श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९२ ☆
☆ हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
आषाढ़ की पहली फुहार के साथ ही धरती की गोद में सोए बीज जाग उठते हैं। सावन उन्हें हरियाली का आशीर्वाद देता है और भादों तक वे नवजीवन का उत्सव बन जाते हैं। यही ऋतु हमें सिखाती है कि प्रकृति में किया गया प्रत्येक निवेश समय के साथ चक्रवृद्धि होकर लौटता है।
पेड़-पौधों में लगाया गया श्रम, समय और प्रेम केवल एक पौधा नहीं उगाता, बल्कि शुद्ध वायु, शीतल छाया, वर्षा, उपजाऊ मिट्टी, पक्षियों का संगीत और आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य भी रचता है। धन का निवेश सीमित लाभ देता है, किंतु हरियाली का निवेश जीवन का विस्तार करता है। एक पौधा वर्षों बाद हजारों बीजों में बदलकर प्रकृति की संपदा को निरंतर बढ़ाता रहता है।
आषाढ़, सावन और भादों केवल ऋतुएँ नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और संवर्धन का संदेश हैं। यह समय हमें याद दिलाता है कि यदि आज हमने एक पौधा रोपा, तो उसका फल केवल हमें नहीं, उन पीढ़ियों को भी मिलेगा जिनसे हमारा कभी परिचय भी नहीं होगा। यही प्रकृति का सबसे बड़ा चक्रवृद्धि प्रतिफल है।
आइए, इस हरित ऋतु में केवल वृक्षारोपण का संकल्प ही न लें, बल्कि हर पौधे को अपने भविष्य की अमूल्य पूँजी मानकर उसका संरक्षण भी करें। क्योंकि प्रकृति का यही निवेश ऐसा है, जो कभी समाप्त नहीं होता—वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन, आशा और समृद्धि का ब्याज देता रहता है।
“धरती की सबसे समृद्ध तिजोरी बैंक का लॉकर नहीं, बल्कि वह मिट्टी है जिसमें प्रेम से रोपा गया एक पौधा आने वाले कल का वटवृक्ष बनकर पीढ़ियों को जीवन लौटाता है।”
**
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




