सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हार-जीत…।
रचना संसार # ८५ – गीत – हार-जीत… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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हम अपनों से हार रहे,
जग की कैसी अजब रीत रे।
हार मिली है आज मगर,
कल निश्चित ही मिले जीत रे।।
सुरभित उर की हैं साँसे,
मादक सावन का समीर है।
जलकण बन आँखे बरसे,
प्रतिपल पिया मिलन अधीर है।।
सेज सजी है सपनों की,
निशदिन गाते प्रेम गीत रे।
हार मिली है आज मगर,
कल निश्चित ही मिले जीत ले।।
खिली कली भँवरे हँसते,
यौवन इठला रहा आज है।
साँस- साँस है नाच रही,
बतला सजन ये क्या राज है।।
व्याकुल है आलिंगन को,
ऋतु में कैसी बढ़ी शीत रे ।
हार मिली है आज मगर,
कल निश्चित ही मिले जीत ले।।
तिल -तिल मैं तो नित्य जली,
अगन लगाती प्रेम ज्वाल भी।
आँख मिचौली खेलें सब,
पूछें नहीं कोई हाल भी ।।
मिलन यामिनी आयी अब,
घूँघट पट खोलते मीत रे ।।
हार मिली है आज मगर,
कल निश्चित ही मिले जीत ले।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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