श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६४ \ ☆

?  व्यंग्य – फाइलें चल पड़ी हैं ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

देश में इन दिनों फाइलों का मौसम हर दिशा में एक साथ चल पड़ा है। परसाई जी के भोलाराम का जीव अभी तक यमराज की सूची और  रिकॉर्ड रूम की फाइलों  के बीच पेंडुलम की तरह झूल ही रहा होगा, क्योंकि यहां फाइल का भविष्य तय होने में वही पुरानी कहावत लागू रहती है कि नौ दिन चले अढ़ाई कोस। भोलाराम की कहानी आज भी सरकारी दफ्तर की टेबल पर पड़ी एक नोटशीट की तरह जीवित है, जिसमें हर पृष्ठ पर केवल यह लिखा रहता है कि प्रस्तुत प्रकरण पर उच्चाधिकारियों के निर्देश अपेक्षित हैं। परसाई के व्यंग्य का निशाना बाबूगिरी थी और है, और उनकी रचना भोलाराम का जीव हमारे समय के लालफीताशाहों पर कालजयी टिप्पणी बनी हुई है।

पर दफ्तर से बाहर निकलते ही अब देश में फाइलें सिनेमा हॉल में भी खुलने लगी हैं। कश्मीर फाइल्स ने दो हजार बाइस में एक बड़ी बहस को जन्म दिया। किसी ने इसे इतिहास के अनसुने पन्नों की प्रस्तुति कहा, किसी ने इसे विद्वेष फैलाने वाली कथा माना, पर इतना तय रहा कि यह फिल्म बक्से से निकली उस फाइल की तरह थी जो बरसों तहखाने में पड़ी थी और एक दिन अचानक प्रकाश में लायी गयी। उस पर समर्थन हुआ, विरोध हुआ, टैक्स छूट हुई, राजनीतिक भाषण हुए, और दर्शक कतार में लगे रहे। यही वह बिंदु है जहां सिनेमा और फाइल संस्कृति का गठजोड़ होता दिखा, जहाँ कहानी, किरदार और फाइल्स में कैद इतिहास  एक साथ पर्दे पर पुनर्जीवित हो रहा है।

बंगाल फाइल्स का ट्रेलर कोलकाता में लॉन्च होना था। कार्यक्रम में तार कटे, हंगामा हुआ, आयोजन रोका गया, फिर किसी तरह जारी भी हुआ। एक फिल्म का ट्रेलर तक अटकती लटकती फाइल जैसा, कभी मंजूर, कभी स्थगित, कभी रद्द, फिर किसी नई मुहर की प्रतीक्षा। ट्रेलर प्रदर्शन भी अभिलेखागार  की खामोशी में बदल गया। यह दृश्य जैसे कह रहा था कि फाइल जहां भी जाती है, वहां बिना टिप्पणी के वापस नहीं आती।

इधर उदयपुर फाइल्स की फाइल अलग खुली हुई है। अदालतें, मंत्रालय, संशोधन, अस्वीकरण, और अंततः थिएटर तक पहुँचना। रिलीज से पहले किसी ने रोक लगाने की दलील दी, किसी ने रिहाई का तर्क रखा, और अंत में परदे पर रोशनी जली। इस दौरान पीड़ित परिवार की पीड़ा भी प्रदर्शनी का हिस्सा बन गई। अदालत और सेंसर की मुहरें, याचिकाएँ और आदेश, सब मिलकर वही पुराने कार्यालयी शब्दकोश के पन्ने पलटते हैं जिनमें कहा गया है कि अभिव्यक्ति और निष्पक्ष सुनवाई दोनों की रक्षा करनी है, बशर्ते फाइल सही डेस्क तक समय से पहुँच जाए।

और हां, फाइलों की यह खनक केवल दो चार शीर्षकों तक सीमित नहीं रही। दिल्ली फाइल्स का एलान भी हुआ, जो अलग पन्ने का इतिहास खोजती दिखाई दी, कभी इसे त्रयी का अंतिम अध्याय बताया गया। अब तो लगता है कि फाइल अभिव्यक्ति की एक विधा बन गई है, जैसे व्यंग्य उपन्यास, कहानी और कविता। यह सिनेमा का फाइलीय युग है, जहाँ कथानक कम और केस हिस्ट्री अधिक होती है, जहाँ स्क्रीनप्ले की पहली पंक्ति होती है कि प्रस्तुत विषय अत्यंत संवेदनशील है और दर्शकों से संयम की अपेक्षा है। पहले डिस्क्लेमर होता था कि किसी सत्य घटना से कहानी का मेल संयोग माना जाए , अब दर्शक ही इस तथ्य से जुड़ते हैं कि फिल्म सत्य घटना से प्रेरित है।

दफ्तर की फाइल हो या फिल्म की फाइल, दोनों में एक साझा तत्व है, विवाद। दफ्तर की फाइल बिना आपत्ति पत्र के आगे नहीं बढ़ती और फिल्म की फाइल बिना बहस अथवा कोर्ट केस  के बॉक्स ऑफिस तक नहीं पहुँच पाती। दफ्तर में नोटशीट पर लाल स्याही बोलती है, सिनेमा में सोशल मीडिया की नीली टिक। उधर बाबू लिखता है कि वांछित जानकारी उपलब्ध न होने से प्रस्ताव फिलहाल रोक दिया जाए, इधर किसी प्रवक्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में वही वाक्य नया रूप ले लेता है कि विषय पर शांतिपूर्वक विचार चल रहा है। दोनों के बीच जनता खड़ी रहती है, जो कभी टिकट खिड़की पर, कभी जनसुनवाई में लाइन में लगती है, और हर बार आशान्वित होती है कि अगली तारीख निश्चित ही अंतिम होगी।

