श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी  एवं विचारणीय लघुकथा बारिश”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 131 ☆

☆ लघुकथा ☆ बारिश 🌨️🌿

शरद अपने बाग बगीचे को बच्चों की तरह देखभाल करते थे। एक बेटा था जो संगति के कारण बहुत ही अलग किस्म का निकला।

शरद पिछली बातों को भुला ना पा रहे थे… क्या कमी रह गई थी बेटे की परवरिश में? यही कि वह सख्ती से उसे जीवन में आगे बढ़ने और अपने जीवन में नित प्रति उन्नति करते रहने की शिक्षा देते थे।

शायद इसे अनुशासन और पाबंदी कहा करता था बेटा। घर का माहौल बेटे को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। 15 वर्ष की आयु के आते ही उसने अपना निर्णय स्वयं लेने लगा। माता- पिता के बातों की अवहेलना करने लगा। सब अपने मन से करने लगा।

आज शरद ने पूछ लिया…. “क्या वजह है कि तुम मेरी कोई बात का उत्तर नहीं देते? क्या अब मैं इतना भी नहीं पूछ सकता कि… कहां और किस से तुम्हारे पास पैसा आता है खर्च के लिए और तुम क्या काम करते हो?”

बेटे ने पिता जी की बात का जवाब दिए बिना ही बाहर निकल जाना उचित समझा। माँ यह सदमा बर्दाश्त न कर सकी और दिमागी संतुलन खो बैठी।

अब पूरी तरह शरद अकेले अपनी पत्नी के साथ जीवन संभाल रहे थे।

आज कई वर्षों बाद झुकी कमर और थरथराती हाथों से छाता लिए बगीचे में खड़े, बारिश में ताक रहे थे।

उन्होंने देखा सफेद साड़ी में लिपटी एक सुंदर महिला 5 वर्ष के बच्चे के साथ अंदर आई और पिता जी के चरणों पर सर रख दिया।

बच्चा कुछ सहमा हुआ था परंतु शरद की बूढ़ी आंखों ने तुरंत ही पहचान लिया और कहा…. “छोड़ गया तुम्हें मेरे हवाले।”

महिला ने नीचे सिर कर एक पत्र थमा दिया। बेटे की हाथ की चिट्ठी थी। शरद ने आगे पत्र खोलकर पढ़ा… ‘पिताजी शायद जब यह चिट्ठी आपको मिलेगी तब मैं नहीं रहूंगा। अपने बगीचे में एक पौधा लगा लेना। मुझे मेरे किए की सजा मिल चुकी परंतु इसे आप अपने जैसा इंसान बना देना।’

आज सावन की बारिश शरद को रुला रही थी, या हंसा रही थी कोई समझ ना सका। परंतु बारिश में बच्चे का हाथ लिए शरद सावन की बारिश में भींगने लगे थे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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