोज़गार में हैं वे छटनियों के शिकार हों, जो रोजगार में नहीं हैं वे पंखों से रस्सी डालकर झूलते रहें. नए साल में आरक्षण का नया उत्साह हो, प्रतिशत निनानवे हो मगर नौकरियाँ हो ही नहीं. रिजर्वेशन कन्फर्म, ट्रेन केंसिल. एक रात में हज़ारों की छटनीं हो जाए और लेबर मिनिस्टर की उफ़ भी सुनाई न दे. छलावे के नए कीर्तिमान रचने की चुनौती है तुम्हारे सामने डियर ट्वेंटी सिक्स. मरें तो अकेले बेरोजगार क्यों मरें, किसान भी क्यों न मरे, करियर बनाने के दबाव में युवा भी मरे, क़र्ज़ वसूली से परेशान भी मरे, ले-ऑफ़ का शिकार भी मरे? बरस छब्बीस तुम्हें चैलेंज है – किस पेशे से कितनी हाराकीरी करवा पाते हो तुम.
और हाँ, सरकार के भरोसे मत रहना. सरकारें चुनौतियाँ उनको मानती हैं जो उनकी सत्ता को होती है. वे संविधान के प्रावधानों में गली ढूंढकर संविधान की आत्मा मारते रहें तभी तुम्हारे आनेवाले बावन सप्ताह सफल मानियो. मैं सफल रहा कि जो इंसान के मूल अधिकारों के लिए लड़ते रहे वे कारावास से बाहर न आ सके, तुम और अधिक सड़ा सको उन्हें. एक ऐसा समाज गढ़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना है तुम्हें जहाँ बुद्धिजिवियों को देश का दुश्मन माना जाने लगे. जो पर्यावरण बचाने की लड़ाई लड़ें उन्हें कारावास हो. जल, जंगल, जमीन बचे नहीं, बिके. हवा की गुणवत्ता बद से बदतर होती जाए. निनानवे मीटर तक ऊँचा पहाड़ पहाड़ न माना जाए. पानी जमीन के नीचे का नहीं आँखों का भी निरंतर सूखता रहे.
न्यूजट्वंटी-फोर-बाय-सेवेन मिले मगर उसमें समाचार न हो. मिडिया आगे बढ़े ऐसे जैसे केंचुआ बढ़ता है. हड्डियों से परहेज़ रखना दोस्त दरबार में रेंगने में बाधा उत्पन्न होती है. महानगर की सड़कों पर पानी भर जाए तो मिडिया आसमान सर पर उठाले मगर दूर देश में लाखों लोग हफ़्तों बाढ़ में घिरे रहें, बेघर हो जाएँ और तूती भी आवाज़ न करे. इंडेक्स शेयर बाज़ार का बढ़े डेमोक्रेसी का गिरे, प्रेस फ्रीडम का गिरे, भुखमरी का गिरे, करप्शन का गिरे.
न्याय अदालतों से नहीं जेसीबी से मिले. राज़ पुलिस का हो, न्याय जंगल का, मुकदमें कंगारू कोर्ट में निपटाएँ जाएँ. मैं तो नहीं कर सका मगर तुम कर सकते हो–इसी बरस आला अदालत को सरकार-ए-हिन्द की बांदी बना सको तो. चैलेंज कठिन है मगर तुम कर सकते हो.
ओ अनुवर्ती वर्ष, तुम तैयार रहना आतंकी हमलों से लेकर अचानक बाढ़ तक सहने के लिए, हिमस्खलन से लेकर पुल तक के गिरने के लिए, विमान दुर्घटना से लेकर भगदड़ तक में मरने के लिए, भूस्खलन से लेकर फैक्ट्री विस्फोट तक में मरने के लिए. तुम तैयार रहना युद्ध के लिए, वनों की कटाई, पहाड़ों की खुदाई के लिए, अत्यधिक भ्रष्टाचार के लिए, डिजिटल अरेस्ट के लिए, साइबर धोखाधड़ी के लिए, हवाई अड्डे पर अटके रहने के लिए, रेल के निरस्त हो जाने के लिए, नए श्रम क़ानून से पिटने के लिए, वोटर लिस्ट से कटा नाम जुड़वाने की लाइन में लगने के लिए. मैं यकीन से कह सकता हूँ – ये देश तुम्हारी बढ़ती ज्यादतियों पर उफ़्फ़ भी नहीं करेगा.
बहरहाल, समय कम है चुनौतियाँ अधिक, महज़ तीन सौ पैंसठ दिन हैं तुम्हारे पास. अपनी फितरतों, हरकतों, कारनामों, कमीनगियों, गिरावटों के मेरे कीर्तिमानों से तुम कितना और नीचे गिर सकते हो डियर ट्वेंटी सिक्स इसका आकलन हम 31 दिसंबर, 2026 की शाम करेंगे. भरोसा है मुझे, तुम मुझे निराश नहीं करोगे. अलविदा और मुबारकें.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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