आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७४ ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जल प्रवाह में नर्तित रवि-किरणों में झलक तुम्हारी है।

चंद्र-रश्मियों में बिंबित छवि हमने हुलस निहारी है।।

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अवधविहारी सदा अवध तज वन सीता के साथ गया।

पंचवटी की कुटिया में महकी जीवन फुलवारी है।

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जहाँ बाँसुरी बजी, राधिका की पैंजनिया थिरक उठी।

जहाँ रँभाई गाय वहीं हँस रमता विपिन विहारी है।।

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नित्य नवल नर्मदा धार की लहर-लहर चक्रित पल-पल।

श्याम-श्वेत चट्टानों ने की चुप रह भागीदारी है।।

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बीज अंकुरित हुआ पल्लवित पुष्पित फल कर झरता है।

जर्जर तरु हर शाख अपर्णा, जाने की तैयारी है।।

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कौन कहीं का सगा यहाँ है?, किस बिन किसका काम रुका?

चार दिनों का सफर, लदी क्यों सिर पर गठरी भारी है?

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सलिलनगद सौदा करता जो, साहूकार सुखी रहता।

दुखी वहीं जिसने फैलाई जहँ-तहँ बहुत उधारी है।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१६.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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