श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “आग्रह या दुराग्रह”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 84 ☆ आग्रह या दुराग्रह 

ग्रह शब्द जिसके भी साथ जुड़ता है उसके भाव बढ़ा देता है। आजकल सब लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित हो निर्णय करते हैं। ऐसा चुनावी मौसम में ज्यादा देखने को मिलता है। एक दूसरे को प्रलोभन देते हुए   पूरे मनोयोग से आग्रह करते हैं। मन में भले ही दुराग्रह हो पर  शब्द चासनी में लपेट कर  परोसते हैं। मीडियाकर्मियों को तो मसाला चाहिए वे फटाफट प्रश्नों की श्रंखला तैयार कर दोनों खेमें में पहुँच जाते हैं। जनता की ओर से प्रश्नोत्तर शुरू हो जाते हैं। मजे की बात कोई भी विकास के मुद्दे पर चर्चा नहीं करते बस सबको खाना पूर्ति करनी होती है। वोटर चुनावी एजेंडे को समझने हेतु एड़ी- चोटी का जोर लगा देते हैं पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। अपना सा मुख लेकर बिना कुछ समझे ही वोट देने को तैयार हो जाते हैं।

कोई बदलाव की बयार के साथ बहना चाहता है तो कोई और पाँच साल का मौका देने का विचार मन में रखता है। जोड़- तोड़ की उठा पटक के बीच कुछ लोग स्वामिभक्त  भी होते हैं वे सकारात्मकता ही देखते हुए जाति व धर्म की ओर मुड़ जाते हैं। जिसके ग्रह साथ दे गए वो जीत का ताज पहन कर इतराता हुआ पूर्णता की मनौती मनाने लगता है।

इन सबसे बेखबर जनता लोकतंत्र के पर्व को पूरे उत्साह के साथ मनाती है। उसे क्या ? कौउ नृप होय हमय का हानि के भाव को मन में भरे हुए, वोट देने जाने को आतुर रहती है। तभी गली  चौराहे में खड़े लोग आपसी परिचर्चा करके हवा का रुख निर्धारित कर देते हैं। जल्दी ही आग को हवा मिलती है और परिवार, मोहल्ला, समाज अपना वोट एक दिशा में मोड़ देता है। लाभ – हानि से ऊपर उठ व्यक्तिगत व्यवहार, देशहित, जीवन मूल्य, धर्म रक्षा हेतु सशक्त उम्मीदवारों को चुन कर कुर्सी पर विराजित कर दिया जाता है।

बस मजबूत सरकार देश को गौरवान्वित करने की शपथ लेकर लोककल्याण के कार्यों में जुट जाती है। ग्रहों से ऊपर एक दुनिया स्थापित हो सारे पूर्वाग्रहों को चकनाचूर करती जाती है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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