श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘युद्ध अहंकार का…‘।)
☆ शशि साहित्य # १९ ☆
कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
बादलों के नरम आगोश में पलकें मूंदे,
चांद मुस्कुरा रहा था,
तेज रोशनी निगल गई,
उसकी इस खुशगवारी को,
हड़बड़ा कर आंखें खोले,
देख रहा जलती धरती को
धरती कांप रही है डर से,
कैसे रक्षित करे,
लाखों जिंदगानी को,
खून के आंसू बहा रही है,
धधकता, देख अपने आंचल को,
कोई तो, कैसे तो, खत्म करे,
भीषण युद्ध की विभीषिका को,
चांद भी रोने लगा, चित्कारता देख पृथ्वी को..
विचलित हो गया, भविष्य अपना देख कर..
धिक्कार रहा है मानवता को,
कैसे रोके मनुष्य की इस आवाजाही को..
हश्र उसका भी निश्चित है,
खा जाएगा, खत्म कर देगा मानव अहंकार,
उसकी शीतल सुंदरता को..
सब दुआ करो….
इंसानियत खत्म करे, इस कलंकित कृत्य को..
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






