श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७९ ☆

?  व्यंग्य – लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो ! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वो जमाना गया जब लोग अख़बार में “आज का विचार” पढ़कर दिन की शुरुआत करते थे। अब लोग सुबह उठते ही मोबाइल उठाकर “आज की वायरल रील” देखते हैं  जिसमें कोई बाल सुखा रहा है, कोई नाच रहा है, और कोई तो बिना वजह ही होंठ चबा कर भद्दे इशारे रही है। गोया कि होंठ चबाना भी कोई राष्ट्रीय खेल बन गया हो। टिकटॉक और रील्स ने दुनिया को ऐसा उलझाया है कि लोग अब रील्स पर दिखाने के लिए कपड़े बदलते हैं। एक आउटफिट से तीन-तीन रील्स!  कपड़ों की एक्सपायरी डेट नहीं होती पर रील्स की होती है । “अरे ये वाला तो कल ही पोस्ट किया था, आज दूसरा पहनना पड़ेगा, नहीं तो लोग ट्रोल करेंगे।”

एक जमाना था जब लोग खाने से पहले “बिस्मिल्लाह” कहते थे, अब “वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन” करते हैं। यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ये खा रहे हैं, या इंस्टाग्राम पर दिखाने के लिए खाने की एक्टिंग  कर रहे हैं? खाना ठंडा हो जाए तो चलेगा, पर रील का एंगल परफेक्ट होना चाहिए। “अरे ज़रा चम्मच ऐसे पकड़ो, लाइट इधर से आ रही है… हाँ! परफेक्ट! अब चबाओ स्लो मोशन में।” खाना अब पेट नहीं, फोन भरता है। रील की इनकम पेट भर सकती है।

घर की दादी, जो पहले तक ‘व्हाट्सएप’ को ‘व्हाट्शैप’ कहती थीं, अब खुद ‘रील क्वीन’ बन चुकी हैं। चश्मा चढ़ाकर ट्रेंडिंग साउंड सुनती हैं और बोलती हैं  “बहू, ये वाला गाना तो हमारे ज़माने का है, इस पर हम भी रील बनाएंगे!” और फिर शुरू होता है परिवार का सामूहिक प्रोडक्शन हाउस। पोते कैमरामैन बनते हैं, बेटा डायरेक्टर, पति कैमरामैन और दादी हीरोइन। “दादी, एक बार और! इस बार हाथ थोड़ा ऊपर उठाना।” दादी की फिटनेस एक्सरसाइज अब योग से नहीं, रीटेक से हो रही है।

“आज ये डायलॉग ट्रेंड में है, इसका वीडियो बना दो ज़रा”, पत्नी कहती हैं, और फिर शुरू होता है उनका गायन सह अभिनय जिसे यदि शंकर महादेवन देख लें तो सुर की समाधि में चले जाएं। “अरे सुनो न, लिप सिंक गड़बड़ हो गया, एक बार और!” पति जो पहले ऑफिस में बॉस की डाँट खाते थे, अब घर में ‘डायरेक्टर बीवी’ की सुनते हैं। “तुमने फोन हिला दिया! फोकस बिगड़ गया! तुमसे एक काम सही से नहीं होता!” अब शादी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पति कितनी अच्छी रील बना देता है।

दुनिया हकीकत से अधिक, कैमरे में जी रही है। कभी लोग पार्क में टहलने जाते थे, अब ट्राइपॉड लेकर रील्स बनाने जाते हैं। पेड़-पौधों से बात नहीं करते, उनके पीछे खड़े होकर डांस करते हैं। वो  पेड़ भी सोचता होगा  “मुझे ऑक्सीजन देने दो या बैकड्रॉप बनने दो, कुछ एक तो तय करो!” और अगर गलती से कोई इनकी शूटिंग के बीच से निकल जाए, तो उसे ऐसे घूरते हैं जैसे उसने फ़िल्मफेयर अवार्ड छीन लिया हो। “अरे भाई, दिखता नहीं शूटिंग चल रही है? अब पूरा फिर से बनाना पड़ेगा!” वो बेचारा सोचता है  “ये पार्क है या मल्टीप्लेक्स शूट स्टूडियो?”

अब रील्स ही असली हैं,ज़िंदगी बैकग्राउंड में चल रही है। शादी हो तो पहले पंडित नहीं, कैमरामैन बुलाओ। “बेटे की शादी में तो पाँच रीलमेकर रखे थे, हर एंगल से कवर हो!” लड़का लड़की एक दूसरे को नहीं, कैमरे को देख रहे होते हैं। फेरे ले रहे हैं, पर निगाह फोन पर होती हैं । लाइव पर “कितने व्यूज आए?” मेहमान खाना नहीं खा रहे, रील बना रहे हैं। “अरे पनीर  टिक्का कैसा लग रहा है फ्रेम में?”

