श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है सम्मान के पर्याय पानी पर आधारित एक अतिसुन्दर लघुकथा “पानी का स्वाद…”। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 125☆

☆ लघुकथा  – 🌨️पानी का स्वाद 🌨️  

गर्मी की तेज तफन, पानी के लिए त्राहि-त्राहि। सेठ त्रिलोकी चंद के घर के आसपास, सभी तरह के लोग निवास करते थे। परंतु किसी की हिम्मत उसके घर आने जाने की नहीं थी, क्योंकि वह अपने आप  को बहुत ही अमीर समझता था।

सारी सुख सुविधा होने के बाद भी त्रिलोकी चंद मन से बहुत ही अवसाद ग्रस्त था, क्योंकि सारी जिंदगी उसने अपने से छोटे तबके वालों को हमेशा नीचा दिखाते अपना समय निकाला था।

उसके घर के पास एक  किराये के मकान में बिटिया तुलसी अपनी माँ के साथ रहती थी।

गरीबी की मार से दोनों बहुत ही परेशान थे। माँ मिट्टी, रेत उठाने का काम कर करती और बिटिया घर का काम संभाल रखी थी।

गर्मी की वजह से नल में पानी नहीं आ रहा था और मोहल्ले में पानी की बहुत परेशानी थी। मोहल्ले वाले सभी कहने लगी कि शायद त्रिलोकी चंद के यहाँ जाने से सब को पीने का पानी मिल जाएगा।

उसने पानी तो दिया परंतु सभी से पैसा ले लिया। जरुरत के हिसाब से सभी अपनी अपनी हैसियत से पानी खरीद रहे थे। सभी के मन से आह निकल रही थी।

कुछ दिनों बाद सब ठीक हुआ मोहल्ले में पानी की व्यवस्था हो गई। सब कुछ सामान्य हो गया।

आज त्रिलोकी चंद अपने घर के दालान दरवाजे के पास कुर्सी लगा बैठा था।

तुलसी माँ के काम में जाने के बाद पानी के भरें घड़े को  लेकर आ रही थी। उसके चेहरे पर पसीने और पानी की धार एक समान दिख रही थी।

ज्यों ही वह त्रिलोकी चंद के घर के पास पहुंची वह देख रही थी कि अचानक वह कुर्सी से गिर पड़े।

परिवार के सभी सदस्य घर के अंदर थे। तुलसी को कुछ समझ में नहीं आया फिर भी हिम्मत करके घड़े का पानी त्रिलोकी चंद के चेहरे और शरीर पर डाल  दिया। पास में रखे गिलास से उसने पानी पिलाया। त्रिलोकी चंद पानी पी कर बहुत खुश हुआ और उसे आराम लगा।

आज उसे पानी से स्वाद मिला। और उसकी आँखें भर आई। और उसे समझ आया कि मेहनत का पानी मीठा होता है।

घर के सभी सदस्य बाहर निकल कर तुलसी को डांटने लगे कि “तुमने कहां का पानी पापा को पिला दिया।”परंतु त्रिलोकी चंद को जैसे मन से भारी बोझ हट गया हो। उसे असीम शांति मिली। आज वह पानी में स्वाद  होता है ऐसा कह कर तुलसी के सर पर हाथ रखा।

मोहल्ले वाले कभी सपने में नहीं सोचते थे कि अपने घर के बाहर दरवाजे के पास पानी की व्यवस्था कर सभी को पानी लेने के लिए कहेगा।

परंतु यह सब काम उसने किया।

त्रिलोकी चंद  की जय जयकार होने लगी। वह समझ चुका था….

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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