श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९८ ☆
☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – “व्यंग्य का मनोविज्ञान”
लेखक – डॉ संजीव कुमार
प्रकाशक – इंडिया नेटबुक्स, नोएडा
एक सर्वथा नए अनछुए विषय पर और विश्वसनीय कृति के रूप में डा संजीव कुमार की नई किताब “व्यंग्य का मनोविज्ञान”लिखी गई है। व्यंग्य को मात्र साहित्यिक विधा न मानकर उसे मनुष्य और समाज के अंतर्मन से जोड़कर देखती यह पुस्तक व्यंग्य को हँसी का साधन नहीं बल्कि सामाजिक आत्मावलोकन और मनोवैज्ञानिक फीडबैक मैकेनिज्म के रूप में स्थापित करती है ।
पुस्तक की संरचना पहचानने योग्य अकादमिक अनुशासन के साथ रची गई है। भूमिका के बाद आरम्भिक अध्यायों में लेखक ने व्यंग्य का स्वरूप उसकी परिभाषा और उसके मूल तत्त्वों जैसे विडंबना अतिशयोक्ति प्रतीक न्यूनोक्ति उपहास और व्यंग्यात्मक भाषा का विस्तार से विवेचन किया है।
व्यंग्य को वह ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं जो किसी व्यक्ति विचार संस्था या समूचे समाज पर प्रहार करती हुई भी मूलतः सामाजिक सुधार की दिशा में उकसाने का काम करती है।
इस दृष्टि से व्यंग्य उनके लिए सामाजिक चेतना का सक्रिय माध्यम बन जाता है जो मनोरंजन के परदे के पीछे छिपे असुविधाजनक सत्य को पाठक के सामने लाता है।
ग्रंथ का दूसरा बड़ा आयाम व्यंग्यकार के मनोविश्लेषण से जुड़ा है। डॉ संजीव कुमार व्यंग्यकार की एक मानसिक संरचना की रूपरेखा खींचते हैं जिसमें समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता भीतर जमा असंतोष नैतिक आग्रह विद्रोही वृत्ति हास्यबुद्धि और न्याय बोध ये सभी तत्व सम्मिलित हैं। यही कारण है कि अपनी अनुभूति के अनुरूप हर व्यंग्यकार एक ही विषय पर अलग अलग तरह से व्यंग्य लिखता है।
व्यंग्यकार केवल चुटकुला रचयिता नहीं बल्कि एक सजग और विश्लेषक व्यक्तित्व है जो सत्ता संरचनाओं रूढ़ मान्यताओं और ढोंग के साथ स्वयं अपनी कमजोरियों तक को व्यंग्य के दायरे में रखता है।
व्यंग्यकार की इस आत्म समावेशी दृष्टि को लेखक व्यंग्य का एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक गुण मानते हैं जो उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाता है।
एक अलग खण्ड में संजीव जी व्यंग्य और पाठक के मनोविज्ञान के संबंध पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनके अनुसार व्यंग्य पाठक या दर्शक में एक साथ तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है पहली हँसी और मनोरंजन जो भावनात्मक तनाव को ढीला करते हैं दूसरी अपराध बोध और आत्म चिंतन जो व्यक्ति को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करते हैं और तीसरी परिवर्तन की आकांक्षा जो समाज के स्तर पर प्रतिरोध प्रश्नाकुलता और सुधार की इच्छा को जन्म देती है।
इस त्रिस्तरीय प्रभाव के कारण व्यंग्य उनकी दृष्टि में बड़ी ताकत से अपनी भूमिका निभाता है।
पुस्तक की एक विशेष शक्ति यह है कि व्यंग्य को वह अलग थलग साहित्यिक कोष्ठक में नहीं रखते बल्कि उसे सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं के बीच रखकर पढ़ते हैं। धर्म परम्परा जाति वर्ग आर्थिक असमानताएँ और पितृसत्ता इन सबके साथ व्यंग्य का जटिल संबंध लेखक की निगाह से छूटा नहीं है।वे दिखाते हैं कि कैसे संस्कार रीति रिवाज पारिवारिक ढाँचे लैंगिक भूमिकाएँ और भाषिक परिस्थितियाँ व्यंग्य की दिशा और लक्ष्य तय करती हैं और इसके उलट व्यंग्य इन संरचनाओं की कमजोर कड़ियों पर चोट करके नए प्रश्न और नई दृष्टि निर्मित करता है।