परसाई शायद आज भोलाराम का जीव लिखते तो पेपरलेस फाइल की दुनिया में यमराज के दफ्तर में भी कंप्यूटर क्रेश करना पड़ता तभी फाइल गुम हो सकती थी, यह आज के डिजिटल युग की व्यंग्य तस्वीर है। हमने कागज़ से पोर्टल तक लंबी यात्रा की, पर कर्सर भी वही करता है जो कभी बाबू की तर्जनी करती थी, स्क्रीन पर अपलोड फोल्डर लिखकर आपको वही पुराना वाक्य पढ़वा देता है कि पुनः प्रयास करें। सामान्य नागरिक की व्यथा वैसी ही बनी रहती है, बस गेट पास की जगह ओटीपी आ गया है, नोटिंग की जगह पीडीएफ लग गया है, और डाक की जगह लिंक। मनुष्य और व्यवस्था के बीच जो फाइल रखी जाती थी, वह अब भी बीच में पड़ी है, बस उसकी जिल्द का रंग बदल गया है।

सिनेमा ने फाइल को लोकप्रिय संस्कृति का पात्र बना दिया है। टिकट लेकर दर्शक फाइल के पन्ने पलटता है, दृश्य दर दृश्य। कभी पीड़ा, कभी रोष, कभी तालियाँ, कभी हूटिंग। अदालतें कहती हैं कि स्वतंत्रता और पूर्वाग्रह के बीच संतुलन चाहिए, सेंसर कहता है कि अस्वीकरण जोड़ दीजिए, निर्माता कहता है कि हमारी मेहनत और निवेश दांव पर है। यह पूरा तंत्र किसी बड़ी रिंग फाइल जैसा है, जिसमें अलग अलग विभाग अपनी अपनी नई शीट डालते जाते हैं और अंततः क्लिप बंद कर देते हैं। रिंग बंद होगी तो फिल्म चलेगी, रिंग खुली रह गई तो प्रेस रिलीज़ ही कहानी बन जाएगी।

सच्चाई यह भी है कि फाइलें केवल तथ्यों का पुलिंदा नहीं, भावनाओं का बहीखाता भी होती हैं। कश्मीर फाइल्स ने एक पुराने घाव को छुआ तो किसी ने ताली बजाई, किसी ने दरार की बात कही। उदयपुर फाइल्स एक ताजा दुख के पास से गुजरी तो परिवार के आँसू भी खबर बने। बंगाल फाइल्स राजनीति के उफान में उतरती है तो माइक के तार भी राजनीति का शिकार हो जाते हैं। हर फाइल के साथ एक राष्ट्र अपनी स्मृति से जूझता है कि क्या याद रखें, क्या भूल जाएँ, और क्या नए शब्दों में दोहराएँ। क्या नई पीढ़ी के लिए  फिर फिर दोहराया जाए क्या इतिहास में दफन किया जाए।

देश का सबसे बड़ा पात्र शायद फाइल ही है। यह उन हाथों की उँगलियों के आकार की हो जाती है जो उसे पलटते हैं, और उन आँखों की रोशनी जितनी तेज हो जाती है जितनी उसे पढ़ने वाले की इच्छा शक्ति। भोलाराम की फाइल यमलोक तक चली गई थी, हमारी फाइलें अभी धरती पर ही घूम रही हैं। अदालत की तारीख, मंत्रालय की मीटिंग, होटल का ट्रेलर लॉन्च, सेंसर की स्क्रीनिंग, सब एक ही महाकथा के अध्याय हैं। इस महाकथा का नायक न कोई स्थापित सितारा है न कोई मंत्री, यह वही पुराना कागज़ है जिसने अपने ऊपर अनगिनत हस्ताक्षर और मुहरें झेली हैं और हर बार चुपचाप अगली मेज तक चला गया है।

शायद हमें एक राष्ट्रीय त्यौहार भी रखना चाहिए, फाइल दिवस। उस दिन हर फाइल को एक बार खुला छोड़ दें कि वह खुद तय कर ले किस मेज पर जाना है। कौन जाने किसी फाइल की आत्मा भी भोलाराम के जीव की तरह आज़ादी माँग ले। और अगर ऐसा हो गया तो दफ्तर के गलियारे थोड़े चौड़े लगेंगे, सिनेमा में बहस थोड़ा संयत होगी, और नागरिक को यह यकीन होगा कि उसकी फाइल अब फाइल नहीं, उसका लिखा हुआ इतिहास है जो किसी भी दिन रिकॉर्ड रूम से, पाठ्यक्रम में लग सकता है। फिलहाल तो यही कह सकते हैं कि देश चलता रहे, फाइलें खुलती रहें, और हम सब दर्शक बनकर देखते रहें कि अगली आवाज किसकी आती है, आदेशित या स्थगित।

अंततः, फाइल की दुनिया में सत्य की परिभाषा भी फाइल जैसी ही है, कहीं आधिकारिक, कहीं वैकल्पिक, और कहीं विवादित। परसाई की कलम ने जो दिखाया था वह आज भी हमारे सामने है, बस मंच बदल गया है। एक ओर सरकारी टेबल, दूसरी ओर सिनेमा स्क्रीन। दोनों के बीच वही पुराना रिश्ता, पहले नोटिंग फिर अभिनय। और जनता, जो हर पंक्ति में अर्थ ढूँढती है, अगले पृष्ठ की प्रतीक्षा करती है, और अंत में ताली बजा देती है कि चलो आज फाइल सचमुच आगे बढ़ गई।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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