डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मिलावट-प्रधान देश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मिलावट-प्रधान देश डॉ कुंदन सिंह परिहार

हमारा देश धर्म-प्रधान होने के साथ-साथ मिलावट-प्रधान भी है। यह कहना मुश्किल है कि वह धर्म-प्रधान ज़्यादा है या मिलावट-प्रधान, क्योंकि यहां करीब-करीब हर चीज़ में मिलावट होती है। मिलावट का हाल यह है कि अब शुद्ध आदमी मिलना मुश्किल हो गया है। मिलावट करने वाले पूरी निष्ठा और समर्पण-भाव से अपने काम में लगे हैं। उनके काम की निपुणता और सफाई देखकर आश्चर्य होता है। मजाल है आदमी असली नकली में भेद कर पाये। मिलावट के मामले में उनके नये-नये प्रयोग देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं।

यहां मिलावट का आलम यह है कि शुद्ध चीज़ मिलना सौभाग्य की बात मानी जाती है। बाहरी उपयोग की चीज़ें छोड़ दीजिए, जो चीज़ें शरीर के भीतर जाती हैं उन्हें भी बख्शा नहीं जाता। दाल, चावल, मसाला, घी, खोया, मिठाइयां, दवाएं, फल, सब्ज़ियां, ईनो, आटा, बेसन, दूध, मक्खन, पनीर, सरसों, शराब, जीरा, हल्दी, सब में पूरे सेवा- भाव से मिलावट की जा रही है। नकली दवाओं का मतलब समाज के लिए क्या होता है यह समझा जा सकता है। कहीं पढ़ा कि अंडे भी मिलावटी हो रहे हैं, यद्यपि मेरे लिए समझ पाना मुश्किल है कि नकली अंडे कैसे होते होंगे।

चावल में कंकड़, मसाले में बुरादा, हल्दी में पीली मिट्टी मिलना आम है। नकली दवाओं का बाज़ार अरबों का है। अभी नकली कफ़ सीरप पीकर इंदौर में कई बच्चे काल-कवलित हुए। निम्न वर्ग के शराबी हर साल मिलावटी शराब पीकर मरते हैं।

फलों और सब्ज़ियों को कार्बाइड की मदद से जल्दी पकाया और तैयार किया जाता है, लेकिन कार्बाइड मनुष्य-शरीर के लिए बहुत हानिकारक है। चने भी नकली होने की ख़बर पढ़ी। मिट्टी से बनने वाले सीमेंट के बारे में भी पढ़ा।

हाल ही में राज्यसभा में एक सदस्य ने वक्तव्य  दिया कि जांच में दूध के 71% नमूनों में यूरिया और 64% में न्यूट्रलाइज़र पाये गये, जबकि कुल  खाद्य नमूनों में 25% मिलावटी निकले। यह भी बताया गया कि गर्म मसाले में ईंट और लकड़ी का बुरादा, चाय में सिंथेटिक रंग, शहद में शुगर सीरप और मिठाइयों में देसी घी की जगह वनस्पति की मिलावट पायी गयी।

हमारे देश में नकली डिग्री, नकली आधार कार्ड, नकली प्रमाण-पत्र उपलब्ध होना मुश्किल नहीं है, बशर्ते कि आप जोखिम लेने को तैयार हों। कई नेताओं की झूठी डिग्री पर प्रश्न उठते रहे हैं। नकली नोट छापने वालों की सक्रियता के प्रमाण जब-तब मिलते रहते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ नकल के धंधे का एक नया रूप है, जिसमें कई लोगों को करोड़ों रुपयों का चूना लग चुका है।

सबसे ताज़ा ख़बर यह पढ़ी कि जूते भी नकली बन रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि नकली जूतों में क्या नकली होगा। शायद ये पहनने के अलावा दूसरे काम के लिए बन रहे होंगे। शायद नकली जूतों के प्रहार से आदमी की इज़्ज़त कम ख़राब होगी।

बाबा रामदेव के गाय के घी के बारे में पढ़ा कि वह दो प्रयोगशालाओं में जांच में खाने योग्य नहीं पाया गया। उनके मिर्च पाउडर की गुणवत्ता का मामला भी संसद में उठाया गया था।

आदमी भी अब खरा नहीं रहा। मुंह पर कुछ बोलता है, मन में कुछ और रचता है।टेक्नोलॉजी के विकास के साथ स्वार्थपरता और संकीर्णता बढ़ रही है, रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं, सुविधाओं का मोह बढ़ रहा है। नतीजतन आदमी अपने आप में सिमटता जा रहा है, टापू होता जा रहा है। इसीलिए शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखा— ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।’

मैं यह सोच सोच कर परेशान हूं कि कई नेता और धर्मगुरु धार्मिक एकता की बातें करते हैं, दूसरे धर्म वालों को अपने से कमतर समझते हैं, लेकिन धार्मिक एकता में ये मिलावट के लिए समर्पित हुनरमंद लोग कहां ‘फिट’ होंगे? क्या धार्मिक एकता के लिए ये मिलावटखोर मिलावट करना छोड़ देंगे? क्या इनका हृदय-परिवर्तन हो जाएगा? क्या ये आसानी से मिल रहे बड़े मुनाफे का लालच छोड़ देंगे? फिलहाल तो ये अपने धर्म वालों का ही मुंडन कर रहे हैं।

हम गज़ा में सत्तर हज़ार निर्दोष लोगों की मौत पर सिहरते हैं, दुखी होते हैं, लेकिन हमारे देश में सीधे हत्या के बजाय धीमे ज़हर के द्वारा करोड़ों की ‘स्लो डेथ’ का इंतज़ाम है। हम बाकी मामलों में भले ही विश्वगुरु न बन पायें, मिलावट के मामले में हमारे विश्वगुरु होने में कोई संदेह नहीं हो सकता। अन्य देश आयें और हमसे उपयोगी शिक्षा ग्रहण करें।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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