टिकटॉक बंद हुआ तो लगा कुछ चैन मिलेगा, पर इंस्टाग्राम छा गया। और यूट्यूब शॉर्ट्स ने तो जैसे कसम खा ली है “हर इंसान को कम से कम एक वीडियो ज़रूर बनवा कर ही मानेंगे।” अब तो फेसबुक भी रील्स लेकर आ गया। यानी, भागो कहीं भी, रील्स का भूत पीछा करेगा ही। लिंक्डइन पर भी लोग प्रोफेशनल रील्स बना रहे हैं “देखिए कैसे मैं ऑफिस में कॉफी पीते हुए प्रोडक्टिव रहता  हूँ।”

बुद्धिजीवी अब ‘बुक क्लब’ नहीं, ‘रील क्लब’ में शामिल हैं। “कैसे बनाएं वायरल वीडियो?” पर सेमिनार होते हैं। “लाइक नहीं आए तो आत्ममंथन करें”  ये आज का गंभीर विषय है। प्रकाशक मुझसे बोला सर कविता कहां ले आए ? कुछ युवाओं के लायक लिखी पांडुलिपि लाइये मसलन ” रील से पैसे कैसे बनाएं”

इंजिनियरिंग कॉलेज  में पहले इंजीनियरिंग पढ़ाई जाती थी, अब “वायरल मार्केटिंग 101” कोर्स शुरू होने वाला है। MBA की डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है “10 लाख फॉलोअर्स”। नौकरी के इंटरव्यू में अब पूछा जाता है  “आपके इंस्टाग्राम पर कितने फॉलोअर्स हैं?” बायोडाटा में लिखा होता है ,  “अनुभव: 5 साल, वायरल रील्स: 12″।

अब लोग परीक्षा में कम नंबर आने पर नहीं, वीडियो पर कम लाइक्स आने पर बच्चे डिप्रेशन में जाने लगे हैं। “मम्मी, मेरी रील पर सिर्फ 200 लाइक्स आए!” माँ दिलासा देती है “बेटा, टाइमिंग गलत थी, शाम को पोस्ट करना था।” पहले बच्चे बोर्ड एग्ज़ाम के रिज़ल्ट से डरते थे, अब रील के व्यूज से। काउंसलर भी अब नई समस्याओं से जूझ रहे हैं “डॉक्टर साहब, मेरी रील वायरल नहीं हो रही, मुझे लगता है मैं असफल हूँ।”

सोचता हूँ, ये रील बनाने वाले आखिर करते क्या हैं? तो जवाब आता है  “रील बनाते हैं, और वही करते हैं।” दिन की शुरुआत रील से, अंत रील से। सुबह उठे  “गुड मॉर्निंग “। नाश्ता किया  “ब्रेकफास्ट रील”। ऑफिस गए  तो भी रील”। लंच किया  “फूड रील”। शाम को जिम किया तो “वर्कआउट रील”। रात को सोए  “गुडनाइट रूटीन रील”। यानी, ज़िंदगी एक बड़ी रील है और हम सब उसमें महज एक्स्ट्रा किरदार हैं।

घर में बर्तन गिरते हैं तो पत्नी चिल्लाती नहीं, कहती है  “सुनो न, मैं फिर से गिराती हूं, जरा इसका स्लो मोशन बना लो!” नया आइडिया है। है न! बच्चा रो रहा है तो पहले फोन उठाओ। “अरे रुको, रिकॉर्डिंग ऑन करने दो, ये ‘क्यूट बेबी क्राइंग’ रील बनेगी।” बच्चा चुप हो गया तो बोलो “बेटा, फिर से रो ले, एंगल गड़बड़ हो गया था।” प्यार भी अब रिहर्सल माँगता है।

पढ़ाई छोड़, करियर छोड़, रिश्तेदार छोड़ ,  सब छोड़ कर लोग अब केवल “वायरल होने” की साधना कर रहे हैं। गुरुकुल में अब योगासन नहीं, “कंटेंट स्ट्रैटेजी” सिखाई जाती है। संन्यासी भी अब हिमालय नहीं, स्टूडियो में वर्चुअल ध्यान करते हैं  “फॉलोअर्स बढ़ाने का मंत्र, अगली रील में।” गलती से जो कोई वीडियो चल गया, तो समझो  “ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया।” तब फिर क्या, बाकी ज़िंदगी वही फॉर्मूला रिपीट करो। “वो वाला ही डांस फिर करो, वही बैकग्राउंड, वही ओछे चमकीले  कपड़े!”

