श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ।)
☆ शेष कुशल # ६१ ☆
☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” – शांतिलाल जैन ☆
आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में. दो सांड एक तरफ, एक सांड दूसरी तरफ. जोड़ी में एक सांड अंकल सैम का, एक सांड ज़ायोनिस्टों का. दूसरी तरफ एक अकेला सांड, पर्शियन नस्ल का. ये क्या!! शुरू मेई बेईमानी! पास के वेन्यू ओमान में शांतिवार्ता चल रही थी कि जोड़ीदार सांडों ने पर्शियन सांड को अकेला पा कर अटैक कर दिया. जुबां शांति की, अंगुलियाँ मिसाईलों के ट्रिगर पे. बुल फाईट में नुकसान बागड़ का. कुवैत, बहरीन, क़तर इस बागड़ पर ज़ख्मी तो लेबनान उस बागड़ पर. नुकसान तो दूर देशों तक पसरी बागड़ का भी हो रहा है. जम्बूद्वीप जैसे देश जो दो रोज़ पहले ही जाकर ‘आ सांड मुझे मार’ कर आए थे, लहुलुहान वे भी कम नहीं है. सांड लड़ वहाँ रहे हैं, सिलेंडर की कतार में हम और आप यहाँ खड़े हैं. बाज़ार की दुनिया के सांड वाल-स्ट्रीट से दलाल-स्ट्रीट तक हर जगह दुबक गए हैं, बीयर हावी हैं. क्षत-विक्षत है बागड़ इन्वेस्टर्स की. मज़े में हैं तो बस चीन और रूस. चतुर हैं, बागड़ पर नहीं दर्शक दीर्घा में जा बैठे हैं. माल भी कमा रहे हैं और मज़े भी ले रहे हैं. उनकी कम्पनियाँ मुनाफ़े में है और तीसरी दुनिया लॉस में. आप देख रहे हैं बुल-फाईट में दुनिया की शेष बागड़ का सत्यानाश.
आगे का हाल सुनाने से पहले हम आपको बताते चलें दो सांडों की जोड़ी मान कर चल रही थी एक अकेला, दुबला-पतला, कमज़ोर सांड रमजान में क्या तो खुद को बचा पाएगा, क्या आक्रमण कर पाएगा. अनावृत्त मानकर चल रहे थे उसे. सोचा क्या तो नहाएगा, क्या तो निचोड़ेगा. पर्शियन नस्ल को वे चुटकियों में मसल देंगे. मगर ऐसा होता दीख नहीं रहा. सांडो की लडाई जलिकट्टू की लड़ाई नहीं है. ये न परंपरा के लिए है, न मनोरंजन के लिए. असल मकसद तो पर्शियन सांड के कब्ज़े वाली उस दुधारू गाय का अपहरण करना है जिसे तेल का कुआँ कहा जाता है. आँखों में सपने पेट्रो डॉलर के हैं. फाईट टफ़ है, नुकसान जबरजस्त.
और ये दांव. धोबी पछाड़. जोड़ीदार सांडों का पॉवर मूव. प्रतिबंध के सींगों में फँसा कर विचारधारा बदलने का दांव….. ओह्ह मूव फिर फेल हुआ. पर्शियन सांड फिर बच निकला. अबकि बार निज़ाम से बेदख़ल कराने डबल-लेग टेकडाउन लगाया गया है. पर्शियन सांड को सींगों की बजाए पैरों में घुसकर पकड़ने का दांव लगाया गया है. मगर ये क्या…. अधिनायकवादी निज़ाम से बेदख़ल कराने निकले अंकल सैम का अपना चेहरा अधिनायकवादी निकल आया है. पर्शियन सांड है कि लीडरान-दर-लीडरान मारे जाने के बाद भी अंकल सैम के काबू में आ नहीं रहा. अलबत्ता, ड्रोननुमा छोटे छोटे सींगों से अंकल सैम को हलाकान किए दे रहा है. अभी तक दो सांडों की जोड़ी एक भी राउंड पूरी तरह से जीत नहीं पाई है. ‘परमाणु खतरे को रोकना है और मध्यपूर्व में स्थिरता लानी है’ कहते हुए अंकल सैम का सांड एक बार फिर आगे बढ़ा, एक बार फिर मुँह की खाई. न यार मिला, न विसाले सनम. न परमाणु बम मिला न ख़तरा. जोड़ीदार सांड का हर दांव फेल हो रहा है. वे बार बार मुँह की खा रहे हैं, मगर अभी चुके नहीं हैं. अंकल सैम यूरोप से ला कर एडिशनल सांड्स उतारने के मूड में हैं. लेकिन ये क्या!! सांड-सखाओं ने मना कर दिया. बुल जर्मनी का हो, इटली का हो, फ़्रांस या ऑस्ट्रेलिया का, सबने अंकल सैम को अंगूठा दिखा दिया है. कह रहे हैं कि भांडों के लिए सांडों के सींग नहीं पकड़े जाते. अलग-थलग पड़ता जा रहा है पॉवरफुल पेयर ऑफ़ सांड्स. हारने की कगार पर दीखते तो हैं मगर मैच अभी ख़त्म नहीं हुआ है. तरकशों में तीर बाकी हैं. कुछ भी हो सकता है. जो यूरेनियम बुझा सींग मार दिया तो मनुष्यता की बागड़ का गहरे तक झुलस जाना तय है.
जंग जारी है. वैश्विक बागड़ पर बैठे अबोध, निहत्त्थे, निर्दोष नागरिकों को कभी ये सांड कुचल रहा है कभी वो. न कोई अस्पताल बख्श रहा है न स्कूल, न बीमार न अपाहिज, न औरतें न बच्चे, न गरीब न मजलूम. रहम किस चिड़िया का नाम है!!
आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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