श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना सच्ची चाहत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 80 ☆ सच्ची चाहत 

काम किसी का नहीं रुकता है, बस चाहत सच्ची होनी चाहिए। जब कोई व्यक्ति जाता है तो उससे बढ़िया आता है। प्रश्न ये है कि  प्रमुख व्यक्ति  जब सबको जोड़कर रखे हुए है तो उसकी टीम अनायास टूट कैसे जाती है? अक्सर देखने  में आता है कि नए लोगों का स्वागत है, वहीं पुराने लोग उपेक्षित होकर सब कुछ छोड़ने पर मजबूर होते हुए दिखते हैं। सबको बाँध कर रखना संभव नहीं हो सकता है। लोगों को अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाना चाहिए। लोग निरन्तर आ रहे हैं और जुड़ने पर गर्व महसूस करते हैं।जबकि दूसरी ओर  नए – नए लोगों का आना और पुरानों का बेइज्जत होकर जाना ये क्रम भी चल रहा है। इन सबके बीच यदि कोई पूज्यनीय है तो वो है सत्कर्म। कर्म करते रहें, सही योजना बनाकर जब भी आयोजन होंगे तो सफलता कदम चूमेंगी ही।

शत प्रतिशत ताकत के साथ जब आप किसी कार्य में जुटेंगे तो उसका परिणाम अवश्य ही दूरगामी होगा। पूर्णता के साथ आगे बढ़ते रहें। क्रमशः ऊँचाई की ओर देखते हुए एक -एक कदम रखते जाएँ अवश्य ही सफ़लता मिलेगी। यदि शिखर पर विराजित होना है तो स्वयं को हर पल तरोताजा व तकनीकी रूप से समृद्ध रखना होगा। लक्ष्य एक हो किन्तु उसे पाने के तरीके में नई – नई योजना होनी चाहिए। जब तक मन आनंदित नहीं होगा कार्य करते समय उदासीनता घर कर लेगी।  उत्साह बनाए रखने के लिए नवीनता का होना जरूरी होता है। ये कार्य हमारे लिए क्यों जरूरी है इससे हमें व समाज को क्या फायदा होगा ये प्रश्न भी पूछते रहना चाहिए। लाभ व हानि का मुद्दा ही मन में जोश भरता है। 

कार्य में इतनी गुणवत्ता होनी चाहिए कि दूसरा कोई विकल्प न हो, जब भी कोई नाम ढूंढा जाए तो आपका ही अक्स सामने उभर कर आए। ये सही है कि समझौते के बिना दुनिया नहीं चलती किन्तु योग्यता के महत्व को कोई आज तक नकार नहीं सका है सो अपने अंदर जुनून पैदा करें और कोई इतिहास रचें जो न भूतों न भवष्यति हो।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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