श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मन…‘।)
☆ शशि साहित्य # २३ ☆
कविता – मन… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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मन पर कोई जोर चले ना,
मन का वेग अनंत,
कभी यहां तो कभी वहां,
विचरे लोक परलोक,
कठोर बने ,तो पत्थर भी शर्माए,
कोमल इतना , मोम सा पिघला जाए,
कभी सूरज से ऊष्मा ले ले,
कभी शीतलता को ले अपनाए,
कभी मुखरित हो जाता है,
कभी धारण कर लेता है मौन,
कभी विश्व पर शासन करता,
कभी दुबक ,सिमट ,अपने में जाए,,
मन की लीला मनमोहन जाने,
और जान सका ना कोई,
जिसने पाई मन की थाह…
सम ईश् तुल्य हो जाए…
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

