श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपके “मनोज के दोहे। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 181 – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆

बेलन से रोटी बने, सदियों का औजार।

भूखे को भोजन मिले, किया बड़ा उपकार।।

 *

तन-निरोग मट्ठा करे, पिएँ सदा ही रोज।

नित प्रातः ही घूमिए, जी भर खाएँ भोज।।

 *

वर्षा ऋतु में ऊगती, हरियाली जब घास।

प्रकृति बिखेरे हरितिमा, स्वागत करती खास।।

 *

सत्ता की रबड़ी चखें, नेतागण बैचेन।

जनता स्वप्नों में जिए, तरसें उसके नैन।।

जिसके हाथों लग गई, रूठी गुमी बटेर।

किस्मत उसकी खुल गई, कभी न लगती देर।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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