श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन जी द्वारा लिखित “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९७ ☆
☆ “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)” – संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति: व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)
संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन
प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य: ₹550/-
पृष्ठ संख्या: 212
ISBN: 978-93-49362-25-3
चर्चा: विवेक रंजन श्रीवास्तव
साहित्य जब समाज का जीवंत दस्तावेज बनता है, तो वह केवल शब्दों का संचयन नहीं रह जाता, बल्कि कालखंड की पदचाप बन जाता है। ‘व्यंग्य के रंग ‘ के पन्नों से गुजरते हुए ऐसा ही महसूस होता है। यह संकलन उन बिखरे हुए वैचारिक व्यंग्य के मोतियों की माला है, जो आज के संक्रमणकालीन भारत की तस्वीर को पूरी नग्नता और आत्मीयता के साथ उकेरते हैं।
संपादन की मेज पर परवेश जी ने जिस धैर्य और दृष्टि का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। उनके ‘संपादकीय कथन’ में स्पष्ट झलकता है कि यह संकलन केवल रचनाओं का जमावड़ा नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से इस संग्रह की प्रकाशन यात्रा साझा की है।
इस संग्रह की शक्ति इसकी विविधता है। राजनीति के गलियारों से लेकर सामाजिक सरोकारों की गलियों तक, यहाँ हर मोड़ पर एक नई दृष्टि मिलती है। राजनीति केंद्रित व्यंग्य लेखों में ‘लोकतंत्र ‘ पर किए गए कटाक्ष पठनीय हैं। विभिन्न लेखकों की अपनी शैली में केंद्रीय चिंता एक विसंगति है। शुचिता की कामना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सत्ता के खेल में खोते जा रहे नैतिक मूल्यों पर कड़ा प्रहार करती रचनाएं हैं। लेखों के माध्यम से व्यवस्था के दोहरेपन को बेनकाब कर व्यंग्यकारों ने उनके हिस्से के लेखकीय दायित्व निभाने का यत्न किया है।
इस संकलन में मेरी (विवेक रंजन श्रीवास्तव) की भी कुछ वैचारिक भागीदारी रही है। मेरा व्यंग्य लेख ‘ लाइक, शेयर, सब्सक्राइब प्लीज! शामिल किया गया है।
विकास की बलि चढ़ते सरोकार से खिन्न लेख, व्यंग्यकारों की छटपटाहट की अभिव्यक्ति है। आखिर हम कंक्रीट के जंगल उगाकर किस हरियाली की तलाश कर रहे हैं? तकनीकी विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच का जो असंतुलन है, उसे लेखकों ने अपनी तार्किकता और साहित्य की तरलता के साथ पिरोने का प्रयास किया है।
संग्रह में शामिल कुल 88 रचनाओं में हरएक के अपने अनुभव, अलग अलग रचना समय, स्मृति, जड़ों की ओर वापसी जैसे मूल सिद्धांत पाठक के मानस पटल पर गहरी छाप छोड़ती हैं।
सामूहिक संकलनों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘डेमोक्रेसी’ होती है, जहाँ भिन्न विषय पर अलग-अलग लेखकों के भिन्न दृष्टिकोण पाठक को सोचने के लिए एक व्यापक धरातल प्रदान करते हैं। वरिष्ठ कलमकारों का अनुभव और नए लेखकों का उत्साह, इस पुस्तक को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।
