श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ।)
☆ शेष कुशल # ६० ☆
☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” – शांतिलाल जैन ☆
आदाब, नमस्कार. खुशामदीद ख़वातीन-ओ-हज़रात. सुनो सुनो. सात समंदर पार का दर्दनाक किस्सा सुनो. चश्म-ए-नम कर देने वाला किस्सा सुनो. दिल चीर देने वाला किस्सा सुनो. सीना चाक न कर दे तो नाम बदल देना किस्सागो का.
यूँ तो सुने आपने अब तक किस्से बादशाहों के, शहंशाहों के, राजाओं के, महाराजाओं के, निज़ाम के, सियासी रहनुमाओं के. आज सुनिए आप किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ. एक रहे आए अंकल सैम, पढ़े लिखे अंकल सैम! सभ्य अंकल सैम! समृद्ध अंकल सैम! दुनिया के चौधरी अंकल सैम! पर्शिया में निज़ाम बदलवाने निकले अंकल सैम! असली मकसद तो तेल बेचना. तेल बेचने निकले अंकल सैम! तेल कब्ज़ाने निकले अंकल सैम! तेली नंबर-वन का मिशन लिए निकले अंकल सैम! क्रूर अंकल सैम! लालच में अंधे अंकल सैम! पर्शियन ख़वातीनों को आज़ाद कराने निकले, एक सौ पैसठ बच्चियों को फ़ानी दुनिया से आज़ाद करा बैठे.
वो कैसे किस्सागो ?
ख़वातीन-ओ-हज़रात, खुलुक खुदा का, मुलुक अंकल सैम का, हुकुम ट्रंप साहेब का. हुकुम हुआ मिसाईल चलाने का. टॉमहॉक चली तो गिरी जाकर मिनाब शहर के इलेमेंट्री स्कूल पर. अल्लाह को प्यारी हो गईं डेढ़ सैंकड़ा बच्चियाँ. न डॉलर जानती थीं न पेट्रो डॉलर. न टैरिफ न बेलेंस ऑफ़ पेमेंट. मरहूम बच्चियाँ. मासूम बच्चियाँ. अम्मी-अब्बू की उम्मीदों की बच्चियाँ. उनकी अँखियों की नूर बच्चियाँ. टूटे ख्वाबों की बच्चियाँ. उनके ख्वाबों में तालीम थी. ख्वाब टीचर बनने के. ख्वाब डॉक्टर बनने के. ख्वाब साइंटिस्ट बनने के. अम्मी जैसा घर बसाने के ख्वाब. अपने हिस्से की आधी दुनिया को खूबसूरत बनाने के ख्वाब. अंकल सैम की नफ़रत, हिंसा और क्रूरता से चूर चूर ख्वाब.
ख़वातीन-ओ-हज़रात, बच्चियों से पुरानी दुश्मनी रही आई अंकल सैम की. एक्जोटिक आईलेंड पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ मुँह काला करके आए थे, छोटी छोटी बच्चियों के स्कूल पर मिसाईल दाग बैठे. चमड़ी का रंग सफ़ेद मगर हरकतों में मुँह काला, हाथ काले, काला ही ठहरा मन. चले थे शांति का नोबेल लेने, अबोध बालिकाओं का वध कर बैठे. मस्ती के मंज़र एपस्टीन की फाईल में, तबाही का मंज़र स्कूल के दालान में. अधजले दुपट्टे, अधखाए लंच बॉक्स, बिखरे स्कूल बेग, बिखरी पॉकेट मनी, खून से लथपथ होमवर्क की कॉपियाँ, कॉपियों में यहाँ वहाँ चितरी बे-तरतीब ड्राईंग, गुस्सैल टीचर के मुँह चिढ़ाते रेखाचित्र, जुगराफियों के तितर-बितर नक़्शे, नक्शों पर खीचीं सरहदें बदलने की ज़िद में चली टॉमहॉक मिसाईल. काँप उठी कायनात, बच्चियों की चीख से नहीं, खामोश जन्नत नशींनी से.
हाँ तो ख़वातीन-ओ-हज़रात, इसके बाद किस्से में रह ही क्या जाता है. अलबत्ता, जंग जारी है. जंग के किस्से ख़त्म नहीं होते… रुंध जाए गला किस्सागो का तो किस्से को विराम लेना ही होता है. अलविदा.
अरे!! रुको रुको किस्सागो, चश्म-ए-नम तो हमारी भी हैं मगर इतना तो बताते जाओ उसी समय जंबूद्वीप में क्या हुआ?
कुछ नहीं हुआ ख़वातीन-ओ-हज़रात. एक होर्डिंग खड़ा था वहाँ, अपने सीने पर बड़े बड़े हर्फ़ों में एक जागतिक नारा चस्पाँ किए – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’. होर्डिंग ख़ामोश खड़ा रहा.
होर्डिंग अब भी ख़ामोश है.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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