डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है एक बेहतरीन व्यंग्य – ‘लेखक का सन्ताप‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 223 ☆
☆ व्यंग्य – लेखक का सन्ताप ☆
[1]
आदरणीय तुलाराम जी,
सादर प्रणाम।
मैं पिछले चालीस साल से कलम का मजदूर बना हुआ हूँ। अब तक सात उपन्यास और तेइस कहानी संग्रह निकल चुके हैं। मेरे लेखन के प्रसंशकों की अच्छी खासी संख्या है। लेकिन मैं इसे ऊपर वाले की कृपा मानता हूँ, वर्ना मेरे जैसे आदमी की औकात ही क्या है।
आप प्रतिष्ठित समीक्षक हैं। बहुत लोगों से आपकी समीक्षा की तारीफ सुनी है। मेरे मित्र कहते हैं की आपकी समीक्षा लेखकों के लिए बहुत फायदेमन्द होती है।
मैं अपना सद्यप्रकाशित उपन्यास ‘ऊँट और पहाड़’ आपकी सेवा में समीक्षा के लिए भेज रहा हूँ। मेरे मित्रों की राय में यह बहुत उच्च कोटि का उपन्यास है। कुछ मित्र इसे दास्तायवस्की के ‘कारामाजोव ब्रदर्स’ की टक्कर का मानते हैं। अब आप निर्णय करें की वह किस स्तर का है। मैं आपकी समीक्षा तीन-चार अच्छी पत्रिकाओं में छपवा दूँगा। मेरे कई संपादकों से प्रेम-संबंध हैं, इसलिए दिक्कत नहीं होगी। समीक्षा जल्दी कर देंगे तो आपका आभारी हूँगा।
आपका
छेदीलाल ‘इंकलाबी’
[2]
प्रिय तुलाराम जी,
कल आपकी लिखी समीक्षा मिली। पढ़ कर बहुत निराशा हुई। आपने मेरे बहुचर्चित और लोकप्रिय उपन्यास को बचकानी और दिशाहीन बताया है जिससे मुझे गहरा आघात लगा है। अब मेरी समझ में आ गया कि लोग झूठमूठ ही आपकी तारीफ करते हैं, आप में तो निरक्षर आदमी के बराबर भी समझ नहीं है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप जैसा अनाड़ी आदमी समीक्षा का महत्वपूर्ण काम कैसे कर रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि आप समीक्षा करने के बजाय भाड़ झोंकते हैं। मैं आपके खिलाफ अभियान चलाऊँगा।
आपने लिखा है कि मेरी भाषा कमजोर है। आपने लिखा है कि मैंने कई जगह ‘स्थिति’ को ‘स्तिथि’, ‘प्रवृत्ति’ को ‘प्रवर्ती’, ‘प्रशंसा’ को ‘प्रसंशा’ और ‘तरन्नुम’ को ‘तरुन्नम’ लिखा है जो मेरी भाषा की अनभिज्ञता को दिखाता है। आपने यह भी लिखा है कि मैं ‘कि’ के स्थान पर ‘की’ लिखता हूँ जो बड़ी गलती है। यह सब फालतू मीन-मेख निकालने की बात है। भाषा की छोटी-मोटी गलतियाँ निकलने से कोई किताब बेकार नहीं हो जाती।
जाहिर हुआ कि आप मेरे प्रति दुर्भाव रखते हैं और किसी ने आपको मेरे खिलाफ भड़काया है। वर्ना आप मेरे स्तर के लेखक की किताब को इस तरह खारिज न करते।
आपकी लिखी समीक्षा मैंने डस्टबिन में डाल दी है। अब किसी दूसरे समझदार समीक्षक से लिखवाऊँगा। अभी साहित्य में समझदार समीक्षकों की कमी नहीं है।
भवदीय,
छेदीलाल ‘इंकलाबी’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




