श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित “व्यंग्य पच्चीसी” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९९ ☆
☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी
लेखक : सुरेश पटवा
प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल
मूल्य : ₹250
☆ विसंगतियों के विरूद्ध तीखा प्रतिकार है ‘व्यंग्य पच्चीसी’- – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हिंदी साहित्य जगत में अपनी बहुआयामी लेखनी से विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ रचनाकार सुरेश पटवा अब व्यंग्य की दुनिया में अपनी नई कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के साथ उपस्थित हैं। मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित यह संग्रह पटवा जी के गहन अनुभवों और समाज की विसंगतियों पर उनके पैनी दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।
विविधतापूर्ण लेखन का विस्तार
१९५२ में जन्मे सुरेश चंद्र पटवा एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक हैं, जिनकी स्वीकार्यता उनके भाषाई कौशल और पाठकीय संप्रेषणीयता से स्व-प्रमाणित है। बाल साहित्य, प्रकृति वर्णन, इतिहास, फिल्म जगत और मनोविज्ञान जैसे विविध विषयों पर अधिकारपूर्वक लिखने वाले पटवा जी ‘प्रयोगवादी’ रचनाकार हैं। ‘हिन्दू प्रतिरोध गाथा’ जैसी ऐतिहासिक कृति हो या ‘जंगल की सैर’ जैसी बाल रचना, उन्होंने हर विधा में अपनी शोधपरक दृष्टि का परिचय दिया है।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
‘व्यंग्य पच्चीसी’ पटवा जी का प्रथम व्यंग्य केंद्रित संग्रह है, जो समकालीन व्यंग्य लेखन की स्थापित सीमाओं को तोड़ता है। इनके आलेख किसी अखबार की शब्द-सीमा में बंधे न होकर विषय का विस्तार से विश्लेषण करते हैं। संग्रह में शामिल ‘अथ श्री मोबाइल कथा’ और ‘स्वर्गीय फेसबुकिया से संवाद’ आज के डिजिटल युग की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करते हैं। बिना पढ़े संदेश फॉरवर्ड करने की अंधी दौड़ और आभासी दुनिया में सक्रियता की होड़ को उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से उकेरा है।
साहित्यिक जगत पर कटाक्ष
संग्रह की रचनाएं जैसे ‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ लेखकों के ही आपसी अंतर्विरोधों और साहित्यिक परिवेश के वर्तमान हाल को उजागर करती हैं। वे बड़ी बेबाकी से लिखते हैं— “साहित्यजीवी भैया, असल में ईनाम वाली किताब और बिकने वाली किताब अलग-अलग होती हैं।” लोकभाषा का पुट और संवाद शैली उनके व्यंग्यों को और भी मारक बनाती है। ‘मैथी में पका नीम चढ़ा करेला’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से वे भाषाई उन्मुक्तता के साथ समाज और व्यवस्था पर चोट करते हैं।
अनुभव की परिपक्वता
अपने बैंक अधिकारी के सेवाकाल के अनुभवों को उन्होंने ‘छिद्दी का बकरी लोन’ जैसे व्यंग्य में पिरोया है, जो भ्रष्टाचार की जड़ों तक ले जाता है। वहीं ‘ओम बजटाय नमः’ और ‘अथ श्री कल्कि पुराण कथा’ जैसे शीर्षक दर्शाते हैं कि उन पर हरिशंकर परसाई जैसी महान व्यंग्य परंपरा का गहरा प्रभाव है, जिसे उन्होंने अपनी मौलिकता के साथ आगे बढ़ाया है।
निष्कर्ष
व्यंग्य केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने के लिए होता है। पटवा जी की यह कृति पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। बदलते समय के साथ जब घटनाएं खुद को दोहराती हैं, तब ये व्यंग्य और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। निश्चित ही, ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के माध्यम से सुरेश पटवा जी समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में एक सक्षम और संभावनाओं से भरपूर व्यंग्यकार के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ेंगे।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