हाल यह है कि दुनिया के बड़े-बड़े सवालों के जवाब हमें शॉर्ट वीडियो में मिलते हैं। चाहे जीवन का उद्देश्य हो, या सिक्स पैक ऐब्स बनाने की शिक्षा । सब कुछ 30 सेकंड में समझा दिया जाता है। “क्वांटम फिजिक्स समझें 60 सेकंड में!” “महाभारत की पूरी कहानी  एक रील में!” ज्ञान की गहराई अब 30 सेकंड की है। पहले गुरु कहते थे  “बेटा, वर्षों लगेंगे समझने में”, अब रील गुरु कहते हैं  “बस एक मिनट दो, सब क्लियर हो जाएगा।” यानी, ज्ञान अब ज्ञान नहीं  कंटेंट बन गया है। और सबसे बड़ी बात  “फॉलो करना मत भूलना!”

ऊपर की ओर स्क्रॉल करते हुए समय कब बीत जाता है, किसे पता चलता है। सुबह 10 बजे फोन खोला  सोचकर  “बस एक रील देखूँ।” अचानक नज़र घड़ी पर  दोपहर के 2 बज गए! ये कौन-सी आइंस्टीन की थ्योरी है जिसमें 10 मिनट    4 घंटे के बराबर हो रहे हैं? रील्स में टाइम ट्रैवल होता है, बस भविष्य की तरफ ही। वापस नहीं आ सकते। लोगों की नींद उड़ गई है, टाइम पास हो रहा है। सोने जा रहे हो  “चलो सोते हैं, पर पहले एक रील।” फिर एक, फिर एक, और सुबह की नमस्ते! रात 2 बजे अचानक याद आता है  “अरे, कल मीटिंग है!” पर फिर सोच “चलो एक और लास्ट देख लेते हैं।”

हम सब डिजिटल कंटेंट क्रिएटर बनकर उस डॉलर की प्रतीक्षा में हैं जो हमारी रील्स के व्यूज, लाइक, रीपोस्ट और सब्सक्राइब से टोटल टाइम ऑफ वॉचिंग से आएगा। बच्चे अब डॉक्टर इंजीनियर से अधिक बड़े  “इन्फ्लुएंसर” बनना चाहते हैं। “मम्मी, मैं बड़ा होकर यूट्यूबर बनूँगा!” पहले माता-पिता कहते थे  “बेटा, पढ़-लिख कर कुछ बनो”, अब बच्चे कहते हैं  “पापा, आपको नहीं पता, मेरे 5000 फॉलोअर्स हैं!” और पापा गर्व से कहते हैं “हमारा बेटा इन्फ्लुएंसर है!”

जिस दिन इंटरनेट डाउन हो गया, उस दिन ये पूरी रील असेंबली पूछेगी , “अब मैं क्या करूं, जाऊं तो जाऊं कहाँ?” लोग सड़कों पर भटकेंगे, हाथ में फोन लिए, निगाह खाली स्क्रीन पर। “नेटवर्क कब आएगा?” ये नया राष्ट्रीय प्रश्न बन जाएगा। बच्चे रोएंगे, बड़े घबराएंगे, और दादी बोलेंगी  “हमारे ज़माने में तो बिजली जाती थी, फिर भी हम  रहते थे।” पर कोई सुनेगा नहीं, क्योंकि बिना रील्स के सुनने की आदत ही खत्म हो गई है।

असली ज़िंदगी अब “अनस्क्रिप्टेड कंटेंट” लगने लगी है , बोरिंग, बिना एडिट का, बिना फिल्टर का। “अरे ये तो रियल लाइफ है, कौन देखेगा इसे?” रिश्ते अब “कोलैबोरेशन” हैं। “चलो मिलते हैं और एक साथ मस्त रील बनाते हैं।” दोस्ती की परिभाषा बदल गई  “जो तुम्हारी हर रील पर पहला कमेंट करे, वही सच्चा दोस्त।”

और हाँ, सबसे बड़ी बात,  अब तो शादियों में भी लड़के लड़की एक दूसरे के इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखते हैं। “लड़की है तो अच्छी, पर फॉलोअर्स कम हैं।” “लड़का कमा तो अच्छा रहा है, पर एस्थेटिक सेंस नहीं है, रील्स देखो इसकी।” बायोडाटा में अब लिखा होता है  “नेट वर्थ: 50 लाख, फॉलोअर्स: 1 लाख”। और सास-बहू की पहली बातचीत “बेटा, तुम रील्स बनाती हो? हमारे घर की पारंपरिक पोशाक पहनकर एक बना देना, वायरल हो जाएगी!”

@ कैमरा ऑफ. लेखक ऑफ. दिमाग स्टैंड बाई मोड पर।

पर रुकिए… ये आर्टिकल तो बहुत लंबा हो गया। अब इसे भी 30-30 सेकंड के पार्ट में बाँटना पड़ेगा। क्योंकि अब कोई पूरा आर्टिकल पढ़ता ही कहाँ है? सब रील में चाहिए। तो अगली रील में मिलते हैं  “व्यंग्य, पर शॉर्ट फॉर्म में!”लाइक करो, शेयर करो, और हाँ… फॉलो करना मत भूलना!

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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