श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्यास” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १४१ ☆ प्यास ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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यहाँ कितना बह गया
पानी नदी में
प्यास घाटों की मगर
बुझती नहीं है ।
समुंदर के पास
जाकर रुक गई है
अनवरत् सा सफ़र
मंजिल चुक गई है
डूबते विश्वास पर
ले नाव अपनी
छल रही है कामना
रुकती नहीं है ।
डूबते तटबंध
साँसों की कहानी
पर्वतों के रौद्र
रूपों की ज़ुबानी
तड़पती श्रद्धा
विकल हैं आस्थाएँ
पर ध्वजाएँ कर्म की
झुकती नहीं हैं ।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