इस द्वंद्वात्मक पाठ के कारण पुस्तक केवल थ्योरी ऑफ सैटायर नहीं रह जाती बल्कि सोशल साइकोलॉजी ऑफ सैटायर का रूप ले लेती है।
समकालीन परिप्रेक्ष्य में लेखक विशेष रूप से डिजिटल युग के व्यंग्य पर लिखते हैं। सोशल मीडिया मीम संस्कृति स्टैंड अप कॉमेडी और ऑनलाइन कार्टूनों की तेज़ी से बदलती दुनिया के बीच व्यंग्य का स्वर गति और पहुँच किस प्रकार बदल गई है यह पुस्तक का एक रोचक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लेखक मानते हैं कि इन माध्यमों ने व्यंग्य को जनतांत्रिक और त्वरित जरूर बनाया है लेकिन साथ साथ इसने सतहीपन ट्रोलिंग समूह घृणा और नैतिक असंवेदनशीलता जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ाई हैं।
वे जिम्मेदार व्यंग्य के पक्ष में खड़े होकर यह ज़रूरत रेखांकित करते हैं कि हास्य और आलोचना दोनों के प्रयोग में मानवीय गरिमा संवेदनशीलता और निष्पक्षता के मूल्यों को न छोड़ा जाए।
पुस्तक का एक पूरा खण्ड व्यंग्य और नैतिकता के बीच नाज़ुक संतुलन पर केंद्रित है। यहाँ लेखक व्यंग्यकार के नैतिक दायित्वों की सूची तैयार करते हुए उसे सत्यनिष्ठ संवेदनशील निष्पक्ष और सुधारोन्मुख रहने की सलाह देते हैं। व्यंग्य के प्रहार का लक्ष्य व्यक्ति की गरिमा नहीं उसके असंगत आचरण और शोषक भूमिका हो यह पुस्तक बार बार स्पष्ट करती है।व्यंग्यकार को वे आक्रामक मनोरंजनकर्ता नहीं बल्कि उत्तरदायी सामाजिक हस्तक्षेपकर्ता के रूप में देखने का आग्रह करते हैं जो हास्य का सहारा लेकर भी अंततः न्याय समानता और मानवीयता की तरफ खड़ा होता है।
लेखन शैली की दृष्टि से पुस्तक मानक हिन्दी में लिखी गई है जिसमें अकादमिक अनुशासन के साथ साथ उदाहरणों और उपमानों का संयमित प्रयोग है। भाषा प्रभावी और स्पष्ट है । यह ग्रंथ सामान्य मनोरंजक पाठ से अधिक शोधार्थियों अध्यापकों तथा गंभीर लेखकों पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। विषय सूची से लेकर अंतिम अध्याय तक एक क्रमबद्धता बनी रहती है पहले व्यंग्य की परिभाषा और स्वरूप फिर व्यंग्यकार की मानसिकता उसके बाद पाठक समाज पर प्रभाव और अंत में डिजिटल युग नैतिकता तथा भविष्य की चुनौतियाँ यह क्रमिक विन्यास अध्ययन को सुगठित बनाता है।
पुस्तक में कुछ संभावित सीमाएँ भी संकेतित की जा सकती हैं। विश्लेषण का जोर लगभग पूरा सैद्धांतिक विमर्श पर है यदि समकालीन हिन्दी व्यंग्य कृतियों के अधिक विशिष्ट और विस्तृत पाठ विश्लेषण उदाहरण और उद्धरण यहाँ जोड़े जाते तो यह पुस्तक पाठ्य स्तर पर और भी प्रभावी हो सकती थी।
इसी तरह लेखक मनोविज्ञान की अवधारणाओं का व्याख्यात्मक उपयोग करते हैं । प्रयोगात्मक या क्षेत्रीय अध्ययन पाठक सर्वे या केस स्टडी जैसी अनुसंधान विधियाँ जोड़ी जा सकती हैं । अभी यह मनोविज्ञान की व्याख्यात्मक शाखा पर ही अधिक आश्रित किताब बन गई है।
व्यंग्य का मनोविज्ञान हिन्दी व्यंग्य चिंतन में एक महत्त्वपूर्ण और आवश्यक ग्रंथ की तरह अपनी तरह की पहली किताब है। यह व्यंग्य को हँसी आलोचना मनोविज्ञान समाजशास्त्र और नैतिक दर्शन के संगम बिन्दु पर रखकर प्रस्तुत करती है ।
व्यंग्य लिखने वाले रचनाकारों के लिए यह पुस्तक अपने शिल्प और अपनी जिम्मेदारी को समझने का मार्गदर्शक बन सकती है आलोचकों और शोधार्थियों के लिए यह एक ठोस सैद्धांतिक आधार और गंभीर पाठकों के लिए व्यंग्य पठन के नए कोण खोलने वाला पाठ है।
यह कृति केवल व्यंग्य का मनोविज्ञान नहीं बल्कि व्यंग्य की समग्र मानसिक सामाजिक और नैतिक संरचना का सुविचारित मानचित्र प्रस्तुत करती है । हिन्दी साहित्य में दीर्घकालीन संदर्भ ग्रंथ बनने की क्षमता रखती है।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