पुस्तक की साज-सज्जा और इसके आवरण (Cover) पर चर्चा किए बिना यह समीक्षा अधूरी होगी। आवरण का डिजाइन प्रतीकात्मकता से भरा है।
गांधी जी की मेज पर उपस्थित तीन बंदरों का प्रतीकात्मक संदेश न्यू आर्ट फॉर्म में, ब्लैक एंड व्हाइट चित्र से प्रदर्शित किया गया है। जो द्वंद्व कवर पर चित्रित किया गया है, वह पुस्तक के शीर्षक के साथ पूरा न्याय करता है।
पुस्तक क्या ग्रंथ कहा जाना चाहिए में, अकारादी क्रम में लेखक शामिल हैं। राजू श्रीवास्तव, डॉ. अजय अनुरागी, डॉ. अजय जोशी, अखतर अली, अलंकार रस्तोगी, अलका अग्रवाल सिगतया, आलोक पुरानीक, अनीता यादव, अनूप शुक्ल, डॉ. कुमारी अर्पणा, अर्चना चतुवदी, अरुण अर्नव खरे, अरिवंद तिवारी, आशीष दशोतर, आत्माराम भाटी, डॉ. अतुल चतुर्वदी, बी.एल. आचछा, बिंदु जैन, ब्रजेश कानूनगो, बुलाकी शमा, धर्मपाल महेंद्र जैन, दिलीप कुमार, दिलीप तेतरवे, डॉ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, फ़ारूक़ आफ़रीदी, गिरीश पंकज, ज्ञान चतुर्वेदी, हनुमान मुण्ड, हरशंकर राढ़ी, डॉ. हरीश कुमार सिंह, डा हरीश नवल, इंद्रजीत कौर
, इंद्रजीत कौशिक, इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’, जय प्रकाश पाण्डेय, जीतेंद्र जितांशु, डॉ. के.के. अस्थाना, कैलाश मण्डलेकर, डॉ. किशोर अग्रवाल, डॉ. कुलवंत सिंह शेहरी, डॉ. लालित्य ललित, मलय जैन, मीरा जैन, मुकेश राठौर, मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ा
नीरज दइया, पंकज सून, डॉ. पंकज साहा, परवेश जैन, पवन कुमार जैन, डॉ. पिलक अरोरा, शारदेन्दु शुक्ला ‘शरद’, शिशिर सिंह, श्रीकांत आप्टे, डॉ. स्नेहलता पाठक, सुभाष चंदर, सुभाष काबरा, सुधीर कवलिया, सुनील जैन ‘राही’, सुनील सक्सेना, डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतुप्त’, सूर्यबाला, विजय आनंद दुबे, विजय शंकर मिश्र, विशाल चर्चित, विवेक रंजन श्रीवास्तव, यशवंत कोठारी, पूरन सरमा, प्रभाशंकर उपाध्याय, प्रभात गोस्वामी एवं पृथ्वीराज चौहान, डॉ प्रेम जनमेजय, डॉ. राजेश कुमार, राज नागर ‘निरंतर’, राजेश वर्मा, आचार्य राजेश कुमार, राकेश सोहम, राम भोले शर्मा, रामस्वरूप दीक्षित, रामविलास जांगिड़, डॉ. रामवृक्ष सिंह, रमाकांत ताम्रकार, रमेश सैनी, रणविजय राव, रश्मि चौधरी, डॉ. संगीता शर्मा अधिकारी, सीमा राय ‘मधुरिमा’ एवं सेवाराम त्रिपाठी जैसे सभी स्वनाम धन्य सुप्रसिद्ध व्यंग्य कारों को एक जिल्द में पढ़ सकते हैं।
लगभग 350 पृष्ठ की किताब का गेटअप, रंगों का चयन और शीर्षक का संयोजन पहली नजर में ही पाठक को अपनी ओर आकर्षित करता है और विषय-वस्तु की गंभीरता का संकेत दे देता है। अद्विक पब्लिकेशन ने मुद्रण और कागज की गुणवत्ता में भी उच्च मानक स्थापित किए हैं।
अंततः, यह संकलन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सहेजने के लिए है। यह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी आत्मा की धड़कनें आज भी शाश्वत सत्य के मूल्यों के बीच कहीं अटकी हुई हैं।
किताब खरीदिए, पढ़िए और अपनी सम्मति से व्यंग्य जगत के इस ” जोर लगा कर हैय्या” वाले समवेत स्वर को बधाई दीजिए।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






